पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखा शासन : किलों से कचहरी तक, न्याय-व्यवस्था, कठोर दण्ड और कर-नीति

 

डॉ. भावना जुयाल

भूमिका : जब पश्चिमी रामगंगा घाटी बनी गोरखा सत्ता का रणनीतिक क्षेत्र

पश्चिमी रामगंगा घाटी उत्तराखण्ड के इतिहास में केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के संघर्ष, आवागमन और प्रशासनिक नियंत्रण की महत्वपूर्ण भूमि रही है। गोरखों के उत्तराखण्ड आगमन के बाद यह क्षेत्र उनके लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया।

गोरखा सत्ता ने इस क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए केवल सैनिक शक्ति का सहारा नहीं लिया, बल्कि दुर्ग, कारागार, स्थानीय प्रशासन, न्याय व्यवस्था और कर-वसूली—इन सभी को एक-दूसरे से जोड़कर शासन का ढाँचा विकसित किया।

पश्चिमी रामगंगा घाटी में स्थित भैरवगढ़ी और नैथनागढ़ी जैसे दुर्ग जहाँ गोरखों की सैन्य रणनीति के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, वहीं मासी का गोरखाकालीन कारागार उनके प्रशासन और दण्ड व्यवस्था की कठोरता को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

इस प्रकार इस क्षेत्र का गोरखा इतिहास हमें एक ऐसी सत्ता की तस्वीर दिखाता है जो—

दुर्गों से निगरानी करती थी,
स्थानीय अधिकारियों से शासन चलाती थी,
करों से राजस्व जुटाती थी
और कठोर दण्ड व्यवस्था से अपना नियंत्रण बनाए रखती थी।


1. पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखों के पर्वतीय दुर्ग

गोरखों की सैन्य नीति में पर्वतीय दुर्गों का विशेष महत्व था। दुर्ग केवल सैनिकों के रहने के स्थान नहीं थे, बल्कि आसपास के विस्तृत क्षेत्र पर निगरानी रखने तथा प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने के रणनीतिक केन्द्र भी थे।

पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखों द्वारा निर्मित प्रमुख दुर्गों में भैरवगढ़ी और नैथनागढ़ी उल्लेखनीय हैं। आज इन दुर्गों के अधिकांश भाग नष्ट हो चुके हैं, लेकिन इनके अवशेष गोरखा काल की सैन्य स्थापत्य परंपरा और रणनीतिक सोच के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

भैरवगढ़ी : पहाड़ की चोटी से विस्तृत क्षेत्र पर निगाह

भैरवगढ़ी का किला चाँदपुर परगने की लोहबा पट्टी में पण्डुवाल की चोटी पर बनाया गया था। इसकी ऊँची स्थिति इसे अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य चौकी बनाती थी।

यहाँ से—

  • पूर्व में गेवाड़ पट्टी,

  • पश्चिम में चोपड़ाकोट पट्टी,

  • दक्षिण में कुमाऊँ की चौकोट पट्टी,

  • तथा उत्तर में चाँदपुर सैली, सिरगुर और पिण्डरवार पट्टियों

पर निगरानी रखी जा सकती थी।

अर्थात् भैरवगढ़ी केवल एक किला नहीं था, बल्कि पश्चिमी रामगंगा क्षेत्र में गोरखा सैन्य निगरानी की आँख था।

नैथनागढ़ी : रणनीतिक नियंत्रण का दूसरा केन्द्र

गोरखाकालीन किले के अवशेष 

पाली पछाऊँ क्षेत्र में नैथना देवी मंदिर से लगभग 200 मीटर दक्षिण दिशा में स्थित गोरखाकालीन किला नैथनागढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है।

किले की योजना लगभग 20 × 15 मीटर क्षेत्र में बनाई गई थी और पश्चिम दिशा से इसमें प्रवेश किया जा सकता था। किले के चारों ओर लगभग 2 मीटर गहरी कच्ची खाई थी। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 1751 मीटर बताई जाती है।

