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यह लेख "उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक काल" शोध-श्रृंखला का भाग-13 है। यदि आपने इस श्रृंखला के पिछले लेख नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें पहले अवश्य पढ़ें। इससे इस लेख में वर्णित पुरातात्त्विक स्थलों, सांस्कृतिक विकास तथा शोध निष्कर्षों को समझना अधिक सरल और रोचक होगा।
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-भाग-12 पश्चिमी रामगंगा घाटी में गोरखा शासन : किलों से कचहरी तक, न्याय-व्यवस्था, कठोर दण्ड और कर-नीति
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भूमिका : विकास के पीछे छिपा औपनिवेशिक शोषण
ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तराखण्ड में सड़क, डाकबंगले, प्रशासनिक केन्द्र और यातायात जैसी व्यवस्थाओं के विकास के प्रयास हुए, लेकिन इन कार्यों से अंग्रेजी शासन स्थानीय जनता के बीच लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका प्रमुख कारण था—विकास के साथ जुड़ा व्यापक शोषण और औपनिवेशिक दमन।
ब्रिटिश शासन की कठोर नीतियों ने पर्वतीय समाज में असंतोष की ऐसी जमीन तैयार की, जिस पर आगे चलकर स्वतंत्रता आन्दोलन की मजबूत नींव पड़ी। देश में उठ रही राष्ट्रीय चेतना की लहर से उत्तराखण्ड भी अछूता नहीं रहा। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, 1857 के विद्रोह से ही कालूमहरा के नेतृत्व में उत्तराखण्ड में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रारम्भ माना गया है।
समय के साथ इस प्रतिरोध को आगे बढ़ाने वालों की लंबी श्रृंखला सामने आई। गोविन्द बल्लभ पंत, हरगोविन्द पंत, मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचन्द्र, बद्रीदत्त पाण्डे, श्रीदेव सुमन, ज्योतिराम काण्डपाल, इन्द्र सिंह नयाल, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा और भैरव दत्त जोशी जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित किया। इनमें से अनेक नेता गाँव-गाँव और क्षेत्र-क्षेत्र घूमकर युवाओं में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना जागृत कर रहे थे।
सन् 1920 के असहयोग आन्दोलन से लेकर 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन तक उत्तराखण्ड की जनता ने राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी की। गांधीजी के आह्वान पर गोविन्द बल्लभ पंत के नेतृत्व में घाटी में बड़ी संख्या में लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।
कुली बेगार : वह व्यवस्था जिसने पहाड़ के आत्मसम्मान को चुनौती दी
उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता आन्दोलन को समझने के लिए कुली बेगार व्यवस्था को समझना अत्यंत आवश्यक है।
कुमाऊँ में ब्रिटिश अधिकारियों के आने और बसने के बाद पहाड़ी भूगोल के कारण यातायात एक बड़ी समस्या थी। अधिकारियों को दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर डोली में ले जाया जाता था। उनके सामान को ढोने तथा विभिन्न सेवा कार्यों के लिए स्थानीय लोगों से बिना पारिश्रमिक श्रम लिया जाता था।
इसी व्यवस्था के तीन प्रमुख रूप थे—
कुली उतार, कुली बर्दाश और कुली बेगार।
- कुली उतार: ग्रामीणों को रास्तों पर उतार कर अंग्रेज अधिकारियों का समान एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना पारिश्रमिक दिए पहुंचाने को बाध्य करना।
