उत्तराखण्ड में गोरखा शासन : ‘गोरख्याली’ के पच्चीस वर्ष

 


चंद और पंवार सत्ता के पतन से अंग्रेजी शासन के आगमन तक

उत्तराखण्ड के इतिहास में कुछ कालखंड ऐसे हैं, जिनकी स्मृति केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं, बल्कि लोकजीवन, लोकगीतों और जनश्रुतियों में भी सुरक्षित है। 1790 से 1815 ई. तक का गोरखा शासन ऐसा ही एक कालखंड है।

इन लगभग पच्चीस वर्षों में हिमालय का यह प्रदेश एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन से गुजरा। कुमाऊँ की दीर्घकालीन चंद सत्ता का अंत हुआ, गढ़वाल की पंवार सत्ता गोरखाओं के सामने पराजित हुई, नेपाल की गोरखा शक्ति ने कुमाऊँ और गढ़वाल के बड़े भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित किया और एक नई प्रशासनिक तथा राजस्व व्यवस्था लागू हुई। अंततः अंग्रेज-गोरखा युद्ध ने इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को फिर बदल दिया।

उत्तराखण्ड की लोकस्मृति में यह काल आज भी ‘गोरख्याली’ के नाम से जाना जाता है।

लेकिन गोरख्याली केवल किसी राजवंश के परिवर्तन की कहानी नहीं है। यह सत्ता, सैन्य विस्तार, भूमि-बंदोबस्त, कर-व्यवस्था, प्रशासन और सामान्य जनता के अनुभवों की भी कहानी है।

आइए, इसी उथल-पुथल भरे कालखंड की यात्रा पर चलते हैं।


नेपाल से उठी गोरखा शक्ति

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नेपाल की गोरखा शक्ति तेजी से विस्तार कर रही थी। पृथ्वीनारायण शाह के नेतृत्व में नेपाल के एकीकरण की प्रक्रिया आरंभ होने के बाद गोरखा राज्य ने अपने प्रभाव क्षेत्र को निरंतर विस्तृत किया।

दूसरी ओर कुमाऊँ की चंद सत्ता अपने पुराने वैभव और शक्ति को धीरे-धीरे खो रही थी। राजनीतिक संघर्षों और कमजोर होती केंद्रीय सत्ता ने कुमाऊँ को बाहरी आक्रमण के लिए अपेक्षाकृत असुरक्षित बना दिया था।

ऐसे समय में गोरखा सेना ने कुमाऊँ की ओर अपना अभियान आरंभ किया।

नेपाल के सिंहासन पर उस समय रण बहादुर शाह थे। वे अल्पायु में ही राजा बने थे। इसलिए उनके अल्पवयस्क होने के कारण शासन का वास्तविक संचालन उनके संरक्षकों और प्रभावशाली दरबारी शक्तियों के हाथों में था। 

कुमाऊँ अभियान में काजी जगजीत पाण्डे, अमरसिंह थापा तथा अन्य गोरखा सैन्य अधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


1790 ई. : कुमाऊँ में चंद सत्ता का अंत

गोरखा सेना ने कुमाऊँ की ओर बढ़ते हुए चंद सत्ता को चुनौती दी।

कुमाऊँ के तत्कालीन शासक महेन्द्रचन्द गोरखा शक्ति का सामना करने में सफल नहीं हो सके। संघर्ष के बाद गोरखाओं ने कुमाऊँ पर अधिकार स्थापित कर लिया।

इस प्रकार 1790 ई. में कुमाऊँ की चंद सत्ता का अंत हुआ और यहाँ गोरखा शासन का आरंभ हुआ।

यह केवल एक राजा की पराजय नहीं थी।

यह कुमाऊँ की राजनीतिक व्यवस्था में एक युगांतकारी परिवर्तन था।

जिस भूमि पर लंबे समय से चंद राजाओं के ताम्रपत्र जारी होते थे, मंदिरों को गूंठ प्रदान किए जाते थे और स्थानीय राजसत्ता शासन करती थी, अब वही भूमि नेपाल की गोरखा सत्ता के अधीन आ गई।

कुमाऊँ के इतिहास में एक नया शब्द दर्ज हुआ—

गोरख्याली।


राजा की जगह आया ‘सुब्बा’

