कत्यूरी राजवंश की शाखाएँ : पाली-पछाऊँ, अस्कोट, डोटी, सीरा और सोर का इतिहास

 


एक सत्ता के बिखरने के बाद हिमालय में कितने नए राजघराने उभरे?

कत्यूरी इतिहास को अक्सर कार्तिकेयपुर और कत्यूर की महान सत्ता के साथ जोड़कर देखा जाता है। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

केंद्रीय कत्यूरी सत्ता के कमजोर पड़ने के बाद मध्य हिमालय का राजनीतिक मानचित्र बदलने लगा। एक बड़े राज्य की जगह अनेक क्षेत्रीय राजघराने, छोटी रियासतें और स्थानीय सत्ता-केंद्र उभर आए।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार, 12वीं–13वीं शताब्दी के राजनीतिक परिवर्तनों के बाद केंद्रीय कत्यूरी सत्ता का विघटन हुआ, लेकिन उत्तरवर्ती कत्यूरी मध्य हिमालय के विभिन्न भागों में छोटी स्वतंत्र रियासतों के रूप में बने रहे। इनमें सीरा–डोटी के रैका विशेष रूप से शक्तिशाली हुए।

यही वह दौर है जिसे यशवंत सिंह कठौच ने बहुराजकता का काल कहा है।

इस लेख में हम एक-एक करके उन प्रमुख शाखाओं को देखेंगे—उनके क्षेत्र, प्रमुख राजा और उपलब्ध प्रमाणों के साथ।


पाली–पछाऊँ : आसन्तिदेव से शुरू होती एक महत्वपूर्ण शाखा

कत्यूरी परंपरा की परवर्ती शाखाओं में पाली–पछाऊँ का विशेष महत्व है।

इस शाखा की वंशावली में सबसे पहला प्रमुख नाम मिलता है—

राजा आसन्तिदेव

पाली–पछाऊँ की परंपरा में आसन्तिदेव को शाखा का प्रारंभिक राजा माना गया है।

उनके बाद आता है—

राजा वासन्तिदेव

पं. बद्रीदत्त पाण्डे द्वारा उद्धृत पाली–पछाऊँ की वंशावली में क्रम इस प्रकार दिया गया है—

आसन्तिदेव → बासन्तिदेव → गौरांगदेव → श्यामलदेव → फेणबराई → केशबराई → अजबराई → गजबराई।

यही वंशावली इस शाखा को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

लेकिन यहाँ एक सावधानी

इन सभी राजाओं के शासनकाल और राजनीतिक गतिविधियों के लिए समान स्तर के समकालीन अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए इस क्रम को पाली–पछाऊँ की वंशावली परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित है।

यानी—

वंशावली हमें नामों की स्मृति देती है, जबकि अभिलेख जहाँ उपलब्ध हों, वहाँ इतिहास को अधिक ठोस आधार देते हैं।


आसन्तिदेव और बासन्तिदेव : दो नाम, एक परंपरा

आसन्तिदेव और बासन्तिदेव का उल्लेख केवल पाली–पछाऊँ की वंशावली में ही नहीं मिलता।

डोटी, अस्कोट और पाली से जुड़ी कत्यूरी वंशावलियों में भी इन दोनों नामों की परंपरा मिलती है।

इसी कारण इन दोनों राजाओं की ऐतिहासिक पहचान को लेकर लंबे समय से चर्चा रही है।

कुछ परंपराएँ इन्हें कत्यूरी सत्ता की व्यापक उत्तरवर्ती शाखाओं से जोड़ती हैं। लेकिन यह मान लेना कि इन दोनों के बारे में उपलब्ध हर कथा एक ही ऐतिहासिक व्यक्ति की प्रमाणित जीवनी है, उचित नहीं होगा।

इतिहास में नाम समान हो सकते हैं, लेकिन व्यक्ति, काल और राज्य अलग हो सकते हैं।

इसलिए इस ब्लॉग में हम इतना ही निश्चित रूप से कहेंगे कि—

आसन्तिदेव और बासन्तिदेव पाली–पछाऊँ की कत्यूरी वंशावली के दो आरंभिक और अत्यंत महत्वपूर्ण नाम हैं।


अब कहानी बदलती है : अस्कोट

पाली–पछाऊँ के बाद कत्यूरी परंपरा की दूसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक इकाई है—

