सोमवार, 3 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–4) पश्चिमी रामगंगा घाटी की पुरातात्त्विक अभिज्ञता : कपमार्क्स, शैलाश्रय और महापाषाणीय संस्कृति के साक्ष्य

 

डॉ. भावना जुयाल 

पश्चिमी रामगंगा घाटी : उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अतीत की जीवंत प्रयोगशाला

"यदि लखु उडियार हमें प्रागैतिहासिक मानव की कलात्मक चेतना से परिचित कराता है, तो पश्चिमी रामगंगा घाटी उसके दैनिक जीवन, निवास और सांस्कृतिक विकास की कथा सुनाती है।"

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक इतिहास का अध्ययन करते समय पश्चिमी रामगंगा घाटी का विशेष महत्व सामने आता है। यह घाटी केवल एक नदी तंत्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से मानव गतिविधियों की साक्षी रही एक प्राकृतिक प्रयोगशाला है। यहाँ बिखरे हुए कपमार्क्स (Cup-marks), शैलाश्रय, पाषाण अवशेष तथा स्थानीय परंपराएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक समुदायों के लिए अत्यंत अनुकूल निवास स्थल रहा होगा।


उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक खोजों की शुरुआत

मध्य हिमालय में व्यवस्थित पुरातात्त्विक खोज का इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी से प्रारम्भ होता है। 1856 ई. में ब्रिटिश अधिकारी विलियम जे. हेनवुड (William J. Henwood) ने चम्पावत जनपद के देवीधुरा में चट्टानों पर बने कपमार्क्स खोजे। उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन में इसे एक महत्वपूर्ण प्रारम्भिक खोज माना जाता है।

इसके लगभग दो दशक बाद 1877 ई. में कार्नेक (Carnegy) ने द्वाराहाट स्थित चंद्रेश्वर मंदिर के समीप लगभग 200 कपमार्क्स का उल्लेख किया। ये कपमार्क्स बारह समानांतर पंक्तियों में व्यवस्थित थे तथा इनके आसपास लहरदार रेखाएँ, पत्तीनुमा आकृतियाँ और अन्य ज्यामितीय चिह्न भी अंकित थे।

कार्नेक ने इन चिह्नों की तुलना यूरोप में मिले समान पुरातात्त्विक अवशेषों से करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि कपमार्क्स की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि विश्व के अन्य भागों में भी विद्यमान थी। इस तुलना ने उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया।


पश्चिमी रामगंगा घाटी : कपमार्क्स का समृद्ध क्षेत्र

समय के साथ अनेक भारतीय पुरातत्त्वविदों ने पश्चिमी रामगंगा घाटी का सर्वेक्षण किया। डॉ. एम. पी. जोशी ने अल्मोड़ा जनपद के घिटाई, दियाली डांडा, कालीमाटी, कैखान, मल्ला पैनुली, नौगाँव, फलसीमा और सिमल्टी जैसे स्थलों पर अनेक कपमार्क्स का प्रलेखन किया।

इसी क्रम में भारतीय शैलचित्र विशेषज्ञ डॉ. यशोधर मठपाल ने रामगंगा घाटी में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने नौला गाँव में 72 कपमार्क्स, जालली–मासी मार्ग पर जोंयो के समीप एक विशाल प्रस्तर पर 22 कपमार्क्स तथा दूसरी चट्टान पर 11 कपमार्क्स दर्ज किए। इसके अतिरिक्त नौगाँव और मुनिया की ढाई जैसे स्थलों पर भी कपमार्क्स की उपस्थिति दर्ज की गई।

इन खोजों से स्पष्ट होता है कि पश्चिमी रामगंगा घाटी उत्तराखण्ड की उन प्रमुख घाटियों में है जहाँ प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियों के व्यापक प्रमाण आज भी सुरक्षित हैं।

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'बाइस ओखला' : जहाँ इतिहास आज भी जीवित है

चौखुटिया–जौरासी मोटर मार्ग पर आगर मनराल गाँव के समीप स्थित एक विशाल वर्गाकार प्रस्तर पर 22 कपमार्क्स बने हुए हैं। इन्हीं के कारण यह स्थान स्थानीय लोगों के बीच "बाइस ओखला" के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्थल की विशेषता केवल इसके कपमार्क्स नहीं हैं, बल्कि यह भी है कि स्थानीय ग्रामीणों ने इन्हें सुरक्षित रखने के उद्देश्य से चारों ओर लौह सुरक्षा घेरा (Iron Railing) बनवाया है। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि स्थानीय समाज अपनी विरासत के प्रति सजग हो, तो संरक्षण का कार्य अधिक प्रभावी हो सकता है।

बाईस ओखला (आगर मनराल) 

