पश्चिमी रामगंगा घाटी : ताम्रपत्रों, मंदिरों और लोकस्मृतियों में जीवित चंदकालीन इतिहास

रुद्रचन्द से उद्योतचन्द तक सत्ता, संघर्ष, भूमि-अनुदान और सांस्कृतिक विरासत की रोचक यात्रा

पश्चिमी रामगंगा की धारा आज भी पहाड़ों के बीच अपनी पुरानी लय में बहती है। उसके किनारे बसे गाँव शायद बदल गए हों, रास्ते बदल गए हों, राजसत्ताएँ बदल गई हों—लेकिन इस घाटी की धरती ने इतिहास की अनेक स्मृतियों को अब भी अपने भीतर सँभाल रखा है।

कहीं एक प्राचीन मंदिर के गर्भगृह में सदियों पुरानी शिला आज भी पूजी जाती है, कहीं किसी परिवार के पास तांबे की पट्टिका सुरक्षित है, तो कहीं किसी गाँव का नाम सदियों पुराने राजकीय अनुदान की स्मृति को जीवित रखता है।

और सबसे रोचक बात यह है कि इन कथाओं में राजा भी हैं, युद्ध भी हैं, मंदिर भी हैं, ताम्रपत्र भी हैं और लोकविश्वास भी।

पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास इसी बहुरंगी संसार को जोड़कर समझा जा सकता है।


ताम्रपत्र : जब राजा की आवाज तांबे पर दर्ज हुई

मध्यकालीन कुमाऊँ के इतिहास को समझने में ताम्रपत्रों का विशेष महत्व है। ये केवल राजकीय आदेश या भूमि-अनुदान के दस्तावेज नहीं थे, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

अभिलेखीय स्रोतों के आधार पर भीष्मचन्द के बाद क्रमशः बालो कल्याणचन्द, रामचन्द, कल्याणचन्द और रुद्रचन्द जैसे शासकों का उल्लेख मिलता है।

रुद्रचन्द का शासनकाल 1565 से 1597 ई. माना जाता है।

राजा रुद्रचन्द के समय ही पश्चिमी रामगंगा के तट पर स्थित अफौं गाँव के वृद्धकेदार मंदिर का इतिहास चंद राजसत्ता से जुड़ता है।

मंदिर से संबंधित ताम्रपत्र पर शाके 1490 अर्थात् 1568 ई. की तिथि अंकित है। इसमें मंदिर के नाम गूंठ प्रदान किए जाने का उल्लेख मिलता है।

यह तिथि विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह रुद्रचन्द के शासन के आरंभिक वर्षों से संबंधित है।

लेकिन इस ताम्रपत्र के पीछे एक ऐसी लोककथा भी प्रचलित है, जो इस इतिहास को बेहद रोचक बना देती है।


वृद्धकेदार : एक स्वप्न, एक शिला और एक मंदिर

अल्मोड़ा जनपद के मासी-भिकियासैंण मोटर मार्ग के मध्य, पश्चिमी रामगंगा नदी के दाहिने तट पर स्थित वृद्धकेदार शिव मंदिर आज भी क्षेत्रीय जनमानस में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है।

यह मंदिर तल्ला चौकोट पट्टी के अंतर्गत स्याल्दे क्षेत्र के अफौं (केदार) गाँव में स्थित है तथा रामगंगा और विनो नदी के संगम के उत्तर में अवस्थित है।

यह मंदिर लगभग 29°47'03" उत्तरी अक्षांश और 79°14'23" पूर्वी देशांतर के मध्य तथा समुद्र तल से लगभग 852 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

मंदिर की स्थापना चंदवंशी राजा रुद्रचन्द से जोड़ी जाती है, लेकिन इसकी स्थापना की लोककथा इतिहास से भी अधिक रहस्यमय है।


जब राजा को स्वप्न में मिले महादेव

क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार एक समय राजा रुद्रचन्द का पुत्र एक गंभीर और असाध्य रोग से पीड़ित हो गया।

राजा ने अपने समय के कुशल वैद्यों से उसका उपचार कराया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ।

पुत्र की बीमारी से राजा अत्यंत दुखी था।

इसी दौरान एक रात उसे स्वप्न में भगवान शिव के दर्शन हुए।

लोककथा के अनुसार भगवान शिव ने राजा को बताया कि रामगंगा नदी के तट से कुछ ऊपर एक स्थान पर उनका शिलारूपी धड़ धरती में दबा हुआ है।

राजा को स्वप्न में वह स्थान दिखाई भी दिया।

प्रातःकाल राजा ने अपने सभासदों को स्वप्न के बारे में बताया।

सभी ने उस स्थान की खोज करने और वहाँ मंदिर स्थापित करने की सलाह दी।

राजा ने तत्काल खोज शुरू करवाने का आदेश दिया।


धरती के भीतर छिपी रक्तवर्ण शिला

रक्तवर्ण शिवधड़ 

काफी खोजबीन के बाद एक रक्तवर्ण शिला दिखाई दी, जिसका थोड़ा-सा हिस्सा भूमि के ऊपर था।

राजा ने इसे स्वप्न में दिखाई गई शिला से संबंधित माना और उसके चारों ओर खुदाई शुरू करवाई।

लोकपरंपरा के अनुसार खुदाई के दौरान नंदी की दो प्रस्तर प्रतिमाओं सहित अन्य मूर्तियाँ भी प्राप्त हुईं।

लेकिन असली रहस्य अभी बाकी था।

शिला को बाहर निकालने के लिए जितनी खुदाई की जाती, जमीन उतनी ही नीचे जाती चली जाती।

शिला का निचला भाग फिर भी दिखाई नहीं देता था।

खुदाई करते-करते जब रामगंगा नदी का तट सामने आ गया, तब राजा के साथ उपस्थित अनुभवी ज्योतिषियों और सभासदों ने सुझाव दिया कि अब शिला को निकालने का प्रयास छोड़कर इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया जाए।

उनका मानना था कि शायद यह भगवान शिव की इच्छा है कि शिला इससे ऊपर न आए।

इसके बाद उसी स्थान पर मंदिर निर्माण आरंभ किया गया।


लोककथा से अभिलेख तक

राजा रुद्र चंद द्वारा जारी ताम्रपत्र। 

परंपरा के अनुसार मंदिर निर्माण के बाद राजा का पुत्र स्वस्थ हो गया।

राजा इस घटना से अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने मंदिर के आसपास की भूमि मंदिर के नाम गूंठ के रूप में प्रदान कर दी।

यहीं पर इतिहास और लोकपरंपरा एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

राजा के स्वप्न और राजकुमार के स्वस्थ होने की कथा स्थानीय लोकविश्वास है।

लेकिन मंदिर के नाम गूंठ दिए जाने का 1568 ई. का ताम्रपत्र एक अभिलेखीय साक्ष्य है।

इसलिए दोनों को अलग-अलग स्तर पर समझना आवश्यक है।

लोककथा हमें बताती है कि स्थानीय समाज मंदिर की उत्पत्ति को किस प्रकार याद रखता है, जबकि ताम्रपत्र हमें यह प्रमाण देता है कि चंद राजसत्ता द्वारा मंदिर को भूमि-अनुदान दिया गया था।


वृद्धकेदार मंदिर की सामाजिक व्यवस्था

मंदिर की स्थापना के बाद इसकी पूजा एवं व्यवस्था के लिए विशिष्ट सामाजिक जिम्मेदारियाँ निर्धारित किए जाने की परंपरा रही।

