समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित कर्तृपुर आखिर कहाँ था? क्या वह उत्तराखण्ड के किसी पर्वतीय राज्य का नाम था? गुप्त साम्राज्य की शक्ति हिमालय तक पहुँची तो क्या मध्य हिमालय भी गुप्त शासन के अधीन आ गया था? और गुप्तों के बाद उत्तराखण्ड में कौन-कौन सी राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं?
इन प्रश्नों के उत्तर उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
उत्तराखण्ड का इतिहास केवल बड़े साम्राज्यों की सीमाओं का इतिहास नहीं है। हिमालय की घाटियों में समय-समय पर अनेक स्थानीय राजसत्ताएँ विकसित हुईं, जिन्होंने बदलती परिस्थितियों में अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखी। चौथी शताब्दी से लगभग ग्यारहवीं शताब्दी तक का काल इसी परिवर्तन की एक लंबी कहानी प्रस्तुत करता है—गुप्त प्रभाव से लेकर स्थानीय पर्वतीय राज्यों और फिर कार्तिकेयपुर की संगठित सत्ता तक।
1. गुप्त साम्राज्य और उत्तराखण्ड की सीमा
चौथी शताब्दी ईस्वी में समुद्रगुप्त के शासनकाल में गुप्त सत्ता उत्तर भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में बदल गई। समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का प्रमुख स्रोत प्रयाग प्रशस्ति है, जिसे उनके दरबारी कवि हरिषेण ने रचा था। यह अभिलेख उस समय की राजनीतिक शक्तियों और समुद्रगुप्त की उनसे संबंध-व्यवस्था की महत्वपूर्ण जानकारी देता है।
प्रयाग प्रशस्ति में नेपाल के साथ कर्तृपुर का भी उल्लेख मिलता है। इसी कारण उत्तराखण्ड के इतिहास में कर्तृपुर का विशेष महत्व हो जाता है।
लेकिन यहाँ एक सावधानी जरूरी है।
प्रशस्ति में किसी राज्य का उल्लेख मिल जाना और उसके आधुनिक भौगोलिक क्षेत्र की निश्चित पहचान हो जाना—दो अलग बातें हैं।
2. कर्तृपुर : उत्तराखण्ड के इतिहास की पहली बड़ी पहेली
कर्तृपुर की पहचान को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय से मतभेद रहा है। कुछ पुराने मत इसे उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों से जोड़ते थे, जबकि बाद के अध्ययनों में इसे पश्चिमी हिमालय और विशेष रूप से गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र से जोड़ने की संभावना व्यक्त की गई।
उत्तराखण्ड से संबंधित शोध में कर्तृपुर को हिमालयी राजनीतिक इकाई मानने का मत महत्वपूर्ण है। सरकारी पुरातात्विक सामग्री भी बताती है कि कर्तृपुर की पहचान को बाद के कार्तिकेयपुर से जोड़ने की एक परंपरा रही है, लेकिन प्रारंभिक कार्तिकेयपुर के वास्तविक विस्तार और कर्तृपुर के साथ उसके संबंध को पूरी तरह निश्चित नहीं माना जा सकता।
इसलिए कर्तृपुर के विषय में सबसे संतुलित निष्कर्ष यही होगा—
कर्तृपुर को मध्य हिमालय की एक संभावित राजनीतिक इकाई के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन उसकी सटीक स्थिति और बाद के कार्तिकेयपुर से उसका संबंध अभी भी शोध का विषय है।
3. क्या समुद्रगुप्त ने कर्तृपुर को जीत लिया था?