थकुली उड्यार : जहाँ पत्थर भी बोलते हैं

गेवाड़ घाटी के ऊँचावाहन गाँव के समीप स्थित थकुली उड्यार पश्चिमी रामगंगा घाटी का सबसे रहस्यमय और रोचक पुरातात्त्विक स्थल माना जा सकता है। यहाँ विभिन्न चट्टानों पर 21 कपमार्क्स अंकित हैं, जिनमें कुछ उथले हैं तो कुछ अत्यंत गहरे।

इस स्थल की सबसे अनोखी विशेषता इसकी ध्वनि उत्पन्न करने वाली चट्टान है। जब इस पर हाथ से हल्की थाप दी जाती है तो थाली जैसी स्पष्ट ध्वनि सुनाई देती है, जबकि लकड़ी या पत्थर से प्रहार करने पर अलग प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। संभवतः इसी कारण स्थानीय लोगों ने इसे 'थकुली उड्यार' नाम दिया।

भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया के अनुसार ऐसी ध्वनियाँ चट्टानों की आंतरिक संरचना, प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाओं से बने रिक्त स्थान तथा उनके खनिजीय संघटन के कारण उत्पन्न हो सकती हैं। भारत के मध्य प्रदेश, गुजरात तथा बुंदेलखंड क्षेत्र में भी इस प्रकार की अनुनादी (Resonant) चट्टानों के उदाहरण मिलते हैं।


    
थकुली उड्यार 


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क्या थकुली उड्यार महापाषाणीय संस्कृति से जुड़ा है?

यद्यपि थकुली उड्यार में अभी तक शैलचित्र प्राप्त नहीं हुए हैं, फिर भी यह स्थल पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार उड्यार की सफाई के दौरान यहाँ से—

  • एक मिट्टी का दीपक,
  • एक प्रस्तर चक्र, तथा 
  • कुछ मृद्भाण्डों के अवशेष

प्राप्त हुए थे। दुर्भाग्यवश, जानकारी के अभाव में इन वस्तुओं का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं हो सका।

इन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, कपमार्क्स तथा शैलाश्रय की संरचना के आधार पर यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि इस स्थल का उपयोग महापाषाणीय अथवा उत्तर-प्रागैतिहासिक समुदायों द्वारा किया जाता रहा हो। हालांकि, इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक उत्खनन और दिनांकन (Dating) आवश्यक है।

शोध टिप्पणी: किसी भी पुरातात्त्विक स्थल को महापाषाणीय घोषित करने के लिए केवल कपमार्क्स पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए उत्खनन, सांस्कृतिक स्तर, दिनांकन और अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है।

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महरू उड्यार : शैलचित्र और कपमार्क्स का संगम

मासी–जालली मोटर मार्ग पर स्थित महरू उड्यार का उल्लेख डॉ. यशोधर मठपाल ने अपने शैलचित्र अध्ययनों में किया है। इसकी बनावट लखु उडियार से काफी मिलती-जुलती है। विशेष बात यह है कि इसके ठीक सामने एक कपमार्क भी स्थित है।

यह तथ्य इस संभावना को बल देता है कि शैलाश्रयों और कपमार्क्स का उपयोग एक ही सांस्कृतिक समुदाय द्वारा विभिन्न उद्देश्यों से किया जाता रहा होगा। यह विषय भविष्य के शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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पश्चिमी रामगंगा घाटी क्यों है विशेष?

पश्चिमी रामगंगा घाटी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यहाँ बड़ी संख्या में कपमार्क्स मिले हैं, बल्कि इसलिए भी है कि यहाँ प्राकृतिक शैलाश्रय, नदी तंत्र, पाषाण संसाधन और सांस्कृतिक अवशेष एक साथ मिलते हैं। ये सभी तत्व मिलकर संकेत देते हैं कि यह घाटी उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक मानव के जीवन, तकनीक और सांस्कृतिक विकास को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रही है।

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📚 संदर्भ

  1. Carnegy, P. (1877). Notes on Cup-Marks in Kumaon.
  2. Henwood, W. J. (1856). देवीधुरा क्षेत्र की प्रारम्भिक पुरातात्त्विक टिप्पणियाँ।
  3. Joshi, M. P. – कुमाऊँ क्षेत्र के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण।
  4. Mathpal, Y. (1996). Rock Art in Kumaon Himalaya.
  5. Mathpal, Y. (2008). कुमाऊँ के शैलचित्र एवं महरू उड्यार संबंधी अध्ययन।
  6. कुमार (2021). भारतीय अनुनादी (Resonant) चट्टानों पर अध्ययन।
  7. कोटलिया, बहादुर सिंह – हिमालयी भूगर्भीय संरचना पर अध्ययन।
  8. बिष्ट, शंकर सिंह (2022). ऊँचावाहन ग्राम से प्राप्त स्थानीय मौखिक जानकारी।
लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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