जब इतिहास की एक घटना, बचपन की स्मृति बनकर लौट आई
कुछ लोकगीत केवल गीत नहीं होते—वे समय की धड़कनों को अपने भीतर सँजोए हुए जीवित दस्तावेज होते हैं। उनमें किसी युग का इतिहास पुस्तकों की तरह तिथियों और घटनाओं में नहीं, बल्कि मनुष्यों की आँखों के आँसुओं, उनके बिछोह, आशंकाओं, प्रेम और प्रतीक्षा में दर्ज होता है। ऐसे गीत जब पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी माँ की आवाज़ से बेटी के कानों तक पहुँचते हैं, तो वे केवल शब्दों का हस्तांतरण नहीं करते, बल्कि अपने साथ एक पूरा लोकजीवन, उसकी संवेदनाएँ और उसकी स्मृतियाँ भी आगे ले जाते हैं।
कभी-कभी कोई पुरानी धुन वर्षों की दूरी पार करके अचानक हमारे सामने आ खड़ी होती है और हमें उस समय में ले जाती है, जहाँ से वह चली थी। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 1962 के भारत-चीन युद्ध से जुड़ा एक लोकगीत, जिसे मैंने अपने बचपन में अपनी माँ से सुना था, वर्षों बाद अचानक मेरी स्मृतियों में लौट आया। वह केवल एक गीत नहीं था; उसमें मेरे पहाड़ का जीवन था, एक सैनिक का कर्तव्य था, एक माँ की व्यथा थी और एक पत्नी के विरह की वह पीड़ा थी, जिसे शब्दों में बाँधना आसान नहीं।
1962 की पीड़ा को स्वर देता वह लोकगीत
बाधनी रस्सी खेंचनी डोरा।
आसाम हई रौ लड़ाई जोरा।।
पके दे इजु दी आंठा ऊमी।
पके दे माता बिन पाणी खीरा।
आसाम रनी बड़-बड़ वीरा।।
सड़के तिरावा काटी हाली तूणी।
जाणौं जरूर बेकारे रुणी।।
कुड़ी कौख्याणी झप-झपा जौ छैं।
शान्तु का आंख्यूं मां खूने का रौ छैं।।
शान्तु समझाई मैलै सारी राता।
शान्तु लै नी मानी मेरी एक बाता।।
झन तोड़िए शान्तु आमे की डाई।
सासु हुदेली भैनू की गाई।।
झन दिए इजु शान्तु कैं गाई।
जस त्यरो च्यल शान्तु कौ भाई।।
बाधनी रस्सी खेंचनी डोरा।
आसाम हई रौ लड़ाई जोरा।।
भावार्थ— सैनिक अपनी माँ से असम में छिड़े युद्ध का वर्णन करते हुए कहता है—माँ, मेरे लिए ऊमी (भुनी हुई कच्चे गेहूँ की बालियाँ) पका दे; मुझे उस निर्दयी धरती पर जाना है। मेरे लिए बिना पानी की खीर बना दे, क्योंकि मुझे असम की रणभूमि में बड़े-बड़े वीरों के साथ युद्ध करने जाना है।
माँ जब यह सुनकर व्याकुल होकर रोने लगती है, तो सैनिक उसे समझाते हुए कहता है कि रोने से क्या होगा, मुझे तो जाना ही होगा। इसके बाद वह अपनी पत्नी शान्तु की व्यथा का उल्लेख करता है। वह कहता है कि शान्तु की आँखों से आँसू नहीं, मानो रक्त की धाराएँ बह रही हैं। उसने उसे पूरी रात समझाया, किंतु शान्तु उसकी एक भी बात मानने को तैयार नहीं हुई।
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आगे सैनिक शान्तु को समझाते हुए खेत में उगे आम के पौधों को न तोड़ने की हिदायत देता है, ताकि उसकी माँ शान्तु के भाइयों के लिए कटु वचन न कहे। वह अपनी माँ से भी आग्रह करता है कि शान्तु के भाइयों को अपने ही बेटों के समान समझे और उन्हें बुरा-भला न कहे।
इस प्रकार यह लोकगीत युद्धभूमि की ओर प्रस्थान करते एक सैनिक के मन में उमड़ती कर्तव्यनिष्ठा, अपनी माँ के प्रति स्नेह, पत्नी के विरह और दोनों परिवारों के बीच संबंधों की संवेदनशीलता को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करता है। इसमें युद्ध की विभीषिका से अधिक उस मानवीय पीड़ा का चित्र उभरता है, जिसे पीछे छूट जाने वाले परिवार अपने भीतर सँजोए रहते हैं।
लोकगीत—इतिहास की वह आवाज़ जो भुलाई नहीं जानी चाहिए
इस लोकगीत को लिखते हुए बार-बार यही अनुभव हुआ कि इतिहास केवल पुस्तकों के पन्नों में सुरक्षित नहीं रहता। वह कभी किसी स्मारक में दिखाई देता है, कभी किसी पुरानी तस्वीर में ठहर जाता है और कभी किसी माँ की आवाज़ में लोकगीत बनकर पीढ़ियों तक यात्रा करता है।
1962 का युद्ध हमारे राष्ट्रीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, लेकिन इस लोकगीत में वही इतिहास एक सैनिक और उसके परिवार की व्यक्तिगत पीड़ा बनकर सामने आता है। यहाँ युद्ध केवल सीमा पर लड़ी जा रही लड़ाई नहीं है; यहाँ युद्ध एक माँ की आँखों में उतरता है, पत्नी के आँसुओं में बहता है और उस सैनिक के मन में अपना घर, अपने खेत और अपने लोगों की चिंता बनकर जीवित रहता है।
यही लोक साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है। वह इतिहास को केवल बताता नहीं, महसूस कराता है।
मेरे लिए इस गीत को लिपिबद्ध करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि बचपन में सहज रूप से सुना गया यह गीत समय के साथ मेरी स्मृति से भी धुंधला होने लगा था। यदि मैंने इसे उसी समय लिखकर सुरक्षित न किया होता, तो संभव है कि इसके कुछ पद हमेशा के लिए मेरी स्मृति के साथ ही खो जाते।
आज जब लोकभाषाएँ और लोकगीत बदलते समय के साथ धीरे-धीरे हमारी दैनिक जीवन-धारा से दूर होते जा रहे हैं, तब ऐसे गीतों को लिखना, सुनना, समझना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना और भी आवश्यक हो जाता है। किसी लोकगीत का संरक्षण केवल शब्दों का संरक्षण नहीं है; उसके साथ एक अंचल की भाषा, उसकी संस्कृति, उसके रिश्ते, उसके दुःख-सुख और उसकी सामूहिक स्मृति भी सुरक्षित होती है।
इसलिए यह गीत अब केवल मेरी बचपन की स्मृति नहीं रहा। माँ की आवाज़ से मेरी स्मृति तक और मेरी स्मृति से इन शब्दों तक पहुँचा यह लोकगीत अब ‘थात-विरासत’ के माध्यम से आप तक पहुँच रहा है।
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यही प्रयास है ‘थात-विरासत’ का।
