चंद राजवंश का इतिहास | सोमचंद से महेंद्र चंद तक | कुमाऊँ का इतिहास


चंद राजवंश : कुमाऊँ के इतिहास को नई पहचान देने वाला राजवंश

चम्पावत से अल्मोड़ा तक—राजनीतिक विस्तार, संघर्ष, प्रशासन और सांस्कृतिक विरासत की कहानी

उत्तराखण्ड का इतिहास केवल हिमालय, मंदिरों और लोकपरंपराओं का इतिहास नहीं है। इसके भीतर अनेक राजवंशों के उत्थान-पतन, राजनीतिक संघर्ष, प्रशासनिक प्रयोग, व्यापारिक संबंध और सांस्कृतिक निर्माण की लंबी कहानी छिपी हुई है।

कुमाऊँ के इतिहास में चंद राजवंश इसी कहानी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है।

कत्यूरियों के राजनीतिक प्रभुत्व के कमजोर पड़ने के बाद कुमाऊँ की भूमि पर चंद शक्ति का उदय हुआ। चम्पावत को केन्द्र बनाकर शुरू हुई यह सत्ता धीरे-धीरे विस्तृत हुई और आगे चलकर अल्मोड़ा को अपनी राजधानी बनाकर कुमाऊँ की एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति में परिवर्तित हुई।

चंदों के इतिहास की विशेषता केवल यह नहीं थी कि उन्होंने लंबे समय तक शासन किया, बल्कि यह भी थी कि उनके काल में राजनीतिक विस्तार के साथ प्रशासनिक व्यवस्था, भूमि-बंदोबस्त, मंदिर निर्माण, व्यापार, सैन्य संगठन और स्थानीय सामाजिक संस्थाओं का विकास हुआ।

लेकिन चंद इतिहास का एक प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है—इस वंश का वास्तविक आरंभ कब हुआ?


चंद वंश की स्थापना : 700 ई. या 1025 ई.?

चंद राजवंश के आरंभ को लेकर लंबे समय से अलग-अलग मत मिलते रहे हैं।

परंपरागत वंशावलियाँ चंदों की स्थापना को बहुत प्राचीन समय, लगभग 7वीं शताब्दी तक ले जाती हैं। लेकिन डॉ. अजय सिंह रावत उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों और कालक्रम का विश्लेषण करते हुए चंद सत्ता की स्थापना को 1020 से 1025 ई. के बीच रखना अधिक उपयुक्त मानते हैं और सुविधा के लिए 1025 ई. को सोमचंद द्वारा चंद वंश की स्थापना का समय स्वीकार करने की बात करते हैं।

इस मत के पीछे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिस्थिति भी है।

लगभग इसी समय कत्यूरी सत्ता के कमजोर होने के बाद उसके विभिन्न राजकुमार और स्थानीय शक्तियाँ अलग-अलग क्षेत्रों—मणकोट, अस्कोट, डोटी, लखनपुर-बैराट तथा मानिला-सल्ट आदि—की ओर फैल रही थीं। ऐसे राजनीतिक संक्रमण के बीच कुमाऊँ में चंद शक्ति का उदय हुआ।

इसलिए चंद वंश की स्थापना के विषय में सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है—

परंपरा सोमचंद को अत्यंत प्राचीन काल में रखती है, लेकिन डॉ. अजय सिंह रावत के ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार चंद सत्ता की स्थापना का समय लगभग 1020–1025 ई. के बीच मानना अधिक उपयुक्त है।

यह अंतर हमारे लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वंशावली और ऐतिहासिक कालक्रम हमेशा एक जैसे नहीं होते।


सोमचंद : चंद सत्ता की पहली नींव

परंपरा के अनुसार चंद वंश के संस्थापक सोमचंद थे।

रावत के अनुसार कत्यूरी सत्ता के अवसान के बाद सोमचंद ने कुमाऊँ में अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की और चंपावती/चम्पावत को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया।

उस समय काली कुमाऊँ का राजनीतिक परिदृश्य आज की तरह संगठित नहीं था। अनेक स्थानीय खस, नाग, द्रविड़ तथा अन्य स्थानीय शक्तियाँ और ठकुराइयाँ अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखती थीं।