अस्कोट

आज का अस्कोट पिथौरागढ़ जिले में स्थित है, लेकिन मध्यकाल में यह एक महत्वपूर्ण स्थानीय सत्ता-केंद्र था।

अस्कोट के राजपरिवार को परंपरा में पाल रजवार कहा गया और उन्होंने अपने वंश को कत्यूरी परंपरा से जोड़ा।

अस्कोट के इतिहास की खास बात यह है कि यहाँ हमें केवल वंशावली ही नहीं, बल्कि अभिलेखीय प्रमाण भी मिलते हैं।

यही कारण है कि अस्कोट का इतिहास पाली–पछाऊँ की तुलना में कुछ अधिक ठोस दस्तावेजी आधार प्रदान करता है।


अस्कोट का संस्थापक कौन?

यहीं इतिहास एक रोचक मोड़ लेता है।

अस्कोट की परंपरा में अभयपाल का नाम संस्थापक के रूप में आता है।

लेकिन कुछ अभिलेखीय प्रमाण नागपाल/नागमल्ल की ओर संकेत करते हैं।

इसलिए अस्कोट की स्थापना को लेकर दो परंपराएँ सामने आती हैं—

राजावली की परंपरा — अभयपाल

और

अभिलेखीय संकेत — नागपाल/नागमल्ल

यही वह जगह है जहाँ इतिहासकार के लिए स्रोतों की तुलना आवश्यक हो जाती है।

इसलिए ब्लॉग में इसे एक निश्चित तथ्य के बजाय “अस्कोट की स्थापना से जुड़ा स्रोत-भेद” कहना अधिक उचित होगा।


अस्कोट के प्रमुख पाल राजा

अस्कोट शाखा के प्रमुख नामों में—

  • नागपाल / नागमल्ल

  • निर्भयपाल

  • भारतीपाल

  • तिलकपाल

  • कल्याणपाल

  • महेन्द्रपाल

विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

बाद के शासकों के नाम ताम्रपत्रों और अन्य अभिलेखों से जुड़े हैं।

इसलिए अस्कोट का इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण बात सिखाता है—

जहाँ वंशावली और अभिलेख दोनों उपलब्ध हों, वहाँ दोनों को मिलाकर इतिहास लिखना चाहिए।


डोटी : काली नदी के पार कत्यूरी परंपरा

अब हमारी कहानी उत्तराखण्ड से आगे बढ़कर वर्तमान सुदूर-पश्चिमी नेपाल पहुँचती है।

यहाँ स्थित डोटी मध्यकाल में एक महत्वपूर्ण राज्य था।

ASI के अनुसार कत्यूरी सत्ता के विघटन के बाद सीरा–डोटी के रैका अत्यंत शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे।

डोटी की परंपरा में इसके आरंभिक शासक के रूप में—

निरञ्जन मल्लदेव

का नाम मिलता है।

बाद की रैका परंपरा में अनेक मल्ल शासकों के नाम मिलते हैं।

इनमें स्रोतों के अनुसार—

नागी मल्ल
रिपु मल्ल
निरयपाल
नाग मल्ल
धीर मल्ल
आनन्द मल्ल
संसार मल्ल
कल्याण मल्ल
सुरतान मल्ल
कृति मल्ल
पृथ्वी मल्ल

जैसे नाम आते हैं। उपलब्ध संकलनों में इन शासकों के साथ तिथियाँ और अभिलेखीय संकेत भी दिए गए हैं, हालांकि पूरी सूची के क्रम और तिथियों को लेकर स्रोत-भेद है।

इसलिए इन्हें डोटी के प्रमुख रूप से उल्लिखित रैका शासक कहना अधिक सुरक्षित है।


सीरा : डोटी की शक्ति से जुड़ा क्षेत्र

डोटी के निकट सीरा एक अलग राजनीतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।

वर्तमान डीडीहाट और आसपास के क्षेत्र का इतिहास सीरा की इस राजनीतिक परंपरा से जुड़ता है।

सीरा के शासकों में विशेष रूप से—

संसार मल्ल
कल्याण मल्ल
हरि मल्ल

जैसे नाम मिलते हैं।

बाद के समय में सीरा और डोटी की रैका शक्ति का संबंध इतना घनिष्ठ हो गया कि दोनों का इतिहास कई बार एक-दूसरे से जुड़कर सामने आता है।