यह प्रश्न बहुत रोचक है, लेकिन इसका उत्तर केवल 'हाँ' या 'नहीं' में देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।
प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के समकालीन राज्यों को अलग-अलग राजनीतिक श्रेणियों में रखा गया है। कुछ राज्यों को पराजित करके गुप्त साम्राज्य में मिला लिया गया, जबकि सीमावर्ती और दूरस्थ शक्तियों के साथ अधीनता, कर, सम्मान या राजनीतिक स्वीकृति जैसे संबंध स्थापित हुए।
इसलिए यदि कर्तृपुर को उत्तराखण्ड के किसी पर्वतीय क्षेत्र से संबंधित माना जाए, तो भी यह आवश्यक नहीं कि समुद्रगुप्त ने वहाँ प्रत्यक्ष गुप्त प्रशासन स्थापित कर दिया था।
बल्कि संभवतः स्थिति अधिक जटिल थी।
मैदानी साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति एक ओर थी और दूसरी ओर हिमालय की अपनी स्थानीय सत्ता।
यही कारण है कि समुद्रगुप्त की 'विजय' को सीधे पूरे उत्तराखण्ड पर गुप्त शासन के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
4. गुप्त प्रभाव के बाद स्थानीय सत्ताओं का उभार
गुप्त साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी तो उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में स्थानीय राजवंशों ने पुनः अपनी राजनीतिक शक्ति स्थापित की।
मध्य हिमालय भी इससे अछूता नहीं रहा।
उत्तराखंड के ऐतिहासिक ग्रंथों में इस काल के लिए ब्रह्मपुर, गोविषाण तथा अन्य छोटे-बड़े पर्वतीय राज्यों का उल्लेख मिलता है। चीनी यात्रियों के विवरण और स्थानीय अभिलेख इन राजनीतिक इकाइयों के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं।
इस काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि मध्य हिमालय किसी एक विशाल साम्राज्य के अधीन नहीं था।
इसके बजाय यहाँ अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक केंद्र विकसित हो रहे थे।
5. ब्रह्मपुर : मध्य हिमालय की एक महत्वपूर्ण सत्ता
गुप्त साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बाद उत्तराखण्ड में कई क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियाँ उभरने लगीं। इसी क्रम में ब्रह्मपुर मध्य हिमालय की एक महत्वपूर्ण सत्ता के रूप में सामने आता है। चीनी यात्री के विवरण तथा उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास जैसे स्रोतों में इसका उल्लेख मिलता है। यद्यपि इसके भौगोलिक विस्तार को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि उस समय हिमालय और तराई-मैदानी क्षेत्रों के बीच राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संपर्क सक्रिय थे।
ब्रह्मपुर के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी तालेश्वर ताम्रपत्र हैं। अल्मोड़ा जनपद की चौकोट पट्टी के अंतर्गत भिकियासैंण तहसील में विनो नदी के किनारे स्थित तालेश्वर गांव में लगभग 1915 ई. में खेत की नींव खोदते समय दो ताम्रपत्र मिले। ग्रामीणों ने उन्हें मंदिर में सुरक्षित रखा और लगभग 48 वर्ष बाद, 1963 ई. में श्री सदानन्द शर्मा ने उन्हें अध्ययन के लिए लखनऊ संग्रहालय को सौंपा।
अध्ययन से ज्ञात हुआ कि ये अभिलेख 5वीं–6वीं शताब्दी के सोमवंशी पौरव शासकों से संबंधित हैं। इनमें विष्णुवर्मन, वृषवर्मन, अग्निवर्मन, द्युतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय सहित पाँच शासकों का उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों में ब्रह्मपुर का उल्लेख पौरव शासकों की राजनीतिक सत्ता और राजधानी के संदर्भ में मिलता है।
इस प्रकार तालेश्वर ताम्रपत्र केवल प्राचीन शासकों की जानकारी नहीं देते, बल्कि यह भी संकेत करते हैं कि गुप्तोत्तर काल में उत्तराखण्ड में स्वतंत्र क्षेत्रीय राजसत्ताएँ विकसित हो चुकी थीं। ब्रह्मपुर इसी राजनीतिक परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण कड़ी था, जिसने मध्य हिमालय के इतिहास में स्थानीय सत्ता के उभार को स्पष्ट रूप से सामने रखा।
6. गोविषाण : कुमाऊँ की ओर एक अलग राजनीतिक केंद्र
मध्य हिमालय की दूसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक इकाई थी गोविषाण।
उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में गोविषाण का विशेष स्थान है। वर्तमान काशीपुर के आसपास स्थित इस प्राचीन स्थल की पहचान चीनी यात्री ह्वेनसांग के वर्णित किउ-पि-श्वांग-ना से की गई है। पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने इसे काशीपुर से जोड़ा था। ह्वेनसांग के समय गोविषाण एक विकसित बस्ती थी, जहाँ बौद्ध मठों के साथ ब्राह्मण मंदिर भी विद्यमान थे।
गोविषाण की ऐतिहासिकता को पुरातात्विक उत्खननों से भी बल मिलता है। यहाँ विभिन्न चरणों में हुई खुदाइयों से ईंट-निर्मित मंदिर, मृदभांड, टेराकोटा प्रतिमाएँ, सिक्के और अन्य स्थापत्य अवशेष मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यहाँ प्राप्त मंदिर परिसर के प्रारंभिक चरण को गुप्तकाल तथा बाद के विस्तार को लगभग छठी-सातवीं शताब्दी से जोड़ा जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि गोविषाण इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और नगरीय केंद्र था।
गोविषाण का महत्व ब्रह्मपुर के संदर्भ में भी बढ़ जाता है। गुप्तोत्तर काल में मध्य हिमालय में ब्रह्मपुर जैसी राजनीतिक सत्ता सक्रिय थी और काशीपुर का गोविषाण मैदान तथा हिमालय के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। कुछ इतिहासकार गोविषाण और ब्रह्मपुर को एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में देखते हैं, लेकिन गोविषाण निश्चित रूप से ब्रह्मपुर के अधीन था, ऐसा प्रमाण अभी निर्णायक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए दोनों के संबंध को संभावित राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क के रूप में देखना अधिक उचित है।
गोविषाण का इतिहास आज भी खोज का विषय है। 2026 में यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा पुनः उत्खनन शुरू किया गया है। नई खुदाई से प्राप्त सामग्री इस प्राचीन नगरी के कालक्रम, स्वरूप और आसपास की राजनीतिक शक्तियों से उसके संबंधों पर नई रोशनी डाल सकती है।
इस प्रकार गोविषाण केवल काशीपुर का एक पुराना टीला नहीं, बल्कि तराई और मध्य हिमालय के बीच प्राचीन आवागमन, धर्म, संस्कृति और राजनीति को समझने वाली महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी है। इसके नीचे दबी परतें शायद ब्रह्मपुर और उत्तराखण्ड के प्रारंभिक मध्यकालीन इतिहास के कई अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।
7. छोटे-छोटे पर्वतीय राज्यों का संसार
इस समय मध्य हिमालय में केवल बड़े राज्य ही नहीं थे।
गढ़वाल के विभिन्न भागों में छोटे राजनीतिक केंद्रों का अस्तित्व भी रहा होगा। उत्तराखंड का नवीन इतिहास में स्थानीय इतिहासकार पातीराम परमार के आधार पर गढ़वाल के आसपास विभिन्न राजसत्ताओं का उल्लेख मिलता है।
इनमें—
कुमाऊँ क्षेत्र की प्रारंभिक स्थानीय सत्ता,
ब्रह्मपुर,
पाण्डुवाला,
मोरध्वज क्षेत्र,
चाँदपुर क्षेत्र तथा
पश्चिमी भागों की स्थानीय शक्तियाँ
जैसी राजनीतिक इकाइयों की चर्चा मिलती है।
इन सभी की राजनीतिक सीमा और काल-निर्धारण समान रूप से प्रमाणित नहीं हैं। इसलिए इन्हें एक सुव्यवस्थित साम्राज्य के हिस्से के रूप में देखने के बजाय मध्य हिमालय की बहुकेंद्रीय राजनीतिक संरचना के रूप में समझना अधिक उचित है।
8. पौरव सत्ता : ब्रह्मपुर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा
डॉ. अजय रावत की पुस्तक में ब्रह्मपुर के शासकों को पौरव राजवंश से जोड़ने का मत भी सामने आता है।
तालेश्वर ताम्रपत्र इस संदर्भ में विशेष महत्व रखते हैं। इनमें पौरव शासकों की वंशावली तथा उनके शासन की जानकारी मिलती है।
इन अभिलेखों से यह संकेत मिलता है कि गुप्तोत्तर काल में मध्य हिमालय में राजनीतिक सत्ता स्थानीय राजवंशों के हाथों में थी।
इसलिए गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तराखण्ड में राजनीतिक शून्य नहीं बना।
इसके विपरीत—
गुप्त सत्ता के स्थान पर स्थानीय राजनीतिक परंपराएँ अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने लगीं।
9. कर्तृपुर से कार्तिकेयपुर की ओर
यहीं से उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सामने आती है।
कर्तृपुर का उल्लेख समुद्रगुप्त के समय मिलता है, जबकि बाद के अभिलेखों में कार्तिकेयपुर नाम सामने आता है।
क्या दोनों एक ही राजनीतिक परंपरा के अलग-अलग रूप हैं?
