उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-3) कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड : कुषाण, यौधेय, शीलवर्मन और नाग सत्ता का बदलता राजनीतिक परिदृश्य

 

कुणिंदों की पर्वतीय सत्ता से कुषाणों की दस्तक तक

उत्तराखण्ड का प्राचीन इतिहास केवल राजाओं और राजवंशों की सूची नहीं है। यह उन पहाड़ी घाटियों, व्यापारिक मार्गों, सिक्कों और अभिलेखों की कहानी भी है, जिनके सहारे हम लगभग दो हजार वर्ष पुराने राजनीतिक परिवर्तनों को समझने का प्रयास करते हैं।

कुणिंदों ने मध्य हिमालय में एक सशक्त राजनीतिक पहचान बनाई थी। किंतु ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में उत्तर भारत का राजनीतिक मानचित्र तेजी से बदल रहा था। उत्तर-पश्चिम से उभरी कुषाण शक्ति ने पंजाब, गांधार, मथुरा और उत्तर भारत के बड़े हिस्से में अपना प्रभाव स्थापित किया। इस परिवर्तन से हिमालय की तलहटी और उत्तराखण्ड का दक्षिणी भाग भी अछूता नहीं रहा।

लेकिन यहाँ एक रोचक तथ्य सामने आता है—

कुषाणों की शक्ति जितनी मैदानों में दिखाई देती है, मध्य हिमालय में उसका प्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण उतना स्पष्ट नहीं है।

यही अंतर उत्तराखण्ड के इतिहास को विशिष्ट बनाता है।


1. कुषाणों की पहुँच : पहाड़ों तक या केवल तराई-भाबर तक?

कुषाणकालीन साक्ष्यों का अध्ययन करते समय उत्तराखण्ड को दो भौगोलिक क्षेत्रों में देखना उपयोगी है—

तराई–भाबर और शिवालिक क्षेत्र
और
मध्य हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र।

डॉ. अजय रावत जैसे आधुनिक इतिहासकारों के ग्रंथों में यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है कि कुषाणकालीन मुद्राएँ तराई और शिवालिक के निकटवर्ती क्षेत्रों से तो प्राप्त हुई हैं, लेकिन मध्य हिमालय के पर्वतीय भाग में उसी प्रकार के प्रत्यक्ष कुषाण नियंत्रण के प्रमाण नहीं मिलते। इसके विपरीत, वहाँ कुणिंदों की स्वतंत्र सत्ता के बने रहने की बात कही गई है।

यह निष्कर्ष आधुनिक शोध में भी सावधानी के साथ स्वीकार किया जाता है। Central Himalayas के पुरातात्विक अध्ययन में भी तीसरी–चौथी शताब्दी के मध्य हिमालय की राजनीतिक स्थिति को अस्पष्ट माना गया है और पाँचवीं शताब्दी से पहले कुमाऊँ के लिए प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रमाण बहुत कम बताए गए हैं।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि—

कुषाण प्रभाव उत्तराखण्ड में पहुँचा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सम्पूर्ण मध्य हिमालय कुषाण साम्राज्य के प्रत्यक्ष प्रशासन के अधीन था।


2. सिक्के बोलते हैं : कुषाणों की उत्तराखण्ड में उपस्थिति



जब किसी प्राचीन सत्ता के अभिलेख कम मिलते हैं, तब सिक्के इतिहासकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

उत्तराखण्ड में कुषाणकालीन सिक्कों और पुरावशेषों की प्राप्ति मुख्यतः—

कुषाणकालीन स्वर्ण मुद्राएं 
  • वीरभद्र (ऋषिकेश)

  • मोरध्वज (कोटद्वार क्षेत्र)

  • गोविषाण (काशीपुर) तथा

  • तराई-भाबर के अन्य क्षेत्रों

से हुई है। इन स्थानों से मिले साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र कुषाणकालीन आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था।

विशेष रूप से गोविषाण का महत्व उल्लेखनीय है। प्राचीन गोविषाण की पहचान वर्तमान काशीपुर क्षेत्र से की जाती है और यहाँ से कुषाणकालीन तथा उत्तर-कुषाणकालीन मुद्राओं की प्राप्ति ने इस क्षेत्र की ऐतिहासिक महत्ता को और स्पष्ट किया है।