गोरखाओं ने विजित प्रदेशों को केवल सैन्य शक्ति के बल पर नहीं छोड़ा, बल्कि वहाँ अपनी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की।

कुमाऊँ जैसे विजित प्रदेशों में नेपाल की ओर से ‘सुब्बा’ अथवा सूबेदार नियुक्त किए जाते थे। ये अधिकारी नेपाल की केंद्रीय सत्ता के निर्देशों के अनुसार शासन चलाते थे।

कुमाऊँ का प्रथम गोरखा सुब्बा जोगा मल्ल शाह बनाया गया।

उसके साथ ही कुमाऊँ में गोरखाकालीन प्रशासन की औपचारिक शुरुआत हुई।

जोगा मल्ल शाह के समय कुमाऊँ में प्रथम गोरखा भूमि-बंदोबस्त किए जाने का उल्लेख मिलता है।

इससे स्पष्ट होता है कि गोरखा विजय का उद्देश्य केवल भू-भाग पर अधिकार करना नहीं था। विजित प्रदेश को प्रशासनिक और आर्थिक रूप से नियंत्रित करना भी उतना ही आवश्यक था।


भूमि-बंदोबस्त : खेतों का नया हिसाब

किसी भी शासन की वास्तविक शक्ति केवल सेना से नहीं, बल्कि उसकी भूमि और राजस्व व्यवस्था से भी निर्धारित होती है।

गोरखा शासन के आरंभिक काल में कुमाऊँ में भूमि का बंदोबस्त कराया गया। गाँवों और भूमि से प्राप्त होने वाले राजस्व का निर्धारण किया गया तथा उसे शासन की आय का प्रमुख आधार बनाया गया।

यहीं चंद और गोरखा शासन के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

चंदकालीन ताम्रपत्रों में हमें भूमि के दान और गूंठ के प्रमाण मिलते हैं, जबकि गोरखा काल में भूमि को व्यवस्थित करके उससे राजस्व प्राप्त करने पर विशेष बल दिखाई देता है।

अर्थात्—

भूमि वही थी, गाँव वही थे, खेत वही थे;
लेकिन शासन की दृष्टि बदल चुकी थी।


बदलते रहे गोरखा अधिकारी

जोगा मल्ल शाह के बाद कुमाऊँ में विभिन्न गोरखा अधिकारियों की नियुक्ति होती रही।

क्रमशः काजी नर शाही, अजब सिंह थापा, रुद्रवीर सिंह आदि अधिकारियों ने कुमाऊँ के प्रशासन में अहम भूमिका निभाई।

अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में भी गोरखा प्रशासन से जुड़े अनेक अधिकारियों के नाम मिलते हैं।

इन अधिकारियों का परिवर्तन इस बात का संकेत है कि कुमाऊँ का प्रशासन नेपाल की केंद्रीय सत्ता से नियंत्रित था।

स्थानीय स्तर पर शासन करने वाला अधिकारी बदल सकता था, लेकिन उसके पीछे नेपाल की राजनीतिक और सैन्य शक्ति बनी रहती थी।


‘गोरख्याली’ : लोकस्मृति में दर्ज एक कठोर काल

गोरखा शासन का उल्लेख आते ही उत्तराखण्ड की लोकस्मृति में कर, बेगार और कठोर प्रशासन की स्मृतियाँ सामने आती हैं।

‘गोरख्याली’ शब्द विशेष रूप से गढ़वाल की लोकपरंपरा में एक कठिन और पीड़ादायक काल की स्मृति से जुड़ा हुआ है।

गोरखा शासन में जनता से विभिन्न प्रकार के कर लिए जाते थे। सैन्य और प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए श्रम भी लिया जाता था।

इसलिए सामान्य ग्रामीण के लिए सत्ता परिवर्तन का अर्थ केवल यह नहीं था कि राजा बदल गया।

उसके लिए इसका अर्थ था—

कर का नया हिसाब,
श्रम की नई माँग,
नए अधिकारी,
नई प्रशासनिक भाषा
और शासन के नए आदेश।

