![]() |
| महापाषाणीय शवाधान |
"जब लिखित इतिहास मौन हो जाता है, तब पत्थर बोलना शुरू करते हैं; और उन्हीं की भाषा को पुरातत्त्व कहा जाता है।"
पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास केवल कपमार्क्स तक सीमित नहीं है। इस घाटी की धरती के गर्भ में ऐसी अनेक पुरातात्विक धरोहरें छिपी हैं, जो हजारों वर्ष पूर्व यहाँ विकसित मानव सभ्यता की मौन गाथा सुनाती हैं। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण हैं महापाषाणीय शवाधान—विशाल प्रस्तरखण्डों से निर्मित वे समाधि-स्थल, जिनमें उस युग के लोगों ने अपने प्रियजनों को अंतिम विश्राम दिया। ये केवल कब्रें नहीं हैं, बल्कि उस समाज की धार्मिक आस्था, सामाजिक संरचना, कलात्मक अभिरुचि और मृत्यु के प्रति उसके दार्शनिक दृष्टिकोण के सजीव दस्तावेज हैं।
मलारी : जहाँ उत्तराखण्ड में पहली बार खुला महापाषाणीय संस्कृति का द्वार
उत्तराखण्ड में महापाषाणीय शवाधानों की खोज का श्रेय प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' को जाता है। वर्ष 1956 ई. में उन्होंने चमोली जनपद के नीति घाटी स्थित मलारी गाँव में ऐसे शवाधानों की पहचान कर हिमालयी पुरातत्त्व के एक नए अध्याय का उद्घाटन किया।
मलारी में मिले शवाधानों का निर्माण अत्यन्त सुविचारित ढंग से किया गया था। चारों ओर विशाल प्रस्तरखण्ड खड़े किए गए थे और ऊपर एक बड़े शिलाखण्ड से उन्हें ढक दिया गया था। इन पत्थरों के भीतर सुरक्षित सामग्री यह संकेत देती है कि मृतकों के प्रति उस समाज का सम्मान अत्यन्त गहरा था तथा मृत्यु को वे जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि किसी नई यात्रा का आरम्भ मानते थे।
