लखनपुर कोट का इतिहास: कत्यूरी राजधानी, राजवंश, दुर्ग, सुरंगें और सांस्कृतिक थात। अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड



उत्तराखंड का प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल 

लखनपुर कोट का इतिहास: कत्यूरी राजवंश की अनकही विरासत  

रामगंगा के तट पर इतिहास की एक ऐसी पहाड़ी, जहाँ किले के अवशेष, सुरंगों की रहस्यमयी दुनिया, कत्यूरी राजाओं की स्मृतियाँ और लोकगाथाओं की ध्वनि आज भी एक साथ सुनाई देती है—वह है लखनपुर कोट।

उत्तराखण्ड का इतिहास केवल बड़े राजवंशों और प्रसिद्ध मंदिरों का इतिहास नहीं है। इस पहाड़ी प्रदेश की ऐतिहासिक पहचान उन दुर्गों, मंदिरों, नौलों, शिलालेखों, लोकगीतों और पुरातात्विक अवशेषों से भी बनती है, जो आज बिखरे हुए रूप में हमारे सामने मौजूद हैं।

लखनपुर कोट इसी ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। यह स्थल पाली-पछाऊँ क्षेत्र की कत्यूरी शाखा, पश्चिमी रामगंगा घाटी के ऐतिहासिक भूगोल और उत्तराखण्ड की मध्यकालीन राजनीतिक-सांस्कृतिक परंपरा को समझने का अवसर देता है।

लेकिन लखनपुर की कहानी केवल एक किले की कहानी नहीं है। इसके साथ आसन्तिदेव से चली वंशपरंपरा, गजबराई, सुजानदेव, प्रीतमदेव, धामदेव, मालूसाही, सारंगदेव, वीरमदेव और कल्याणदेव जैसे शासकों की स्मृतियाँ जुड़ी हैं। दूसरी ओर मालूसाही–राजुला की प्रेमगाथा ने इस इतिहास को लोकजीवन में अमर कर दिया।


लखनपुर कोट कहाँ स्थित है?

लखनपुर कोट अल्मोड़ा जनपद के चौखुटिया विकासखण्ड से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर चौखुटिया–जौरासी मार्ग में, रामगंगा नदी के बाएं तट के निकट स्थित है।

कोट रूपी यह मंदिर झलां, हाट और उडलीखान गाँवों के ऊपर पहाड़ की चोटी पर स्थित है। इसकी भौगोलिक स्थिति लगभग 29°52'46" उत्तरी अक्षांश और 79°19'18" पूर्वी देशान्तर तथा समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1,174 मीटर है।

मासी–चौखुटिया के मध्य सुइठौ पुल से लखनपुर की ओर पैदल मार्ग प्रारम्भ होता है। इस भौगोलिक स्थिति ने लखनपुर को प्राकृतिक सुरक्षा के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र पर निगरानी की सामरिक सुविधा भी प्रदान की होगी।


लखनपुर का ऐतिहासिक परिचय

उत्तराखण्ड में प्रारम्भिक राजनीतिक शक्तियों के क्रम में कुणिंद, खश, शक और कत्यूरी जैसी शक्तियों का उल्लेख मिलता है। इनमें कत्यूरी राजवंश ने मध्य हिमालय के राजनीतिक इतिहास पर दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ा।

कत्यूरी सत्ता के विभिन्न चरणों में अलग-अलग राजनीतिक केंद्र विकसित हुए। बाद में कत्यूरी सत्ता के विखंडन के साथ विभिन्न शाखाएँ भी अस्तित्व में आईं।

लखनपुर कोट को पाली-पछाऊँ क्षेत्र की कत्यूरी शाखा के प्रमुख राजनीतिक केंद्र के रूप में देखा जाता है।

इसे पाली शाखा की राजधानी माना जाता है। हालांकि “कत्यूरी राजधानी” के प्रश्न पर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं, इसलिए इसे समझने के लिए ऐतिहासिक स्रोतों की तुलना आवश्यक है।


ब्रह्मपुर, विराट-पट्टन और लखनपुर : एक ऐतिहासिक पहेली

लखनपुर के इतिहास का सबसे रोचक प्रश्न इसके प्राचीन नाम और राजधानी के स्वरूप से जुड़ा है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने अपने यात्रा-वृत्तांत में एक नगर का उल्लेख किया है, जिसका नाम चीनी लिप्यंतरण में ‘पो-लो-ही-मो-पु-लो’ दिया गया है। एम. जूलियन ने इसे ब्रह्मपुर के रूप में पहचाना।

इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने ब्रह्मपुर को विराट-पट्टन से जोड़ने का मत प्रस्तुत किया। इसी पहचान के आधार पर लखनपुर/विराट-पट्टन को रामगंगा के ऊपर स्थित कत्यूरी राजधानी से जोड़ा गया है।

