जब पहाड़ों की खामोशी में सिक्के इतिहास बोलते थे...
कल्पना कीजिए—आज से लगभग दो हजार वर्ष पहले का मध्य हिमालय।
न आज जैसा उत्तराखण्ड था, न आज जैसी प्रशासनिक सीमाएँ। हिमालय की घाटियों से होकर व्यापारिक मार्ग गुजरते थे। पर्वतीय बस्तियाँ अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समूहों के साथ जीवन जी रही थीं। कहीं नदियों की घाटियों में व्यापार चलता था, तो कहीं पहाड़ी दर्रों से होकर मैदानों और हिमालय के बीच संपर्क बना रहता था।
इन्हीं पहाड़ियों और घाटियों में एक प्राचीन राजनीतिक शक्ति ने अपना प्रभाव स्थापित किया था—कुणिंद।
आज उनके बारे में कोई विस्तृत राजकीय इतिहास उपलब्ध नहीं है। न उनके राजाओं की पूरी वंशावली हमारे सामने है, न उनके राज्य का कोई निश्चित राजनीतिक मानचित्र। फिर भी इतिहास ने उनके अस्तित्व को पूरी तरह मिटने नहीं दिया।
उनके सिक्के आज भी बोलते हैं।
कभी उन पर अमोघभूति का नाम दिखाई देता है, कभी हिरण और लक्ष्मी की आकृति, तो कभी पर्वत, वृक्ष, नदी, स्वस्तिक और अन्य धार्मिक प्रतीक। कुछ रजत सिक्कों पर ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियों का प्रयोग मिलता है। ये सिक्के केवल मुद्रा नहीं, बल्कि उस समय के राजनीतिक अधिकार, व्यापारिक संपर्क, धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक संसार की झलक भी देते हैं। (British Museum)
तो आखिर कुणिंद कौन थे?
आइए, उपलब्ध साहित्यिक, पुरातात्त्विक और मुद्राशास्त्रीय साक्ष्यों के आधार पर इस प्राचीन हिमालयी शक्ति की कहानी को समझते हैं।
1. कुणिंद कौन थे?
कुणिंद, जिन्हें प्राचीन साहित्य में कुलिंद, कौलिंद या कौणिंद जैसे नामों से भी संबोधित किया गया है, मध्य हिमालय और उसके निकटवर्ती मैदानी क्षेत्रों से जुड़े एक प्राचीन जनसमुदाय/राजनीतिक संगठन थे।
उपलब्ध स्रोतों से यह स्पष्ट होता है कि उनका संबंध वर्तमान उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश तथा उनसे लगे उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों से था। कुणिंद सिक्कों की प्राप्ति हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक हुई है। (eGyankosh)
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है। आधुनिक अर्थ में कुणिंदों को सीधे एक केंद्रीकृत “साम्राज्य” कहना हमेशा उचित नहीं होगा। उपलब्ध साक्ष्य उनके राजनीतिक संगठन के विभिन्न चरणों की ओर संकेत करते हैं और विद्वानों ने उनके स्वरूप को जनपद, गणराज्य अथवा स्थानीय राजनीतिक शक्ति के रूप में अलग-अलग ढंग से समझा है।
अर्थात् “कुणिंद राज्य” की कल्पना एक ही समय में एक विशाल केंद्रीकृत साम्राज्य के रूप में करना इतिहास को सरल बना देना होगा।
2. कुणिंदों के इतिहास के प्रमुख स्रोत
कुणिंदों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके बारे में जानकारी किसी एक विस्तृत ग्रंथ से नहीं मिलती। उनका इतिहास अलग-अलग स्रोतों को जोड़कर समझना पड़ता है।
साहित्यिक स्रोत
