मृद्भांडों, धातु-साक्ष्यों, समाधियों, प्राचीन समुदायों और अभिलेखीय परंपराओं के बीच उत्तराखण्ड के अतीत की खोज
हिमालय की ऊँची चोटियों, गहरी नदी-घाटियों और दुर्गम पर्वतीय अंचलों में बसा उत्तराखण्ड केवल प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आस्था की भूमि नहीं है। इसकी मिट्टी, चट्टानों, गुफाओं और नदी-घाटियों में मानव सभ्यता की अत्यंत प्राचीन स्मृतियाँ भी सुरक्षित हैं।
लखु उडियार और हुडुली के शैलचित्रों से लेकर पाषाण औजारों, महापाषाणीय समाधियों, प्राचीन मृद्भांडों, धातु-अवशेषों और अभिलेखों तक—उत्तराखण्ड का पुरातात्त्विक परिदृश्य मानव जीवन के विकास की अनेक परतें खोलता है।
हमारी पिछली श्रृंखला में हमने उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक काल, पाषाण औजारों और शैलचित्रों को समझने का प्रयास किया। लेकिन इसके बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—
इन प्रारम्भिक मानव समुदायों के बाद उत्तराखण्ड में इतिहास की ओर बढ़ते कदमों को हम कैसे पहचानें?
यहीं से शुरू होती है उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास की कहानी।
आद्य इतिहास क्या है?
इतिहास के अध्ययन में आद्य ऐतिहासिक काल (Protohistoric Period) उस चरण को कहा जाता है जिसके बारे में पुरातात्त्विक अथवा अन्य प्रमाण तो उपलब्ध होते हैं, लेकिन लिखित स्रोत या तो सीमित होते हैं, अस्पष्ट होते हैं अथवा अभी पूरी तरह पढ़े और समझे नहीं जा सके हैं।
सरल शब्दों में इसे इस प्रकार समझ सकते हैं—
प्रागैतिहासिक काल → आद्य ऐतिहासिक काल → ऐतिहासिक काल
लेकिन यह क्रम हर क्षेत्र में एक जैसी तिथि पर लागू नहीं होता। कहीं कृषि पहले विकसित हुई, कहीं धातु तकनीक, कहीं लेखन और कहीं संगठित राजनीतिक व्यवस्था।
इसलिए उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास को समझने के लिए हमें उसके स्थानीय पुरातात्त्विक साक्ष्यों को केंद्र में रखना होगा।
पत्थर से धातु तक : बदलती दुनिया के संकेत
प्रागैतिहासिक मानव के लिए पत्थर जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साधन था। शिकार, भोजन-संग्रह और प्रकृति पर निर्भर जीवन से आगे बढ़ते हुए मानव ने कृषि, पशुपालन, स्थायी अथवा अर्ध-स्थायी बस्तियों और नई तकनीकों को अपनाना शुरू किया।
इसी क्रम में धातु का प्रयोग मानव सभ्यता के विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
तांबे और बाद में लोहे के उपयोग ने औजारों, कृषि, निर्माण और युद्ध की तकनीकों को बदल दिया। उत्तराखण्ड में मिले विभिन्न पुरातात्त्विक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि हिमालयी समाज व्यापक भारतीय सांस्कृतिक परिवर्तनों से पूरी तरह अलग-थलग नहीं था।
हाँ, हिमालय की भौगोलिक परिस्थितियों ने इस परिवर्तन को अपना विशिष्ट रूप दिया। ऊँची पर्वत-श्रृंखलाएँ, संकरी घाटियाँ, नदियाँ और दर्रे बाधा होने के साथ-साथ संपर्क के मार्ग भी रहे होंगे।