यह मत उत्तराखण्ड के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे निर्विवाद तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। ब्रह्मपुर, विराट-पट्टन और लखनपुर की सटीक पहचान को लेकर इतिहासलेखन में मतभेद रहे हैं।

इसलिए शोधपरक रूप में कहा जा सकता है—

कनिंघम ने ब्रह्मपुर को विराट-पट्टन से जोड़ते हुए लखनपुर को कत्यूरी राजधानी की पहचान से संबंधित किया, जबकि आधुनिक इतिहासलेखन में इस भौगोलिक पहचान पर अभी भी विमर्श जारी है।


ह्वेनसांग का ब्रह्मपुर : ‘स्त्रियों का राज्य’ और स्वर्णगोत्र

ह्वेनसांग के विवरण में ब्रह्मपुर को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है जहाँ स्त्रियों की राजनीतिक भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी

उनके विवरण के अनुसार शासन में स्त्रियों की प्रमुख भूमिका थी, जबकि पुरुष प्रशासन में सहभागी होने के साथ युद्ध और कृषि जैसे कार्य करते थे।

ह्वेनसांग ने उत्तर में बर्फ से ढकी पर्वत-श्रृंखलाओं से घिरे इस क्षेत्र को स्वर्णगोत्र के रूप में भी वर्णित किया तथा यहाँ सोने की उपलब्धता के साथ ताँबे और स्फटिक के उत्पादन का उल्लेख किया।

उनके विवरण में बौद्धों के साथ हिन्दू धार्मिक परंपरा मानने वाले लोगों की उपस्थिति का भी संकेत मिलता है।

यह विवरण हमें तत्कालीन हिमालयी समाज की एक रोचक झलक देता है। हालांकि ह्वेनसांग के वर्णन को लखनपुर की प्रत्यक्ष पहचान का अंतिम प्रमाण मानने से पहले अन्य ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों से तुलना आवश्यक है।


लखनपुर के कत्यूरी : आसन्तिदेव से आरम्भ होती वंशपरंपरा

लखनपुर की कत्यूरी शाखा का इतिहास पाली की वंशावली से जुड़ा हुआ है।

इस वंशावली में आसन्तिदेव का नाम सबसे पहले आता है। इससे यह अनुमान लगाया गया है कि सम्भवतः आसन्तिदेव ने पाली क्षेत्र में इस शाखा की स्थापना की होगी अथवा वंशावली को उनके नाम से आरम्भ किया गया होगा।

यहाँ “सम्भवतः” शब्द महत्वपूर्ण है, क्योंकि वंशावली की जानकारी को समकालीन अभिलेखों से मिलाकर देखना आवश्यक है।

फिर भी पाली वंशावली लखनपुर की कत्यूरी शाखा को समझने का महत्वपूर्ण आधार है।


गजबराई से सुजानदेव और प्रीतमदेव तक

पं. बद्रीदत्त पाण्डे के विवरण में आसन्तिदेव की वंशावली की आठवीं पीढ़ी में राजा गजबराई का उल्लेख मिलता है।

गजबराई की नौवीं पीढ़ी में उनके दो पुत्रों का उल्लेख मिलता है—

  • सुजानदेव

  • प्रीतमदेव अथवा पृथ्वीपालदेव

यहीं से लखनपुर की कत्यूरी वंशपरंपरा में दो प्रमुख शाखाएँ दिखाई देती हैं।


प्रीतमदेव, धर्मादेवी और जियारानी

प्रीतमदेव की दो रानियों का उल्लेख मिलता है—

धर्मादेवी और जियारानी

प्रीतमदेव के दो पुत्रों के रूप में—

  • धामदेव — जियारानी के पुत्र

  • मालूसाही — धर्मादेवी के पुत्र

का उल्लेख मिलता है।

इन दोनों के नाम इतिहास से आगे बढ़कर कुमाऊँ की लोकस्मृति का हिस्सा बन गए।


मालूसाही और राजुला : इतिहास की सबसे प्रसिद्ध लोकगाथाओं में से एक

मालूसाही–राजुला की प्रेमकथा कुमाऊँ की सबसे प्रसिद्ध लोकगाथाओं में गिनी जाती है।

मालूसाही की कथा केवल राजवंशीय इतिहास का प्रसंग नहीं रही। यह कुमाऊँ की जात्राओं, भड़ों, लोकगायन और लोकनाट्य परंपरा में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रही।

उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी ने भी मालूसाही और राजुला की प्रेमकथा को लोकगीत के माध्यम से व्यापक लोकप्रियता प्रदान की।

इस प्रकार लखनपुर का इतिहास हमें यह भी दिखाता है कि कोई ऐतिहासिक व्यक्तित्व समय के साथ किस प्रकार लोकनायक बन सकता है।