कुणिंदों का उल्लेख प्राचीन भारतीय साहित्यिक परंपराओं में विभिन्न रूपों में मिलता है। पाणिनि की परंपरा, महाभारत तथा बाद के संस्कृत साहित्य में उनसे संबंधित उल्लेखों की चर्चा इतिहासकार करते रहे हैं।
बाद के स्रोतों में वराहमिहिर की बृहत्संहिता में भी कुणिंद/कौणिंद से संबंधित उल्लेखों को महत्वपूर्ण माना जाता है।
इन साहित्यिक उल्लेखों से यह संकेत मिलता है कि कुणिंद केवल किसी एक छोटी पहाड़ी बस्ती तक सीमित समुदाय नहीं थे, बल्कि उत्तर भारत के व्यापक राजनीतिक भूगोल में उनकी पहचान थी।
मुद्राशास्त्रीय स्रोत—सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण
कुणिंदों के इतिहास को समझने में उनके सिक्के सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष स्रोतों में से हैं।
IGNOU की अध्ययन सामग्री के अनुसार कुणिंद सिक्कों पर “कुणिंद” नाम मिलता है और उनके सिक्के हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुए हैं। रजत सिक्कों पर ब्राह्मी और खरोष्ठी दोनों लिपियों का प्रयोग भी मिलता है। (eGyankosh)
इसलिए कुणिंदों का इतिहास लिखते समय सिक्के केवल आर्थिक इतिहास का स्रोत नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास का भी प्रमुख प्रमाण बन जाते हैं।
3. कुणिंदों का राजनीतिक क्षेत्र कहाँ तक फैला था?
कुणिंदों का राज्य मुख्य रूप से मध्य हिमालय में स्थित था और उनका प्रभाव हिमालय से लगे शिवालिक तथा मैदानी क्षेत्रों तक दिखाई देता है। हालांकि उनकी निश्चित सीमाएँ आधुनिक राज्यों की तरह तय करना संभव नहीं है।
डॉ. अजय सिंह रावत, डॉ. यशवंत सिंह कठोच और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बलोदी के अनुसार कुणिंदों का प्रभाव क्षेत्र वर्तमान गढ़वाल-कुमाऊँ, हिमाचल प्रदेश और उनसे जुड़े शिवालिक व मैदानी भागों तक फैला था। विशेष रूप से अमोघभूति के समय उनका प्रभाव अम्बाला, सहारनपुर और बिजनौर जैसे क्षेत्रों तक बताया गया है।
इसी मत की पुष्टि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्टों और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) से जुड़े अध्ययनों में भी मिलती है, जहाँ कुणिंद सिक्कों की प्राप्ति को उनके व्यापक संपर्क क्षेत्र का प्रमाण माना गया है, न कि निश्चित राजनीतिक सीमा का।
कुणिंदों के सिक्के भी उनके व्यापक संपर्क क्षेत्र का संकेत देते हैं, जो मुख्यतः सतलुज और यमुना के बीच के हिमालयी एवं शिवालिक क्षेत्र से जुड़ा माना जाता है।
मध्य हिमालय : मुख्य आधार
कुणिंदों की शक्ति का केंद्र मध्य हिमालय (वर्तमान उत्तराखण्ड) था। यहाँ की घाटियाँ और दर्रे उन्हें हिमालय को शिवालिक और मैदानी क्षेत्रों से जोड़ने में मदद करते थे। इसी कारण उनका प्रभाव धीरे-धीरे पर्वतीय क्षेत्रों से बाहर भी फैलता गया।
यूनानी भूगोलवेत्ता टॉलेमी भी इस क्षेत्र को उन पर्वतीय भागों से जोड़ता है जहाँ से प्रमुख नदियाँ निकलती हैं, जिससे उनके क्षेत्र की व्यापकता का संकेत मिलता है। आधुनिक भूगोलविदों के अनुसार भी हिमालयी दर्रों के कारण यह क्षेत्र प्राचीन काल में उत्तर भारत और मध्य एशिया के बीच संपर्क-सेतु की भूमिका निभाता था।