इन स्थानीय शक्तियों को अपने अधीन संगठित करना सोमचंद के सामने बड़ी चुनौती थी।

उन्होंने स्थानीय राजनीतिक शक्तियों को व्यवस्थित किया तथा प्रशासन और सैन्य व्यवस्था को मजबूत किया। चंद सत्ता के प्रारंभिक स्वरूप में स्थानीय सरदारों और किलेदारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

यही वह आधार था जिस पर आगे चलकर चंद राज्य का विस्तार हुआ।


चम्पावत : चंद सत्ता का पहला राजनीतिक केन्द्र

चंपावती देवी के नाम से जुड़ा चम्पावत चंदों की प्रारंभिक राजधानी बना।

चम्पावत का महत्व केवल राजनीतिक नहीं था। आगे चलकर यह धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केन्द्र बना।

चंद शासन की प्रारंभिक स्मृतियों में बालेश्वर मंदिर विशेष महत्व रखता है। चम्पावत के मंदिरों और अभिलेखों से चंदों तथा उस समय की विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के संबंधों की जानकारी मिलती है।

यहीं से चंद सत्ता ने धीरे-धीरे अपना विस्तार आरंभ किया।


सोमचंद के बाद : आत्मचंद से वीणाचंद तक

सोमचंद के बाद उसका पुत्र आत्मचंद गद्दी पर बैठा। रावत के अनुसार उसने लगभग 20 वर्षों तक राज्य किया और अपने पूर्ववर्ती द्वारा स्थापित चंद सत्ता को बनाए रखा।

उसके बाद पूर्णचंद (1066-1084 ई.) गद्दी पर बैठा।

पूर्णचंद के बाद इन्द्रचंद आया। उसके समय कुमाऊँ में रेशम उत्पादन और रेशमी वस्त्र निर्माण से संबंधित गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। मैदानों से बुनकरों को लाकर रेशम उत्पादन को प्रोत्साहित करने और नेपाल के रास्ते चीन से व्यापारिक संबंध बनाने की चर्चा भी स्रोत में है।

इसके बाद क्रमशः—

संसारचंद → सुधाचंद → हरिचंद → वीणाचंद

का उल्लेख मिलता है।

इन शासकों के समय कोई बड़ी राजनीतिक घटना दर्ज नहीं होने के कारण उनके शासन का विवरण अपेक्षाकृत कम मिलता है।


चंद सत्ता और डोटी का प्रभाव

चंद इतिहास को समझने के लिए डोटी के साथ उसके संबंधों को समझना अत्यंत आवश्यक है।

प्रारंभिक समय में कुमाऊँ की राजनीति पर डोटी की शक्ति का प्रभाव था। चंदों की विभिन्न शाखाएँ और स्थानीय शासक कभी स्वतंत्र तो कभी किसी बड़ी शक्ति के अधीन दिखाई देते हैं।

1223 ई. के बालेश्वर मंदिर अभिलेख में अनेक मांडलिकों का उल्लेख मिलता है। इससे उस समय की राजनीतिक संरचना की जटिलता का पता चलता है। अभिलेख में चंद्रवंशी नामों के साथ अन्य स्थानीय शासकों और सामंतों का भी उल्लेख मिलता है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय कुमाऊँ कोई पूरी तरह केंद्रीकृत राज्य नहीं था। अलग-अलग स्थानीय शक्तियाँ, मांडलिक और सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में सत्ता का संचालन करते थे।


वीरचंद और चंद शक्ति का पुनर्गठन

चंद इतिहास में आगे वीरचंद का उल्लेख महत्वपूर्ण है।

रावत के अनुसार वीरचंद ने बाहरी राजनीतिक दबावों के बीच चंद शक्ति को मजबूत करने का प्रयास किया। उसका संबंध डोटी की शक्ति और स्थानीय मांडलिक व्यवस्था से जुड़े संघर्षों से भी रहा।

लगभग 1206 ई. में वीरचंद की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। उसके बाद चंद शासन में कई शासक आए और राजनीतिक स्थिति लगातार बदलती रही।


ज्ञानचंद : चंद शक्ति का महत्वपूर्ण मोड़

चंद इतिहास में ज्ञानचंद का काल एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का समय माना जाता है।

डॉ. अजय रावत के अनुसार ज्ञानचंद ने 1365 से 1420 ई. तक शासन किया।

वह दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के दरबार में भेंट लेकर जाने वाला पहला चंद राजा बताया गया है।