मंदिर से प्राप्त स्रोतों के अनुसार सल्ट के डुंगरियाल ब्राह्मणों को मंदिर में पूजा आदि सेवाकार्यों का अधिकार प्रदान किया गया।

मंदिर के उचित प्रबंधन एवं रख-रखाव का दायित्व मनराल समुदाय के लोगों को सौंपा गया।

आज भी दोनों परंपराओं के निरंतर बने रहने का उल्लेख मिलता है।

इससे स्पष्ट होता है कि मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, वह एक ऐसी संस्था थी जिसके साथ—

भूमि जुड़ी थी,
राजस्व जुड़ा था,
पुजारी जुड़े थे,
स्थानीय परिवार जुड़े थे
और सामाजिक उत्तरदायित्व जुड़े थे।

यही बात मंदिरों को मध्यकालीन समाज के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।


रुद्रचन्द के बाद : बदलते राजा, जारी रही ताम्रपत्र परंपरा

रुद्रचन्द के बाद क्रमशः लक्ष्मीचन्द, दलीपचन्द, विजयचन्द, त्रिमलचन्द और बाज बहादुरचन्द जैसे शासक आए।

इन शासकों के समय भी भूमि-अनुदान और ताम्रपत्र जारी करने की परंपरा जारी रही।

विशेष रूप से बाज बहादुरचन्द से संबंधित ताम्रपत्र पश्चिमी रामगंगा क्षेत्र के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण है।


1666 ई. : तिमली का ताम्रपत्र

राजा बाज बहादुर चंद द्वारा जारी ताम्रपत्र। 

वर्ष 2019 में क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. चन्द्र सिंह चौहान के नेतृत्व में किए गए सर्वेक्षण के दौरान स्याल्दे विकासखंड के तिमली गाँव निवासी श्री लक्ष्मण सिंह बिष्ट के पास एक महत्वपूर्ण ताम्रपत्र प्राप्त हुआ।

इस पर शाके 1588 अर्थात् 1666 ई. की तिथि अंकित है।

यह ताम्रपत्र चंदवंशी राजा बाज बहादुरचन्द द्वारा जारी किया गया था।

इसमें तिमली के श्री उदा बिष्ट के नाम भूमि-दान किए जाने की घोषणा का उल्लेख मिलता है।

एक छोटी-सी तांबे की पट्टिका हमें तत्कालीन भूमि व्यवस्था की एक बड़ी तस्वीर दिखाती है।

राजा द्वारा किसी व्यक्ति या परिवार को भूमि प्रदान करना केवल अनुदान नहीं था; इसके पीछे राजकीय अधिकार, भूमि-व्यवस्था और स्थानीय समाज के बीच संबंधों की पूरी संरचना थी।

इसलिए तिमली का यह ताम्रपत्र पश्चिमी रामगंगा घाटी के सामाजिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है।


2019 : जब अतीत ने फिर दस्तक दी

वर्ष 2019 का ASI सर्वेक्षण इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसी दौरान वृद्धकेदार से संबंधित शाके 1490 / 1568 ई. का ताम्रपत्र भारतीय पुरातत्व  विभाग के संज्ञान में आया।

अल्मोड़ा जनपद के भिकियासैंण विकासखंड के केदार ग्राम निवासी श्री महेश चन्द्र डुंगरियाल के पास यह ताम्रपत्र प्राप्त हुआ।

यह ताम्रपत्र राजा रुद्रचन्द द्वारा वृद्धकेदार मंदिर के नाम गूंठ प्रदान किए जाने का घोषणापत्र था।

इस प्रकार एक ही पुरातात्विक सर्वेक्षण ने पश्चिमी रामगंगा घाटी के इतिहास की दो अलग-अलग शताब्दियों को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सामने ला दिया—

1568 — रुद्रचन्द और वृद्धकेदार

1666 — बाज बहादुरचन्द और तिमली

यह केवल दो ताम्रपत्रों की कहानी नहीं है।

यह लगभग एक शताब्दी के अंतराल में जारी राजकीय भूमि-अनुदान और स्थानीय समाज के बीच संबंधों की कहानी है।


क्या ये ही अंतिम ताम्रपत्र हैं?

शायद नहीं।

डॉ. वी. डी. एस. नेगी ने कुमाऊँ की भूमि व्यवस्था से संबंधित लगभग 70 चंदवंशी ताम्रपत्रों का विवरण प्रस्तुत किया है (नेगी, व. ड., 1994)।

इससे पता चलता है कि चंदकालीन कुमाऊँ में ताम्रपत्रों के माध्यम से भूमि-अनुदान की परंपरा कितनी व्यापक थी।

और यही प्रश्न पश्चिमी रामगंगा घाटी के संदर्भ में सबसे रोचक बन जाता है—

क्या इस घाटी में अभी और ताम्रपत्र छिपे हुए हैं?

संभव है।

क्योंकि 2019 में प्राप्त अभिलेख इस बात का संकेत देते हैं कि स्थानीय परिवारों और मंदिरों के पास अभी भी ऐसी ऐतिहासिक सामग्री सुरक्षित हो सकती है, जिसकी व्यवस्थित पहचान और अभिलेखीकरण होना बाकी है।


उद्योतचन्द : जब कुमाऊँ को दो दिशाओं से चुनौती मिली

बाज बहादुरचन्द के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र उद्योतचन्द कुमाऊँ की गद्दी पर बैठे।

उनके समय में कुमाऊँ की राजनीतिक परिस्थितियाँ अत्यंत चुनौतीपूर्ण थीं।

कुमाऊँ को लंबे समय से डोटी और गढ़वाल के साथ संघर्षों का सामना करना पड़ रहा था।

उद्योतचन्द के शासनकाल में डोटी के राजा देवपाल ने चम्पावत की ओर से तथा गढ़वाल के पंवार नरेश मेदिनीशाह ने दोरा-दूनागिरी और द्वाराहाट क्षेत्र की ओर से आक्रमण किया।

कुमाऊँ के सामने एक साथ दो दिशाओं से संकट था।

लेकिन उद्योतचन्द ने दोनों मोर्चों का सामना किया और आक्रमणकारियों को अपनी सीमा से बाहर खदेड़ने में सफलता प्राप्त की।

इसके बाद दोरा, चम्पावत, सोर और ब्रह्देव मंडी में छावनियाँ बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।

इसी अभियान के दौरान नागार्जुन क्षेत्र की कथा भी सामने आती है।


नागार्जुन : युद्ध के बीच एक मंदिर का जन्म

पाली पछाऊँ क्षेत्र में स्थित नागार्जुन मंदिर को चंदकालीन धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

यह क्षेत्र का प्रमुख विष्णु मंदिर है और इसकी स्थापना चंद शासनकाल में हुई।

जब उद्योतचन्द पश्चिम दिशा में युद्ध के लिए जा रहे थे, तब उन्होंने अपनी सेना सहित नागार्जुन पर्वत पर रात्रि विश्राम किया।