सुजानदेव की शाखा : सारंगदेव से वीरमदेव तक

दूसरी ओर सुजानदेव के पुत्र सारंगदेव हुए।

सारंगदेव की वंशपरंपरा में वीरमदेव और बागदेव का उल्लेख मिलता है।

डॉ. लक्ष्मण सिंह मनराल के अनुसार प्रीतमदेव रणझूली हाट में शासन करते थे, जबकि सारंगदेव लखनपुर में शासन करते थे।

यह विवरण अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि कत्यूरी सत्ता एक ही स्थान से संचालित होने के बजाय विभिन्न क्षेत्रीय केंद्रों में विभाजित राजनीतिक संरचना के रूप में विकसित हो चुकी थी।


धामदेव और वीरमदेव : कत्यूरी सत्ता का बदलता दौर

कालांतर में प्रीतमदेव और सारंगदेव की शाखाओं से क्रमशः धामदेव और वीरमदेव प्रमुख शासक बने।

इन दोनों के शासनकाल को कत्यूरी सत्ता के पतन की प्रारंभिक अवस्था से जोड़ा गया है।

लेकिन वीरमदेव के व्यक्तित्व और उनके शासन के बारे में इतिहासकारों के मत एक जैसे नहीं हैं।

यही मतभेद लखनपुर के इतिहास को और अधिक रोचक बनाते हैं।


वीरमदेव : अत्याचारी या प्रजापालक?

पं. बद्रीदत्त पाण्डे और ऑकले (1905) के विवरण में धामदेव तथा वीरमदेव/ब्रह्मदेव को अत्याचारी शासकों के रूप में चित्रित किया गया है।

ऑकले ने वीरमदेव की मृत्यु से जुड़ी दो किवदंतियों का उल्लेख किया है।

पहली किवदंती

कहा जाता है कि वीरमदेव के अत्याचारों से परेशान होकर उनकी पालकी उठाने वालों ने पालकी सहित ऊँची पहाड़ी से छलांग लगा दी। इस घटना में वीरमदेव की मृत्यु हो गई।

दूसरी किवदंती

एक अन्य परंपरा के अनुसार चन्दवंशी शासक विक्रमचन्द के साथ युद्ध में धामदेव और वीरमदेव मारे गए तथा उनके शव पश्चिमी रामगंगा में फेंक दिए गए।

ऑकले के अनुसार उनके अत्याचारी स्वभाव और असामान्य मृत्यु के कारण उनकी मृतात्माओं के प्रकोप से बचने के लिए पाली-पछाऊँ सहित कत्यूरी क्षेत्रों में उनकी पूजा की जाने लगी।

इन घटनाओं को लोककिवदंतियों के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है।


वीरमदेव की दूसरी तस्वीर : साहसी और धर्मज्ञ शासक

ऑकले की कथा के विपरीत शिवप्रसाद डबराल और लक्ष्मण सिंह मनराल वीरमदेव को साहसी, प्रतापी और धर्मज्ञ शासक के रूप में देखते हैं।

मनराल के अनुसार 1488 ई. में चन्दवंशी शासक कीर्तिचन्द के नरसंहार से अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिए वीरमदेव ने अपनी राजधानी का त्याग किया और परिवार सहित सैणमानुर, मानिला चले गए।

यदि इस मत को स्वीकार किया जाए तो राजधानी छोड़ने की घटना को कायरता नहीं, बल्कि प्रजा की रक्षा के लिए राजनीतिक त्याग के रूप में देखा जा सकता है।

इस प्रकार वीरमदेव का व्यक्तित्व इतिहासलेखन में विवादित होने के साथ-साथ अत्यंत रोचक भी है।


लोकमान्यता में कत्यूरी शासक

क्षेत्रीय लोकमान्यता इतिहासकारों से कुछ अलग तस्वीर प्रस्तुत करती है।

स्थानीय जनमानस में कत्यूरी शासकों को धार्मिक और शांतिप्रिय माना जाता है। एक लोकव्याख्या यह भी कहती है कि वे अंततः राजकाज का त्याग कर शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहते थे।

इस लोकमान्यता के अनुसार वीरमदेव ने जानबूझकर ऐसा कठोर व्यवहार किया कि जनता स्वयं उनके शासन से मुक्त होना चाहे।

इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य की तरह नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लोकव्याख्या के रूप में देखना चाहिए।


कल्याणदेव : लखनपुर का अंतिम कत्यूरी शासक?