उस समय तराई-भाबर क्षेत्र में कटेहरियों का प्रभाव था। ज्ञानचंद और दिल्ली सल्तनत के संबंधों के परिणामस्वरूप उसे तराई क्षेत्र प्राप्त हुआ।

ज्ञानचंद के संबंध में सेराखड़कोट और गोबसा ताम्रपत्र महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। इनसे उसके शासन, भूमि-दान और राजनीतिक पदवी की जानकारी मिलती है। रावत के अनुसार इन अभिलेखों से ज्ञानचंद की राजनीतिक स्थिति काफी मजबूत दिखाई देती है।

यहीं से चंद सत्ता का विस्तार एक नए चरण में प्रवेश करता दिखाई देता है।


विक्रमचंद और भारतीचंद : डोटी के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष

ज्ञानचंद के बाद कुछ समय तक हरिहरचंद, दानचन्द, आत्मचंद और हरिचंद जैसे शासकों का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद 1423 ई. में विक्रमचंद के गद्दी पर बैठने का उल्लेख है। उसके दो ताम्रपत्र उपलब्ध होने की चर्चा रावत ने की है। उनके आधार पर उसका शासन लगभग 1423–1434 ई. माना गया है।

इसके बाद 1437 ई. में भारतीचंद गद्दी पर बैठा।

रावत के अनुसार भारतीचंद ने 1437 से 1477 ई. तक शासन किया।

भारतीचंद के समय चंद शक्ति ने डोटी के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष किया।

उसकी सेना में विभिन्न सामाजिक समूहों के लोग शामिल थे। डोटी की शक्ति को चुनौती देने के बाद चंदों ने सोर, सीरा और थल आदि क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया।

यही वह समय था जब चंद सत्ता ने केवल चम्पावत-केंद्रित शक्ति से आगे बढ़कर कुमाऊँ के व्यापक राजनीतिक भूभाग पर अधिकार स्थापित करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया।


रत्नचंद : विस्तार के बाद स्थिरता

भारतीचंद के बाद उसका पुत्र रत्नचंद गद्दी पर बैठा।

रावत के अनुसार रत्नचंद ने 1477 से 1488 ई. तक शासन किया।

उसके समय तक चंद सत्ता का आधार काफी मजबूत हो चुका था।

रत्नचंद के शासन के अंतिम वर्षों में उसकी वृद्धावस्था के कारण शासन की वास्तविक जिम्मेदारियों में उसके पुत्र कीर्तिचंद की भूमिका बढ़ने लगी थी।


कीर्तिचंद : सत्ता का विस्तार और संक्रमण

रत्नचंद के बाद कीर्तिचंद चंद इतिहास में महत्वपूर्ण शासक के रूप में सामने आता है।

कीर्तिचंद ने लगभग 1506 ई. तक शासन किया। विभिन्न स्रोतों में यह भी संकेत मिलता है कि 1488–1499 ई. के बीच वह युवराज के रूप में शासन-कार्य में सक्रिय था।

कीर्तिचंद के शासनकाल में चंद सत्ता ने कुमाऊँ की सीमाओं से आगे अपना प्रभाव बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्होंने सैन्य अभियानों के माध्यम से कई स्थानीय शक्तियों को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार किया। 

उनके विस्तारवादी अभियान में बारामंडल, पाली और फल्दाकोट जैसे क्षेत्रों को चंद राज्य में सम्मिलित किए जाने का उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं में बिसौद आदि क्षेत्रों को भी उनके राज्य-विस्तार से जोड़ा गया है।

कीर्तिचंद की महत्वाकांक्षा केवल कुमाऊँ तक सीमित नहीं थी। परंपरागत विवरणों में उनके द्वारा गढ़वाल के शासक अजयपाल को पराजित करने और गढ़वाल को चंद सत्ता के अधीन लाने का उल्लेख मिलता है। 

हालांकि इस घटना तथा उसके स्वरूप को लेकर इतिहासकारों और स्रोतों में मतभेद हैं, इसलिए इसे निश्चित तथ्य के बजाय परंपरागत ऐतिहासिक विवरण के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा।