शिवालिक और मैदानी क्षेत्र
सतलुज–यमुना के बीच का शिवालिक क्षेत्र कुणिंदों के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह हिमालय और मैदानों के बीच संपर्क मार्ग था। यहाँ से व्यापार और सांस्कृतिक संबंध विकसित हुए।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के पुरातात्विक अध्ययनों में भी यह संकेत मिलता है कि शिवालिक क्षेत्र में कुणिंद कालीन सांस्कृतिक अवशेष और सिक्के पाए गए हैं, जो उनके प्रभाव और संपर्क की पुष्टि करते हैं।
अमोघभूति के समय उनके प्रभाव का विस्तार अम्बाला, सहारनपुर और बिजनौर तक बताया गया है, जिससे उनके संपर्कों की व्यापकता स्पष्ट होती है।
सिक्कों से प्राप्त संकेत
कुणिंदों के सिक्के उनके प्रभाव और संपर्क का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। अमोघभूति के सिक्के ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि में मिलते हैं और उन पर विभिन्न प्रतीक अंकित हैं।
भारतीय संग्रहालय (Indian Museum, Kolkata) और राष्ट्रीय संग्रहालय (National Museum, New Delhi) में संरक्षित कुणिंद सिक्कों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि उनका उपयोग केवल राजनीतिक सत्ता नहीं बल्कि व्यापारिक विनिमय और क्षेत्रीय संपर्क के लिए भी होता था।
लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि—
किसी स्थान पर कुणिंद सिक्कों का मिलना उस क्षेत्र को उनके राज्य की निश्चित सीमा सिद्ध नहीं करता।
ये सिक्के मुख्यतः उनके व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्कों का संकेत देते हैं।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर कुणिंदों का मुख्य आधार मध्य हिमालय था, जबकि उनका प्रभाव हिमालय से शिवालिक और कुछ मैदानी क्षेत्रों तक फैला हुआ था। पुरातात्विक साक्ष्य, विश्वविद्यालयीय शोध और ऐतिहासिक ग्रंथ सभी इस बात की पुष्टि करते हैं कि कुणिंद राज्य को एक निश्चित सीमा वाले राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रभाव क्षेत्र के रूप में समझना अधिक उचित है।
4. अमोघभूति—कुणिंद इतिहास की सबसे स्पष्ट ऐतिहासिक पहचान
कुणिंद इतिहास में सबसे अधिक चर्चित नाम है—अमोघभूति।
उनका महत्व मुख्यतः इसलिए है क्योंकि उनके नाम वाले अनेक सिक्के प्राप्त हुए हैं।
सिक्कों पर ब्राह्मी लेख में—
“राज्ञः कुणिंदस्य अमोघभूतिस्य महाराजस्य”
जैसा अभिलेख मिलता है, जिसका आशय है—
“कुणिंदों के महाराज अमोघभूति का।”
ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रह में भी अमोघभूति से संबंधित कुणिंद सिक्के सुरक्षित हैं, जिनमें हिरण, लक्ष्मी, पर्वत, वृक्ष और अन्य प्रतीक दिखाई देते हैं। (British Museum)
यही कारण है कि अमोघभूति कुणिंदों के इतिहास में सबसे अधिक प्रमाणित शासकीय व्यक्तित्व बन जाते हैं।
लेकिन क्या अमोघभूति “कुणिंद साम्राज्य के सम्राट” थे?