मिट्टी के बर्तन : इतिहास की सबसे शांत लेकिन महत्वपूर्ण आवाज
पुरातत्त्व में मृद्भांड अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं।
उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास में चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware—PGW) विशेष महत्त्व रखते हैं।
और यहीं से सामने आते हैं दो महत्वपूर्ण स्थल—थापली और पुरोला।
थापली : अलकनंदा घाटी में पहुँची चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति
श्रीनगर के निकट अलकनंदा नदी के तट पर स्थित थापली उत्तराखण्ड के आद्य ऐतिहासिक पुरातत्त्व का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है।
पुरातात्त्विक अनुसंधानों में थापली से Painted Grey Ware (PGW) की उपस्थिति स्थापित हुई है। शोधकर्ताओं के अनुसार थापली और पुरोला की खोज ने यह स्पष्ट किया कि चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति केवल गंगा-यमुना के मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं थी, बल्कि मध्य हिमालय के भीतर तक इसके प्रमाण मिलते हैं। (IGNCA)
थापली से प्राप्त PGW में मुख्यतः कटोरे और थालीनुमा पात्र मिले हैं तथा एक चित्रित लघु पात्र भी उल्लेखनीय है। (IGNCA)
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उत्तराखण्ड को उत्तर भारत की व्यापक सांस्कृतिक गतिविधियों के संदर्भ में देखने का अवसर मिलता है।
अर्थात—
अलकनंदा केवल तीर्थों की नदी नहीं थी; उसकी घाटी प्राचीन मानव गतिविधियों और सांस्कृतिक संपर्कों की भी वाहक रही।
पुरोला : यमुना घाटी की एक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक कड़ी
उत्तरकाशी जिले का पुरोला उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास का एक और महत्वपूर्ण स्थल है।
यहाँ के उत्खनन से चित्रित धूसर मृद्भांड के अवशेषों के साथ टेराकोटा आकृतियाँ, मनके, मृद्भांडों पर कुम्हार के चिह्न तथा घोड़े के दाँत और जांघ की हड्डी के अवशेष मिलने की सूचना है। (Uttarakhand PSC Notes)
पुरोला की यह सामग्री हमें केवल एक प्राचीन बस्ती की जानकारी नहीं देती; यह उस समय के लोगों की तकनीक, जीवनशैली और संभावित सांस्कृतिक संपर्कों को समझने का अवसर देती है।
पुरोला से संबंधित एक अन्य रोचक पुरातात्त्विक विवरण में ईंटों से निर्मित वेदिका का उल्लेख मिलता है, जिसे उत्खननकर्ता ने श्येनचिति से संबद्ध किया है।
हालाँकि ऐसे पुरातात्त्विक साक्ष्यों की व्याख्या करते समय सावधानी जरूरी है। किसी मृद्भांड या घोड़े की अस्थि को सीधे किसी एक जाति, साहित्यिक परंपरा या धार्मिक समूह से जोड़ देना उचित नहीं होगा।
पुरातत्त्व साक्ष्य देता है; इतिहासकार उन साक्ष्यों के बीच संबंध खोजता है।
क्या अलकनंदा घाटी से उत्तर-हड़प्पाकालीन गेरुए मृद्भांड मिले थे?