3. मुनि की रेती का स्वर्ण-मुद्रा भंडार : एक अनोखी कहानी

ऋषिकेश के निकट मुनि की रेती से हुविष्क की 44 स्वर्ण मुद्राओं के प्राप्त होने का उल्लेख डॉ. यशवंत कठौच की पुस्तक उत्तराखंड का नवीन इतिहास में मिलता है।

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वर्ण मुद्राएँ केवल आर्थिक समृद्धि का संकेत नहीं देतीं; वे यह भी बताती हैं कि कोई क्षेत्र व्यापक आर्थिक गतिविधि से जुड़ा हुआ था।


4. गोविषाण से वासुदेव की मुद्राएँ : कुषाण प्रभाव का एक और संकेत

गोविषाण के प्राचीन टीले से वासुदेव से संबंधित स्वर्ण मुद्राओं की प्राप्ति का उल्लेख भी उत्तराखंड का नवीन इतिहास में वर्णित है।

इन मुद्राओं में शिव और नंदी से संबंधित प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। ऑनलाइन उपलब्ध क्षेत्रीय पुरातात्विक विवरण भी गोविषाण से उत्तर-कुषाणकालीन स्वर्ण मुद्राओं की प्राप्ति का उल्लेख करते हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—

कुषाणकालीन उत्तराखण्ड केवल राजनीतिक संपर्क का क्षेत्र नहीं था, बल्कि धार्मिक प्रतीकों और आर्थिक गतिविधियों के आदान-प्रदान का क्षेत्र भी था।

कुषाण मुद्राओं पर विभिन्न धार्मिक प्रतीकों का अंकन उस बहुधार्मिक वातावरण की ओर संकेत करता है जिसमें बौद्ध, ब्राह्मणीय और स्थानीय धार्मिक परंपराएँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं।


5. पहाड़ों में कुणिंद अभी जीवित थे

यहीं से उत्तराखण्ड का इतिहास एक रोचक मोड़ लेता है।

यदि तराई और भाबर में कुषाण प्रभाव बढ़ रहा था, तो क्या कुणिंद पूरी तरह समाप्त हो गए थे?

उपलब्ध साक्ष्य ऐसा नहीं बताते।

एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक अध्ययन के अनुसार कुणिंदों ने लगभग पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास कुषाण प्रभुत्व स्वीकार किया था, लेकिन तीसरी शताब्दी के प्रारम्भ में उनकी राजनीतिक सक्रियता फिर दिखाई देती है। छत्रेश्वर से संबंधित कुणिंद सिक्के लगभग तीसरी शताब्दी के माने जाते हैं और उनका स्वरूप समकालीन यौधेय सिक्कों से काफी मिलता है। लगभग 250 ई. के बाद कुणिंद सिक्कों का क्रम समाप्त होता दिखाई देता है।

इससे इतिहासकारों ने यह संभावना व्यक्त की है कि कुणिंद और यौधेय कुषाण शक्ति के विरुद्ध किसी स्तर पर सहयोगी रहे होंगे।

यहाँ “संयुक्त महासंघ” की बात निश्चित तथ्य के रूप में नहीं कही जा सकती; उपलब्ध साक्ष्य सहयोग की संभावना को तो मजबूत करते हैं, लेकिन किसी विशाल औपचारिक महासंघ को सिद्ध नहीं करते।


6. कुषाणों के विरुद्ध यौधेयों का उभार

कुषाण साम्राज्य के कमजोर पड़ने के साथ उत्तर भारत में कई स्थानीय शक्तियाँ पुनः सक्रिय हुईं।

इनमें यौधेय गण विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।

यौधेयों की मुद्राओं पर प्रसिद्ध वाक्य मिलता है—

“यौधेय गणस्य जयः”

अर्थात्—

“यौधेय गण की विजय।”

उनकी मुद्राओं पर उनके अधिष्ठाता देवता के रूप में कार्तिकेय की छवि भी मिलती है। उत्तराखण्ड के पश्चिमी भागों और शिवालिक क्षेत्र से यौधेय सिक्कों की प्राप्ति उनके हिमालयी संपर्क की ओर संकेत करती है। ऐतिहासिक स्रोतों में काँगड़ा, शिमला, जौनसार-भाबर, कालाडांडा और सहारनपुर जैसे क्षेत्रों में इनकी मुद्राओं का उल्लेख मिलता है।