इस प्रकार कीर्तिचंद के समय चंद राज्य का विस्तार केवल भू-भाग बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि यह कुमाऊँ की राजनीतिक शक्ति को आसपास के क्षेत्रों पर प्रभावी बनाने का प्रयास भी था। 

उनके अभियानों ने आगे आने वाले चंद शासकों के लिए एक विस्तृत राजनीतिक आधार तैयार किया और चंद राजसत्ता के क्रमिक सुदृढ़ीकरण में योगदान दिया।


चंद राजवंश का मध्यकालीन विस्तार

कीर्तिचंद के बाद क्रमशः—

प्रतापचंद, ताराचंद, माणिकचंद, कल्याणचंद, भीष्मचंद और अन्य शासकों

का उल्लेख मिलता है।

इस दौर में चंद सत्ता के लिए स्थानीय सामंतों, डोटी और आसपास की शक्तियों के साथ लगातार राजनीतिक संघर्ष चलता रहा।

चंदों की राजनीतिक संरचना में केवल राजा ही नहीं, बल्कि मांडलिक, सामंत, थोकदार और विभिन्न प्रशासनिक अधिकारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।


कल्याणचंद और अल्मोड़ा की ओर बढ़ता चंद राज्य

चंद इतिहास में अगला बड़ा परिवर्तन कल्याणचंद के समय दिखाई देता है।

उपलब्ध ताम्रपत्रों के आधार पर डॉ. अजय रावत कल्याणचंद का शासन 1545–1565 ई. के आसपास निर्धारित करते हैं।

कल्याणचंद ने चंद राज्य को और मजबूत किया।

इसी राजनीतिक प्रक्रिया के दौरान मणकोट राज्य को चंद राज्य में मिलाया गया और चम्पावत से प्रशासनिक ढाँचे को अल्मोड़ा की ओर ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

मणकोट के उप्रेती और पंत जैसे परिवारों तथा चम्पावत के विभिन्न प्रशासनिक कर्मचारियों को अल्मोड़ा में बसाने का उल्लेख भी मिलता है।

यह परिवर्तन आगे चलकर अल्मोड़ा को चंद सत्ता का प्रमुख केन्द्र बनाने वाला था।


रुद्रचंद : चंद राज्य का सुदृढ़ीकरण

कल्याणचंद के बाद उसका पुत्र रुद्रचंद गद्दी पर बैठा।

डॉ. अजय रावत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रुद्रचंद का शासन 1565–1597 ई. के बीच रखते हैं।

रुद्रचंद का समय भारतीय इतिहास में मुगल सम्राट अकबर के काल से जुड़ा था।

उसने चंद राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति को मजबूत किया। सीरा सहित कई क्षेत्रों में चंदों का प्रभाव बढ़ा और भूमि-बंदोबस्त तथा प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया।

रुद्रचंद ने सामाजिक और प्रशासनिक संगठन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किए। उसके समय विभिन्न सामाजिक और प्रशासनिक पदों के निर्धारण तथा अधिकारियों की भूमिकाओं का उल्लेख मिलता है।


रुद्रचंद की प्रशासनिक व्यवस्था

रुद्रचंद के शासन की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी व्यवस्थित प्रशासनिक संरचना थी।

भूमि पर विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते थे। प्रशासन में विभिन्न अधिकारियों की भूमिकाएँ निर्धारित थीं।

सेना को भी व्यवस्थित रूप दिया गया। राजा की सुरक्षा के लिए राजधानी में सेना रहती थी और युद्ध के समय स्थानीय ठाकुर तथा सामंत अपने सैनिकों के साथ राजा की सहायता करते थे।

इससे पता चलता है कि चंद राज्य केवल सैन्य शक्ति के सहारे नहीं चल रहा था, बल्कि उसके भीतर एक विकसित राजस्व, न्याय, भूमि और सैन्य प्रशासन भी विकसित हो चुका था।


लक्ष्मीचंद : प्रशासन और निर्माण का दौर

1597 ई. में रुद्रचंद की मृत्यु के बाद लक्ष्मीचंद गद्दी पर बैठा।

उसके शासन में प्रशासनिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया। दारमा घाटी में शौका समुदाय के अधिकार और दायित्व निर्धारित करने तथा सीमाओं और कर व्यवस्था को व्यवस्थित करने की चर्चा मिलती है।