यह प्रश्न उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास को लिखते समय विशेष सावधानी की माँग करता है।
उत्तर भारत में गेरुए रंग के मृद्भांड (Ochre Coloured Pottery—OCP) और उत्तर-हड़प्पाकालीन सांस्कृतिक चरणों का अध्ययन हुआ है, लेकिन अलकनंदा घाटी के संदर्भ में उपलब्ध स्पष्ट पुरातात्त्विक प्रकाशन थापली से PGW की उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं। (IGNCA)
इसलिए उत्तराखण्ड के लेख में यह कहना अधिक सुरक्षित और प्रमाणिक है कि—
“अलकनंदा घाटी के थापली से चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।”
इसे बिना विशिष्ट प्रमाण के उत्तर-हड़प्पाकालीन गेरुए मृद्भांड कहना उचित नहीं होगा।
यह सावधानी लेख को कमजोर नहीं करती; बल्कि उसे शोधपरक विश्वसनीयता देती है।
कोल, किरात और खस : इतिहास के धुँधले पन्नों की कहानी
पुरातात्त्विक साक्ष्यों के साथ उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास में प्राचीन समुदायों की चर्चा भी महत्वपूर्ण है।
उत्तराखण्ड के पारंपरिक इतिहासलेखन में कोल, किरात और खस जैसे समुदायों का उल्लेख मिलता है। कुछ इतिहासकारों ने कोल अथवा मुण्ड समुदाय को हिमालय के प्राचीन निवासियों में माना और उनके बाद किरात तथा खस समुदायों के आगमन की परिकल्पना की।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
कोल → किरात → खस
को एक निर्विवाद और निश्चित पुरातात्त्विक क्रम मानना उचित नहीं है। इन समुदायों की पहचान, उनके आगमन का काल और उनके पारस्परिक संबंधों के विषय में इतिहासलेखन में मतभेद हैं।
इसी प्रकार “किरातों ने कोलों को दास बना लिया” जैसे कथन को भी निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके समर्थन में प्रत्यक्ष पुरातात्त्विक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं।
इसलिए इसे इतिहासलेखन की एक परंपरागत धारणा के रूप में देखना अधिक उचित होगा।
यही अंतर एक अच्छे इतिहास-लेख और लोककथा में होता है—
लोकस्मृति प्रश्न देती है, जबकि पुरातत्त्व और इतिहास उसके प्रमाण खोजते हैं।
क्या सिंधु घाटी सभ्यता का उत्तराखण्ड से संबंध था?
यह प्रश्न स्वाभाविक है।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता का मुख्य विकास उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ। उत्तराखण्ड में अभी तक हड़प्पा के प्रमुख नगरों जैसी नगरीय संरचनाएँ नहीं मिली हैं। इसलिए यह कहना कि “उत्तराखण्ड सिंधु सभ्यता का हिस्सा था”, वर्तमान प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा।
हाँ, उत्तर भारत और हिमालय के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संपर्कों की संभावना को व्यापक पुरातात्त्विक संदर्भ में देखा जा सकता है।
थापली और पुरोला में PGW की उपस्थिति ने विशेष रूप से यह दिखाया कि उत्तर भारत की कुछ सांस्कृतिक परंपराएँ हिमालय के भीतर तक पहुँची थीं। शोधकर्ताओं ने इसे PGW संस्कृति की हिमालयी सीमा के विस्तार के रूप में महत्वपूर्ण माना है। (IGNCA)
इसलिए लेख में “सांस्कृतिक संपर्क” कहना अधिक उचित है, बजाय इसके कि किसी बड़े सभ्यतागत विस्तार का दावा कर दिया जाए।
बिनसर महादेव : अभिलेख, रहस्य और लोकविश्वास
पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण क्षेत्र में स्थित बिनसर महादेव मंदिर भी प्राचीन अभिलेखीय परंपरा की दृष्टि से उल्लेखनीय है। मंदिर की एक दीवार पर एक प्राचीन अभिलेख उत्कीर्ण है, जिसे स्थानीय परंपरा में ‘विश्वकर्मा द्वारा लिखा हुआ’ माना जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि अभिलेख की लिपि सामान्य जन के लिए सहज पठनीय नहीं है। स्थानीय लोगों में प्रचलित इस विश्वास ने इस अभिलेख को रहस्य और लोक-आस्था से जोड़ दिया है।
यदि इसे शंख लिपि का अभिलेख माना जाता है, तो यह उत्तराखण्ड की प्राचीन लिपि-परंपराओं और अभिलेखीय इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। हालांकि किसी अभिलेख की वास्तविक तिथि, लिपि और आशय निर्धारित करने के लिए पैलियोग्राफिक अध्ययन तथा विशेषज्ञों द्वारा प्रत्यक्ष परीक्षण आवश्यक है। इसलिए इसे बिना प्रमाण के निश्चित काल या किसी ऐतिहासिक व्यक्ति से जोड़ना उचित नहीं होगा।
यही इस अभिलेख की सबसे रोचक विशेषता है—एक ओर पत्थर पर अंकित अज्ञात अक्षर हैं और दूसरी ओर उनसे जुड़ी लोकस्मृति। इतिहासकार जहाँ उन अक्षरों को पढ़कर उनका वास्तविक अर्थ और काल निर्धारित करने का प्रयास करते हैं, वहीं स्थानीय समाज ने अपनी कल्पना और आस्था के माध्यम से उन्हें विश्वकर्मा से जोड़ दिया। इस प्रकार बिनसर महादेव का यह अभिलेख पुरातत्त्व, अभिलेख-विज्ञान और लोकविश्वास—तीनों के संगम का उदाहरण बन जाता है।
पुरातत्त्वविद के लिए वह एक अनपढ़ा चिह्न है; स्थानीय समाज के लिए वही विश्वकर्मा की स्मृति।
यानी एक ही पत्थर—दो अलग-अलग अर्थ।
जब इतिहास ने स्वयं को लिखना शुरू किया : कालसी
आद्य इतिहास से लिखित इतिहास की ओर बढ़ते हुए सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है—
अभिलेख
जब किसी समाज के अपने समय के लिखित प्रमाण सामने आने लगते हैं, तो इतिहासकार के पास पुरातात्त्विक सामग्री के साथ एक नया स्रोत जुड़ जाता है।
उत्तराखण्ड में इसका सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणिक उदाहरण है—
कालसी का अशोक शिलालेख
भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अनुसार कालसी वह महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ सम्राट अशोक के चौदह प्रमुख शिलालेखों का समूह एक शिला पर उत्कीर्ण है। ये अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं। (Dehradun Circle)
यहाँ उत्तराखण्ड के इतिहास में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है।
अब हमारे पास केवल—
मिट्टी नहीं, शब्द भी हैं।
अब पुरातत्त्व के साथ अभिलेख इतिहास की आवाज बनने लगता है।
कुणिंद : जब हिमालयी समाज राजनीतिक पहचान की ओर बढ़ा
आगे चलकर उत्तराखण्ड और उसके आसपास के हिमालयी क्षेत्र में कुणिंदों का उल्लेख मिलता है।
कुणिंदों के अध्ययन में उनकी मुद्राएँ विशेष महत्व रखती हैं। इनसे राजनीतिक सत्ता, अर्थव्यवस्था, धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक संपर्कों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं।
यहाँ इतिहास की यात्रा एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई देती है—
पुरास्थल → संस्कृति → समुदाय → राजनीतिक संगठन → मुद्रा → अभिलेख
अब अतीत केवल मिट्टी की परतों में नहीं है; वह अपनी राजनीतिक पहचान भी व्यक्त करने लगा है।
हिमालय : क्या पर्वत वास्तव में बाधा थे?
उत्तराखण्ड के इतिहास को देखते हुए एक पुरानी धारणा पर पुनर्विचार आवश्यक है—
क्या हिमालय ने यहाँ के लोगों को बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग रखा था?