इसलिए कुषाणोत्तर उत्तराखण्ड को समझने के लिए यौधेय शक्ति की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


7. कुषाणों की वापसी के बाद भी पहाड़ों की राजनीति अलग रही

यहाँ एक बार फिर उत्तराखण्ड की भौगोलिक स्थिति निर्णायक बनती है।

मैदानों में किसी विशाल साम्राज्य का नियंत्रण अपेक्षाकृत सरल था, लेकिन हिमालयी घाटियों में राजनीतिक सत्ता का स्वरूप अधिक स्थानीय रहा होगा।

इसीलिए संभव है कि—

तराई और भाबर में कुषाण → फिर यौधेय प्रभाव के साथ-साथ, मध्य हिमालय में कुणिंद या अन्य स्थानीय राजनीतिक इकाइयाँ अपनी सत्ता बनाए रखती रही हों।

यह राजनीतिक बहुलता उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास की एक प्रमुख विशेषता थी।


8. कालसी–जगतग्राम और राजा शीलवर्मन : एक अलग शक्ति का उदय

इसी संक्रमणकाल में कालसी के निकट जगतग्राम इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र बनकर सामने आता है।

यहाँ से प्राप्त ईंटों और अभिलेखों से राजा शीलवर्मन द्वारा अश्वमेध यज्ञों के आयोजन का प्रमाण मिलता है।

शिलालेखीय साक्ष्य शीलवर्मन को वार्षगण्य गोत्र से जोड़ते हैं और जगतग्राम में उसके अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख करते हैं। उपलब्ध शोध इन्हें लगभग तीसरी शताब्दी ईस्वी के संदर्भ में रखता है।

जगतग्राम की सबसे बड़ी विशेषता वहाँ मिली गरुड़ाकार/श्येनाकार वेदिकाएँ हैं।

जगतग्राम से प्राप्त गरुड़ाकार/श्येनाकार वेदिका

सोचिए—

यमुना की घाटी के निकट एक ऐसा शासक, जो अपनी राजनीतिक शक्ति और सार्वभौम महत्वाकांक्षा को प्रदर्शित करने के लिए अश्वमेध जैसे वैदिक राजसूचक अनुष्ठान करता है।

यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था।

अश्वमेध राजनीतिक शक्ति की सार्वजनिक घोषणा भी था।

जगतग्राम इसीलिए उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में एक असाधारण स्थल है।


9. फिर इतिहास में आता है एक नया अध्याय—नाग

अब हम उस प्रश्न तक पहुँचते हैं जिसने उत्तराखण्ड के इतिहासकारों को लंबे समय से आकर्षित किया है—

नागों का उत्तराखण्ड से क्या संबंध था?

यहाँ सबसे पहले एक सावधानी जरूरी है।

उत्तराखण्ड के नागों को सीधे कुषाणों के तत्काल उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

उपलब्ध अभिलेखीय साक्ष्य नाग सत्ता को विशेष रूप से उत्तर-गुप्त काल और लगभग छठी–सातवीं शताब्दी के संदर्भ में अधिक स्पष्ट करते हैं। गढ़वाल-हिमालय में गुप्तोत्तर काल के प्रमुख स्रोतों में गोपेश्वर त्रिशूल लेख, बाड़ाहाट त्रिशूल लेख और लाखामंडल लेख का विशेष महत्व माना जाता है।

अर्थात् इतिहास की समयरेखा को इस प्रकार समझना अधिक उचित होगा—

कुणिंद → कुषाण प्रभाव → यौधेय/स्थानीय शक्तियाँ → गुप्तकालीन प्रभाव → गुप्तोत्तर स्थानीय राज्य → नाग सत्ता