आज भी उस स्थान को ‘राजाटौ’ नाम से जाना जाता है।

रात में राजा को स्वप्न में देववाणी सुनाई दी।

उसे बताया गया कि घनी झाड़ियों के मध्य भगवान श्री विष्णु की प्रतिमा स्थित है।

यदि वहाँ मंदिर बनाकर प्रतिमा की प्रतिष्ठा की जाए तो युद्ध में विजय प्राप्त होगी।

राजा ने प्रातः अपने मंत्रियों को स्वप्न बताया।

मूर्ति की खोज की गई और मूर्ति प्राप्ति के बाद फिर राजा युद्ध के लिए आगे बढ़ गया।


विजय के बाद राजा स्वप्न भूल गया

लोककथा के अनुसार उद्योतचन्द युद्ध में विजयी होकर वापस उसी स्थान पर पहुँचे।

लेकिन विजय के उत्साह में वे अपना स्वप्न भूल गए।

रात्रि में जब राजा के विश्राम के लिए चारपाई लगाई गई तो वह बार-बार उलटने लगी।

कई प्रयास किए गए, लेकिन चारपाई ठीक से नहीं लग सकी।

जब यह समाचार राजा तक पहुँचा तो अचानक उन्हें अपना पुराना स्वप्न याद आया।

राजा ने इसे संकेत माना और उसी स्थान पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया।

यहीं से नागार्जुन मंदिर की लोककथा आगे बढ़ती है।


1690 ई. : नागार्जुन का ताम्रपत्र

नागार्जुन मंदिर की कथा को विशेष महत्व इसलिए मिलता है क्योंकि इसके साथ उद्योतचन्द से संबंधित ताम्रपत्र का उल्लेख मिलता है।

इस पर शाके 1612 अर्थात् 1690 ई. की तिथि अंकित है।

यह ताम्रपत्र नागार्जुन ग्राम और मंदिर के लिए भूमि एवं राजस्व व्यवस्था से संबंधित माना जाता है।

उद्योतचन्द ने अपने पुरोहित गंगोलीहाट के उप्रेती ब्राह्मणों को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया।

उनके लिए भूमि-अनुदान किया गया और इसी के साथ नागार्जुन नाम से ब्राह्मण ग्राम बसाने की परंपरा जुड़ी हुई है।

इसके साथ ही फलद्वाड़ी, मुरनौला, खरगेठी आदि गाँवों के राजस्व का कुछ अंश नागार्जुन ग्राम के लिए नियत किए जाने का उल्लेख मिलता है।

इस राजस्व से पुजारियों की जीविका और मंदिर की व्यवस्था संचालित की जाती थी।

अर्थात् मंदिर की स्थापना के साथ एक पूरी आर्थिक-सामाजिक संरचना भी निर्मित हुई।


मंदिर और ग्राम : एक-दूसरे से जुड़ी व्यवस्था

मध्यकालीन पहाड़ों में मंदिरों की भूमिका को समझने के लिए नागार्जुन का उदाहरण महत्वपूर्ण है।

राजा ने भूमि दी।

गाँवों को मंदिर से जोड़ा गया।

राजस्व का हिस्सा निर्धारित किया गया।

पुजारी नियुक्त हुए।

और मंदिर की पूजा एवं भोग की व्यवस्था सुनिश्चित हुई।

इससे पता चलता है कि मंदिर केवल धार्मिक आस्था का स्थान नहीं था।

वह स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक संगठन का भी केंद्र था।

यही कारण है कि ताम्रपत्रों का अध्ययन केवल धर्म के इतिहास के लिए नहीं, बल्कि भूमि व्यवस्था और ग्रामीण समाज के इतिहास के लिए भी आवश्यक है।


नागार्जुन : विष्णु मंदिर और पशुधन के रक्षक देवता

नागार्जुन की धार्मिक पहचान का एक और रोचक पक्ष स्थानीय लोकविश्वास में दिखाई देता है।

क्षेत्रीयजन नागार्जुन देवता को पशुधन के रक्षक देवता के रूप में भी पूजते हैं।

स्थानीय परंपरा के अनुसार प्रत्येक फसल पर लगभग एक पसेरी, अर्थात् लगभग दो किलोग्राम अन्न, पुजारी को अर्पित किया जाता है।

इसी अन्न से भगवान विष्णु को प्रतिदिन भोग लगाने की परंपरा बताई जाती है।

यह परंपरा हमें बताती है कि किसी राजकीय संरक्षण प्राप्त मंदिर की धार्मिक भूमिका समय के साथ स्थानीय समाज की आवश्यकताओं और विश्वासों से किस प्रकार जुड़ सकती है।


ज्ञानचन्द के समय फिर तेज हुआ संघर्ष

उद्योतचन्द के बाद उनके पुत्र ज्ञानचन्द सत्ता में आए।

राजसत्ता बदल गई, लेकिन कुमाऊँ और गढ़वाल के बीच संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।

सत्ता संभालने के लगभग दो वर्ष बाद ज्ञानचन्द ने गढ़वाल स्थित रामगंगा घाटी के प्रारंभिक क्षेत्र के मल्ला सलाण में स्थित साबली, खाटली और सैंजधार आदि गाँवों पर आक्रमण किया और वहाँ उत्पात मचाया।

इसके प्रत्युत्तर में अगले वर्ष गढ़वाल के राजा फतेहशाह ने पाली पछाऊँ परगने में स्थित गेवाड़ घाटी और चौकोट घाटी पर आक्रमण कर लूटपाट की।

इससे पश्चिमी रामगंगा घाटी की राजनीतिक भूमिका और स्पष्ट हो जाती है।

यह केवल मंदिरों और धार्मिक यात्राओं का क्षेत्र नहीं था।

यह कुमाऊँ और गढ़वाल के बीच संघर्ष और संपर्क का महत्वपूर्ण भू-क्षेत्र भी था।


पश्चिमी रामगंगा : सीमा भी, सेतु भी

यदि मानचित्र पर इस क्षेत्र को देखें तो इसकी भौगोलिक स्थिति इसके ऐतिहासिक महत्व को समझने में मदद करती है।

नदी घाटियाँ हमेशा केवल जल का मार्ग नहीं होतीं।

वे मनुष्यों, व्यापारियों, सैनिकों, यात्रियों, धार्मिक परंपराओं और राजसत्ताओं के आवागमन के मार्ग भी बनती हैं।

पश्चिमी रामगंगा घाटी में भी यही दिखाई देता है।

यहाँ—

राजाओं के सैन्य अभियान हुए,
मंदिरों को भूमि मिली,
गाँव राजस्व व्यवस्था से जुड़े,
पुजारी नियुक्त हुए,
और स्थानीय समाज ने इन संस्थाओं को अपनी परंपराओं में आत्मसात किया।

यही कारण है कि इस घाटी का इतिहास केवल राजनीतिक इतिहास नहीं है।

यह राजनीति, धर्म, समाज और भूगोल के परस्पर संबंधों का इतिहास है।


चंद सत्ता का अवसान

ज्ञानचन्द के बाद क्रमशः जगतचन्द, देवीचन्द, अजीतचन्द, कल्याणचन्द पंचम, दीपचन्द और मोहनचन्द या महेंद्रचंद  आदि शासक आए।

परवर्ती काल में चंद सत्ता धीरे-धीरे कमजोर होती गई।

यहाँ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।

अंततः चंद सत्ता का अंतिम चरण आया और 1790 ई. में गोरखाओं ने कुमाऊँ पर अधिकार कर लिया।