शायद नहीं।
नदियों की घाटियाँ, पर्वतीय दर्रे और प्राकृतिक मार्ग प्राचीन समुदायों के लिए आवागमन और संपर्क के रास्ते भी रहे होंगे।
अलकनंदा, यमुना और अन्य नदी घाटियों के पुरातात्त्विक साक्ष्य हमें यह सोचने का आधार देते हैं कि हिमालय केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं था।
वह संपर्क का क्षेत्र भी था।
इसीलिए उत्तराखण्ड के पुरातात्त्विक साक्ष्यों को केवल स्थानीय इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि हिमालय और उत्तर भारतीय मैदानों के व्यापक सांस्कृतिक नेटवर्क के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
प्रागैतिहासिक से ऐतिहासिक तक : एक लंबी यात्रा
उत्तराखण्ड का इतिहास किसी एक दिन अचानक शुरू नहीं हुआ।
यह हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुई प्रक्रिया थी—
यह यात्रा सीधी रेखा में नहीं चली होगी। अलग-अलग घाटियों और समुदायों में परिवर्तन की गति अलग रही होगी।
लेकिन प्रत्येक पुरातात्त्विक परत हमें उस विशाल परिवर्तन की एक झलक देती है।
एक मिट्टी का टुकड़ा और हजारों वर्षों की कहानी
उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास की सबसे सुंदर बात यही है कि यहाँ इतिहास हमें हमेशा राजाओं की वंशावली से नहीं मिलता।
कहीं—
मिट्टी का एक छोटा-सा टुकड़ा है।
कहीं—
चट्टान पर बना एक रहस्यमय चिह्न।
कहीं—
मृतक की समाधि।
कहीं—
धातु का छोटा-सा उपकरण।
कहीं—
घोड़े की अस्थि।
और अंततः—
कालसी की चट्टान पर खुदे हुए अक्षर।
इन छोटे-छोटे साक्ष्यों को जोड़कर इतिहासकार उस विशाल अतीत की तस्वीर बनाते हैं जिसे समय ने लगभग मिटा दिया था।
यही पुरातत्त्व का आकर्षण है।
एक छोटा साक्ष्य—एक बड़ा प्रश्न।
निष्कर्ष : पत्थरों से शब्दों तक
उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास वास्तव में मौन साक्ष्यों को पढ़ने की कला है।
जहाँ कोई राजा अपना नाम नहीं लिख गया, वहाँ एक मृद्भांड बोलता है।
जहाँ कोई इतिहासकार उपस्थित नहीं था, वहाँ एक धातु का औजार कहानी कहता है।
जहाँ कोई लिखित ग्रंथ नहीं मिला, वहाँ एक समाधि हमें मृत्यु और विश्वास के बारे में सोचने को विवश करती है।
जहाँ किसी चट्टान पर अनजाने चिह्न हैं, वहाँ लोकस्मृति उन्हें विश्वकर्मा की लेखनी मानकर अपने ढंग से अर्थ देती है।
और जहाँ पुरातत्त्व के साथ अभिलेख जुड़ जाता है, वहाँ इतिहास की आवाज और स्पष्ट हो जाती है।
इस दृष्टि से उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास केवल अतीत की खोज नहीं है। यह उस प्रक्रिया को समझने का प्रयास है जिसमें मानव समुदायों ने अपने परिवेश को समझते हुए तकनीक, समाज, संस्कृति, विश्वास और राजनीतिक पहचान की जटिल दुनिया का निर्माण किया।
प्रागैतिहासिक औजारों से लेकर थापली और पुरोला के मृद्भांडों तक, मालारी की समाधियों से लेकर बिनसर की रहस्यमय अभिलेखीय परंपरा तक और अंततः कालसी के अशोक शिलालेख तक—उत्तराखण्ड की धरती एक लंबी कहानी सुनाती है।
एक ऐसी कहानी जिसमें—
और शायद यही इतिहास की सबसे सुंदर यात्रा है—
“जब मनुष्य ने पत्थर को आकार दिया, तब संस्कृति ने जन्म लिया;और जब उसने अपने अनुभवों को शब्दों में दर्ज किया, तब इतिहास ने स्वयं को पहचान लिया।”
अंतिम विचार
उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास अभी पूर्णतः लिखा नहीं जा चुका है। इसकी अनेक घाटियाँ, पुरास्थल, अभिलेख और पुरावशेष आज भी नए शोध की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
इसलिए यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
हर नई खुदाई, हर नया अभिलेख और हर नया पुरातात्त्विक अध्ययन उत्तराखण्ड के अतीत की किसी अनदेखी परत को सामने ला सकता है।
शायद भविष्य में कोई ऐसा पुरावशेष मिले, जो आज के किसी प्रश्न का उत्तर दे।
और तब—
उत्तराखण्ड की धरती एक बार फिर इतिहास बोलेगी।
"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर
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🔗 अधिक पढ़ें
- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट
- भाग–2: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण (भाग-2): समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा
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