लक्ष्मीचंद को निर्माण कार्यों में भी रुचि थी।

उसके समय बाग-बगीचों का निर्माण, मंदिरों का निर्माण और पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया। स्रोत में बागनाथ मंदिर के 1602 ई. के जीर्णोद्धार का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है।

चंद शासकों द्वारा मैदानों से कारीगरों और शिल्पियों को लाकर बसाने की परंपरा ने कुमाऊँ के स्थापत्य और शिल्प पर भी प्रभाव डाला।


त्रिमलचंद, दिलीपचंद और विजयचंद

लक्ष्मीचंद के बाद उसके पुत्र त्रिमलचंद ने युवराज के रूप में शासन में सक्रिय भूमिका निभाई।

रावत के अनुसार उसने 1616–1621 ई. तक युवराज के रूप में शासन-कार्य संभाला।

इसके बाद:

  • दिलीपचंद — 1621–1624 ई.

  • विजयचंद — 1625 ई.

  • त्रिमलचंद — 1625–1638 ई.

का क्रम मिलता है।

विजयचंद का शासन बहुत अल्पकालिक रहा और उसकी मृत्यु के बाद त्रिमलचंद ने सत्ता संभाली।


बाजबहादुरचंद : चंद शक्ति का उत्कर्ष

चंद इतिहास में बाजबहादुरचंद का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उसका शासन 1638–1678 ई. तक रहा।

उसके समय चंद राज्य का विस्तार हुआ और तराई, डोटी तथा पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों में चंद प्रभाव को मजबूत करने के प्रयास किए गए।

बाजबहादुरचंद को अपने राजनीतिक हितों के लिए मुगल दरबार से भी संपर्क रखना पड़ा। स्रोत के अनुसार वह शाहजहाँ के समय दिल्ली गया और तराई क्षेत्र से संबंधित राजनीतिक समस्या के समाधान के लिए मुगल सत्ता से सहायता प्राप्त की।

मुगल सत्ता के सहयोग से तराई क्षेत्र पुनः चंद नियंत्रण में आया और बाजपुर नगर की स्थापना का उल्लेख भी मिलता है।


बाजबहादुरचंद और प्रशासनिक विस्तार

बाजबहादुरचंद केवल युद्धप्रिय शासक नहीं था।

उसने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित किया और अनेक नए पदों तथा कर्मचारियों की भूमिकाओं का निर्धारण किया।

उसके समय विभिन्न क्षेत्रों को प्रशासनिक इकाइयों में व्यवस्थित करने और राजस्व व्यवस्था को नियंत्रित करने का प्रयास हुआ।

उसने मंदिर निर्माण को भी संरक्षण दिया। थल का एकहथिया देवाल उसके समय की स्थापत्य परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण है।

कैलाश-मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए भूमि और भोजन जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख भी स्रोतों में मिलता है।


उद्योतचंद : डोटी और गढ़वाल से संघर्ष

1678 ई. में बाजबहादुरचंद की मृत्यु के बाद उद्योतचंद गद्दी पर बैठा।

उसके समय डोटी और गढ़वाल दोनों के साथ संघर्ष तेज हुआ।

1679 ई. का बरम ताम्रपत्र उद्योतचंद के शासन का एक महत्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण है।

उद्योतचंद ने गद्दी संभालते ही अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने का प्रयास किया। डोटी के राजा देवपाल और गढ़वाल की शक्ति के बीच बने राजनीतिक समीकरणों ने चंद राज्य के सामने नई चुनौती पैदा कर दी।

उसने डोटी के विरुद्ध कई सैन्य अभियान किए।

अजमेरगढ़ पर लगभग 1683 ई. के आसपास चंद विजय का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1688 ई. में खैरागढ़ पर अधिकार और डोटी के साथ संधि का उल्लेख है।

लेकिन संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ। 1696 ई. के आसपास फिर युद्ध हुआ और इस संघर्ष में उद्योतचंद को पराजय का सामना करना पड़ा।

इस घटना के बाद उसके जीवन का अंतिम चरण धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में बीता।


ज्ञानचंद और जगतचंद : चंद राज्य का अंतिम उत्कर्ष

उद्योतचंद के बाद उसका पुत्र ज्ञानचंद गद्दी पर बैठा।

उसके प्रथम ताम्रपत्र-अभिलेख की तिथि 1698 ई. बताई गई है और उसके शासन का काल 1698–1708 ई. माना गया है।