यह संभावना इतिहासकारों को आकर्षित करती रही है।
कुछ अध्ययनों में कार्तिकेयपुर को कर्तृपुर का संस्कृतनिष्ठ या परिवर्तित रूप मानने की संभावना व्यक्त की गई है। भारतीय पुरातत्व संबंधी सामग्री में भी यह संभावना दर्ज है कि कार्तिकेयपुर और कर्तृपुर के बीच कोई संबंध हो सकता है। लेकिन उसी सामग्री में यह भी स्पष्ट है कि यह पहचान पूरी तरह निश्चित नहीं है।
इसलिए यहाँ इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण सबक देता है—
समान नाम महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं, लेकिन वे अपने आप में पूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होते।
10. कार्तिकेयपुर : मध्य हिमालय की उभरती शक्ति
लगभग सातवीं–आठवीं शताब्दी के बाद मध्य हिमालय में कार्तिकेयपुर नाम अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने लगता है।
यहीं से वह राजनीतिक परंपरा विकसित होती है जिसे बाद के इतिहास-लेखन में प्रायः कत्यूरी सत्ता के नाम से जाना गया।
कार्तिकेयपुर की सत्ता का प्रभाव केवल एक छोटी घाटी तक सीमित नहीं था। उसके अभिलेख उत्तराखण्ड के विभिन्न भागों में प्राप्त हुए हैं और इससे एक व्यापक राजनीतिक प्रभाव का संकेत मिलता है।
बागेश्वर, पाण्डुकेश्वर और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त अभिलेख इस राजसत्ता की राजनीतिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर बाद के काल में कार्तिकेयपुर एक संगठित और प्रभावशाली पर्वतीय राज्य के रूप में उभरता दिखाई देता है।
11. कत्यूरी नाम : इतिहास और परंपरा के बीच
आज हम जिस सत्ता को सामान्यतः कत्यूरी राजवंश कहते हैं, उसके प्रारंभिक इतिहास में 'कत्यूरी' नाम की तुलना में कार्तिकेयपुर और संबंधित अभिलेखीय नाम अधिक महत्वपूर्ण हैं।
सरकारी पुरातात्विक दस्तावेज भी स्वीकार करते हैं कि इस राज्य को विभिन्न साहित्यिक और अभिलेखीय स्रोतों में अलग-अलग नामों से जाना गया है और आठवीं शताब्दी से पहले इसकी स्थिति एवं सीमा स्पष्ट नहीं है।
इसलिए कार्तिकेयपुर और बाद की कत्यूरी परंपरा के बीच संबंध को स्वीकार करते समय अभिलेखीय प्रमाण और लोकपरंपरा को अलग-अलग स्तरों पर देखना चाहिए।
12. कार्तिकेयपुर राजवंश का विस्तार
लगभग आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच कार्तिकेयपुर की सत्ता मध्य हिमालय में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गई।
इस काल के शासकों ने विभिन्न घाटियों और व्यापारिक मार्गों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। पाण्डुकेश्वर और बागेश्वर जैसे स्थानों से प्राप्त अभिलेख इस सत्ता की गतिविधियों की जानकारी देते हैं।
यही वह काल है जब मध्य हिमालय पहली बार अपेक्षाकृत व्यापक राजनीतिक एकीकरण की ओर बढ़ता दिखाई देता है।
एक ओर अलग-अलग घाटियों की स्थानीय शक्तियाँ थीं, दूसरी ओर कार्तिकेयपुर जैसी सत्ता उन्हें एक बड़े राजनीतिक ढाँचे में जोड़ने का प्रयास करती दिखाई देती है।
13. क्या यही आगे चलकर कुमाऊँ की राजनीतिक पहचान बनी?