- कुली बर्दाश: अंग्रेज अधिकारियों या उनके मेहमानों के ठहरने पर उनके भोजन और ईंधन की निःशुल्क व्यवस्था करना।
- कुली बेगार: बिना पारिश्रमिक दिए जबरन श्रम करवाना अथवा समान ढुलवाना।
अंग्रेज प्रशासन ने लोगों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बेगार रजिस्टर तक बनाए थे। ग्रामीणों को अपना काम छोड़कर अंग्रेज अधिकारियों के भारी सामान को दूर-दूर तक ढोना पड़ता था और इसके बदले उन्हें कोई मेहनताना नहीं मिलता था।
धीरे-धीरे यह व्यवस्था केवल आर्थिक शोषण का प्रश्न नहीं रही। यह ग्रामीण समाज के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना से जुड़ गई।
और फिर उत्तराखण्ड ने इसका संगठित प्रतिरोध किया।
14 जनवरी 1921 : सरयू में बहा बेगार का रजिस्टर
14 जनवरी 1921।
मकर संक्रान्ति का दिन।
बागेश्वर का प्रसिद्ध उतरायणी मेला।
सरयू बगड़ में एक विशाल जनसभा आयोजित हुई। इसके पीछे नेतृत्व था—बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत और विक्टर मोहन जोशी का।
सभा में जनता ने अंग्रेजों के लिए किसी भी प्रकार का बेगार और डोली-पालकी व्यवस्था न करने का संकल्प लिया।
लेकिन इस संकल्प को इतिहास में अमर बनाने वाला दृश्य अभी बाकी था।
कुमाऊँ क्षेत्र के विभिन्न गाँवों के कुली बेगार रजिस्टरों को सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया गया।
सरयू की धारा में बहते वे रजिस्टर औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध जनप्रतिरोध के प्रतीक बन गए। इस आन्दोलन की सफलता ने जनता में नई ऊर्जा पैदा की, जबकि अंग्रेज प्रशासन इससे अत्यधिक क्रुद्ध हुआ।
सल्ट में अंग्रेजों को मिली खाली वापसी
कुली बेगार आन्दोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने कार्रवाई तेज की। रानीखेत के एस.डी.एम. हबीबुर्रहमान को सल्ट की चार पट्टियों और पौड़ी की गुजुड़पट्टी में बेगार वसूलने भेजा गया।
लेकिन अंग्रेज अधिकारी सल्ट पहुँचते, उससे पहले ही हरगोविन्द पंत वहाँ पहुँच चुके थे।
उन्होंने खुमाण के सरकारी विद्यालय के शिक्षक पुरुषोत्तम उपाध्याय, लक्ष्मण सिंह अधिकारी और पान सिंह पटवाल के साथ मिलकर व्यापक जनसम्पर्क किया और ग्रामीणों को समझाया कि सरकार को बेगार न दिया जाए।
जनता संगठित हो चुकी थी। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज अधिकारियों को खाली हाथ लौटना पड़ा।
यह घटना बताती है कि पर्वतीय क्षेत्रों में राष्ट्रीय आन्दोलन केवल शहरों तक सीमित नहीं था। यहाँ गाँव स्वयं राजनीतिक चेतना के केन्द्र बन रहे थे।
पुरुषोत्तम उपाध्याय : एक शिक्षक का घर बना आन्दोलन का केन्द्र
खुमाण निवासी पुरुषोत्तम उपाध्याय का घर स्वतंत्रता आन्दोलन की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया था।
वहाँ अक्सर बैठकें होती थीं और राष्ट्रीय आन्दोलन से संबंधित रणनीतियाँ तैयार की जाती थीं। देशसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी।
सन् 1929 में गांधीजी के कुमाऊँ आगमन के दौरान 16 जून को प्रेम विद्यालय, ताड़ीखेत में आयोजित वार्षिकोत्सव में उन्होंने अपने साथियों के साथ गांधीजी से भेंट की। इसके बाद वे गांधीजी के संपर्क में बने रहे और 31 दिसम्बर 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में भी भाग लिया।
चौकोट पट्टी के रूद्र सिंह बिष्ट सहित क्षेत्र के अनेक लोगों ने कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों में भाग लेकर राष्ट्रीय आन्दोलन से अपना संबंध मजबूत किया।
दांडी मार्च की गूँज रामगंगा घाटी तक