एक लंबे राजवंश का राजनीतिक अध्याय समाप्त हुआ।

लेकिन पश्चिमी रामगंगा की सांस्कृतिक स्मृति समाप्त नहीं हुई।


संरक्षण : क्योंकि खोया हुआ इतिहास वापस नहीं आता

आज सबसे बड़ी आवश्यकता इन स्थलों के संरक्षण और संवर्धन की है।

यदि किसी प्राचीन प्रतिमा को क्षति पहुँचती है, किसी ताम्रपत्र को नष्ट कर दिया जाता है, कोई पुराना मंदिर बिना दस्तावेजीकरण के बदल जाता है या कोई महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल निर्माण कार्य में दब जाता है, तो केवल एक वस्तु नष्ट नहीं होती।

उसके साथ इतिहास का एक प्रमाण भी नष्ट हो सकता है।

इसलिए आवश्यक है कि—

  • पश्चिमी रामगंगा घाटी का व्यवस्थित पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जाए।

  • कपमार्क्स, शवाधान और समाधियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण हो।

  • मंदिरों और प्राचीन मूर्तियों की सूची तैयार की जाए।

  • ताम्रपत्रों का संरक्षण और डिजिटल अभिलेखीकरण किया जाए।

  • स्थानीय परिवारों के पास सुरक्षित ऐतिहासिक सामग्री की पहचान की जाए।

  • नौले और धारे जैसी पारंपरिक जल-संरचनाओं को सांस्कृतिक विरासत के रूप में दर्ज किया जाए।

  • स्थानीय लोककथाओं और मौखिक परंपराओं का भी दस्तावेजीकरण किया जाए।

क्योंकि किसी पुरानी वस्तु को बचाना केवल अतीत को बचाना नहीं है—

यह आने वाली पीढ़ियों को अपनी पहचान से जोड़ना है।


तीन ताम्रपत्र, दो शताब्दियाँ और एक घाटी

पश्चिमी रामगंगा घाटी के इतिहास को समझने के लिए तीन तिथियाँ विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं—

1568 ई. — वृद्धकेदार

राजा रुद्रचन्द का ताम्रपत्र और वृद्धकेदार मंदिर के नाम गूंठ।

1666 ई. — तिमली

राजा बाज बहादुरचन्द का ताम्रपत्र और उदा बिष्ट के नाम भूमि-अनुदान।

1690 ई. — नागार्जुन

राजा उद्योतचन्द से संबंधित ताम्रपत्र और नागार्जुन मंदिर/ग्राम की भूमि एवं राजस्व व्यवस्था।

इन तीन अभिलेखीय पड़ावों के बीच हमें चंदकालीन शासन की एक महत्वपूर्ण तस्वीर दिखाई देती है।

राजा → भूमि → मंदिर/व्यक्ति → ग्राम → राजस्व → सामाजिक व्यवस्था

यह श्रृंखला मध्यकालीन कुमाऊँ की प्रशासनिक और सामाजिक संरचना को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती है।


निष्कर्ष : रामगंगा की धारा में बहता इतिहास

पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास किसी एक राजा की कहानी नहीं है।

यह रुद्रचन्द के वृद्धकेदार से शुरू होकर बाज बहादुरचन्द के तिमली ताम्रपत्र और उद्योतचन्द के नागार्जुन तक पहुँचता है।

यहाँ राजा हैं, युद्ध हैं, भूमि-अनुदान हैं और मंदिर हैं।

लेकिन इसके साथ ही लोकविश्वास भी हैं—

रुद्रचन्द का स्वप्न,

धरती में दबी रक्तवर्ण शिला,

रामगंगा तक पहुँचती रहस्यमय खुदाई,

और नागार्जुन में बार-बार उलटती चारपाई।

इन कथाओं को यदि ताम्रपत्रों और अन्य अभिलेखीय स्रोतों के साथ पढ़ा जाए तो पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास और अधिक जीवंत हो उठता है।

डॉ. वी. डी. एस. नेगी द्वारा दर्ज लगभग 70 चंदवंशी ताम्रपत्रों की परंपरा और पश्चिमी रामगंगा घाटी में मौजूद कपमार्क्स, शवाधान, समाधियाँ, मंदिर, मूर्तियाँ, नौले-धारे और अन्य पुरातात्विक अवशेष इस बात के संकेत हैं कि अभी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है।

शायद किसी पहाड़ी मोड़ के पीछे कोई पुराना मंदिर हमारा इंतजार कर रहा हो।

शायद किसी घर की पुरानी संदूकची में कोई ताम्रपत्र अब भी सुरक्षित हो।

शायद किसी चट्टान पर बने कुछ कपमार्क्स किसी बहुत पुराने मानव समुदाय की कहानी कह रहे हों।

और शायद किसी गाँव के बुजुर्ग की स्मृति में ऐसी कथा जीवित हो, जिसका कोई लिखित प्रमाण अभी हमें नहीं मिला।

इसलिए पश्चिमी रामगंगा घाटी को केवल अतीत की भूमि नहीं, बल्कि जीवित इतिहास की भूमि के रूप में देखना होगा।

क्योंकि—

इतिहास केवल वह नहीं जो किताबों में लिखा जा चुका है;
इतिहास वह भी है जो धरती, पत्थरों, ताम्रपत्रों और लोकस्मृतियों में अब भी सुरक्षित है।

और पश्चिमी रामगंगा घाटी आज भी जैसे हमें पुकार रही है—

**“मेरी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है…

मेरे इतिहास के कुछ पन्ने अभी खोजे जाने बाकी हैं।”**


संदर्भ एवं स्रोत

  1. नेगी, वी. डी. एस. (1994) — कुमाऊँ की भूमि व्यवस्था से संबंधित चंदवंशी ताम्रपत्रों का विवरण।

  2. जोशी, म. प. (1994) — कुमाऊँ के चंदकालीन एवं क्षेत्रीय ऐतिहासिक संदर्भ।

  3. रावत, अजय सिंह (2021)उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास

  4. जोशी, घनश्यामउत्तराखण्ड का राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास

  5. वृद्धकेदार मंदिर, अफौं से संबंधित ताम्रपत्र — शाके 1490 / 1568 ई.

  6. तिमली गाँव से प्राप्त बाज बहादुरचन्द का ताम्रपत्र — शाके 1588 / 1666 ई.

  7. नागार्जुन मंदिर/ग्राम से संबंधित उद्योतचन्द का ताम्रपत्र — शाके 1612 / 1690 ई.

  8. वर्ष 2019 में डॉ. चन्द्र सिंह चौहान के नेतृत्व में किए गए क्षेत्रीय पुरातात्विक सर्वेक्षण से संबंधित विवरण।

  9. वृद्धकेदार एवं नागार्जुन मंदिर से संबंधित स्थानीय परंपराएँ एवं मौखिक स्रोत।

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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

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कुमाऊँ के इतिहास में चंद राजवंश इसी कहानी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है।

कत्यूरियों के राजनीतिक प्रभुत्व के कमजोर पड़ने के बाद कुमाऊँ की भूमि पर चंद शक्ति का उदय हुआ। चम्पावत को केन्द्र बनाकर शुरू हुई यह सत्ता धीरे-धीरे विस्तृत हुई और आगे चलकर अल्मोड़ा को अपनी राजधानी बनाकर कुमाऊँ की एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति में परिवर्तित हुई।

चंदों के इतिहास की विशेषता केवल यह नहीं थी कि उन्होंने लंबे समय तक शासन किया, बल्कि यह भी थी कि उनके काल में राजनीतिक विस्तार के साथ प्रशासनिक व्यवस्था, भूमि-बंदोबस्त, मंदिर निर्माण, व्यापार, सैन्य संगठन और स्थानीय सामाजिक संस्थाओं का विकास हुआ।

लेकिन चंद इतिहास का एक प्रश्न आज भी इतिहासकारों के बीच चर्चा का विषय है—इस वंश का वास्तविक आरंभ कब हुआ?