लखनपुर की कत्यूरी शाखा के अंतिम शासक के रूप में कल्याणदेव का नाम मिलता है।

हाण्डा (2002) के अनुसार कल्याणदेव के शासनकाल में चन्द शासक कीर्तिचन्द ने लखनपुर पर आक्रमण किया। उनके अनुसार कल्याणदेव ने बिना प्रतिरोध आत्मसमर्पण किया और परिवार सहित सल्ट चले गए।

लेकिन यह विवरण भी सर्वसम्मत नहीं है।


एम.पी. जोशी का अलग मत

एम.पी. जोशी की पुस्तक अल्मोड़ा नगर : एक ऐतिहासिक अध्ययन (1994) में कीर्तिचन्द के बाद प्रतापचन्द और फिर भीष्मचन्द के शासन का उल्लेख मिलता है।

जोशी के अनुसार भीष्मचन्द के शासनकाल में पाली अर्थात् लखनपुर के उत्तर के कत्यूरी शासक अपने क्षेत्र में प्रभावी स्वतंत्र अस्तित्व बनाए हुए थे और उस क्षेत्र में विद्रोहों का भी उल्लेख मिलता है।

यदि यह विवरण स्वीकार किया जाए, तो कीर्तिचन्द के समय ही लखनपुर की कत्यूरी सत्ता पूरी तरह समाप्त हो गई थी—ऐसा निष्कर्ष सावधानी के बिना नहीं निकाला जा सकता।

संभव है कि कल्याणदेव ने किसी समय चन्द सत्ता की अधीनता स्वीकार की हो, लेकिन बाद में परिस्थितियों के अनुसार स्थानीय स्वायत्तता पुनः स्थापित हुई हो।

यह एक संभावित ऐतिहासिक व्याख्या है, न कि प्रमाणित निष्कर्ष।


लखनपुर कोट : राजधानी या दुर्ग?

लखनपुर कोट के वर्तमान स्वरूप को समझना भी आवश्यक है।

लखनपुर कोट घने जंगल के बीच पहाड़ी की चोटी पर स्थित था और राजधानी की सुरक्षा के लिए चारों दिशाओं में चार अलग-अलग कोट बनाए गए थे—

दिशासुरक्षा कोट
पूर्व-झण्डीकोट
पश्चिम-दादुरीकोट
उत्तर-छिपलीकोट
दक्षिण-बकरीकोट

प्रत्येक कोट में सैनिक टुकड़ी रहने की बात कही गई है, जिसका उद्देश्य संबंधित दिशा से राजधानी की रक्षा करना था।

यह विवरण लखनपुर को एक संगठित सामरिक परिसर के रूप में देखने की संभावना पैदा करता है।


सुइठौ पुल और विरमदेव नौला

मासी–चौखुटिया क्षेत्र से लखनपुर जाने वाले मार्ग में सुइठौ पुल का विशेष उल्लेख मिलता है।

क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार यहाँ कत्यूरी काल में फाँसीघर था। आज भी सुइठौ में कत्यूरी शासकों की स्मृति में पवित्र रामगंगा में स्नान करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।

आगे हाट गाँव के ऊपर वीरमदेव नौला स्थित है, जो आज भी स्थानीय लोगों के लिए पेयजल स्रोत के रूप में उपयोगी बताया जाता है।

इस प्रकार लखनपुर की ऐतिहासिक भौगोलिक सीमा केवल कोट तक सीमित नहीं थी; आसपास के जलस्रोत और मार्ग भी उसके ऐतिहासिक परिदृश्य का हिस्सा थे।


लखनपुर की सुरक्षा व्यवस्था और चार कोट

लखनपुर की सुरक्षा व्यवस्था का विवरण विशेष रूप से आकर्षक है।

चार दिशाओं में बनाए गए कोट—

झण्डीकोट, दादुरीकोट, छिपलीकोट और बकरीकोट

यदि पुरातात्विक रूप से प्रमाणित किए जाते हैं, तो यह पहाड़ी राजधानी की बहुस्तरीय रक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकता है।

यहाँ भविष्य के शोध के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न है—

क्या इन चारों कोटों के स्वतंत्र पुरातात्विक अवशेष आज भी उपलब्ध हैं?

यदि उपलब्ध हैं, तो उनका वैज्ञानिक सर्वेक्षण लखनपुर की सैन्य संरचना को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।


लखनपुर की भूमिगत सुरंगें

लखनपुर कोट से जुड़ी सबसे रोचक संरचनाएँ इसकी भूमिगत सुरंगें हैं।

राजभवन के भूमिगत कक्षों से दो भूमिगत मार्ग बने थे—

पहला मार्ग → छिपलीकोट की ओर

दूसरा मार्ग → आसन-वासन से होकर रामगंगा की ओर

लोकमान्यता है कि कत्यूरी रानियाँ दूसरे मार्ग से रामगंगा में स्नान करने जाती थीं।

सुरंगों में लगभग 15 मीटर की दूरी पर प्रकाश के लिए झरोखे होने की बात कही गई है। इन झरोखों की संरचना ऐसी बताई जाती है कि बाहर का दृश्य देखा जा सके, जबकि बाहर से भीतर देख पाना कठिन हो।

रात्रि में मशाल रखने के लिए स्थान होने का भी उल्लेख है।


क्या ये सुरंगें राजमहल से नदी तक जाती थीं?