यही कारण है कि गोरख्याली की स्मृति राजदरबार से अधिक जनस्मृति में जीवित रही।


कुमाऊँ के बाद गढ़वाल की ओर

कुमाऊँ पर अधिकार स्थापित करने के बाद गोरखा शक्ति की दृष्टि पश्चिम की ओर गई।

अब लक्ष्य था—

गढ़वाल।

उस समय गढ़वाल पर पंवार वंश के राजा प्रद्युम्नशाह का शासन था।

1791 में गोरखा सेना ने गढ़वाल की ओर अभियान आरंभ किया और लंगूरगढ़ की घेराबंदी की।

गढ़वाल की सेना ने प्रतिरोध किया।

लगभग चार सप्ताह तक संघर्ष चलता रहा।

लेकिन इसी बीच नेपाल के सामने एक नया संकट उत्पन्न हो गया।

नेपाल और चीन के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो गई और गोरखा नेतृत्व को अपनी सैन्य शक्ति वापस बुलानी पड़ी।

फलतः पहला गोरखा अभियान गढ़वाल पर स्थायी अधिकार स्थापित किए बिना समाप्त हो गया।

गढ़वाल को कुछ समय के लिए राहत मिली।

लेकिन यह राहत बहुत लंबे समय तक नहीं रहने वाली थी।


1792 : श्रीनगर की संधि

गोरखा दबाव और राजनीतिक परिस्थितियों के बीच गढ़वाल के राजा प्रद्युम्नशाह को नेपाल के साथ समझौता करना पड़ा।

1792 में श्रीनगर की संधि का उल्लेख मिलता है।

गढ़वाल ने नेपाल की अधीनता स्वीकार की और प्रतिवर्ष कर देने तथा अपने दरबार में नेपाली प्रतिनिधि रखने की व्यवस्था स्वीकार की।

कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों में प्रारंभिक कर 3,000 रुपये प्रतिवर्ष बताया गया है और बाद में इसे बढ़ाकर 9,000 रुपये किए जाने का उल्लेख मिलता है।

हालाँकि विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में इस कर की राशि और उसके क्रम को लेकर भिन्न विवरण मिलते हैं। इसलिए शोधपरक दृष्टि से इतना कहना अधिक उचित है कि संधि के अंतर्गत गढ़वाल पर नेपाली प्रभाव तथा कर-व्यवस्था स्वीकार की गई थी और बाद में गोरखाओं ने उस पर अधिक दबाव बनाया।

यह समझौता स्थायी शांति का आधार नहीं बन सका।


फिर लौटे गोरखा

नेपाल-चीन संघर्ष समाप्त होने के बाद गोरखा शक्ति ने फिर गढ़वाल की ओर ध्यान दिया।

अब गढ़वाल की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर थी।

राज्य आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा था। इसी बीच 1803 का भूकंप भी गढ़वाल के लिए भारी विनाश लेकर आया।

प्राकृतिक आपदा के बाद गोरखा आक्रमण ने राज्य को और कमजोर कर दिया।

गोरखा सेना फिर गढ़वाल में आगे बढ़ी।

इस बार परिस्थितियाँ अलग थीं।

गढ़वाल अकेला पड़ चुका था।


1804 : खुड़बुड़ा का निर्णायक युद्ध

गोरखा और गढ़वाल की सेनाओं के बीच निर्णायक संघर्ष खुड़बुड़ा में हुआ।

गढ़वाल के राजा प्रद्युम्नशाह स्वयं युद्ध में उपस्थित थे।

गोरखा सेना की ओर से अनुभवी सेनानायकों ने मोर्चा संभाला।

युद्ध में गढ़वाल की सेना पराजित हुई और राजा प्रद्युम्नशाह युद्धभूमि में मारे गए।

इसके साथ ही गोरखाओं ने गढ़वाल के बड़े हिस्से पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

अब हिमालय के दो प्रमुख राजनीतिक क्षेत्र—

कुमाऊँ और गढ़वाल

गोरखा सत्ता के प्रभाव में आ चुके थे।

यह उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ था।


एक सत्ता, दो ऐतिहासिक क्षेत्र

कुमाऊँ और गढ़वाल की अपनी-अपनी राजवंशीय परंपराएँ थीं।

कुमाऊँ में चंद।

गढ़वाल में पंवार।

लेकिन गोरखा विजय के बाद दोनों क्षेत्रों के बड़े हिस्से एक ही बाहरी सत्ता के अधीन आ गए।