चंद वंश की स्थापना : 700 ई. या 1025 ई.?

चंद राजवंश के आरंभ को लेकर लंबे समय से अलग-अलग मत मिलते रहे हैं।

परंपरागत वंशावलियाँ चंदों की स्थापना को बहुत प्राचीन समय, लगभग 7वीं शताब्दी तक ले जाती हैं। लेकिन डॉ. अजय सिंह रावत उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों और कालक्रम का विश्लेषण करते हुए चंद सत्ता की स्थापना को 1020 से 1025 ई. के बीच रखना अधिक उपयुक्त मानते हैं और सुविधा के लिए 1025 ई. को सोमचंद द्वारा चंद वंश की स्थापना का समय स्वीकार करने की बात करते हैं।

इस मत के पीछे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिस्थिति भी है।

लगभग इसी समय कत्यूरी सत्ता के कमजोर होने के बाद उसके विभिन्न राजकुमार और स्थानीय शक्तियाँ अलग-अलग क्षेत्रों—मणकोट, अस्कोट, डोटी, लखनपुर-बैराट तथा मानिला-सल्ट आदि—की ओर फैल रही थीं। ऐसे राजनीतिक संक्रमण के बीच कुमाऊँ में चंद शक्ति का उदय हुआ।

इसलिए चंद वंश की स्थापना के विषय में सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है—

परंपरा सोमचंद को अत्यंत प्राचीन काल में रखती है, लेकिन डॉ. अजय सिंह रावत के ऐतिहासिक विश्लेषण के अनुसार चंद सत्ता की स्थापना का समय लगभग 1020–1025 ई. के बीच मानना अधिक उपयुक्त है।

यह अंतर हमारे लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वंशावली और ऐतिहासिक कालक्रम हमेशा एक जैसे नहीं होते।


सोमचंद : चंद सत्ता की पहली नींव

परंपरा के अनुसार चंद वंश के संस्थापक सोमचंद थे।

रावत के अनुसार कत्यूरी सत्ता के अवसान के बाद सोमचंद ने कुमाऊँ में अपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित की और चंपावती/चम्पावत को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया।

उस समय काली कुमाऊँ का राजनीतिक परिदृश्य आज की तरह संगठित नहीं था। अनेक स्थानीय खस, नाग, द्रविड़ तथा अन्य स्थानीय शक्तियाँ और ठकुराइयाँ अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव रखती थीं।

इन स्थानीय शक्तियों को अपने अधीन संगठित करना सोमचंद के सामने बड़ी चुनौती थी।

उन्होंने स्थानीय राजनीतिक शक्तियों को व्यवस्थित किया तथा प्रशासन और सैन्य व्यवस्था को मजबूत किया। चंद सत्ता के प्रारंभिक स्वरूप में स्थानीय सरदारों और किलेदारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

यही वह आधार था जिस पर आगे चलकर चंद राज्य का विस्तार हुआ।


चम्पावत : चंद सत्ता का पहला राजनीतिक केन्द्र

चंपावती देवी के नाम से जुड़ा चम्पावत चंदों की प्रारंभिक राजधानी बना।

चम्पावत का महत्व केवल राजनीतिक नहीं था। आगे चलकर यह धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केन्द्र बना।

चंद शासन की प्रारंभिक स्मृतियों में बालेश्वर मंदिर विशेष महत्व रखता है। चम्पावत के मंदिरों और अभिलेखों से चंदों तथा उस समय की विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के संबंधों की जानकारी मिलती है।

यहीं से चंद सत्ता ने धीरे-धीरे अपना विस्तार आरंभ किया।


सोमचंद के बाद : आत्मचंद से वीणाचंद तक

सोमचंद के बाद उसका पुत्र आत्मचंद गद्दी पर बैठा। रावत के अनुसार उसने लगभग 20 वर्षों तक राज्य किया और अपने पूर्ववर्ती द्वारा स्थापित चंद सत्ता को बनाए रखा।

उसके बाद पूर्णचंद (1066-1084 ई.) गद्दी पर बैठा।

पूर्णचंद के बाद इन्द्रचंद आया। उसके समय कुमाऊँ में रेशम उत्पादन और रेशमी वस्त्र निर्माण से संबंधित गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। मैदानों से बुनकरों को लाकर रेशम उत्पादन को प्रोत्साहित करने और नेपाल के रास्ते चीन से व्यापारिक संबंध बनाने की चर्चा भी स्रोत में है।

इसके बाद क्रमशः—

संसारचंद → सुधाचंद → हरिचंद → वीणाचंद

का उल्लेख मिलता है।

इन शासकों के समय कोई बड़ी राजनीतिक घटना दर्ज नहीं होने के कारण उनके शासन का विवरण अपेक्षाकृत कम मिलता है।


चंद सत्ता और डोटी का प्रभाव

चंद इतिहास को समझने के लिए डोटी के साथ उसके संबंधों को समझना अत्यंत आवश्यक है।

प्रारंभिक समय में कुमाऊँ की राजनीति पर डोटी की शक्ति का प्रभाव था। चंदों की विभिन्न शाखाएँ और स्थानीय शासक कभी स्वतंत्र तो कभी किसी बड़ी शक्ति के अधीन दिखाई देते हैं।

1223 ई. के बालेश्वर मंदिर अभिलेख में अनेक मांडलिकों का उल्लेख मिलता है। इससे उस समय की राजनीतिक संरचना की जटिलता का पता चलता है। अभिलेख में चंद्रवंशी नामों के साथ अन्य स्थानीय शासकों और सामंतों का भी उल्लेख मिलता है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय कुमाऊँ कोई पूरी तरह केंद्रीकृत राज्य नहीं था। अलग-अलग स्थानीय शक्तियाँ, मांडलिक और सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में सत्ता का संचालन करते थे।


वीरचंद और चंद शक्ति का पुनर्गठन

चंद इतिहास में आगे वीरचंद का उल्लेख महत्वपूर्ण है।

रावत के अनुसार वीरचंद ने बाहरी राजनीतिक दबावों के बीच चंद शक्ति को मजबूत करने का प्रयास किया। उसका संबंध डोटी की शक्ति और स्थानीय मांडलिक व्यवस्था से जुड़े संघर्षों से भी रहा।

लगभग 1206 ई. में वीरचंद की मृत्यु का उल्लेख मिलता है। उसके बाद चंद शासन में कई शासक आए और राजनीतिक स्थिति लगातार बदलती रही।


ज्ञानचंद : चंद शक्ति का महत्वपूर्ण मोड़

चंद इतिहास में ज्ञानचंद का काल एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का समय माना जाता है।

डॉ. अजय रावत के अनुसार ज्ञानचंद ने 1365 से 1420 ई. तक शासन किया।

वह दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के दरबार में भेंट लेकर जाने वाला पहला चंद राजा बताया गया है।

उस समय तराई-भाबर क्षेत्र में कटेहरियों का प्रभाव था। ज्ञानचंद और दिल्ली सल्तनत के संबंधों के परिणामस्वरूप उसे तराई क्षेत्र प्राप्त हुआ।

ज्ञानचंद के संबंध में सेराखड़कोट और गोबसा ताम्रपत्र महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। इनसे उसके शासन, भूमि-दान और राजनीतिक पदवी की जानकारी मिलती है। रावत के अनुसार इन अभिलेखों से ज्ञानचंद की राजनीतिक स्थिति काफी मजबूत दिखाई देती है।