यह प्रश्न अभी भी शोध की माँग करता है।

स्थानीय मान्यता इन्हें राजपरिवार के आवागमन और रामगंगा में स्नान से जोड़ती है, लेकिन एक अन्य व्याख्या इन्हें सामरिक सुरंगों के रूप में देखती है।

लखनपुर कोट में राजमहल के स्पष्ट अवशेष उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए सुरंगों को केवल राजपरिवार के स्नान-मार्ग के रूप में देखने के बजाय सैनिकों के सुरक्षित आवागमन और संकट के समय रक्षा व्यवस्था से जोड़ना अधिक तार्किक हो सकता है।

इस विषय में दोनों संभावनाओं को खुला रखना चाहिए।


लखनपुर मंदिर : वर्तमान परिसर और प्राचीन स्मृति

स्थानीय मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर कभी राजभवन था, उसी क्षेत्र में आज लखनपुर मंदिर का मुख्य परिसर है।

मंदिर से नीचे पहाड़ काटकर बनी एक सुरंग का उल्लेख मिलता है। जहाँ सुरंग समाप्त होती है, वहाँ कत्यूर कुण्ड नामक जलकुण्ड बताया जाता है।

मंदिर के प्रवेशद्वार से पहले एक वर्गाकार कुण्ड भी है, जिसमें आज भी जल रहता है। इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों में किए जाने की संभावना व्यक्त की जाती है।

यहाँ सावधानी आवश्यक है—इन वर्तमान संरचनाओं और उनके कत्यूरीकालीन स्वरूप के बारे में स्थानीय परंपरा तथा आधुनिक निर्माण को अलग-अलग पहचानना चाहिए।


108 शिवलिंग : वर्तमान धार्मिक परिसर की विशेषता

मंदिर परिसर में एक विशाल आयताकार पीठिका पर 108 शिवलिंग स्थापित हैं।

ये छह पंक्तियों में व्यवस्थित हैं और भक्त पीठिका के भीतर जाकर उनकी परिक्रमा कर सकते हैं। पीठिका के बाहर पशुपतिनाथ पद्धति तथा 108 शिवशक्ति परिक्रमा से संबंधित आधुनिक अभिलेख अंकित है।

इस परिक्रमा पीठिका की स्थापना श्रीमती जयन्ती मनराल द्वारा कराई गई तथा शिवलिंग डॉ. लक्ष्मण सिंह मनराल द्वारा अलकनंदा नदी से लाए गए थे।

इसलिए इन्हें आधुनिक धार्मिक परिसर की संरचना के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है, न कि सीधे कत्यूरीकालीन अवशेष के रूप में।


मंदिर परिसर में प्राप्त पुरावशेष

लखनपुर परिसर में खनन के दौरान प्राप्त बताए गए कुछ अवशेषों को भी संरक्षित किया गया है।

इनमें—

  • कत्यूरीकालीन बताए जाने वाले शिल-बट्टे,

  • मृदभाण्ड के टुकड़े,

  • जानर अथवा पाषाण निर्मित हस्त-चक्की,

  • ओखल,

  • विभिन्न प्रतिमाएँ

शामिल हैं।

ये वस्तुएँ उस समय के दैनिक जीवन, भोजन-प्रसंस्करण और धार्मिक गतिविधियों के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

हालाँकि इनके निश्चित काल-निर्धारण के लिए वैज्ञानिक परीक्षण और पुरातात्विक अभिलेखन आवश्यक है।


जिया मंडप और रानी जिया की स्मृति

मंदिर परिसर में जिया मंडप बनाया गया है, जो रानी जिया की स्मृति से जुड़ा बताया जाता है।

जिया मंडप में सूर्य प्रतिमा स्थापित है।

इसके निकट कत्यूरी कीर्ति स्तम्भ, यज्ञशाला और अन्य आधुनिक धार्मिक संरचनाएँ भी हैं।

यहाँ यह अंतर स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान परिसर में मौजूद सभी संरचनाएँ प्राचीन नहीं हैं। अनेक संरचनाएँ आधुनिक काल में स्थानीय श्रद्धा और विरासत संरक्षण के उद्देश्य से निर्मित की गई हैं।


प्राचीन शिलालेख : भविष्य के शोध की बड़ी संभावना

लखनपुर मंदिर परिसर में एक प्राचीन शिलालेख स्थापित होने का उल्लेख मिलता है, जिसकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

यदि यह शिलालेख वास्तव में प्राचीन काल का है और इसका वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, तो यह लखनपुर के इतिहास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण बन सकता है।

शिलालेख से संभवतः—

  • शासक का नाम,

  • निर्माणकर्ता,

  • धार्मिक संस्था,

  • दान,

  • तिथि,

  • अथवा राजनीतिक परिस्थिति

से संबंधित जानकारी प्राप्त हो सकती है।

इसलिए इसकी उच्च-रिजॉल्यूशन डिजिटल प्रतिलिपि, लिपि-विज्ञान विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन और पुरातात्विक प्रमाणीकरण अत्यंत आवश्यक है।