उसने अपने पिता की तरह गढ़वाल और डोटी के विरुद्ध अभियान किए।

इसके बाद 1708 ई. में जगतचंद गद्दी पर बैठा।

रावत के विवरण में जगतचंद के समय को चंदों के उत्कर्ष का काल बताया गया है। उसने गढ़वाल के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाए और श्रीनगर तक अपनी सेना पहुँचाई।

जगतचंद के समय चंद राज्य का प्रभाव काफी विस्तृत हुआ, लेकिन लगातार युद्धों ने राज्य पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव भी डाला।

1720 ई. में जगतचंद की मृत्यु के बाद चंद सत्ता धीरे-धीरे अवनति की ओर बढ़ने लगी।


चंद राज्य का अवनति काल

जगतचंद के बाद देवीचंद और उसके बाद क्रमशः—

अजीतचंद, कल्याणचंद, दीपचंद, मोहनचंद, प्रद्युम्नचंद, मोहनचंद, शिवचंद और महेंद्रचंद

जैसे शासक गद्दी पर आए।

इनमें से कई का शासनकाल छोटा रहा और चंद राज्य की राजनीतिक शक्ति पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रह सकी।

विशेष रूप से कल्याणचंद के समय 1740 के दशक में रोहिल्ला आक्रमण ने चंद राज्य को गंभीर संकट में डाल दिया।

रोहिल्ला नेता अली मुहम्मद खान की सेना कुमाऊँ में पहुँची और अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया। स्रोतों के अनुसार इस दौरान भारी लूटपाट और विनाश हुआ।

यह घटना चंद सत्ता की कमजोर होती राजनीतिक स्थिति का बड़ा संकेत थी।


चंद शासकों और नेपाल के संबंध

चंद इतिहास को नेपाल से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

कुमाऊँ और नेपाल के बीच प्राचीन काल से ही राजनीतिक, सांस्कृतिक और वैवाहिक संबंध रहे थे। मध्यकाल में डोटी के माध्यम से नेपाल की शक्ति का कुमाऊँ की राजनीति पर लगातार प्रभाव रहा।

चंदों और नेपाल के बीच कभी संघर्ष हुआ तो कभी राजनीतिक और वैवाहिक संबंध स्थापित हुए।

डॉ. रावत ने चंदों और नेपाल के संबंधों की चर्चा करते हुए भाषा, रीति-रिवाज, धार्मिक परंपराओं तथा राजनीतिक संबंधों में दोनों क्षेत्रों की निकटता की ओर भी संकेत किया है।

इसलिए कुमाऊँ का मध्यकालीन इतिहास वास्तव में कुमाऊँ–डोटी–नेपाल–गढ़वाल के बीच बदलते राजनीतिक संबंधों का इतिहास भी है।


चंद प्रशासन : केवल राजा और युद्ध की कहानी नहीं

चंद राजवंश की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक उसका प्रशासनिक विकास था।

चंद काल में—

  • भूमि-बंदोबस्त की व्यवस्था विकसित हुई।

  • विभिन्न प्रकार के कर निर्धारित किए गए।

  • सरदार, फौजदार और नेगी जैसे अधिकारियों की भूमिकाएँ निर्धारित थीं।

  • न्याय व्यवस्था के लिए अलग-अलग कचहरियों का उल्लेख मिलता है।

  • सैन्य प्रशासन को व्यवस्थित किया गया।

  • स्थानीय सामंतों और थोकदारों को प्रशासन में भूमिका दी गई।

  • शिल्पियों और कारीगरों को राज्य में बसाया गया।

  • मंदिरों और नौलों के निर्माण को प्रोत्साहन मिला।

इससे स्पष्ट होता है कि चंद राज्य की शक्ति केवल राजा की व्यक्तिगत वीरता पर निर्भर नहीं थी, बल्कि समय के साथ एक जटिल प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हो चुकी थी।


चंद काल की सामाजिक व्यवस्था

चंद शासन में समाज को विभिन्न प्रशासनिक और पेशागत भूमिकाओं में व्यवस्थित करने का प्रयास भी हुआ।