यहाँ इतिहास के साथ सावधानी बरतना आवश्यक है।
लोकप्रिय इतिहास में उन्हें अक्सर “कुणिंदों का महानतम राजा” या “कुणिंद साम्राज्य का शक्तिशाली सम्राट” कहा जाता है, लेकिन आधुनिक शोधपरक दृष्टि से इतना निश्चित रूप से कहना अधिक उचित है कि:
अमोघभूति एक महत्वपूर्ण कुणिंद शासक थे, जिनके नाम पर जारी सिक्के कुणिंद राजनीतिक सत्ता के सबसे महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष प्रमाणों में शामिल हैं।
उनकी वास्तविक राजनीतिक सीमा, शासन-व्यवस्था और उनके अधीन आने वाले प्रत्येक क्षेत्र को केवल सिक्कों के आधार पर निश्चित करना संभव नहीं है।
5. अमोघभूति के सिक्के—एक छोटे से सिक्के में छिपा बड़ा इतिहास
| कुणिंद सिक्के |
कुणिंदों के सिक्के इस पूरे इतिहास की सबसे रोचक कड़ी हैं।
विशेष रूप से अमोघभूति के रजत सिक्कों पर अनेक प्रतीक दिखाई देते हैं—
🦌 हिरण
सिक्के पर हिरण की आकृति प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उसके सामने या निकट देवी लक्ष्मी की आकृति मिलती है।
🌸 लक्ष्मी
लक्ष्मी के हाथ में कमल दिखाई देता है। यह समृद्धि और शुभता से जुड़े प्रतीकात्मक संसार की ओर संकेत करता है।
⛰️ पर्वत/चैत्याकार आकृति
सिक्के के दूसरे भाग में बहु-मेहराबी पर्वत या चैत्याकार प्रतीक दिखाई देता है।
🌳 वेदिका में वृक्ष
वृक्ष की आकृति भी प्रमुख है।
☸️ धार्मिक प्रतीक
स्वस्तिक, नंदीपद, त्रिरत्न अथवा अन्य प्रतीक विभिन्न प्रकार के सिक्कों में दिखाई देते हैं।
ब्रिटिश म्यूज़ियम के अमोघभूति सिक्कों में हिरण, लक्ष्मी, छः-मेहराबी पहाड़ी, नंदीपद, स्वास्तिक, वृक्ष और नदी जैसे चिह्न दर्ज किए गए हैं। (British Museum)
इससे स्पष्ट है कि कुणिंद सिक्के केवल आर्थिक लेन-देन के साधन नहीं थे; वे प्रतीकों के माध्यम से अपनी राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान भी व्यक्त कर रहे थे।
6. ब्राह्मी और खरोष्ठी—कुणिंदों के व्यापक संपर्क का संकेत
कुणिंदों के रजत सिक्कों की एक विशेषता है—दो अलग लिपियों का प्रयोग।
एक ओर ब्राह्मी और दूसरी ओर खरोष्ठी का प्रयोग मिलता है। IGNOU की अध्ययन सामग्री इसे व्यापारिक संपर्कों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानती है। (eGyankosh)
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इससे संकेत मिलता है कि कुणिंदों की आर्थिक गतिविधियाँ केवल स्थानीय पर्वतीय अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं थीं। उनके सिक्के ऐसे व्यापक क्षेत्र से जुड़े थे जहाँ अलग-अलग भाषाई और लिपिगत परंपराएँ प्रचलित थीं।
इस प्रकार एक छोटा-सा सिक्का हमें बताता है कि—
हिमालय अलग-थलग नहीं था।
वह मैदानों, उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों और व्यापारिक मार्गों से जुड़ा हुआ था।
7. कुणिंदों की अर्थव्यवस्था और व्यापार
कुणिंदों के सिक्कों की व्यापक प्राप्ति उनके व्यापारिक जीवन की ओर महत्वपूर्ण संकेत देती है।
उनके सिक्के हिमालयी क्षेत्र के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में भी पाए गए हैं। इससे यह अनुमान मजबूत होता है कि कुणिंद राजनीतिक क्षेत्र पर्वतीय संसाधनों और मैदानी बाजारों के बीच संपर्क का हिस्सा था। (eGyankosh)
मध्य हिमालय से निकलने वाले मार्गों का महत्व केवल स्थानीय आवागमन तक सीमित नहीं था। वे पर्वतीय क्षेत्रों को तराई और मैदानों से जोड़ते थे।
यही कारण है कि कुणिंदों का इतिहास हमें प्राचीन उत्तराखण्ड को एक संपर्क-क्षेत्र के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
8. कुणिंद और धर्म : एक जटिल सांस्कृतिक संसार
कुणिंद सिक्कों पर धार्मिक प्रतीकों की विविधता विशेष ध्यान आकर्षित करती है।
एक ओर हमें लक्ष्मी, स्वास्तिक और नंदीपद जैसे प्रतीक दिखाई देते हैं, तो दूसरी ओर कुछ सिक्कों पर स्तूप और त्रिरत्न से जुड़े प्रतीक मिलते हैं। (Numista)