गांधीजी के दांडी मार्च का प्रभाव उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में भी दिखाई दिया।
सन् 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान सल्ट क्षेत्र के उभरी, चमकना और हटुली गाँवों में नमक बनाकर नमक कानून का विरोध किया गया।
उत्तराखण्ड से तीन सत्याग्रहियों ने दांडी यात्रा में भाग लिया—
ज्योतिराम काण्डपाल
खड़क बहादुर
भैरव दत्त जोशी
इनमें ज्योतिराम काण्डपाल और भैरव दत्त जोशी दोनों रामगंगा घाटी की बिचला चौकोट पट्टी से संबंधित थे।
यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि रामगंगा घाटी का स्थानीय संघर्ष राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की व्यापक धारा से जुड़ा हुआ था।
ज्योतिराम काण्डपाल : खादी और जनसेवा के माध्यम से स्वराज की साधना
दांडी यात्रा से लौटने के बाद ज्योतिराम काण्डपाल ने देघाट में खादी के प्रचार-प्रसार के लिए उद्योग मंदिर की स्थापना की।
यह केवल खादी उत्पादन का केन्द्र नहीं था। जनकल्याण को ध्यान में रखते हुए वहाँ रोगियों के उपचार के लिए औषधालय भी स्थापित किया गया।
लेकिन ब्रिटिश सरकार ने सन् 1932 में देघाट उद्योग मंदिर को जब्त कर लिया।
फिर भी काण्डपाल जी का सेवा-भाव समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने मासी के समीप सुतनिया नामक स्थान पर निजी औषधालय खोलकर रोगियों की सेवा जारी रखी।
देशसेवा और समाजसेवा करते हुए सन् 1938 में उनका निधन हुआ, लेकिन वे अपने पीछे देशभक्तों की एक लंबी परम्परा छोड़ गए।
1942 : भारत छोड़ो आन्दोलन और उत्तराखण्ड
सन् 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया।
8 अगस्त 1942 को राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में भी विरोध प्रदर्शन तेज हुए।
इस आन्दोलन के दौरान देघाट और सल्ट क्षेत्र ने जो कीमत चुकाई, वह उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता इतिहास का अत्यंत मार्मिक अध्याय है।
देघाट गोलीकाण्ड : शांतिपूर्ण जुलूस पर चलीं गोलियाँ
मल्लाचौकोट पट्टी के देघाट में जनता शांतिपूर्ण जुलूस निकाल रही थी।
लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने इस जुलूस पर गोलियाँ चला दीं।
इस गोलीकाण्ड में हीरामणी और हरिकृष्ण उप्रेती शहीद हो गए।
देघाट की घटना के बाद अंग्रेज प्रशासन ने क्षेत्र में अपना दमन और अधिक बढ़ा दिया।
रानीखेत तहसील का एस.डी.एम. जॉनसन सैनिकों के साथ चौखुटिया डाकबंगले पहुँचा और वहाँ से नौगाँव, अखोड़िया, गनाई से लेकर मासी तक विभिन्न स्थानों पर छापे मारे तथा अनेक कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया।
लेकिन संघर्ष थमा नहीं।
रणसिंह की आवाज और खुमाण की ओर बढ़ती अंग्रेजी सेना
जब जॉनसन सल्ट की ओर बढ़ा तो पिपना गाँव के बिड़देव ने रणसिंह बजाकर लोगों को सतर्क किया।
इसी दौरान स्वतंत्रता सेनानी लालमणी ने अंग्रेजी सेना का विरोध किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
जॉनसन जब खुमाण पहुँचा तो उसका उद्देश्य आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार करना था। लेकिन गोविन्द ध्यानी के नेतृत्व में युवकों ने इसका कड़ा विरोध किया।
और फिर इतिहास का एक रक्तरंजित अध्याय सामने आया।
5 सितम्बर 1942 : खुमाण गोलीकाण्ड
5 सितम्बर 1942।
सल्ट क्षेत्र में कांग्रेस का प्रमुख केन्द्र—खुमाण।
अंग्रेज प्रशासन और आन्दोलनकारियों के बीच तनाव बढ़ चुका था। जॉनसन ने निहत्थी जनता पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।