यह क्रम उत्तराखण्ड की राजनीतिक कहानी को अधिक स्पष्ट बनाता है।


10. गोपेश्वर का त्रिशूल : धातु पर अंकित एक राजवंश

चमोली का गोपेश्वर इस इतिहास का शायद सबसे रोचक अध्याय है।

गोपेश्वर के रुद्रनाथ/गोपीनाथ मंदिर परिसर में स्थित विशाल धातु-त्रिशूल पर प्राचीन लेख अंकित है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार इस त्रिशूल पर छठी–सातवीं शताब्दी ईस्वी की उत्तर-ब्राह्मी लिपि में एक लेख है, जिसमें इसे गणपतिनाग द्वारा रुद्र के मंदिर के सामने स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में इसी त्रिशूल पर 1191 ई. में पश्चिमी नेपाल के शासक अशोक चल्ल से संबंधित एक अन्य लेख भी अंकित हुआ।

यानी एक ही त्रिशूल—

प्राचीन नाग सत्ता → मध्यकालीन राजनीतिक हस्तक्षेप → आधुनिक पुरातात्विक विरासत

तीनों को जोड़ता हुआ दिखाई देता है।

“गोपेश्वर के रुद्रनाथ/गोपीनाथ मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन लौह त्रिशूल। त्रिशूल पर एक प्राचीन तथा तीन आधुनिक अभिलेख अंकित हैं; प्राचीन अभिलेख उत्तराखण्ड के गुप्तोत्तर इतिहास और नाग शासक गणपतिनाग के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।”


11. गणपतिनाग कौन था?

गणपतिनाग (Ganapatinaga) लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी के आरंभिक काल का एक प्रमुख नाग शासक था। उसका संबंध उत्तर भारत में प्रभावशाली रहे नाग राजवंश से था। उपलब्ध सिक्कों और अभिलेखीय साक्ष्यों से उसका संबंध विशेष रूप से मथुरा क्षेत्र से जोड़ा जाता है।

गणपतिनाग का महत्व

  • वह नाग राजवंश का शक्तिशाली शासक था।
  • उसके नाम से जुड़े सिक्के मथुरा, पद्मावती और विदिशा से मिले हैं।
  • उसके सिक्कों की बड़ी संख्या मथुरा से मिलने के कारण कुछ इतिहासकार उसे मथुरा की नाग शाखा का शासक मानते हैं।
  • उसका राजनीतिक प्रभाव इतना महत्वपूर्ण था कि वह समुद्रगुप्त के आर्यावर्त अभियान में पराजित होने वाले प्रमुख राजाओं में शामिल हुआ। 

अतः गोपेश्वर त्रिशूल लेख में गणपतिनाग का नाम विशेष महत्व रखता है। गोपेश्वर त्रिशूल लेख में नाग शासकों के क्रमशः —

  1. स्कन्दनाग

  2. विभुनाग

  3. अंशुनाग

  4. गणपतिनाग

नाम दिए गए हैं।

हालाँकि इन शासकों के विस्तृत राजनीतिक इतिहास और उनके राज्य की निश्चित सीमाओं को लेकर अभी भी विद्वानों में मतभेद हैं।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि—

गोपेश्वर का अभिलेख नाग शासक परिवार/स्थानीय नाग सत्ता के अस्तित्व का महत्वपूर्ण प्रमाण है, लेकिन इससे पूरे उत्तराखण्ड पर एक विशाल केंद्रीकृत “नाग साम्राज्य” की सीमा निश्चित नहीं की जा सकती।


12 . नाग सत्ता और शिव उपासना

गोपेश्वर के त्रिशूल को केवल राजनीतिक अभिलेख मानना भी पर्याप्त नहीं होगा।

त्रिशूल स्वयं रुद्र/शैव परंपरा से जुड़ा प्रतीक है।

गोपेश्वर के मंदिर परिसर में आज भी विशाल त्रिशूल और शिव परंपरा की निरंतरता दिखाई देती है। वर्तमान गोपीनाथ मंदिर का स्थापत्य बाद का है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे मुख्यतः आठवीं शताब्दी की स्थापत्य शैली से जोड़ता है, लेकिन परिसर में मौजूद पुराना त्रिशूल इससे कहीं प्राचीन अभिलेखीय परंपरा की ओर संकेत करता है।

इससे एक दिलचस्प सांस्कृतिक निरंतरता दिखाई देती है—

राजा बदलते रहे, राजनीतिक सीमाएँ बदलती रहीं, लेकिन पर्वतीय धार्मिक परंपराओं की स्मृति बनी रही।