इस प्रकार भैरवगढ़ी और नैथनागढ़ी दोनों मिलकर यह संकेत देते हैं कि गोरखों ने पश्चिमी रामगंगा घाटी और उससे जुड़े पर्वतीय क्षेत्रों को सैन्य दृष्टि से व्यवस्थित रूप से नियंत्रित करने का प्रयास किया।


2. किले से कारागार तक : प्रशासन का कठोर चेहरा

गोरखाकालीन कारागार - मासी 


सैन्य शक्ति के बाद किसी शासन की वास्तविक शक्ति उसके प्रशासन और न्याय व्यवस्था में दिखाई देती है।

गेवाड़ घाटी के मासी नामक स्थान पर गोरखों द्वारा निर्मित कारागार इस दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार यहाँ छोटी-छोटी 22 कोठरियाँ थीं। कारागार के समीप थोकदार का कार्यालय भी बनाया गया था।

आज भी इन संरचनाओं के अवशेष गोरखा कालीन प्रशासन की प्रकृति को समझने में सहायता करते हैं।

यदि भैरवगढ़ी और नैथनागढ़ी गोरखा सत्ता की सैन्य शक्ति के प्रतीक थे, तो मासी का कारागार उसकी दण्डात्मक प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक कहा जा सकता है।


3. गोरखाकालीन न्याय व्यवस्था : न्याय या दैवी परीक्षा?

गोरखा शासन में न्याय व्यवस्था आधुनिक न्यायिक व्यवस्था से बिल्कुल अलग थी। उस समय न्याय-निर्णय के लिए स्थानीय अधिकारियों से लेकर उच्च प्रशासनिक केन्द्रों तक एक व्यवस्था कार्य करती थी।

स्थानीय स्तर पर विवादों और अपराधों की प्रारम्भिक कार्यवाही होती थी। गंभीर मामलों में वादी और प्रतिवादी को अल्मोड़ा स्थित अदालत में प्रस्तुत किया जाता था।

अदालत के न्यायाधीश को ‘विचारी’ कहा जाता था।

लेकिन इस न्याय व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद पक्ष था—‘दिव्य’ अथवा दैवी परीक्षा।

जब सामान्य तरीके से किसी विवाद का निर्णय नहीं हो पाता था, तब धार्मिक विश्वास पर आधारित ऐसी परीक्षाओं का सहारा लिया जाता था, जिनमें व्यक्ति की शारीरिक क्षमता, धार्मिक आस्था अथवा कथित दैवी संरक्षण को सत्य-असत्य का प्रमाण माना जाता था।


4. आठ प्रकार के ‘दिव्य’ : जब शरीर बन गया न्याय की कसौटी

गोरखाकालीन न्याय व्यवस्था में प्रचलित दिव्य परीक्षाओं का उल्लेख ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। इन परीक्षाओं का उद्देश्य यह निर्धारित करना था कि वादी या प्रतिवादी में से कौन सत्य बोल रहा है।

1. गोला दीप

इस परीक्षा में व्यक्ति को गरम लौह-छड़ हाथ में पकड़कर कुछ दूरी तक चलना पड़ता था।

यदि उसके हाथ जल जाते, तो उसे अपराधी माना जाता था।

2. कढ़ाई दीप

इसमें व्यक्ति को खौलते तेल की कढ़ाई में हाथ डालना होता था।

हाथ जल जाने की स्थिति में उसे दोषी माना जाता था।

3. तराजू दीप

इस परीक्षा में व्यक्ति को तराजू में बैठाकर पत्थरों से तौला जाता था। उन पत्थरों को सुरक्षित रखकर अगले दिन पुनः उसी व्यक्ति को उन्हीं पत्थरों के बराबर तौला जाता था।

यदि दूसरे दिन व्यक्ति का वजन पहले दिन की तुलना में कम निकलता, तो उसे अपराधी माना जाता था।

यह विश्वास दैवी न्याय की उस धारणा पर आधारित था जिसमें माना जाता था कि अपराध करने से व्यक्ति के शरीर पर अदृश्य प्रभाव पड़ता है।