देघाट की तरह खुमाण की धरती भी गोलियों से गूँज उठी।
इस गोलीकाण्ड में गंगादत्त और खीमदेव, दो सगे भाई, घटनास्थल पर ही शहीद हो गए। चूड़ामणी और बहादुर सिंह मेहरा ने उपचार के दौरान, घटना के चौथे दिन, प्राण त्याग दिए।
इसके अतिरिक्त गंगादत्त शास्त्री, गोपाल सिंह, गोपाल दत्त, मधुसूदन, रूपदेव, नारायण सिंह और बचे सिंह सहित अनेक आन्दोलनकारी घायल हुए।
इस घटना को इतिहास में ‘खुमाण गोलीकाण्ड’ के नाम से जाना गया।
रानीखेत अदालत में इसी नाम से मुकदमा दर्ज हुआ और सल्ट के क्रांतिकारियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। लक्ष्मण सिंह अधिकारी, प्रेमबल्लभ उपाध्याय, रघुवर दत्त उपाध्याय, किशनानन्द उपाध्याय, मथुरा दत्त, अम्बा दत्त, खुशाल सिंह, नैनमणी उपाध्याय, तारा दत्त और हरि दत्त वैद्य जैसे प्रमुख सेनानियों को बिना अदालत में पेश किए डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।
क्षेत्रवासियों के देशप्रेम और बलिदान की गांधीजी ने प्रशंसा की और इस संघर्ष को ‘कुमाऊँ की बारदोली’ की संज्ञा दी।
गेवाड़घाटी : क्रांतिकारी चेतना का एक और केन्द्र
उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता आन्दोलन में गेवाड़घाटी की भूमिका भी उल्लेखनीय रही।
गेवाड़घाटी में आन्दोलन की कमान दोरा पट्टी, द्वाराहाट के क्रांतिकारी नेता मदनमोहन उपाध्याय के हाथों में रही।
ब्रिटिश सरकार उनसे इतनी भयभीत थी कि उन्हें जीवित अथवा मृत पकड़ने पर 5000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था। फिर भी अंग्रेज उन्हें पकड़ने में सफल नहीं हुए। एक अवसर पर मासी क्षेत्र के पटवारी ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन वे पटवारी को ही बन्धक बनाकर वहाँ से निकल गए।
इस क्षेत्र के अनेक लोगों ने जेल की यातनाएँ भी सहीं। बुद्धि सिंह बिष्ट को छह वर्ष तीन माह तक कारावास की यातनाएँ झेलनी पड़ीं। वे मंडल कांग्रेस के अध्यक्ष, कांग्रेस सेवा दल के सदस्य तथा जिला एवं प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सक्रिय सदस्य रहे। भारत कृषक समाज से भी उनका आजीवन संबंध रहा।
इसी प्रकार आदिग्राम के ईश्वरी दत्त फुलोरिया स्वतंत्रता आन्दोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे और उनका योगदान भी उल्लेखनीय रहा।
गाँवों की धरती पर फैला स्वतंत्रता आन्दोलन
स्वतंत्रता संग्राम को केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं के नामों से समझना पर्याप्त नहीं है। उत्तराखण्ड की वास्तविक कहानी उन असंख्य ग्रामीण सेनानियों में भी छिपी है जिन्होंने अपने-अपने गाँवों से इस आन्दोलन को शक्ति दी।
उपलब्ध स्रोतों में गेवाड़, सल्ट और चौकोट पट्टियों के अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का विवरण मिलता है। इनमें मासी, खनूली, आदिग्राम फुलोरिया, थापला, कनौड़ी, काला चौना, कनगाड़, पटलगाँव, चौखुटिया, नागाड़, बसभीड़ा, महतगाँव, उडलीखान, बरलगाँव, महाकालेश्वर, जमराड़, पीपलधार, रामपुर, बेरती-चित्रेश्वर, बौनीगाड़, बाखली, हाट-धामदेवल, ग्वैलचैड़ा और धुधलिया आदि क्षेत्रों के सेनानी शामिल हैं।
चौकोट क्षेत्र में ज्योतिराम काण्डपाल, भैरव दत्त जोशी, रूद्र सिंह बिष्ट, जंग बहादुर सिंह बिष्ट, बचन सिंह रावत, जसवन्त सिंह बिष्ट, दुर्गा सिंह बिष्ट और खुशाल सिंह मनराल जैसे नाम सामने आते हैं।
देघाट-स्याल्दे क्षेत्र में हरीकृष्ण, हीरामणी, कुशल सिंह, खिमानन्द, गंगा सिंह, चिंतामणी, देवी दत्त, दिवान सिंह, नन्दकिशोर, प्रेम सिंह, बचे सिंह, बद्री दत्त, भगत सिंह, राम दत्त, राधा देवी, लक्ष्मण सिंह तथा हर्षदेव आदि के नाम मिलते हैं।
