कत्यूरी राजवंश का इतिहास | कार्तिकेयपुर का उदय और उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक राजनीतिक इतिहास

 


🌄 एक नई सत्ता की आहट

कल्पना कीजिए उस समय की, जब हिमालय की घाटियों में पुराने राज्य धीरे-धीरे अपनी पकड़ खो रहे थे। पहाड़ों की संकरी घाटियों, नदियों और जंगलों के बीच एक नई राजनीतिक शक्ति आकार ले रही थी।

इन्हीं पहाड़ियों में एक स्थान था—कार्तिकेयपुर

यह केवल एक राजधानी नहीं थी; धीरे-धीरे यह मध्य हिमालय की बदलती राजनीति का केंद्र बनने लगी। राजाओं ने भूमि दान किए, मंदिरों का निर्माण कराया और अपने शासन के प्रमाण ताम्रपत्रों पर अंकित करवाए।

आज उन राजाओं की आवाज सुनाई नहीं देती, लेकिन पाण्डुकेश्वर के ताम्रपत्र और बैजनाथ के पत्थर आज भी उनकी कहानी कहते हैं।

तो आखिर कार्तिकेयपुर का उदय कैसे हुआ और किस तरह उसकी सत्ता ने आगे चलकर कत्यूरी परंपरा को जन्म दिया?

आइए, इन प्राचीन अभिलेखों और मंदिरों के बीच छिपी उस कहानी को पढ़ते हैं… पत्थरों और ताम्रपत्रों की जुबानी।

कार्तिकेयपुर का उदय 

ब्रह्मपुर के राजनीतिक क्षितिज के धुंधला पड़ने के बाद मध्य हिमालय में एक ऐसा दौर आया, जब पुरानी सत्ता-संरचनाएँ कमजोर हो रही थीं और नए राजनीतिक केंद्र आकार ले रहे थे। इसी संक्रमण के बीच कार्तिकेयपुर का नाम उभरता है।

यहीं से उत्तराखण्ड के मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास का वह अध्याय शुरू होता है, जिसे बाद के इतिहास-लेखन में कत्यूरी परंपरा के नाम से विशेष पहचान मिली।

लेकिन प्रश्न यह है—कार्तिकेयपुर की सत्ता कहाँ से आई? उसकी राजधानी कहाँ थी? उसके वास्तविक शासक कौन थे और किस प्रकार यह सत्ता इतनी प्रभावशाली बनी कि कुमाऊँ और गढ़वाल के बड़े भूभाग को एक राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में जोड़ने लगी?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें मुख्यतः ताम्रपत्रों, शिलालेखों, मंदिर स्थापत्य और बाद की ऐतिहासिक परंपराओं से मिलते हैं।

कार्तिकेयपुर : नाम में छिपी है एक राजधानी की कहानी

कार्तिकेयपुर का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उसकी पहचान से जुड़ा है। आज के बैजनाथ-कत्यूर घाटी क्षेत्र को प्रायः प्राचीन कार्तिकेयपुर से जोड़ा जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी बैजनाथ को प्राचीन कार्तिकेयपुर के रूप में अक्सर पहचाने जाने वाला स्थल बताता है और इसे मध्य हिमालय की प्रारंभिक ऐतिहासिक राजसत्ता से जोड़ता है। ASI के अनुसार, इस क्षेत्र में राजधानी के जोशीमठ से यहाँ स्थानांतरित होने की परंपरा भी मिलती है।

इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि बैजनाथ-कत्यूर घाटी को कार्तिकेयपुर की पहचान से जोड़ने के पर्याप्त ऐतिहासिक आधार हैं, लेकिन इसकी पहचान को निर्विवाद तथ्य की तरह प्रस्तुत करने के बजाय अभिलेखीय संदर्भ में देखना चाहिए।

कार्तिकेयपुर का महत्व केवल राजधानी होने में नहीं था। यह उस राजनीतिक शक्ति का केंद्र बना जिसने हिमालयी भूभाग के अनेक हिस्सों को एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक व्यवस्था में जोड़ने की क्षमता दिखाई।

हाल के शोध में भी कत्यूरी सत्ता को मध्य हिमालय की ऐसी प्रारंभिक ऐतिहासिक शक्ति माना गया है जिसने कुमाऊँ और गढ़वाल को एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सत्ता की पहली मजबूत झलक : अभिलेख

कार्तिकेयपुर के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लोककथाओं के साथ-साथ ताम्रपत्र और शिलालेख भी उपलब्ध हैं।