इससे उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास में पहली बार एक ऐसी स्थिति बनी जिसमें कुमाऊँ और गढ़वाल की बड़ी पर्वतीय पट्टी पर एक बाहरी सैन्य-राजनीतिक शक्ति का प्रभाव स्थापित हुआ।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि दोनों क्षेत्रों की सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह एक जैसी हो गई।

स्थानीय समाज, ग्राम व्यवस्था और भौगोलिक परिस्थितियाँ अपनी विशिष्टता बनाए रहे।


गोरखा शासन में भूमि और राजस्व

गढ़वाल में भी गोरखा शासन ने भूमि और राजस्व व्यवस्था को संगठित किया।

भूमि का बंदोबस्त कराया गया और राजस्व निर्धारण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

इससे स्पष्ट है कि गोरखा शासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक थी—

विजित भूमि को राजस्व व्यवस्था में बाँधना।

युद्ध से राज्य प्राप्त किया जा सकता था, लेकिन राज्य चलाने के लिए नियमित आय आवश्यक थी।

इसलिए गोरखा प्रशासन ने भूमि को राजस्व की दृष्टि से व्यवस्थित किया।

यही कारण है कि गोरखा काल का अध्ययन करते समय भूमि-बंदोबस्त को समझना उतना ही आवश्यक है जितना कि युद्धों को।

गोरखाकालीन राजस्व प्रणाली के प्रमुख कर

क्र.सं.कर का नामसंक्षिप्त विवरण
                1कुशही                               ब्राह्मण कृषकों पर कर
2मौकर/घरही-पिछहीप्रति परिवार 2 रुपये
3तनाकर                                हिंदू व भोटिया बुनकरों पर कर
4पुंगाड़ीभूमिकर
5सलामीनजराना
6टीका भेंटविवाह एवं शुभ अवसरों पर कर
7तिमारीफौजदार से 4 आने, सूबेदार से 2 आने
8पगड़ीभूमि-संपत्ति हस्तांतरण पर कर
9माँगानौजवानों से 1 रुपया; युद्धकाल में अतिरिक्त कर
10सुवांगी दस्तूरप्रति बीसी भूमि 1 रुपया
11मेजबानी दस्तूरढाई आने; चौथ के समान
12सौन्या-फागुनत्योहारों पर खर्च व पशु-उपहार
13मिझारीशिल्पकारों व जागरिया ब्राह्मणों पर कर
14मरौपुत्रहीन व्यक्ति पर कर
15रहतागाँव छोड़कर भागने वालों पर कर
16बहताछिपाई गई संपत्ति पर कर
17घीकरदुधारू पशुओं के मालिकों पर कर
18अधनी दफ्तरीराजस्व कर्मचारियों के वेतन हेतु कर
19जान्या-सुन्यालगान संबंधी पूछताछ पर कर
20दोनियापहाड़ी पशुचारकों पर कर

अन्य कर: केरू, खुना, अड़ि, घररू, कल्याण धन, वक्ष्यात, गोबर और पुछिया आदि।


विशेष उल्लेख: विवरणों में महिलाओं के छत पर जाने तक पर कर लगाए जाने का उल्लेख मिलता है।


गोरखा विस्तार और अंग्रेजों से टकराव

गोरखा शक्ति लगातार विस्तार कर रही थी।

लेकिन जैसे-जैसे उसका प्रभाव बढ़ा, उसकी सीमाएँ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव क्षेत्र से टकराने लगीं।

सीमा विवाद और क्षेत्रीय विस्तार के प्रश्न धीरे-धीरे गंभीर होते गए।

अंततः 1814 में अंग्रेज-नेपाल युद्ध शुरू हुआ।

अब गोरखा सेना को एक नई शक्ति का सामना करना था।

युद्ध का प्रभाव उत्तराखण्ड पर भी पड़ा।

कुमाऊँ और गढ़वाल इस संघर्ष के महत्वपूर्ण क्षेत्र बने।


1815 : कुमाऊँ में गोरखा शासन का अंत

अंग्रेजी सेना ने कुमाऊँ की ओर अभियान किया।

गोरखा सेना ने प्रतिरोध किया, लेकिन परिस्थितियाँ उसके अनुकूल नहीं थीं।

अंततः अल्मोड़ा गोरखा सत्ता का प्रमुख केंद्र बना।

1815 में अंग्रेजी सेना ने अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया।