4. जल दीप अथवा बौं काटि हारया दीप

इस परीक्षा में वादी-प्रतिवादी से संबंधित तैरने में असमर्थ बच्चों को नदी अथवा तालाब में डुबोने का उल्लेख मिलता है।

जिसकी संतान डूब जाती, उसे अपराधी माना जाता था।

आज के दृष्टिकोण से यह परीक्षा अत्यंत भयावह और अमानवीय प्रतीत होती है।

5. तीर दीप

इसमें वादी को जल में सिर डुबाकर तब तक रहना होता था, जब तक प्रतिवादी द्वारा छोड़े गए तीर के पास जाकर वापस आने में लगा समय पूरा न हो जाए।

यदि वह प्रतिवादी के वापस आने तक जीवित रहता, तो उसे निर्दोष माना जाता था।

6. जहर दीप अथवा कालो हल्दो दीप

इसमें वादी और प्रतिवादी को काली हल्दी को विष के रूप में खिलाने का उल्लेख मिलता है।

जो व्यक्ति जीवित बच जाता, उसे निर्दोष माना जाता था।

7. घात दीप

स्थानीय देवी-देवता के थान में विवादित वस्तु अथवा भूमि-विवाद की स्थिति में संबंधित मिट्टी को देवस्वरूप के सामने रखा जाता था।

वस्तु उठाने के बाद यदि छह महीने तक वादी के परिवार में कोई अप्रिय घटना नहीं होती, तो उसे निर्दोष माना जाता था।

8. मंदिर दीप

वादी और प्रतिवादी के नाम अलग-अलग कागजों पर लिखकर मंदिर में देवी-देवता की मूर्ति के सामने रखे जाते थे।

पुजारी द्वारा जिस नाम की पर्ची पहले उठाई जाती, उसे निर्दोष माना जाता था।


5. न्याय व्यवस्था में धर्म की भूमिका

दिव्य परीक्षाओं के अतिरिक्त न्यायिक प्रक्रिया में धार्मिक शपथ का भी महत्व था।

वादी और प्रतिवादी को असत्य भाषण से रोकने के लिए धार्मिक ग्रंथ, मंदिर, संतान अथवा विवादित वस्तु की शपथ दिलाई जाती थी।

विभिन्न ऐतिहासिक ग्रंथों में महाभारत के हरिवंश भाग को सिर पर रखकर शपथ दिलाने का भी उल्लेख मिलता है।

इससे स्पष्ट होता है कि उस समय न्याय व्यवस्था केवल प्रशासनिक शक्ति पर आधारित नहीं थी। उसमें स्थानीय धार्मिक विश्वास, देवी-देवताओं की मान्यता और दैवी न्याय की धारणा गहराई से जुड़ी हुई थी।

लेकिन यही व्यवस्था आधुनिक दृष्टि से एक गंभीर समस्या भी प्रस्तुत करती है।

सत्य का निर्धारण प्रमाण और तर्क से नहीं, बल्कि परीक्षा के परिणाम और धार्मिक विश्वास से किया जाता था।


6. कठोर दण्ड विधान : अपराध से बड़ा दण्ड?

गोरखा शासन की न्याय व्यवस्था का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष था उसका कठोर दण्ड विधान।

अपराध सिद्ध होने पर दण्ड की प्रकृति अत्यंत कठोर हो सकती थी। शारीरिक दण्ड, अंग-भंग और मृत्युदण्ड जैसे प्रावधानों के उल्लेख मिलते हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल अपराधी को दण्डित करना नहीं, बल्कि भय के माध्यम से शासन की शक्ति स्थापित करना भी था।

इसलिए गोरखा शासन में न्याय और दण्ड को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

न्याय व्यवस्था निर्णय देती थी और दण्ड व्यवस्था उस निर्णय को भय के माध्यम से लागू करती थी।