नवदुर्गा, नरसिंह और अन्य धार्मिक संरचनाएँ

जिया मंडप के पश्चिम में एक गोलाकार छत वाले स्तम्भ के चारों ओर मंदिर उत्खनन से प्राप्त बताई गई नवदुर्गा प्रतिमाएँ स्थापित हैं।

परिसर में नरसिंह भगवान, गणेश मंदिर, सरस्वती मंदिर, शेषावतार लक्ष्मण मंदिर, हनुमान पट्टिका और अन्य धार्मिक संरचनाओं का भी उल्लेख मिलता है।

इनमें से कई वर्तमान काल में विकसित धार्मिक परिसर का हिस्सा हैं।


धामदेव कक्ष और कत्यूरी सैन्य स्मृति

मंदिर परिसर में स्थित तिमंजिला सत्संग भवन के दूसरे तल को धामदेव कक्ष कहा जाता है।

यह 24 स्तम्भों पर निर्मित बताया गया है और इसमें राम, सीता तथा हनुमान की प्रतिमाएँ स्थापित हैं।

तीसरे तल पर नौ लाख कत्यूर देवताओं के प्रतीक माने जाने वाले चरणचिह्न तथा धनुष-बाण, गदा, तलवार-ढाल और भाले जैसे अस्त्र-शस्त्र रखे गए हैं।

एक अश्व प्रतिमा भी यहाँ स्थापित है।

इनका वर्तमान धार्मिक-सांस्कृतिक अर्थ कत्यूरी सैन्य शक्ति की स्मृति से जोड़ा जाता है।


विरमदेव स्वागत कक्ष और श्रीकृष्ण मंदिर

परिसर की कुछ संरचनाएँ आधुनिक काल में निर्मित हुई हैं।

विरमदेव स्वागत कक्ष का निर्माण सन् 1992 ई. में जमुना माई की स्मृति में पद्मसिंह मनराल द्वारा कराया गया है।

इसके ऊपर मुख्य भूमि पर श्रीकृष्ण मंदिर स्थित है। मंदिर के शिखर पर 16 कलश लगाए गए हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण की सोलह कलाओं का प्रतीक माना जाता है।

यह विवरण यह भी दिखाता है कि लखनपुर आज केवल पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि लगातार विकसित होता धार्मिक-सांस्कृतिक परिसर है।


स्वर्ग सीढ़ी और हिमालय का सांस्कृतिक अर्थ

लखनपुर परिसर में चार मंजिला स्वर्ग सीढ़ी का भी निर्माण किया गया है।

ऊँचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ से आसपास के पर्वतीय दृश्य और हिमालय का मनोरम दृश्य दिखाई देता है।

उत्तराभिमुख होकर हिमालय को पितृ-प्रतीक मानकर श्रद्धांजलि देने की परंपरा भी यहाँ से जोड़ी गई है।

यह आधुनिक धार्मिक-सांस्कृतिक व्याख्या लखनपुर को केवल अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान लोकआस्था से भी जोड़ती है।


लखनपुर का पर्यावरणीय महत्व : पंचवाटिका

लखनपुर परिसर के पर्यावरणीय महत्व को देखते हुए डॉ. लक्ष्मण सिंह मनराल द्वारा आम, पांगर, पद्म, पीपल और बरगद के पौधों का रोपण कर पंचवाटिका विकसित करने का उल्लेख मिलता है।

यह पहल महत्वपूर्ण है क्योंकि विरासत संरक्षण केवल पत्थरों और मंदिरों का संरक्षण नहीं है।

विरासत का अर्थ उसके प्राकृतिक परिवेश को सुरक्षित रखना भी है।


लखनपुर के इतिहास में डॉ. लक्ष्मण सिंह मनराल का योगदान

लखनपुर के इतिहास को व्यवस्थित रूप से सामने लाने वाले क्षेत्रीय इतिहासकारों में डॉ. लक्ष्मण सिंह मनराल का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

उनकी कृति ** लखनपुर के कत्यूर (1996)** ने पाली-पछाऊँ की कत्यूरी परंपरा को व्यवस्थित रूप से सामने लाने का प्रयास किया।

लखनपुर मंदिर के जीर्णोद्धार, परिसर के विकास और स्थानीय ऐतिहासिक स्मृतियों को संरक्षित करने में भी उनके योगदान का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार उनका योगदान केवल लेखन तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय विरासत के संरक्षण और पुनर्जीवन से भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है।


लखनपुर और कत्यूरी स्थापत्य

रामगंगा घाटी में कत्यूरी शैली से संबंधित अनेक मंदिर पाए जाते हैं।

इन मंदिरों को एक साथ देखने पर यह स्पष्ट होता है कि कत्यूरी सत्ता का सांस्कृतिक प्रभाव केवल किसी एक राजधानी तक सीमित नहीं था।