सल्ट के खुमाड़ क्षेत्र से पुरुषोत्तम उपाध्याय, रघुवर दत्त उपाध्याय, गंगा राम उपाध्याय, पान देव उपाध्याय, भवानी दत्त उपाध्याय, पूर्णानन्द उपाध्याय, हरि दत्त वैद्य, लालमणी उपाध्याय, हयात सिंह भण्डारी, खीम सिंह भण्डारी, देवी दत्त काण्डपाल, नीलाम्बर नदोलिया, दीवान सिंह महरा, नारायण दत्त उपाध्याय (कालदेव), गोपाल सिंह बोरा, केशव दत्त उपाध्याय, हीरामणी उपाध्याय, माधवानन्द उपाध्याय, बद्री दत्त शर्मा, नन्दराम नखुड़िया, लीलाधर काण्डपाल, नन्दराम उपाध्याय, खीमदेव काण्डपाल, मनशोधन कोटिया, रूपदेव जोशी, नैनमणी उपाध्याय और उदे सिंह जैसे अनेक सेनानियों का उल्लेख मिलता है।
इसी प्रकार कटरिया, कफल्टा, पिपना, सिलोर, जंतरा, चमकना, जामड़ी, डभरा, डंगूला, भ्याड़ी, बैला, पोखरी और छतेड़ आदि स्थानों के भी अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के नाम स्रोत में दर्ज हैं।
इन नामों की लंबी सूची हमें यह समझने में सहायता करती है कि स्वतंत्रता आन्दोलन किसी एक नगर, एक नेता या एक संगठन की गतिविधि नहीं था। यह गाँवों की सामूहिक राजनीतिक चेतना में गहराई तक उतर चुका था।
आदिग्राम फुलोरिया : एक गाँव, अनेक सेनानी और कारावास की पीड़ा
रामगंगा नदी के दाहिने तट पर स्थित आदिग्राम फुलोरिया स्वतंत्रता आन्दोलन की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
यहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों का विवरण-
ईश्वरीदत्त फुलोरिया
त्रिलोचन फुलोरिया
रामदत्त फुलोरिया
देवीदत्त फुलोरिया
विष्णुदत्त फुलोरिया
ईश्वरीदत्त फुलोरिया
रामदत्त फुलोरिया
इन विवरणों से स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने की कीमत केवल जेल नहीं थी। अनेक परिवारों को आर्थिक दण्ड, सामाजिक कठिनाइयों और वर्षों के कारावास का सामना करना पड़ा।
उपसंहार : स्वतंत्रता की कीमत पहाड़ ने भी चुकाई थी
उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास केवल राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रतिध्वनि नहीं था। यह अपनी विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों से निर्मित जनप्रतिरोध की स्वतंत्र ऐतिहासिक धारा भी था।
अंततः 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। इस स्वतंत्रता के पीछे उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों का योगदान था, जिन्होंने न जेल से डरकर पीछे हटे और न ही यातनाओं से। इस इतिहास की स्मृति आज भी जीवित है।
5 सितम्बर 1947 को पहली बार खुमाण में शहीद दिवस मनाया गया और वर्तमान में भी प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को वहाँ शहीद दिवस तथा मेले का आयोजन किया जाता है।
इतिहास हमें यही बताता है—
स्रोत
बिष्ट, न. (2015) एवं देघाट सूचनापट; तथा स्रोत सामग्री में उल्लिखित मनराल एवं मित्तल (2010)।
संदर्भ
बदरीदत्त पांडे — कुमाऊँ का इतिहास, 1937।
शेखर पाठक — उत्तराखण्ड में कुली बेगार प्रथा, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1987।
शेखर पाठक — A Study of Social Movements in Uttarakhand, 1982।
उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित स्थानीय ऐतिहासिक अभिलेख एवं प्रकाशित सामग्री।
श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय की पाठ्य-सामग्री।
उत्तरायणी मेला, बागेश्वर से संबंधित सरकारी/ऐतिहासिक अभिलेख।