यही कारण है कि गोरखा काल की जनस्मृति में कठोर शासन की छवि लंबे समय तक बनी रही।


7. मासी का कारागार : दण्ड व्यवस्था का जीवंत प्रमाण

मासी का कारागार इस पूरी व्यवस्था को समझने के लिए विशेष महत्व रखता है।

22 छोटी-छोटी कोठरियाँ और उनके निकट थोकदार का कार्यालय यह संकेत देते हैं कि कैद और स्थानीय प्रशासन एक संगठित व्यवस्था का हिस्सा थे।

अपराधी को स्थानीय स्तर पर हिरासत में रखा जाना, अधिकारी द्वारा उसकी निगरानी करना और उसके बाद उच्च न्यायिक व्यवस्था के सामने प्रस्तुत करना—यह सब बताता है कि गोरखा शासन ने दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में भी प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए स्थानीय संस्थाओं का उपयोग किया।

इस दृष्टि से मासी का कारागार केवल एक पुराना भवन नहीं, बल्कि पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखा शासन की प्रशासनिक स्मृति है।


8. कर नीति : सेना के लिए राजस्व, जनता पर भार

गोरखा शासन की सैन्य शक्ति को बनाए रखने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता थी। इसलिए पूर्ववर्ती राजस्व व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए अनेक प्रकार के कर लगाए गए।

भूमि-राजस्व प्रमुख आय-स्रोत था। इसके अतिरिक्त विभिन्न व्यवसायों, पशुओं, परिवारों और अन्य आर्थिक गतिविधियों से भी कर वसूले जाने के उल्लेख मिलते हैं।

राजस्व वसूली के लिए स्थानीय स्तर पर कमीण, सयाणा और ग्राम प्रधान जैसे लोगों की सहायता ली जाती थी।

लेकिन पर्वतीय अर्थव्यवस्था की सीमाओं को देखते हुए कठोर राजस्व मांग का भार ग्रामीण समाज पर पड़ता था।

जब कोई व्यक्ति कर देने में असमर्थ होता, तो वह आर्थिक संकट में फँस सकता था।  डॉ. अजय सिंह रावत जी के अनुसार दासों को दस से तीस रुपये तक की कीमत में बेचा जाता था, तो घनश्याम जोशी जी ने यह राशि 10 से 150 रुपये तक बताई है।

9. बेगार : कर केवल धन का नहीं, श्रम का भी था

गोरखा काल में जनता पर पड़ा आर्थिक भार केवल धन या अनाज तक सीमित नहीं था।

बेगार के माध्यम से राज्य अथवा अधिकारियों के लिए बिना पारिश्रमिक श्रम लेने की परंपरा भी महत्वपूर्ण थी।

पर्वतीय क्षेत्रों में जहाँ धन की अर्थव्यवस्था सीमित थी, वहाँ किसी व्यक्ति का श्रम ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति था।

जब यही श्रम राज्य की आवश्यकता के लिए बिना पारिश्रमिक लिया जाता, तो उसका सीधा प्रभाव परिवार की आजीविका पर पड़ता था।

इसलिए गोरखा काल की आर्थिक नीति को समझने के लिए केवल ‘कर’ शब्द पर्याप्त नहीं है।

इसे तीन स्तरों पर समझना अधिक उचित होगा—

**भूमि पर कर

  • श्रम पर बेगार

  • असमर्थता की स्थिति में कठोर दण्ड/दासता।**


10. पश्चिमी रामगंगा घाटी : गोरखा शासन की पूरी संरचना का आईना

पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखा शासन के विभिन्न अवशेषों को एक साथ देखें तो एक व्यापक प्रशासनिक चित्र सामने आता है।

भैरवगढ़ी — सैन्य निगरानी का केन्द्र।
नैथनागढ़ी — रणनीतिक दुर्ग।
मासी कारागार — दण्ड और प्रशासन का केन्द्र।
थोकदार का कार्यालय — स्थानीय प्रशासन का आधार।
कर व्यवस्था — राज्य की आर्थिक शक्ति।
बेगार — श्रम पर नियंत्रण।
दिव्य परीक्षाएँ — तत्कालीन न्याय-धारणा।
कठोर दण्ड — शासन की दमनात्मक शक्ति।