रुद्रचंद के समय सामाजिक व्यवस्था के पुनर्गठन और विभिन्न ब्राह्मण समूहों तथा प्रशासनिक-पेशागत वर्गों के निर्धारण की चर्चा मिलती है।

राज्य के कामकाज के लिए पुरोहित, वैद्य, पौराणिक, सईस, राजकोली, पहरी, बाजदार, बजनिया, टम्टा आदि विभिन्न भूमिकाओं का उल्लेख मिलता है।

इससे उस समय के समाज में पेशा, प्रशासन और राजसत्ता के बीच गहरे संबंध का पता चलता है।


चंदों की स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत

चंद राजवंश की सबसे स्थायी विरासतों में उसकी स्थापत्य परंपरा है।

चम्पावत का बालेश्वर मंदिर, नागनाथ मंदिर, अल्मोड़ा और उसके आसपास के मंदिर, बागेश्वर का बागनाथ मंदिर, थल का एकहथिया देवाल और अनेक नौले चंदकालीन सांस्कृतिक परंपरा की याद दिलाते हैं।

चंद शासक मंदिर निर्माण के साथ-साथ पुराने मंदिरों के जीर्णोद्धार में भी रुचि लेते थे। लक्ष्मीचंद और बाजबहादुरचंद के समय के निर्माण और संरक्षण कार्य इसका उदाहरण हैं।

लेकिन चंदों की सांस्कृतिक विरासत केवल मंदिरों तक सीमित नहीं थी।

लोकदेवताओं, लोककथाओं, पर्व-परंपराओं, शिल्प, प्रशासनिक शब्दावली और सामाजिक संस्थाओं में भी इस काल की छाप दिखाई देती है।


चंद राजाओं की प्रमुख कालक्रम-सूची

डॉ. अजय सिंह रावत की पुस्तक को आधार मानते हुए ब्लॉग में केवल अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से दिए गए कालक्रम को इस प्रकार रखा जा सकता है:

शासकशासनकाल/तिथिटिप्पणी
सोमचंदलगभग 1020–1025 ई.; सुविधा से 1025 ई.स्थापना-काल पर मतभेद
आत्मचंदलगभग 20 वर्षरावत ने अवधि दी है, निश्चित आरंभ-वर्ष नहीं
पूर्णचंद1066–1084 ई.                                                रावत के अनुसार
इन्द्रचंदरेशम उत्पादन व व्यापार का उल्लेख
संसारचंद
सुधाचंद
हरिचंद
वीणाचंदप्रारंभिक काल में डोटी का प्रभाव
वीरचंदमृत्यु लगभग 1206 ई.राजनीतिक संघर्ष का काल
ज्ञानचंद1365–1420 ई.फिरोजशाह तुगलक से संबंध
विक्रमचंद1423–1434 ई.ताम्रपत्रीय प्रमाण
भारतीचंद1437–1477 ई.डोटी के विरुद्ध विस्तार
रत्नचंद1477–1488 ई.
कीर्तिचंदलगभग 1506 ई. तकतिथियों में मतभेद
कल्याणचंद1545–1565 ई.चंद सत्ता का विस्तार
रुद्रचंद1565–1597 ई.प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण
लक्ष्मीचंद1597 ई. सेनिर्माण व प्रशासन
त्रिमलचंदयुवराज 1616–1621; बाद में 1625–1638
दिलीपचंद1621–1624 ई.
विजयचंद1625 ई.अल्पकालिक शासन
बाजबहादुरचंद1638–1678 ई.चंद शक्ति का उत्कर्ष
उद्योतचंद1678 ई. सेडोटी-गढ़वाल संघर्ष
ज्ञानचंद1698–1708 ई.
जगतचंद1708–1720 ई.उत्कर्ष का अंतिम चरण
देवीचंद1720 ई. के बादअवनति का दौर
अजीतचंद
कल्याणचंदलगभग 1730–1747 ई.रोहिल्ला संकट
दीपचंद
मोहनचंद
प्रद्युम्नचंद
शिवचंद
महेंद्रचंदअंतिम चंद शासकचंद सत्ता का अंतिम चरण

चंद सत्ता का अंत

18वीं शताब्दी में चंद राज्य लगातार राजनीतिक दबावों से कमजोर होता गया।

रोहिल्ला आक्रमण, गढ़वाल और डोटी के साथ संघर्ष, आंतरिक राजनीतिक कमजोरी तथा बदलते क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन ने चंद राज्य की शक्ति को प्रभावित किया।