धार्मिक स्थापत्य, स्थानीय देव-परंपराएँ और मंदिरों से जुड़े सामाजिक अनुष्ठान इस व्यापक सांस्कृतिक प्रभाव को समझने में सहायता करते हैं।

लखनपुर इसी स्थापत्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण संदर्भ-बिंदु है।


लखनपुर के कत्यूरी शासन का पतन

लखनपुर की कत्यूरी सत्ता के पतन का कोई एक सर्वमान्य कारण नहीं है।

विभिन्न स्रोतों के आधार पर इसके पीछे कई प्रक्रियाएँ दिखाई देती हैं—

आंतरिक राजनीतिक विखंडन
क्षेत्रीय शाखाओं का विकास
चन्द शक्ति का उदय
सत्ता-संघर्ष
राजनीतिक अधीनता/स्वायत्तता के बदलते संबंध
लखनपुर की स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति का क्रमिक क्षय

वीरमदेव, कल्याणदेव और चन्द शासकों से जुड़े अलग-अलग स्रोत इसी जटिल प्रक्रिया की अलग-अलग तस्वीरें प्रस्तुत करते हैं।

इसलिए लखनपुर के कत्यूरी शासन का अंत एक घटना नहीं बल्कि एक दीर्घकालीन राजनीतिक परिवर्तन के रूप में देखना अधिक उचित है।


इतिहास, लोककथा और पुरातत्व : तीनों को साथ पढ़ना क्यों जरूरी है?

लखनपुर के मामले में तीन प्रकार के स्रोत हमारे सामने आते हैं—

1. ऐतिहासिक स्रोत

बद्रीदत्त पाण्डे, एम.पी. जोशी, हाण्डा आदि के विवरण।

2. क्षेत्रीय अध्ययन

लक्ष्मण सिंह मनराल और शिवप्रसाद डबराल जैसे इतिहासकारों के अध्ययन।

3. लोकस्मृति

मालूसाही–राजुला, वीरमदेव और कत्यूरी राजाओं से जुड़ी लोककथाएँ, जात्रा, भड़, लोकगायन एवं धार्मिक परंपराएँ।

इनके अतिरिक्त—

4. पुरातात्विक सामग्री

मंदिर, किले के अवशेष, सुरंगें, शिलालेख, मृदभाण्ड, शिल-बट्टे और अन्य पुरावशेष।

इन सभी को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि पूरक स्रोत मानना चाहिए।


लखनपुर की वर्तमान स्थिति और संरक्षण की चुनौती

इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिसर के बावजूद लखनपुर कोट का संरक्षण अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाया है।

 परिसर का अवलोकन करने पर कई समस्याएं सामने आती हैं —

  • अनेक छोटे मंदिरों का रख-रखाव अपर्याप्त होना,

  • कुछ मंदिरों का मूर्ति-विहीन होना,

  • परिसर में घास और वनस्पति का बढ़ जाना,

  • दीवारों पर अराजक तत्वों द्वारा लिखी गई टिप्पणियाँ,

  • मंदिरों और शीशों की क्षति,

  • नियमित देखरेख और पूजा व्यवस्था का अभाव।

यह स्थिति केवल सौन्दर्य की समस्या नहीं है।

यदि प्राचीन संरचनाओं, शिलालेखों और पुरावशेषों की नियमित निगरानी नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियाँ इनके बारे में केवल पुस्तकों में पढ़ पाएँगी।


2026 की समकालीन संरक्षण चिंता

लखनपुर की वर्तमान स्थिति को लेकर 14 जून 2026 को अमर उजाला में “विलुप्ति के कगार पर लखनपुर की कत्यूरीकालीन धरोहरें” शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

यह रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि लखनपुर की धरोहरों को संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है।

14 जून 2026 को प्रकाशित अमर उजाला की रिपोर्ट “विलुप्ति के कगार पर लखनपुर की कत्यूरीकालीन धरोहरें” ने लखनपुर की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस स्थल का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि वर्तमान विरासत-संरक्षण की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। (amarujala.com)


लखनपुर को कैसे बचाया जा सकता है?

लखनपुर के संरक्षण के लिए केवल मंदिरों की सफाई पर्याप्त नहीं होगी।

एक व्यापक लखनपुर विरासत संरक्षण योजना की आवश्यकता है।

वैज्ञानिक पुरातात्विक सर्वेक्षण

पूरे लखनपुर परिसर और चारों कथित सुरक्षा-कोटों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाए।

शिलालेख का अध्ययन

अप्रकाशित शिलालेख की विशेषज्ञों द्वारा पहचान और पठन कराया जाए।

सुरंगों का दस्तावेजीकरण

सुरंगों की वास्तविक लंबाई, संरचना और निर्माण-काल का वैज्ञानिक अध्ययन हो।

पुरावशेषों का अभिलेखन

मृदभाण्ड, शिल-बट्टे, ओखल, प्रतिमाएँ और अन्य वस्तुओं की सूची और वैज्ञानिक डेटिंग की जाए।