उत्तराखण्ड के कुणिंद सिक्कों के बाद की छत्रेश्वर/चत्रेश्वर प्रकार की परंपरा में शिव से संबंधित प्रतीकों की व्याख्या भी की गई है। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय से उपलब्ध एक शोध-पत्र कुणिंदों के सिक्कों और साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर उत्तराखण्ड में कुणिंद राजनीतिक संगठन तथा शैव प्रतीकों की उपस्थिति पर चर्चा करता है। (UOU)
इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि कुणिंदों की धार्मिक संस्कृति एक ही धार्मिक पहचान में सीमित नहीं थी।
सिक्कों पर विभिन्न परंपराओं के प्रतीकों की उपस्थिति उस समय के हिमालयी समाज में मौजूद सांस्कृतिक संपर्कों और धार्मिक विविधता की ओर संकेत करती है।
9. कुणिंद सिक्कों के प्रमुख प्रकार
विभिन्न ऐतिहासिक पुस्तकों में कुणिंद सिक्कों को मुख्यतः तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
- अमोघभूति प्रकार
इन सिक्कों पर अमोघभूति का नाम मिलता है। रजत और ताम्र दोनों प्रकार के सिक्कों का उल्लेख मिलता है।
इनमें ब्राह्मी तथा कुछ रजत सिक्कों पर खरोष्ठी का प्रयोग विशेष महत्व रखता है।
- अल्मोड़ा प्रकार
इन सिक्कों को विशेष रूप से उत्तराखण्ड क्षेत्र से संबंधित माना गया है। इनके प्राप्ति-स्थलों और स्वरूप के कारण ये कुणिंद इतिहास में महत्वपूर्ण हैं।
- छत्रेश्वर/चत्रेश्वर प्रकार
इन सिक्कों पर चत्रेश्वर/छत्रेश्वर नाम अथवा उससे संबंधित प्रतीकों की चर्चा मिलती है। उत्तराखण्ड में प्राप्त इन सिक्कों को कुणिंदों की उत्तरवर्ती राजनीतिक-सांस्कृतिक परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण माना जाता है। (Uttarakhand PSC Notes)
10. कुणिंदों का राजनीतिक स्वरूप—राजतंत्र या गण?
कुणिंदों के इतिहास का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि उनकी शासन-व्यवस्था कैसी थी?
उपलब्ध स्रोतों में कुणिंदों को कभी गण/गणराज्यीय परंपरा से जोड़ा गया है, जबकि अमोघभूति के सिक्कों पर स्पष्ट रूप से “महाराज” जैसी राजकीय उपाधि मिलती है।
यह विरोधाभास वास्तव में कुणिंद राजनीतिक इतिहास की जटिलता को दर्शाता है।
संभव है कि कुणिंद राजनीतिक संगठन समय के साथ बदलता रहा हो—प्रारम्भिक गणात्मक या कुल-आधारित संगठन से लेकर कुछ चरणों में अधिक राजकीय स्वरूप तक।
इसलिए कुणिंदों को पूरे काल के लिए केवल “गणराज्य” या केवल “राजतंत्र” कहना सावधानी के बिना उचित नहीं होगा।
11. मौर्य, शुंग और कुषाण काल में कुणिंद
कुणिंदों का इतिहास किसी एक शासक या एक शताब्दी तक सीमित नहीं था।
मौर्य सत्ता के विस्तार के समय हिमालय और उसके आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न स्थानीय राजनीतिक शक्तियाँ सक्रिय थीं। कालसी के अशोक अभिलेख से देहरादून क्षेत्र के मौर्यकालीन संपर्क का प्रमाण मिलता है, लेकिन इससे पूरे मध्य हिमालय को सीधे मौर्य प्रशासन के अधीन मान लेना उचित नहीं होगा।
इसके बाद उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़े परिवर्तन हुए। शुंग, इंडो-ग्रीक तथा बाद में कुषाण शक्तियों का प्रभाव बढ़ा।
कुणिंद सिक्कों की निरंतरता यह संकेत देती है कि हिमालयी क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पहचान इन बड़े साम्राज्यगत परिवर्तनों के बीच भी किसी रूप में बनी रही।
बाद के काल में कुषाण प्रभाव के बढ़ने के साथ मैदानी और तराई क्षेत्रों में राजनीतिक समीकरण बदले, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय शक्तियों की भूमिका बनी रही। यशवंत सिंह कठौच ने भी उत्तराखंड का नवीन इतिहास में इस परिवर्तन को कुणिंद सत्ता के पर्वतीय क्षेत्रों में बने रहने के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
12. कुणिंदों के बाद क्या हुआ?