इन सभी को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि गोरखा शासन केवल सैनिक विजय के बाद स्थापित की गई सत्ता नहीं था। उसने सैन्य, प्रशासनिक, आर्थिक और न्यायिक संस्थाओं के माध्यम से अपना नियंत्रण कायम करने का प्रयास किया।


11. इतिहास का संतुलित मूल्यांकन

गोरखा शासन के बारे में लोकस्मृति और ऐतिहासिक स्रोतों में कठोरता, करों और दमन के अनेक उल्लेख मिलते हैं। लेकिन इतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वह किसी भी कालखंड का मूल्यांकन केवल लोककथाओं अथवा बाद की धारणाओं के आधार पर न करे।

गोरखा प्रशासन में राजस्व निर्धारण, भूमि-वर्गीकरण, अभिलेख निर्माण और स्थानीय प्रशासन के संगठन जैसे प्रयास भी दिखाई देते हैं।

इसलिए गोरखा काल का संतुलित अध्ययन हमें दो परस्पर जुड़े पक्ष दिखाता है—

एक ओर प्रशासनिक संगठन और सैन्य दक्षता,
दूसरी ओर कठोर राजस्व, दण्ड और श्रम व्यवस्था।

यही द्वंद्व इस काल को उत्तराखण्ड के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय बनाता है।


निष्कर्ष : किले मजबूत थे, पर शासन की नींव भय पर टिकी थी?

पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखा शासन के अवशेष आज भी इतिहास के अनेक प्रश्नों को हमारे सामने रखते हैं।

पर्वतों की चोटियों पर बने भैरवगढ़ी और नैथनागढ़ी बताते हैं कि गोरखों ने क्षेत्र को सैन्य दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण माना।

मासी का कारागार बताता है कि इस सैन्य सत्ता के साथ एक संगठित प्रशासनिक और दण्डात्मक तंत्र भी कार्य कर रहा था।

वहीं दिव्य परीक्षाओं, धार्मिक शपथों और कठोर दण्डों के विवरण उस समय की न्यायिक सोच को सामने लाते हैं—एक ऐसी न्याय व्यवस्था जिसमें दैवी विश्वास, शारीरिक परीक्षा और राजकीय दण्ड आपस में जुड़े हुए थे।

इसके साथ ही करों और बेगार ने ग्रामीण समाज पर आर्थिक दबाव बढ़ाया।

इसलिए पश्चिमी रामगंगा घाटी का गोरखा इतिहास केवल किलों और युद्धों का इतिहास नहीं है।

यह उस दौर की कहानी है जब—

“पर्वतों की चोटियों पर दुर्ग बने,
घाटियों में कर वसूले गए,
श्रम को बेगार बनाया गया,
और न्याय की कसौटी पर मनुष्य का शरीर तक रख दिया गया।”

यही पश्चिमी रामगंगा घाटी को गोरखा काल के अध्ययन के लिए विशिष्ट बनाता है—यहाँ आज भी दुर्ग, कारागार और प्रशासनिक अवशेष उस शासन की सैन्य शक्ति और सामाजिक प्रभाव, दोनों की कहानी कहते हैं।


संदर्भ

  1. घनश्याम जोशी — उत्तराखंड का राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, 2017।

  2. शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ — उत्तराखण्ड का इतिहास

  3. ई. टी. एटकिंसन — The Himalayan Gazetteer

  4. बद्री दत्त पाण्डे — History of Kumaun

  5. डॉ. अजय सिंह रावत — उत्तराखण्ड के सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास से संबंधित अध्ययन।

  6. तिवारी — गोरखाकालीन दुर्ग एवं स्थापत्य संबंधी अध्ययन, 2016।

  7. उत्तराखण्ड सरकार, पौड़ी गढ़वाल — जिला इतिहास संबंधी अभिलेख।

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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
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