इसके साथ कुमाऊँ में लगभग पच्चीस वर्षों से चला आ रहा गोरखा शासन समाप्त हो गया।

जिस शासन की शुरुआत 1790 में हुई थी, उसका अंत 1815 में हुआ।


सैणमानुर की सनदें : गोरख्याली की स्थानीय दस्तावेजी आवाज

गोरखा शासन की व्यापक कहानी को समझने के लिए राजकीय इतिहास महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थानीय दस्तावेज उससे भी अधिक जीवंत तस्वीर सामने ला सकते हैं।

पश्चिमी रामगंगा क्षेत्र के सल्ट-मानिला स्थित सैणमानुर गाँव से प्राप्त गोरखाकालीन हस्तलिखित सनदें इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

इन सनदों में संवत् 1857 अर्थात् 1800 ई. से संवत् 1872 अर्थात् 1815 ई. तक विभिन्न अधिकारियों का तिथिवार उल्लेख मिलता है।

इनमें—

  • काजी धौंकल सिंह,
  • सूबेदार कृपासिंधु थापा,
  • विचारी रामू राणा,
  • सूबेदार नर भजन शाह,
  • चौतरिया बड़ा बम शाह,
  • काजी चामू भण्डारी,
  • सरदार सरवर सिंह राणा,
  • जमादार गजदल थापा,
  • काजी वीरभद्र सिंह,
  • काजी रेवंत सिंह कुंवर,
  • सुब्बा कर्ण सिंह कुंवर,
  • डिठा जानकी राम,
  • कृष्णानंद,
  • अमर सिंह बसन्यात,
  • हंसराज खल्ट दवथरी,
  • जमादार मछेराम,
  • सुबेदार गजदल खंडका,
  • फौजदार रामचन्द्र परसाई आदि नाम मिलते हैं।

और फिर—

संवत् 1872 अर्थात् 1815 ई. — फ्रेजर साहब बहादुर।

यह अंतिम प्रविष्टि विशेष रूप से ध्यान खींचती है।

क्योंकि यह केवल किसी अधिकारी का नाम नहीं है।

यह मानो एक शासन के समाप्त होने और दूसरे शासन के आरंभ होने के बीच खींची गई ऐतिहासिक रेखा है।


1815 : गोरखा से अंग्रेजी सत्ता की ओर

गोरखा शासन की समाप्ति के बाद कुमाऊँ और पूर्वी गढ़वाल अंग्रेजी सत्ता के अधीन आ गए।

1815–16 की सुगौली संधि ने नेपाल की पश्चिमी सीमा और उसके अधिकार क्षेत्रों को पुनः निर्धारित किया।

इसके परिणामस्वरूप कुमाऊँ तथा पूर्वी गढ़वाल ब्रिटिश शासन के अधीन आए, जबकि पश्चिमी गढ़वाल का एक भाग बाद में गढ़वाल के शासक वंश को वापस मिला और वहाँ टिहरी गढ़वाल राज्य का विकास हुआ।

इस प्रकार उत्तराखण्ड का राजनीतिक मानचित्र एक बार फिर बदल गया।


पच्चीस वर्षों में तीन सत्ताएँ

यदि 1790 से 1815 तक के काल को एक ही दृष्टि में देखें तो इतिहास की तस्वीर अत्यंत स्पष्ट हो जाती है।

1790 — चंद सत्ता का अंत

कुमाऊँ गोरखाओं के अधीन आया।

1804 — पंवार सत्ता का पतन

गढ़वाल में गोरखा अधिकार स्थापित हुआ।

1815 — गोरखा सत्ता का अंत

कुमाऊँ और पूर्वी गढ़वाल अंग्रेजी शासन के अधीन आए।

अर्थात् एक ही पीढ़ी के भीतर हिमालय ने तीन राजनीतिक व्यवस्थाओं का अनुभव किया—

चंद → गोरखा → अंग्रेज


लेकिन इतिहास यहीं समाप्त नहीं होता

राजसत्ता बदलती रही।

लेकिन गाँव बने रहे।

नदियाँ बहती रहीं।

मंदिरों में पूजा होती रही।

खेती चलती रही।

और लोकस्मृति ने हर युग को अपनी तरह से याद रखा।

यही कारण है कि आज जब हम उत्तराखण्ड के इतिहास में गोरखा शासन को देखते हैं तो हमें केवल युद्धों की सूची नहीं मिलती।