कार्तिकेयपुर की राजनीतिक परंपरा ने मध्य हिमालय के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।
बाद की शताब्दियों में यह विशाल राजनीतिक संरचना छोटे-छोटे राज्यों और स्थानीय सत्ता-केंद्रों में विभाजित हुई। इसी विखंडन ने आगे चलकर कुमाऊँ और गढ़वाल की अनेक क्षेत्रीय राजसत्ताओं के विकास के लिए आधार तैयार किया।
इस दृष्टि से कार्तिकेयपुर का इतिहास केवल एक राजवंश की कहानी नहीं है।
यह मध्य हिमालय में राजनीतिक एकीकरण और फिर राजनीतिक विखंडन की लंबी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण था।
14. सत्ता परिवर्तन की पूरी कड़ी
यदि इस पूरे कालखंड को एक क्रम में देखें तो उत्तराखण्ड की राजनीतिक तस्वीर कुछ इस प्रकार बनती है—
यह क्रम बिल्कुल सीधी रेखा नहीं था। कई शक्तियाँ एक ही समय में अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रही होंगी। इसलिए इसे राजनीतिक विकास की व्यापक रूपरेखा के रूप में देखना चाहिए, न कि प्रत्येक सत्ता के बीच निश्चित वंशगत उत्तराधिकार के रूप में।
निष्कर्ष : हिमालय केवल साम्राज्यों की सीमा नहीं था
समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में कर्तृपुर का उल्लेख उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण खिड़की खोलता है। लेकिन इस खिड़की से दिखाई देने वाला संसार केवल गुप्त साम्राज्य का विस्तार नहीं है।
इसके पीछे एक दूसरा संसार भी था—
ब्रह्मपुर, गोविषाण और अनेक स्थानीय पर्वतीय राजनीतिक केंद्रों का संसार।
समय के साथ यही राजनीतिक बहुलता एक अपेक्षाकृत संगठित शक्ति—कार्तिकेयपुर—के उभार की ओर बढ़ती दिखाई देती है।
कर्तृपुर और कार्तिकेयपुर के बीच संबंध कितना सीधा था, यह प्रश्न अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इसी प्रकार प्रारंभिक कार्तिकेयपुर को बाद की कत्यूरी सत्ता के साथ पूर्णतः एक मानना भी सावधानी की माँग करता है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—
उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास किसी बाहरी साम्राज्य की छाया में दबा हुआ इतिहास नहीं था। यहाँ की घाटियों, व्यापारिक मार्गों और स्थानीय समाजों ने अपनी-अपनी राजनीतिक शक्तियाँ विकसित कीं और समय के साथ इन्हीं शक्तियों ने मध्य हिमालय की विशिष्ट राजनीतिक पहचान को आकार दिया।
और यही इतिहास हमें अगले चरण तक ले जाता है—कार्तिकेयपुर की सत्ता कैसे मजबूत हुई, उसके प्रमुख शासक कौन थे, उसकी राजधानी कहाँ थी और किस प्रकार यह सत्ता आगे चलकर 'कत्यूरी' परंपरा के रूप में प्रसिद्ध हुई?
यहीं से उत्तराखण्ड के मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास का एक नया अध्याय आरंभ होता है।
📚 संदर्भ ग्रंथ
- हरिषेण, प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख), समुद्रगुप्तकालीन अभिलेख।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, Indian Archaeology – A Review तथा उत्तराखण्ड से संबंधित पुरातात्विक अभिलेख।
- डबराल, शिव प्रसाद, उत्तराखण्ड का इतिहास, खंड–प्रासंगिक।
- कठोच, यशवंत सिंह, उत्तराखण्ड का इतिहास, देहरादून।
- रावत, अजय, उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास, देहरादून।
- पाण्डुकेश्वर एवं बैजनाथ-बागेश्वर के अभिलेख, कार्तिकेयपुर/कत्यूरी सत्ता के अध्ययन हेतु।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, Indian Archaeology – A Review तथा उत्तराखण्ड से संबंधित पुरातात्विक अभिलेख।
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर
"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:
🔗 अधिक पढ़ें
- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट
- भाग–2: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण (भाग-2): समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा
इसे भी पढ़े: उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास : पुरातात्विक साक्ष्यों से इतिहास की ओर बढ़ते कदम
-भाग-1: उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-1) आद्य इतिहास से राज्य-व्यवस्था के उदय तक
«नोट: प्रत्येक शीर्षक पर क्लिक करके संबंधित लेख पढ़ें, फिर इस लेख का अध्ययन आगे बढ़ाएँ।»
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)