यहीं से चंद सत्ता का विस्तार एक नए चरण में प्रवेश करता दिखाई देता है।


विक्रमचंद और भारतीचंद : डोटी के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष

ज्ञानचंद के बाद कुछ समय तक हरिहरचंद, दानचन्द, आत्मचंद और हरिचंद जैसे शासकों का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद 1423 ई. में विक्रमचंद के गद्दी पर बैठने का उल्लेख है। उसके दो ताम्रपत्र उपलब्ध होने की चर्चा रावत ने की है। उनके आधार पर उसका शासन लगभग 1423–1434 ई. माना गया है।

इसके बाद 1437 ई. में भारतीचंद गद्दी पर बैठा।

रावत के अनुसार भारतीचंद ने 1437 से 1477 ई. तक शासन किया।

भारतीचंद के समय चंद शक्ति ने डोटी के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष किया।

उसकी सेना में विभिन्न सामाजिक समूहों के लोग शामिल थे। डोटी की शक्ति को चुनौती देने के बाद चंदों ने सोर, सीरा और थल आदि क्षेत्रों पर अपना प्रभाव स्थापित किया।

यही वह समय था जब चंद सत्ता ने केवल चम्पावत-केंद्रित शक्ति से आगे बढ़कर कुमाऊँ के व्यापक राजनीतिक भूभाग पर अधिकार स्थापित करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया।


रत्नचंद : विस्तार के बाद स्थिरता

भारतीचंद के बाद उसका पुत्र रत्नचंद गद्दी पर बैठा।

रावत के अनुसार रत्नचंद ने 1477 से 1488 ई. तक शासन किया।

उसके समय तक चंद सत्ता का आधार काफी मजबूत हो चुका था।

रत्नचंद के शासन के अंतिम वर्षों में उसकी वृद्धावस्था के कारण शासन की वास्तविक जिम्मेदारियों में उसके पुत्र कीर्तिचंद की भूमिका बढ़ने लगी थी।


कीर्तिचंद : सत्ता का विस्तार और संक्रमण

रत्नचंद के बाद कीर्तिचंद चंद इतिहास में महत्वपूर्ण शासक के रूप में सामने आता है।

कीर्तिचंद ने लगभग 1506 ई. तक शासन किया। विभिन्न स्रोतों में यह भी संकेत मिलता है कि 1488–1499 ई. के बीच वह युवराज के रूप में शासन-कार्य में सक्रिय था।

कीर्तिचंद के शासनकाल में चंद सत्ता ने कुमाऊँ की सीमाओं से आगे अपना प्रभाव बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार उन्होंने सैन्य अभियानों के माध्यम से कई स्थानीय शक्तियों को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार किया। 

उनके विस्तारवादी अभियान में बारामंडल, पाली और फल्दाकोट जैसे क्षेत्रों को चंद राज्य में सम्मिलित किए जाने का उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानीय ऐतिहासिक परंपराओं में बिसौद आदि क्षेत्रों को भी उनके राज्य-विस्तार से जोड़ा गया है।

कीर्तिचंद की महत्वाकांक्षा केवल कुमाऊँ तक सीमित नहीं थी। परंपरागत विवरणों में उनके द्वारा गढ़वाल के शासक अजयपाल को पराजित करने और गढ़वाल को चंद सत्ता के अधीन लाने का उल्लेख मिलता है। 

हालांकि इस घटना तथा उसके स्वरूप को लेकर इतिहासकारों और स्रोतों में मतभेद हैं, इसलिए इसे निश्चित तथ्य के बजाय परंपरागत ऐतिहासिक विवरण के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा।

इस प्रकार कीर्तिचंद के समय चंद राज्य का विस्तार केवल भू-भाग बढ़ाने की प्रक्रिया नहीं था, बल्कि यह कुमाऊँ की राजनीतिक शक्ति को आसपास के क्षेत्रों पर प्रभावी बनाने का प्रयास भी था। 

उनके अभियानों ने आगे आने वाले चंद शासकों के लिए एक विस्तृत राजनीतिक आधार तैयार किया और चंद राजसत्ता के क्रमिक सुदृढ़ीकरण में योगदान दिया।


चंद राजवंश का मध्यकालीन विस्तार

कीर्तिचंद के बाद क्रमशः—

प्रतापचंद, ताराचंद, माणिकचंद, कल्याणचंद, भीष्मचंद और अन्य शासकों

का उल्लेख मिलता है।

इस दौर में चंद सत्ता के लिए स्थानीय सामंतों, डोटी और आसपास की शक्तियों के साथ लगातार राजनीतिक संघर्ष चलता रहा।

चंदों की राजनीतिक संरचना में केवल राजा ही नहीं, बल्कि मांडलिक, सामंत, थोकदार और विभिन्न प्रशासनिक अधिकारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।


कल्याणचंद और अल्मोड़ा की ओर बढ़ता चंद राज्य

चंद इतिहास में अगला बड़ा परिवर्तन कल्याणचंद के समय दिखाई देता है।

उपलब्ध ताम्रपत्रों के आधार पर डॉ. अजय रावत कल्याणचंद का शासन 1545–1565 ई. के आसपास निर्धारित करते हैं।

कल्याणचंद ने चंद राज्य को और मजबूत किया।

इसी राजनीतिक प्रक्रिया के दौरान मणकोट राज्य को चंद राज्य में मिलाया गया और चम्पावत से प्रशासनिक ढाँचे को अल्मोड़ा की ओर ले जाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

मणकोट के उप्रेती और पंत जैसे परिवारों तथा चम्पावत के विभिन्न प्रशासनिक कर्मचारियों को अल्मोड़ा में बसाने का उल्लेख भी मिलता है।

यह परिवर्तन आगे चलकर अल्मोड़ा को चंद सत्ता का प्रमुख केन्द्र बनाने वाला था।


रुद्रचंद : चंद राज्य का सुदृढ़ीकरण

कल्याणचंद के बाद उसका पुत्र रुद्रचंद गद्दी पर बैठा।

डॉ. अजय रावत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर रुद्रचंद का शासन 1565–1597 ई. के बीच रखते हैं।

रुद्रचंद का समय भारतीय इतिहास में मुगल सम्राट अकबर के काल से जुड़ा था।

उसने चंद राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति को मजबूत किया। सीरा सहित कई क्षेत्रों में चंदों का प्रभाव बढ़ा और भूमि-बंदोबस्त तथा प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया।

रुद्रचंद ने सामाजिक और प्रशासनिक संगठन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किए। उसके समय विभिन्न सामाजिक और प्रशासनिक पदों के निर्धारण तथा अधिकारियों की भूमिकाओं का उल्लेख मिलता है।


रुद्रचंद की प्रशासनिक व्यवस्था

रुद्रचंद के शासन की एक महत्वपूर्ण विशेषता उसकी व्यवस्थित प्रशासनिक संरचना थी।

भूमि पर विभिन्न प्रकार के कर लगाए जाते थे। प्रशासन में विभिन्न अधिकारियों की भूमिकाएँ निर्धारित थीं।

सेना को भी व्यवस्थित रूप दिया गया। राजा की सुरक्षा के लिए राजधानी में सेना रहती थी और युद्ध के समय स्थानीय ठाकुर तथा सामंत अपने सैनिकों के साथ राजा की सहायता करते थे।