सीरा के अंतिम रैका शासकों में हरि मल्ल का नाम विशेष महत्व रखता है।

चन्द राजा रुद्रचन्द के समय चन्द सत्ता के विस्तार ने सीरा–डोटी की राजनीतिक शक्ति को निर्णायक चुनौती दी। डीडीहाट क्षेत्र के इतिहास में भी रुद्रचन्द द्वारा रैका सत्ता को पराजित करने की परंपरा मिलती है।


सोर : बम राजाओं का राज्य

अब आते हैं सोर पर।

आज का पिथौरागढ़ जिस घाटी में बसा है, उसका ऐतिहासिक नाम सोर रहा है।

यहाँ बम राजाओं की सत्ता का उल्लेख मिलता है।

सोर के इतिहास से जुड़े प्रमुख नामों में—

विजय बम
शक्तिबम
प्रताप बम

विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

सोर के बम राजाओं की परंपरा का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कुछ शासकों के नाम ताम्रपत्रों और अभिलेखीय सामग्री में मिलते हैं।

इससे सोर की राजनीतिक परंपरा को केवल लोककथा मानना उचित नहीं होगा।

हाँ, उनके कत्यूरी वंश से सीधे संबंध का प्रश्न अलग है और उसे स्रोतों के आधार पर सावधानी से देखना चाहिए।


काली-कुमाऊँ और ब्रह्मदेव

कत्यूरी सत्ता के विघटन के बाद काली-कुमाऊँ में भी स्थानीय राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं।

इस क्षेत्र से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध नाम है—

ब्रह्मदेव

स्थानीय परंपराओं में ब्रह्मदेव को कत्यूरी परंपरा से जोड़ा गया है।

उनका नाम काली-कुमाऊँ और नेपाल के तराई क्षेत्र की ऐतिहासिक स्मृतियों में भी मिलता है।

लेकिन ब्रह्मदेव के बारे में उपलब्ध सामग्री का एक बड़ा हिस्सा परंपरा पर आधारित है। इसलिए उनकी तिथि और राजनीतिक विस्तार को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालते समय सावधानी आवश्यक है।


एक ही नाम अलग-अलग शाखाओं में क्यों मिलता है?

यह कत्यूरी इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक है।

आसन्तिदेव, बासन्तिदेव, नागमल्ल, मल्ल, देव जैसे नाम अलग-अलग क्षेत्रों की वंशावलियों में दिखाई देते हैं।

क्या इसका अर्थ यह है कि सभी एक ही व्यक्ति थे?

जरूरी नहीं।

मध्यकालीन राजवंशों में नामों और उपाधियों की पुनरावृत्ति सामान्य थी।

इसीलिए इतिहासकार किसी राजा की पहचान केवल नाम देखकर नहीं करते। वे देखते हैं—

  • उसका अभिलेख कहाँ मिला?

  • उसमें उसकी उपाधि क्या है?

  • उसका राज्य कहाँ था?

  • पिता और पूर्वजों के नाम क्या हैं?

  • तिथि क्या है?

  • दूसरे स्रोत उससे मेल खाते हैं या नहीं?

यही पद्धति कत्यूरी शाखाओं के अध्ययन में भी आवश्यक है।


वंशावली और अभिलेख : दोनों को साथ पढ़ना जरूरी

इस पूरे इतिहास में दो प्रकार के स्रोत विशेष महत्व रखते हैं।

वंशावली हमें बताती है—

किस राजपरिवार ने अपने अतीत को किस प्रकार याद रखा।

अभिलेख हमें बताते हैं—

किस राजा का नाम, उपाधि, भूमि-अनुदान या सत्ता किसी निश्चित समय में दर्ज हुई।

उदाहरण के लिए, बैजनाथ के मंदिर समूह से कत्यूरी काल के अभिलेख प्राप्त हुए हैं और राष्ट्रीय स्मारक एवं पुरावशेष मिशन भी इन्हें कत्यूरी वंश के मध्यकालीन पुरालेखीय अभिलेख के रूप में दर्ज करता है।

इसी तरह डोटी–रैका परंपरा में भी कई शासकों के ऐतिहासिक प्रमाणों की चर्चा मिलती है।