समय के साथ कुणिंद राजनीतिक शक्ति का स्वरूप बदलता गया।
मैदानी क्षेत्रों में अन्य शक्तियाँ प्रभावशाली होती गईं। कुछ कुणिंद शाखाएँ या उनसे संबंधित राजनीतिक समूह पर्वतीय क्षेत्रों में बने रहे होंगे—ऐसा सिक्कों और बाद के साहित्यिक उल्लेखों से अनुमानित किया गया है।
लेकिन किसी एक निश्चित घटना को कुणिंदों के “अंत” के रूप में चिन्हित करना कठिन है।
यही कारण है कि कुणिंदों का इतिहास हमें एक बड़े साम्राज्य के अचानक पतन की कहानी के बजाय धीरे-धीरे बदलती हुई हिमालयी राजनीतिक संरचना की कहानी अधिक प्रतीत होता है।
13. उत्तराखण्ड के इतिहास में कुणिंद इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?
इस प्रश्न का उत्तर कई स्तरों पर मिलता है।
पहला—वे उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक राजनीतिक इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
कुणिंदों के प्रमाण यह बताते हैं कि प्राचीन उत्तराखण्ड का पर्वतीय क्षेत्र राजनीतिक रूप से निष्क्रिय या अलग-थलग नहीं था।
दूसरा—उनके सिक्के प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण हैं।
जहाँ लिखित राजकीय अभिलेख सीमित हैं, वहाँ सिक्के शासक, राजनीतिक पहचान और आर्थिक गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
तीसरा—उनका संपर्क पर्वत और मैदान दोनों से था।
सिक्कों की व्यापक प्राप्ति हिमालय और उत्तर भारतीय मैदानों के बीच संपर्क को समझने में मदद करती है। (eGyankosh)
चौथा—अमोघभूति एक ऐतिहासिक पहचान प्रदान करते हैं।
उनके नाम वाले सिक्के कुणिंद इतिहास को एक स्पष्ट शासकीय व्यक्तित्व से जोड़ते हैं।
पाँचवाँ—कुणिंद हमें प्राचीन उत्तराखण्ड की बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक प्रकृति की झलक देते हैं।
सिक्कों पर उपस्थित विभिन्न प्रतीक उस समय के सांस्कृतिक संसार की जटिलता को सामने रखते हैं।
निष्कर्ष : जब सिक्कों ने इतिहास को बचाए रखा
उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यहाँ के अनेक प्रारम्भिक राजनीतिक चरणों के बारे में विस्तृत लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है।
लेकिन इतिहास हमेशा ग्रंथों में ही सुरक्षित नहीं रहता।
कुणिंदों के लिए यही सिक्के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण आवाज़ बन जाते हैं।
उन पर अंकित “कुणिंद” और “अमोघभूति” हमें बताता है कि आज का उत्तराखण्ड दो हजार वर्ष पहले भी राजनीतिक गतिविधियों, व्यापारिक संपर्कों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सक्रिय भूभाग था।
अमोघभूति का नाम हमें एक प्रभावशाली कुणिंद शासक की पहचान देता है; कुणिंद सिक्कों का विस्तार उनके व्यापक संपर्कों की ओर संकेत करता है; और उन सिक्कों पर अंकित प्रतीक हमें उस समय के धार्मिक-सांस्कृतिक संसार की झलक देते हैं।
इसलिए कुणिंदों का इतिहास केवल एक प्राचीन राजवंश की कहानी नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के उस आरम्भिक ऐतिहासिक चरण की कहानी है जिसमें हिमालय की घाटियाँ राजनीति, व्यापार और संस्कृति के जीवंत मार्गों से जुड़ी हुई थीं।
🔎 संक्षेप में
अगली कड़ी में…
कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड : नाग, कुषाण और बदलता राजनीतिक परिदृश्य
कुणिंदों ने मध्य हिमालय की राजनीतिक पहचान को एक महत्वपूर्ण आधार दिया, लेकिन इतिहास की धारा यहीं नहीं रुकी। समय के साथ हिमालय और उसके आसपास की राजनीति में नई शक्तियाँ उभरने लगीं।
कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड की राजनीतिक स्थिति किस दिशा में बदली?