इससे पता चलता है कि चंद राज्य केवल सैन्य शक्ति के सहारे नहीं चल रहा था, बल्कि उसके भीतर एक विकसित राजस्व, न्याय, भूमि और सैन्य प्रशासन भी विकसित हो चुका था।


लक्ष्मीचंद : प्रशासन और निर्माण का दौर

1597 ई. में रुद्रचंद की मृत्यु के बाद लक्ष्मीचंद गद्दी पर बैठा।

उसके शासन में प्रशासनिक व्यवस्था को आगे बढ़ाया गया। दारमा घाटी में शौका समुदाय के अधिकार और दायित्व निर्धारित करने तथा सीमाओं और कर व्यवस्था को व्यवस्थित करने की चर्चा मिलती है।

लक्ष्मीचंद को निर्माण कार्यों में भी रुचि थी।

उसके समय बाग-बगीचों का निर्माण, मंदिरों का निर्माण और पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया गया। स्रोत में बागनाथ मंदिर के 1602 ई. के जीर्णोद्धार का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है।

चंद शासकों द्वारा मैदानों से कारीगरों और शिल्पियों को लाकर बसाने की परंपरा ने कुमाऊँ के स्थापत्य और शिल्प पर भी प्रभाव डाला।


त्रिमलचंद, दिलीपचंद और विजयचंद

लक्ष्मीचंद के बाद उसके पुत्र त्रिमलचंद ने युवराज के रूप में शासन में सक्रिय भूमिका निभाई।

रावत के अनुसार उसने 1616–1621 ई. तक युवराज के रूप में शासन-कार्य संभाला।

इसके बाद:

  • दिलीपचंद — 1621–1624 ई.

  • विजयचंद — 1625 ई.

  • त्रिमलचंद — 1625–1638 ई.

का क्रम मिलता है।

विजयचंद का शासन बहुत अल्पकालिक रहा और उसकी मृत्यु के बाद त्रिमलचंद ने सत्ता संभाली।


बाजबहादुरचंद : चंद शक्ति का उत्कर्ष

चंद इतिहास में बाजबहादुरचंद का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उसका शासन 1638–1678 ई. तक रहा।

उसके समय चंद राज्य का विस्तार हुआ और तराई, डोटी तथा पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों में चंद प्रभाव को मजबूत करने के प्रयास किए गए।

बाजबहादुरचंद को अपने राजनीतिक हितों के लिए मुगल दरबार से भी संपर्क रखना पड़ा। स्रोत के अनुसार वह शाहजहाँ के समय दिल्ली गया और तराई क्षेत्र से संबंधित राजनीतिक समस्या के समाधान के लिए मुगल सत्ता से सहायता प्राप्त की।

मुगल सत्ता के सहयोग से तराई क्षेत्र पुनः चंद नियंत्रण में आया और बाजपुर नगर की स्थापना का उल्लेख भी मिलता है।


बाजबहादुरचंद और प्रशासनिक विस्तार

बाजबहादुरचंद केवल युद्धप्रिय शासक नहीं था।

उसने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित किया और अनेक नए पदों तथा कर्मचारियों की भूमिकाओं का निर्धारण किया।

उसके समय विभिन्न क्षेत्रों को प्रशासनिक इकाइयों में व्यवस्थित करने और राजस्व व्यवस्था को नियंत्रित करने का प्रयास हुआ।

उसने मंदिर निर्माण को भी संरक्षण दिया। थल का एकहथिया देवाल उसके समय की स्थापत्य परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण उदाहरण है।

कैलाश-मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों के लिए भूमि और भोजन जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख भी स्रोतों में मिलता है।


उद्योतचंद : डोटी और गढ़वाल से संघर्ष

1678 ई. में बाजबहादुरचंद की मृत्यु के बाद उद्योतचंद गद्दी पर बैठा।

उसके समय डोटी और गढ़वाल दोनों के साथ संघर्ष तेज हुआ।

1679 ई. का बरम ताम्रपत्र उद्योतचंद के शासन का एक महत्वपूर्ण अभिलेखीय प्रमाण है।

उद्योतचंद ने गद्दी संभालते ही अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित करने का प्रयास किया। डोटी के राजा देवपाल और गढ़वाल की शक्ति के बीच बने राजनीतिक समीकरणों ने चंद राज्य के सामने नई चुनौती पैदा कर दी।

उसने डोटी के विरुद्ध कई सैन्य अभियान किए।

अजमेरगढ़ पर लगभग 1683 ई. के आसपास चंद विजय का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1688 ई. में खैरागढ़ पर अधिकार और डोटी के साथ संधि का उल्लेख है।

लेकिन संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ। 1696 ई. के आसपास फिर युद्ध हुआ और इस संघर्ष में उद्योतचंद को पराजय का सामना करना पड़ा।

इस घटना के बाद उसके जीवन का अंतिम चरण धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में बीता।


ज्ञानचंद और जगतचंद : चंद राज्य का अंतिम उत्कर्ष

उद्योतचंद के बाद उसका पुत्र ज्ञानचंद गद्दी पर बैठा।

उसके प्रथम ताम्रपत्र-अभिलेख की तिथि 1698 ई. बताई गई है और उसके शासन का काल 1698–1708 ई. माना गया है।

उसने अपने पिता की तरह गढ़वाल और डोटी के विरुद्ध अभियान किए।

इसके बाद 1708 ई. में जगतचंद गद्दी पर बैठा।

रावत के विवरण में जगतचंद के समय को चंदों के उत्कर्ष का काल बताया गया है। उसने गढ़वाल के विरुद्ध सैन्य अभियान चलाए और श्रीनगर तक अपनी सेना पहुँचाई।

जगतचंद के समय चंद राज्य का प्रभाव काफी विस्तृत हुआ, लेकिन लगातार युद्धों ने राज्य पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव भी डाला।

1720 ई. में जगतचंद की मृत्यु के बाद चंद सत्ता धीरे-धीरे अवनति की ओर बढ़ने लगी।


चंद राज्य का अवनति काल

जगतचंद के बाद देवीचंद और उसके बाद क्रमशः—

अजीतचंद, कल्याणचंद, दीपचंद, मोहनचंद, प्रद्युम्नचंद, मोहनचंद, शिवचंद और महेंद्रचंद

जैसे शासक गद्दी पर आए।

इनमें से कई का शासनकाल छोटा रहा और चंद राज्य की राजनीतिक शक्ति पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रह सकी।

विशेष रूप से कल्याणचंद के समय 1740 के दशक में रोहिल्ला आक्रमण ने चंद राज्य को गंभीर संकट में डाल दिया।

रोहिल्ला नेता अली मुहम्मद खान की सेना कुमाऊँ में पहुँची और अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया। स्रोतों के अनुसार इस दौरान भारी लूटपाट और विनाश हुआ।

यह घटना चंद सत्ता की कमजोर होती राजनीतिक स्थिति का बड़ा संकेत थी।


चंद शासकों और नेपाल के संबंध

चंद इतिहास को नेपाल से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

कुमाऊँ और नेपाल के बीच प्राचीन काल से ही राजनीतिक, सांस्कृतिक और वैवाहिक संबंध रहे थे। मध्यकाल में डोटी के माध्यम से नेपाल की शक्ति का कुमाऊँ की राजनीति पर लगातार प्रभाव रहा।