इसलिए कत्यूरी शाखाओं का इतिहास लिखते समय—

वंशावली + अभिलेख + पुरातत्व + स्थानीय परंपरा

चारों को साथ रखना चाहिए।


कत्यूरी शाखाओं की संक्षिप्त तालिका 

शाखाप्रमुख क्षेत्रप्रमुख नाम
पाली–पछाऊँपाली–पछाऊँआसन्तिदेव, बासन्तिदेव, गौरांगदेव, श्यामलदेव, फेणबराई, केशबराई, अजबराई, गजबराई, सुजानदेव, प्रीतमदेव, धामदेव, मालूशाही, सारंगदेव, वीरमदेव   
अस्कोटपिथौरागढ़ क्षेत्रनागपाल/नागमल्ल, निर्भयपाल, भारतीपाल, तिलकपाल, कल्याणपाल, महेन्द्रपाल
डोटीपश्चिमी नेपालनिरञ्जन मल्लदेव, नागी मल्ल, रिपु मल्ल, संसार मल्ल, कल्याण मल्ल आदि
सीराडीडीहाट क्षेत्रसंसार मल्ल, कल्याण मल्ल, हरि मल्ल आदि
सोरपिथौरागढ़ घाटीविजय बम, शक्तिबम, प्रताप बम
काली-कुमाऊँलोहाघाट–काली क्षेत्रब्रह्मदेव

ध्यान दें: तालिका में दिए गए सभी नाम समान स्तर के प्रमाण से पुष्ट नहीं हैं। पाली–पछाऊँ के शुरुआती नाम मुख्यतः वंशावली परंपरा से आते हैं, जबकि कुछ अस्कोट और अन्य शाखाओं के नाम अभिलेखीय प्रमाणों से अधिक स्पष्ट होते हैं।


निष्कर्ष

कत्यूरी सत्ता का अंत नहीं, एक नए राजनीतिक युग की शुरुआत

कत्यूरी इतिहास को यदि केवल कार्तिकेयपुर के उत्थान और पतन तक सीमित कर दिया जाए, तो कहानी अधूरी रह जाती है।

केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने के बाद—

पाली–पछाऊँ में आसन्तिदेव और बासन्तिदेव की वंशपरंपरा,
अस्कोट में पाल रजवार,
डोटी में रैका-मल्ल,
सीरा में मल्ल शक्ति,
और सोर में बम राजा

जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक धाराएँ सामने आईं।

इन सभी को एक ही स्तर की “प्रमाणित कत्यूरी शाखा” कहना उचित नहीं होगा। लेकिन इन सबको साथ देखने पर मध्य हिमालय की उस राजनीतिक दुनिया की तस्वीर स्पष्ट होती है, जिसमें एक केंद्रीय सत्ता के स्थान पर अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभर रही थीं।

और यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है—

राजधानी बदल गई, राजवंशों के नाम बदले, सत्ता के केंद्र बदले—लेकिन कत्यूरी राजनीतिक परंपरा की स्मृति मध्य हिमालय में लंबे समय तक जीवित रही।

आगे चलकर इन्हीं बदलती शक्तियों के बीच चन्दों का कुमाऊँ और परमारों का गढ़वाल अधिक संगठित राजनीतिक राज्यों के रूप में उभरे। ASI भी उत्तरवर्ती कत्यूरों के बाद चन्द और पंवार/परमार राज्यों के उदय को इसी व्यापक राजनीतिक परिवर्तन से जोड़ता है।

अर्थात् कत्यूरी सत्ता का पतन उत्तराखण्ड के इतिहास का अंत नहीं था—वह उसके अगले अध्याय की शुरुआत थी।


संदर्भ

  1. यशवंत सिंह कठौच, उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास । 

  2. पं. बद्रीदत्त पाण्डे, कुमाऊँ का इतिहास ।

  3. Archaeological Survey of India, Dehradun Circle — Archaeological Heritage of Uttarakhand

  4. National Mission on Monuments and Antiquities — बैजनाथ के कत्यूरी अभिलेख।

  5. Maheshwar P. Joshi, Central Himalaya/Western Nepal

  6. उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, BAHI-302: उत्तराखण्ड का इतिहास । 


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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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