बागेश्वर, पांडुकेश्वर, बालेश्वर और अन्य स्थानों से प्राप्त अभिलेख इस राजसत्ता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। पांडुकेश्वर से ललितशूरदेव, पद्मटदेव और सुभिक्षराजदेव के ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। अभिलेखीय सामग्री की सूची में ललितशूरदेव के 21वें और 22वें वर्ष के ताम्रपत्र, कंडारा का ताम्रपत्र तथा सुभिक्षराजदेव के चौथे वर्ष का ताम्रपत्र भी दर्ज हैं।

ललितशूरदेव के 21वें और 22वें राजकीय वर्षों के ताम्रपत्रों की तिथियों को लगभग 853–854 ईस्वी से जोड़ा गया है। इससे आठवीं-नौवीं शताब्दी में इस सत्ता के सुदृढ़ राजनीतिक अस्तित्व का महत्वपूर्ण प्रमाण मिलता है।

यही वे अभिलेख हैं जो कार्तिकेयपुर को केवल लोकस्मृति का विषय नहीं रहने देते, बल्कि उसे एक वास्तविक ऐतिहासिक राजनीतिक सत्ता के रूप में सामने लाते हैं।

कौन थे कार्तिकेयपुर के शासक?

यहाँ इतिहास थोड़ा रोचक और जटिल हो जाता है।

परंपरागत इतिहास-लेखन में कार्तिकेयपुर के शासकों को एक लंबे कत्यूरी राजवंश के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है, किंतु अभिलेखों का तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि इस राजनीतिक क्षेत्र में एक से अधिक शासकीय परिवार सक्रिय रहे।

अभिलेखीय परंपरा में एक क्रम संतन/वासंतदेव, खरपरदेव, कल्याणराजदेव और त्रिभुवनराजदेव आदि से जुड़ता दिखाई देता है। इसके बाद निंबर/निम्बरदेव, इष्टगणदेव, ललितशूरदेव और भूदेव की परंपरा सामने आती है। आगे चलकर सलोणादित्य, इच्छटदेव, पद्मटदेव और सुभिक्षराजदेव जैसे शासकों के अभिलेख मिलते हैं। डॉ. यशवंत सिंह कठौच ने भी इन राजपरिवारों और उनके क्रम को अलग-अलग अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर समझाया है।
एक पुरातात्विक सर्वेक्षण रिपोर्ट भी बागेश्वर, बालेश्वर और पांडुकेश्वर के अभिलेखों से इन अलग-अलग शासकीय क्रमों की वंशावलियों को जोड़ती है।

इसलिए “कत्यूरी राजवंश” को एक लंबे, एकरेखीय राजवंश के बजाय कार्तिकेयपुर-केंद्रित प्रारंभिक मध्यकालीन शासकीय परंपराओं के व्यापक नाम के रूप में समझना अधिक सुरक्षित है।

ललितशूरदेव : अभिलेखों में दिखाई देने वाला प्रभावशाली शासक

इन शासकों में ललितशूरदेव का स्थान विशेष महत्व रखता है।

उनके नाम से पांडुकेश्वर के ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। 21वें और 22वें राजकीय वर्षों के अभिलेख इस बात का संकेत देते हैं कि उनका शासन पर्याप्त रूप से संगठित था और प्रशासनिक तथा धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान दिए जाते थे।

ललितशूरदेव के अभिलेख केवल राजकीय शक्ति की कहानी नहीं कहते। वे उस समय के सामाजिक और धार्मिक जीवन की झलक भी देते हैं। उदाहरण के लिए, पांडुकेश्वर अभिलेख से संबंधित परंपरा में स्थानीय धार्मिक उत्सवों का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि राजसत्ता का संबंध केवल युद्ध और प्रशासन से नहीं था, बल्कि स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन से भी जुड़ा हुआ था।

यही कारण है कि ललितशूरदेव का काल कार्तिकेयपुर की राजनीतिक परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण चरण माना जा सकता है।

पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र : कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव के शासनकाल का महत्वपूर्ण अभिलेख, जो प्रारम्भिक मध्यकालीन उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास का प्रमुख स्रोत है।


सुभिक्षराजदेव और बदलती राजधानी

कार्तिकेयपुर की कहानी का सबसे रोचक अध्याय सुभिक्षराजदेव से जुड़ता है।

उनके चौथे राजकीय वर्ष का पांडुकेश्वर ताम्रपत्र सुभिक्षपुर नामक नगर से जारी हुआ था। अभिलेख के संपादक हेरानंद शास्त्री ने इसे सुभिक्षराजदेव से संबंधित नगर और उनकी राजधानी माना है, हालांकि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि सुभिक्षपुर पुराने कार्तिकेयपुर के ठीक पास था।

इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि समय के साथ सत्ता का प्रशासनिक केंद्र बदल रहा था और नए राजनीतिक-नगरीय केंद्र विकसित हो रहे थे।

अभिलेख में सुभिक्षराजदेव द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भूमि-अनुदान दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इससे उस समय के प्रशासन, भूमि-व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं के बीच संबंधों का पता चलता है।

राज्य की अर्थव्यवस्था : पहाड़ की जमीन से राजकोष तक

कार्तिकेयपुर की शक्ति केवल तलवार से नहीं बनी थी। उसकी वास्तविक नींव भूमि, कृषि, वन और पर्वतीय संसाधनों पर टिकी थी।

डॉ. अजय रावत ने अपने ऐतिहासिक विवरणों में राज्य की आय के प्रमुख साधनों के रूप में कृषि, खनिज और वनों का उल्लेख किया है। भूमि की माप और उसके अभिलेख रखने के लिए अलग-अलग अधिकारियों की व्यवस्था का भी वर्णन मिलता है।

उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री में भूमि-मापन से जुड़े प्रभातर, क्षेत्रपाल और उपचारिक/पट्टकोषचारिक जैसे पदों का उल्लेख मिलता है। पांडुकेश्वर के अभिलेखों में द्रोण और नाली जैसे भूमि-मापन संबंधी मानकों के संकेत भी मिलते हैं।

इससे पता चलता है कि पहाड़ों में शासन केवल स्थानीय मुखियाओं पर निर्भर नहीं था, बल्कि भूमि और राजस्व को व्यवस्थित करने की प्रशासनिक कोशिशें भी की जा रही थीं।

व्यापार और प्राकृतिक संसाधन

हिमालय का भूगोल कार्तिकेयपुर के लिए चुनौती भी था और अवसर भी।

वनों से मिलने वाली वस्तुएँ, पशुधन, ऊन, औषधीय वनस्पतियाँ और अन्य पर्वतीय उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे होंगे। कृषि के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण ने राज्य को आर्थिक आधार दिया।

यही आर्थिक आधार राजनीतिक शक्ति को बनाए रखने, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को दान देने तथा प्रशासनिक व्यवस्था चलाने में सहायक रहा।

धर्म : केवल एक परंपरा की कहानी नहीं

कार्तिकेयपुर के इतिहास का धार्मिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में शंकराचार्य के काल, बौद्ध धर्म के प्रभाव और बाद में ब्राह्मणवाद और धार्मिक परंपराओं के सुदृढ़ होने की चर्चा है।

लेकिन यहाँ इतिहास और परंपरा के बीच अंतर समझना जरूरी है।

आदि शंकराचार्य के उत्तराखण्ड आगमन की परंपरा अत्यंत प्रसिद्ध है, किंतु उनके प्रभाव को सीधे किसी एक राजनीतिक परिवर्तन या बौद्ध धर्म के तत्काल पतन का कारण मानना इतिहासकारों के लिए सरल निष्कर्ष नहीं है। आधुनिक शोध भी इस काल में धार्मिक परिवर्तन को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं से जोड़कर देखने की आवश्यकता बताता है।

कार्तिकेयपुर के अभिलेखों में शिव, विष्णु और देवी परंपराओं से जुड़े दान और धार्मिक संस्थाओं के प्रमाण मिलते हैं। उदाहरण के लिए सुभिक्षराजदेव के अभिलेख में दुर्गा और नारायण से संबंधित भूमि-अनुदानों का उल्लेख मिलता है।

अर्थात यह काल केवल “शैव” या केवल “वैष्णव” कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ साथ-साथ दिखाई देती हैं।

मंदिरों ने सत्ता की पहचान बदल दी

कार्तिकेयपुर की राजनीतिक शक्ति का सबसे स्थायी प्रमाण शायद उसके मंदिर हैं।

बैजनाथ का मंदिर-समूह आज भी मध्यकालीन हिमालयी स्थापत्य परंपरा की महत्वपूर्ण स्मृति को जीवित रखता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, बैजनाथ या वैद्यनाथ में मुख्य शिव मंदिर के साथ 17 सहायक मंदिर हैं। इनमें केदारेश्वर, लक्ष्मी-नारायण और ब्राह्मणी देवी के मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इस स्थापत्य परंपरा ने पहाड़ों में केवल धार्मिक जीवन को प्रभावित नहीं किया, बल्कि राजनीतिक सत्ता को भी सांस्कृतिक पहचान दी।