डिजिटल संरक्षण

3D स्कैनिंग, ड्रोन सर्वे और GIS मानचित्रण किया जाए।

विरासत पथ

चौखुटिया–सुइठौ–हाट–लखनपुर कोट को एक व्यवस्थित Heritage Trail के रूप में विकसित किया जा सकता है।

स्थानीय समुदाय की भागीदारी

स्थानीय लोगों की मौखिक परंपराओं, लोकगीतों और स्मृतियों का दस्तावेजीकरण किया जाए।


निष्कर्ष : लखनपुर केवल एक किला नहीं, एक जीवित इतिहास है

लखनपुर कोट की कहानी आसन्तिदेव से शुरू होकर गजबराई, सुजानदेव, प्रीतमदेव, धामदेव, मालूसाही, सारंगदेव, वीरमदेव और कल्याणदेव तक पहुँचती है।

यह कहानी कभी राजसत्ता की है, कभी प्रेमगाथा की, कभी युद्ध और संघर्ष की और कभी लोकविश्वास की।

कभी वीरमदेव अत्याचारी दिखाई देते हैं, तो कभी वही वीरमदेव प्रजा की रक्षा के लिए राजधानी त्यागने वाले साहसी शासक के रूप में सामने आते हैं।

यही विरोधाभास इतिहास को रोचक बनाता है।

लखनपुर की पहाड़ी पर आज मौजूद मंदिर, सुरंगें, कुण्ड, शिलालेख, पुरावशेष और लोकस्मृतियाँ उस अतीत की अलग-अलग परतें हैं। इनमें से कुछ प्राचीन हो सकती हैं, कुछ बाद की धार्मिक परंपराओं से विकसित हुई हैं और कुछ आधुनिक काल में निर्मित हैं।

इसलिए लखनपुर को समझने का सबसे सही तरीका है—

इतिहास + पुरातत्व + लोकस्मृति + भूगोल

इन चारों को साथ पढ़ना।

और शायद यही लखनपुर की सबसे बड़ी विशेषता है।

रामगंगा के तट पर खड़ा लखनपुर कोट आज भी हमें याद दिलाता है कि राजसत्ताएँ मिट सकती हैं, किले टूट सकते हैं, लेकिन इतिहास की स्मृति—यदि उसे संभालकर रखा जाए—पीढ़ियों तक जीवित रह सकती है।


परीक्षा उपयोगी तथ्य

प्रश्न 1. लखनपुर कोट कहाँ स्थित है?
उत्तर: अल्मोड़ा जनपद के चौखुटिया विकासखण्ड के निकट चौखुटिया–जौरासी मार्ग पर, रामगंगा घाटी के क्षेत्र में।

प्रश्न 2. लखनपुर को किस कत्यूरी शाखा की राजधानी माना जाता है?
उत्तर: पाली शाखा की कत्यूरी सत्ता के प्रमुख केंद्र/राजधानी के रूप में।

प्रश्न 3. पाली वंशावली में प्रथम नाम किसका मिलता है?
उत्तर: आसन्तिदेव।

प्रश्न 4. गजबराई किस पीढ़ी में बताए गए हैं?
उत्तर: आसन्तिदेव की वंशावली की आठवीं पीढ़ी में।

प्रश्न 5. गजबराई के पुत्र कौन बताए गए हैं?
उत्तर: सुजानदेव और प्रीतमदेव/पृथ्वीपालदेव।

प्रश्न 6. प्रीतमदेव की रानियों के नाम क्या थे?
उत्तर: धर्मादेवी और जियारानी।

प्रश्न 7. मालूसाही और धामदेव किससे संबंधित थे?
उत्तर: मालूसाही को धर्मादेवी और धामदेव को जियारानी का पुत्र बताया जाता है।

प्रश्न 8. मालूसाही किस प्रसिद्ध लोकगाथा से जुड़े हैं?
उत्तर: मालूसाही–राजुला प्रेमगाथा।

प्रश्न 9. सारंगदेव के पुत्र कौन बताए गए हैं?
उत्तर: वीरमदेव और बागदेव।

प्रश्न 10. लक्ष्मण सिंह मनराल के अनुसार प्रीतमदेव और सारंगदेव कहाँ शासन करते थे?
उत्तर: प्रीतमदेव रणझूली हाट और सारंगदेव लखनपुर में शासन करते थे।

प्रश्न 11. लखनपुर के अंतिम कत्यूरी शासक के रूप में किसका नाम मिलता है?
उत्तर: हाण्डा के अनुसार कल्याणदेव।

प्रश्न 12. लखनपुर की सुरक्षा के चार कोट कौन-से बताए जाते हैं?
उत्तर: झण्डीकोट, दादुरीकोट, छिपलीकोट और बकरीकोट।

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