हमें मिलते हैं—

सुब्बाओं के नाम,
भूमि-बंदोबस्त के विवरण,
सनदें,
राजस्व व्यवस्था,
लोकस्मृतियाँ,
गोरख्याली की कहानियाँ
और सत्ता परिवर्तन के जीवित प्रमाण।


निष्कर्ष : गोरख्याली—इतिहास का एक निर्णायक मोड़

उत्तराखण्ड में गोरखा शासन लगभग पच्चीस वर्षों का था, लेकिन उसका प्रभाव इतिहास में उससे कहीं अधिक गहरा है।

1790 में कुमाऊँ की चंद सत्ता का अंत हुआ।

गोरखा प्रशासन ने सुब्बा व्यवस्था स्थापित की और भूमि-बंदोबस्त के माध्यम से राजस्व व्यवस्था को संगठित किया।

1791 में गढ़वाल पर पहला बड़ा अभियान हुआ, जो तत्काल स्थायी विजय में नहीं बदल सका।

1792 की श्रीनगर संधि ने कुछ समय के लिए गोरखा-गढ़वाल संबंधों को एक समझौते का रूप दिया।

लेकिन परिस्थितियाँ बदलीं।

1803 के भूकंप और उसके बाद के गोरखा आक्रमण ने गढ़वाल को गंभीर संकट में डाल दिया।

1804 के खुड़बुड़ा युद्ध में राजा प्रद्युम्नशाह की मृत्यु के बाद गोरखाओं ने गढ़वाल पर अधिकार स्थापित किया।

और अंततः—

1814–15 के अंग्रेज-नेपाल युद्ध ने गोरखा सत्ता की नींव हिला दी।

1815 में कुमाऊँ में गोरखा शासन समाप्त हुआ और हिमालय में अंग्रेजी सत्ता का नया अध्याय शुरू हुआ।

इस पूरे काल को केवल विजेताओं और पराजितों की दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं है।

क्योंकि इतिहास की असली धड़कन उन लोगों में होती है, जिन्होंने इन परिवर्तनों को अपनी आँखों से देखा और अपने जीवन में झेला।

इसीलिए—

गोरख्याली केवल एक शासनकाल का नाम नहीं,
उत्तराखण्ड की सामूहिक स्मृति में दर्ज एक पूरा युग है।

एक ऐसा युग जिसमें राजसत्ताएँ बदलीं, सीमाएँ बदलीं, भूमि का हिसाब बदला, अधिकारी बदले—लेकिन हिमालय की धरती ने सब कुछ अपनी स्मृति में सँजो लिया।

और शायद यही उत्तराखण्ड के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता है—

सत्ता बदलती रही, लेकिन हिमालय इतिहास का साक्षी बना रहा।


संदर्भ एवं स्रोत

मूल स्रोत

  1. रावत, अ. स. — उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास, 2021।

  2. जोशी, घ. — उत्तराखण्ड का राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, 2017।

  3. पाण्डे, बद्रीदत्त — कुमाऊँ का इतिहास, 1937।

  4. सैणमानुर, सल्ट-मानिला से प्राप्त गोरखाकालीन हस्तलिखित सनदें।

  5. स्थानीय अभिलेखीय एवं मौखिक परंपराएँ।

अतिरिक्त ऐतिहासिक सामग्री

  • गोरखा प्रशासन और कुमाऊँ में सुब्बा व्यवस्था से संबंधित ऐतिहासिक अध्ययन।

  • कुमाऊँ के गोरखा भूमि-बंदोबस्त एवं राजस्व व्यवस्था संबंधी सामग्री।

  • गढ़वाल में गोरखा आक्रमण और लंगूरगढ़ संघर्ष संबंधी ऐतिहासिक विवरण।

  • 1804 के खुड़बुड़ा युद्ध और राजा प्रद्युम्नशाह की मृत्यु संबंधी विवरण।

  • 1814–15 के अंग्रेज-नेपाल युद्ध तथा सुगौली संधि संबंधी ऐतिहासिक सामग्री। 

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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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