राजा बदल गए, राजधानियाँ बदलीं, लेकिन पत्थरों में गढ़ी यह स्मृति आज भी बची हुई है।


दक्षिणी गढ़वाल में दूसरी शक्तियाँ

कार्तिकेयपुर की शक्ति के समानांतर गढ़वाल के दक्षिणी हिस्सों में अन्य राजनीतिक केंद्र भी मौजूद थे। "उत्तराखंड का नवीन इतिहास" पुस्तक में  मयूर-राज्य का उल्लेख मिलता है, जिसकी राजधानी मयूरनगर/मोरध्वज से जोड़ी गई है और जिसे बाद में बाडुक द्वारा पराजित किए जाने की बात कही गई है।

इसी प्रकार बाद के काल में कनकवंश/परमार परंपरा का उदय दिखाई देता है। उक्त पुस्तक में चांदपुरगढ़ के कनकपाल से संबंधित परंपरा और उसके आधार पर कनकवंश की स्थापना का विवरण दिया गया है। साथ ही पुस्तक स्वयं यह सावधानी भी रखती है कि कुछ प्रशस्ति-संबंधी दावों को सीधे ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

इसलिए कनकपाल की कथा को कत्यूरी सत्ता की निरंतरता के रूप में नहीं, बल्कि बाद के गढ़वाली राजनीतिक इतिहास की अलग परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है।

कार्तिकेयपुर से “कत्यूरी” तक

यहीं इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है।

आज हम जिस नाम से कत्यूरी राजवंश को जानते हैं, उसका ऐतिहासिक अध्ययन मुख्यतः अभिलेखों, मंदिरों, स्थानीय परंपराओं और बाद के इतिहास-लेखन को जोड़कर किया गया है।

हाल के शोध में भी यह स्वीकार किया गया है कि सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच के इस इतिहास में स्रोत सीमित हैं और विशेषकर प्रारंभिक चरण के लिए अनेक प्रश्न अभी खुले हुए हैं। फिर भी उपलब्ध अभिलेख इस बात को मजबूत आधार देते हैं कि मध्य हिमालय में एक प्रभावशाली राजनीतिक सत्ता विकसित हुई जिसने कुमाऊँ और गढ़वाल के व्यापक भूभाग को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसलिए कार्तिकेयपुर केवल एक राजधानी का नाम नहीं था। यह उस राजनीतिक प्रक्रिया का प्रतीक था जिसमें मध्य हिमालय पहली बार एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक एकता की ओर बढ़ता दिखाई देता है।

और शायद यही कारण है कि सदियों बाद भी “कत्यूरी” नाम लोकगीतों, जागरों, मंदिरों और इतिहास की पुस्तकों में जीवित रहा।

निष्कर्ष

ब्रह्मपुर के बाद का राजनीतिक शून्य लंबे समय तक खाली नहीं रहा। कार्तिकेयपुर ने उस शून्य को भरा और धीरे-धीरे एक ऐसी शक्ति के रूप में उभरा जिसका प्रभाव मध्य हिमालय के बड़े भूभाग पर दिखाई देता है।

ताम्रपत्रों में दर्ज राजाज्ञाएँ, पहाड़ों में खड़े मंदिर, भूमि-अनुदानों की सूचियाँ और लोकस्मृति—इन सबको साथ पढ़ने पर कार्तिकेयपुर का इतिहास सामने आता है।

यह इतिहास हमें बताता है कि उत्तराखण्ड का मध्यकाल केवल छोटे-छोटे पहाड़ी राज्यों की कहानी नहीं था; यह राजनीतिक एकीकरण, प्रशासनिक विकास, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, धार्मिक परिवर्तन और स्थापत्य उत्कर्ष की भी कहानी थी।

और यहीं से आगे एक नया प्रश्न जन्म लेता है—

जब कार्तिकेयपुर की शक्ति कमजोर हुई, तो उसकी राजनीतिक विरासत किन-किन शाखाओं में बंटी? और इसी विखंडन से आगे चलकर कुमाऊँ में चंद तथा गढ़वाल में परमार-पंवार सत्ता के लिए जमीन कैसे तैयार हुई? क्या कत्यूरी राजवंश अन्य शाखाएं भी थी? यदि हाँ तो कहाँ?

यही हमारी अगली कड़ी का विषय होगा।                             

संदर्भ:
उत्तराखण्ड का मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास; Hirananda Shastri, Epigraphia Indica, Vol. XXXI; Archaeological Survey of India, Dehradun Circle; Dolly Purohit (2025); बागेश्वर, बालेश्वर एवं पाण्डुकेश्वर के अभिलेख।

                                                                                                                                 "जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"

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