इसके बाद नेपाल की गोरखा शक्ति धीरे-धीरे कुमाऊँ की ओर बढ़ी।

चंदों की अंतिम राजनीतिक अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते राज्य पहले जैसी सैन्य और आर्थिक शक्ति नहीं रखता था।

अंततः 1790 ई. के आसपास गोरखाओं ने कुमाऊँ पर अधिकार कर लिया और चंदों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई।

इस प्रकार चंद राजवंश का राजनीतिक अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उसकी सांस्कृतिक विरासत समाप्त नहीं हुई।


इतिहास की सबसे बड़ी सीख : तिथियों को लेकर सावधानी क्यों जरूरी है?

चंद इतिहास का अध्ययन करते समय एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।

हर राजा की तारीख समान स्तर के प्रमाण पर आधारित नहीं है।

कुछ तिथियाँ ताम्रपत्रों और अभिलेखों से समर्थित हैं। कुछ तिथियाँ वंशावली से आती हैं। कुछ का निर्धारण उपलब्ध राजनीतिक घटनाओं के आधार पर किया गया है।

इसीलिए सोमचंद की तिथि को लेकर 700 ई. की परंपरागत मान्यता और लगभग 1025 ई. की ऐतिहासिक स्थापना में अंतर दिखाई देता है।

डॉ. अजय रावत स्वयं इस कालक्रम को अभिलेखों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर समझने का प्रयास करते हैं। इसलिए इस ब्लॉग में उनकी पुस्तक को मुख्य आधार बनाया गया है।


निष्कर्ष : चम्पावत से अल्मोड़ा तक चंदों की विरासत

चंद राजवंश की कहानी केवल राजाओं की लंबी सूची नहीं है।

यह उस समय की कहानी है जब कुमाऊँ की अनेक स्थानीय शक्तियाँ धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक ढाँचे में संगठित हुईं।

सोमचंद से शुरू हुई राजनीतिक परंपरा, चम्पावत से आगे बढ़ी; ज्ञानचंद और भारतीचंद के समय में उसने विस्तार पाया; रत्नचंद और कीर्तिचंद के दौर से गुजरते हुए कल्याणचंद और रुद्रचंद के समय अधिक संगठित हुई; और बाजबहादुरचंद के समय चंद शक्ति अपने महत्वपूर्ण उत्कर्ष तक पहुँची।

इसके बाद उद्योतचंद और जगतचंद ने संघर्षों के बीच राज्य की शक्ति को बनाए रखने का प्रयास किया, लेकिन 18वीं शताब्दी में चंद राज्य धीरे-धीरे कमजोर होता गया।

फिर आया वह समय जब गोरखा शक्ति ने कुमाऊँ पर अधिकार कर लिया।

लेकिन किसी राजवंश की राजनीतिक सत्ता समाप्त हो जाने से उसकी विरासत समाप्त नहीं होती।

आज भी चम्पावत के मंदिरों, अल्मोड़ा की ऐतिहासिक पहचान, बागेश्वर के धार्मिक स्थलों, कुमाऊँ की लोकपरंपराओं, स्थापत्य, सामाजिक संस्थाओं और लोकस्मृतियों में चंद काल की अनेक परतें दिखाई देती हैं।

इसलिए चंद राजवंश को केवल—

“कुमाऊँ पर शासन करने वाला एक राजवंश”

कहना उसके महत्व को छोटा कर देना होगा।

वास्तव में चंदों का इतिहास कुमाऊँ के राजनीतिक एकीकरण, प्रशासनिक विकास और सांस्कृतिक पहचान के निर्माण की लंबी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चम्पावत से उठी चंद सत्ता ने केवल कुमाऊँ पर शासन नहीं किया; उसने कुमाऊँ की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्मृति पर एक ऐसी छाप छोड़ी, जो आज भी दिखाई देती है।


📚 संदर्भ

मुख्य स्रोत

डॉ. अजय सिंह रावत — उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास, अध्याय: “कुमाऊँ का चन्द राजवंश”।
बद्रीदत्त पाण्डे → ओ.सी. हांडा → शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ → Atkinson → शिलालेख/पुरातात्विक स्रोत → अन्य आधुनिक शोध।

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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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