13 . बाड़ाहाट : उत्तरकाशी की प्राचीन स्मृति

गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी भागीरथी के किनारे स्थित वर्तमान उत्तरकाशी का प्राचीन नाम बाड़ाहाट/बाराहाट माना जाता है।

यहाँ भी एक विशाल त्रिशूल से संबंधित अभिलेखीय परंपरा मिलती है।

कुछ विद्वानों ने बाड़ाहाट को नाग शासकों की राजनीतिक गतिविधियों से जोड़ा है। उपलब्ध विवरणों में गणेश्वर और गुह जैसे नामों का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन अभिलेखों की व्याख्या और उनसे निर्मित राजनीतिक सीमा के बारे में मतभेद हैं।

इससे इतना स्पष्ट अवश्य होता है कि—

उत्तराखण्ड के ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में गुप्तोत्तर काल तक स्थानीय राजसत्ताएँ सक्रिय थीं।


14. क्या नागों ने कुणिंदों का स्थान लिया?

यह प्रश्न सरल है, लेकिन इसका उत्तर सरल नहीं।

कई क्षेत्रीय इतिहास-ग्रंथ नागों को कुणिंदों के बाद की शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन उपलब्ध प्रमाणों को कालक्रम में रखने पर स्थिति अधिक जटिल दिखाई देती है।

कुणिंदों के सिक्के तीसरी शताब्दी के बाद लगभग गायब हो जाते हैं। यौधेय शक्ति भी आगे चलकर गुप्त साम्राज्य के विस्तार में समाहित हो गई। चौथी-पाँचवीं शताब्दी के बीच मध्य हिमालय की राजनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत अस्पष्ट है। फिर पाँचवीं–छठी शताब्दी के बाद हमें स्थानीय राजवंशों और नाग शासकों के अधिक स्पष्ट अभिलेख मिलते हैं।

इसलिए अधिक सुरक्षित निष्कर्ष यह है—

नाग सत्ता कुणिंदों की सीधी और तत्काल उत्तराधिकारी सत्ता के बजाय उत्तराखण्ड में विकसित हुई एक बाद की स्थानीय राजनीतिक शक्ति थी, जिसका स्पष्ट अभिलेखीय स्वरूप गुप्तोत्तर काल में दिखाई देता है।


15. इतिहास का सबसे रोचक पक्ष : सत्ता बदलती रही, क्षेत्र नहीं

कुणिंदों से कुषाणों तक और फिर यौधेयों से नागों तक की यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण तथ्य बताती है।

उत्तराखण्ड किसी एक साम्राज्य की स्थायी परिधि नहीं था।

यह था—

मैदान और पहाड़ के बीच एक संपर्क क्षेत्र।

यहाँ से होकर—

  • व्यापारिक मार्ग गुजरते थे,

  • सिक्के पहाड़ों तक पहुँचते थे,

  • धार्मिक विचारों का आदान-प्रदान होता था,

  • राजनीतिक शक्तियाँ अपने प्रभाव का विस्तार करती थीं,

  • और स्थानीय समाज बाहरी शक्तियों के साथ सामंजस्य या प्रतिरोध दोनों करता था।

इसीलिए उत्तराखण्ड के इतिहास को केवल “किसने शासन किया?” से समझना पर्याप्त नहीं।

सवाल यह भी होना चाहिए—

“किस क्षेत्र पर किसका वास्तविक नियंत्रण था?”

और—

“स्थानीय समाज ने बदलती राजनीतिक शक्तियों के बीच अपनी पहचान कैसे बनाए रखी?”


16. कुषाणों की छाया से नागों की उपस्थिति तक

यदि इस पूरे दौर को एक ऐतिहासिक यात्रा के रूप में देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—

कुणिंदों की शक्ति
कुषाणों का तराई-भाबर और व्यापारिक मार्गों पर प्रभाव
मध्य हिमालय में स्थानीय सत्ता की निरंतरता
यौधेयों का उभार और कुषाण शक्ति का क्षय
शीलवर्मन और जगतग्राम की क्षेत्रीय शक्ति
गुप्तकालीन राजनीतिक प्रभाव
गुप्तोत्तर स्थानीय राज्यों का उदय
नाग शासकों के अभिलेखीय प्रमाण
आगे चलकर नई हिमालयी राजसत्ताओं का उदय

यह क्रम उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास को किसी सीधी रेखा के बजाय लगातार बदलते शक्ति-संतुलन के रूप में सामने लाता है।


निष्कर्ष : कुणिंदों के बाद इतिहास ने कौन-सी राह पकड़ी?

कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड का इतिहास किसी एक साम्राज्य के अधीन जाने की कहानी नहीं है।

कुषाणों ने तराई और शिवालिक से जुड़े क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वीरभद्र, मोरध्वज और गोविषाण जैसे स्थलों से मिले अवशेष और सिक्के इस संपर्क के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। दूसरी ओर मध्य हिमालय में कुणिंदों की राजनीतिक परंपरा कुछ समय तक बनी रही और कुषाण शक्ति के क्षय के साथ यौधेयों जैसी गणराज्यीय शक्तियाँ भी उभरीं।

कालसी–जगतग्राम में शीलवर्मन के अश्वमेध यज्ञ इस बात का प्रमाण हैं कि तीसरी शताब्दी के आसपास इस क्षेत्र में ऐसी स्थानीय शक्ति भी मौजूद थी जो स्वयं को स्वतंत्र और सार्वभौम शासक के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही थी।

और कुछ शताब्दियों बाद—

गोपेश्वर का त्रिशूल गणपतिनाग का नाम लेकर इतिहास के अंधेरे में एक दीपक जला देता है।

वह हमें बताता है कि गुप्तोत्तर उत्तराखण्ड में स्थानीय नाग सत्ता केवल लोककथा नहीं थी; उसके पीछे अभिलेखीय साक्ष्य भी मौजूद हैं। हालांकि उनके राज्य की वास्तविक सीमा और राजनीतिक संरचना पर अभी भी शोध की आवश्यकता है।

इस प्रकार कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड में इतिहास की धारा समाप्त नहीं हुई—

उसने अपना रूप बदला।

सिक्कों से अभिलेखों तक, गणराज्यों से स्थानीय राजसत्ताओं तक और कुषाणों से नागों तक—

मध्य हिमालय अपनी राजनीतिक पहचान को बार-बार नए रूप में गढ़ता रहा।

और इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य से आगे निकलकर उत्तराखण्ड इतिहास के उस दौर में प्रवेश करता है, जहाँ गुप्त साम्राज्य, कर्तृपुर, नाग, मौखरी और बाद में हर्षवर्धन जैसी शक्तियाँ हिमालय की राजनीति को प्रभावित करती दिखाई देती हैं।

अगली कड़ी में…

गुप्तों की छाया में उत्तराखण्ड : कर्तृपुर, पर्वतीय गणराज्य और समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति

क्या समुद्रगुप्त ने वास्तव में उत्तराखण्ड के किसी राज्य को पराजित किया था?
कर्तृपुर कहाँ था?
क्या कर्तृपुर की पहचान आधुनिक कत्यूर घाटी से की जा सकती है?
और गुप्त साम्राज्य के विस्तार के बावजूद मध्य हिमालय अपनी स्वतंत्रता किस प्रकार बनाए रख पाया?

इन प्रश्नों के उत्तर उत्तराखण्ड के इतिहास के अगले महत्वपूर्ण अध्याय का द्वार खोलेंगे।


📚 संदर्भ ग्रंथ

  • रावत, डॉ. अजय सिंह, उत्तराखण्ड का समग्र राजनीतिक इतिहास
  • कठोच, डॉ. यशवंत सिंह, उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास
  • Archaeological Survey of India, Dehradun Circle — गोपेश्वर त्रिशूल एवं गोपीनाथ मंदिर संबंधी विवरण।

  • Central Himalayas: Archaeological, Linguistic and Cultural Synthesis — कुषाण, कुणिंद और मध्य हिमालय की राजनीतिक स्थिति।

  • Altekar आदि के अध्ययन पर आधारित IGNCA में उपलब्ध New History of the Indian People के अंश — कुणिंद, यौधेय और कुषाणोत्तर राजनीतिक परिवर्तन।

  • जगतग्राम–शीलवर्मन और अश्वमेध संबंधी पुरातात्विक/शोध स्रोत। 



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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)




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