क्या कुणिंदों के बाद भी उनकी राजनीतिक परंपरा किसी रूप में बनी रही?
नागों का उत्तराखण्ड से क्या संबंध था?
कुषाणों का प्रभाव हिमालय तक वास्तव में कितना पहुँचा था?
और इस दौर में उत्तराखण्ड की स्थानीय राजनीतिक शक्तियों की क्या भूमिका रही?
इन प्रश्नों के उत्तर हमें कुणिंदों के बाद के उस संक्रमणकाल से परिचित कराएँगे, जब मध्य हिमालय अनेक राजनीतिक शक्तियों के संपर्क और प्रभाव का क्षेत्र बन रहा था।
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर
"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:
📚 संदर्भ ग्रंथ
- रावत, डॉ. अजय सिंह, उत्तराखण्ड का समग्र राजनीतिक इतिहास।कुणिंदों तथा उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास के संदर्भ में। इस पुस्तक का वर्तमान संस्करण प्रागैतिहासिक काल से 1949 तक की राजनीतिक यात्रा को समेटता है।
- कठोच, डॉ. यशवंत सिंह, उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास।कुणिंदों, प्राचीन जनपदों, सिक्कों तथा मध्य हिमालय के प्रारम्भिक राजनीतिक इतिहास के संदर्भ में। आपके भेजे पृष्ठ इसी पुस्तक के हैं।
- बलोदी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, उत्तराखण्ड समग्र ज्ञानकोश।उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास, जनपदों एवं ऐतिहासिक-भौगोलिक संदर्भों के लिए। पुस्तक का लेखक और शीर्षक स्वतंत्र पुस्तक-सूची में भी दर्ज है।
सहायक आधुनिक/प्राथमिक संदर्भ
- IGNOU, Early State Formation, Unit 4 — कुणिंदों, अमोघभूति, उनके सिक्कों, लिपियों और प्राप्ति-क्षेत्र के लिए।
- British Museum Collections — अमोघभूति से संबद्ध कुणिंद रजत एवं ताम्र सिक्कों के प्रत्यक्ष संग्रह-साक्ष्य।
इसके अतिरिक्त आधुनिक संदर्भों में IGNOU की अध्ययन सामग्री कुणिंदों को एक प्राचीन राजनीतिक/गणराज्यीय गठन के रूप में चर्चा करती है तथा उनके सिक्कों, अमोघभूति और विस्तृत प्राप्ति-क्षेत्र का उल्लेख करती है। (eGyankosh) उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के शोध-पत्र में भी कुणिंदों की राजनीतिक उपस्थिति तथा उनके सिक्कों की धार्मिक प्रतीक-परंपरा पर चर्चा मिलती है। (UOU) ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रह में अमोघभूति के ताम्र और रजत कुणिंद सिक्कों के प्रत्यक्ष उदाहरण उपलब्ध हैं। (British Museum)
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- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट
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-भाग-2: उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-1) आद्य इतिहास से राज्य-व्यवस्था के उदय तक
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