चंदों और नेपाल के बीच कभी संघर्ष हुआ तो कभी राजनीतिक और वैवाहिक संबंध स्थापित हुए।

डॉ. रावत ने चंदों और नेपाल के संबंधों की चर्चा करते हुए भाषा, रीति-रिवाज, धार्मिक परंपराओं तथा राजनीतिक संबंधों में दोनों क्षेत्रों की निकटता की ओर भी संकेत किया है।

इसलिए कुमाऊँ का मध्यकालीन इतिहास वास्तव में कुमाऊँ–डोटी–नेपाल–गढ़वाल के बीच बदलते राजनीतिक संबंधों का इतिहास भी है।


चंद प्रशासन : केवल राजा और युद्ध की कहानी नहीं

चंद राजवंश की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक उसका प्रशासनिक विकास था।

चंद काल में—

  • भूमि-बंदोबस्त की व्यवस्था विकसित हुई।

  • विभिन्न प्रकार के कर निर्धारित किए गए।

  • सरदार, फौजदार और नेगी जैसे अधिकारियों की भूमिकाएँ निर्धारित थीं।

  • न्याय व्यवस्था के लिए अलग-अलग कचहरियों का उल्लेख मिलता है।

  • सैन्य प्रशासन को व्यवस्थित किया गया।

  • स्थानीय सामंतों और थोकदारों को प्रशासन में भूमिका दी गई।

  • शिल्पियों और कारीगरों को राज्य में बसाया गया।

  • मंदिरों और नौलों के निर्माण को प्रोत्साहन मिला।

इससे स्पष्ट होता है कि चंद राज्य की शक्ति केवल राजा की व्यक्तिगत वीरता पर निर्भर नहीं थी, बल्कि समय के साथ एक जटिल प्रशासनिक व्यवस्था विकसित हो चुकी थी।


चंद काल की सामाजिक व्यवस्था

चंद शासन में समाज को विभिन्न प्रशासनिक और पेशागत भूमिकाओं में व्यवस्थित करने का प्रयास भी हुआ।

रुद्रचंद के समय सामाजिक व्यवस्था के पुनर्गठन और विभिन्न ब्राह्मण समूहों तथा प्रशासनिक-पेशागत वर्गों के निर्धारण की चर्चा मिलती है।

राज्य के कामकाज के लिए पुरोहित, वैद्य, पौराणिक, सईस, राजकोली, पहरी, बाजदार, बजनिया, टम्टा आदि विभिन्न भूमिकाओं का उल्लेख मिलता है।

इससे उस समय के समाज में पेशा, प्रशासन और राजसत्ता के बीच गहरे संबंध का पता चलता है।


चंदों की स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत

चंद राजवंश की सबसे स्थायी विरासतों में उसकी स्थापत्य परंपरा है।

चम्पावत का बालेश्वर मंदिर, नागनाथ मंदिर, अल्मोड़ा और उसके आसपास के मंदिर, बागेश्वर का बागनाथ मंदिर, थल का एकहथिया देवाल और अनेक नौले चंदकालीन सांस्कृतिक परंपरा की याद दिलाते हैं।

चंद शासक मंदिर निर्माण के साथ-साथ पुराने मंदिरों के जीर्णोद्धार में भी रुचि लेते थे। लक्ष्मीचंद और बाजबहादुरचंद के समय के निर्माण और संरक्षण कार्य इसका उदाहरण हैं।

लेकिन चंदों की सांस्कृतिक विरासत केवल मंदिरों तक सीमित नहीं थी।

लोकदेवताओं, लोककथाओं, पर्व-परंपराओं, शिल्प, प्रशासनिक शब्दावली और सामाजिक संस्थाओं में भी इस काल की छाप दिखाई देती है।


चंद राजाओं की प्रमुख कालक्रम-सूची

डॉ. अजय सिंह रावत की पुस्तक को आधार मानते हुए ब्लॉग में केवल अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से दिए गए कालक्रम को इस प्रकार रखा जा सकता है:

शासकशासनकाल/तिथिटिप्पणी
सोमचंदलगभग 1020–1025 ई.; सुविधा से 1025 ई.स्थापना-काल पर मतभेद
आत्मचंदलगभग 20 वर्षरावत ने अवधि दी है, निश्चित आरंभ-वर्ष नहीं
पूर्णचंद1066–1084 ई.                                                रावत के अनुसार
इन्द्रचंदरेशम उत्पादन व व्यापार का उल्लेख
संसारचंद
सुधाचंद
हरिचंद
वीणाचंदप्रारंभिक काल में डोटी का प्रभाव
वीरचंदमृत्यु लगभग 1206 ई.राजनीतिक संघर्ष का काल
ज्ञानचंद1365–1420 ई.फिरोजशाह तुगलक से संबंध
विक्रमचंद1423–1434 ई.ताम्रपत्रीय प्रमाण
भारतीचंद1437–1477 ई.डोटी के विरुद्ध विस्तार
रत्नचंद1477–1488 ई.
कीर्तिचंदलगभग 1506 ई. तकतिथियों में मतभेद
कल्याणचंद1545–1565 ई.चंद सत्ता का विस्तार
रुद्रचंद1565–1597 ई.प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण
लक्ष्मीचंद1597 ई. सेनिर्माण व प्रशासन
त्रिमलचंदयुवराज 1616–1621; बाद में 1625–1638
दिलीपचंद1621–1624 ई.
विजयचंद1625 ई.अल्पकालिक शासन
बाजबहादुरचंद1638–1678 ई.चंद शक्ति का उत्कर्ष
उद्योतचंद1678 ई. सेडोटी-गढ़वाल संघर्ष
ज्ञानचंद1698–1708 ई.
जगतचंद1708–1720 ई.उत्कर्ष का अंतिम चरण
देवीचंद1720 ई. के बादअवनति का दौर
अजीतचंद
कल्याणचंदलगभग 1730–1747 ई.रोहिल्ला संकट
दीपचंद
मोहनचंद
प्रद्युम्नचंद
शिवचंद
महेंद्रचंदअंतिम चंद शासकचंद सत्ता का अंतिम चरण

चंद सत्ता का अंत

18वीं शताब्दी में चंद राज्य लगातार राजनीतिक दबावों से कमजोर होता गया।

रोहिल्ला आक्रमण, गढ़वाल और डोटी के साथ संघर्ष, आंतरिक राजनीतिक कमजोरी तथा बदलते क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन ने चंद राज्य की शक्ति को प्रभावित किया।

इसके बाद नेपाल की गोरखा शक्ति धीरे-धीरे कुमाऊँ की ओर बढ़ी।

चंदों की अंतिम राजनीतिक अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते राज्य पहले जैसी सैन्य और आर्थिक शक्ति नहीं रखता था।

अंततः 1790 ई. के आसपास गोरखाओं ने कुमाऊँ पर अधिकार कर लिया और चंदों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई।

इस प्रकार चंद राजवंश का राजनीतिक अध्याय समाप्त हुआ, लेकिन उसकी सांस्कृतिक विरासत समाप्त नहीं हुई।


इतिहास की सबसे बड़ी सीख : तिथियों को लेकर सावधानी क्यों जरूरी है?

चंद इतिहास का अध्ययन करते समय एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है।

हर राजा की तारीख समान स्तर के प्रमाण पर आधारित नहीं है।

कुछ तिथियाँ ताम्रपत्रों और अभिलेखों से समर्थित हैं। कुछ तिथियाँ वंशावली से आती हैं। कुछ का निर्धारण उपलब्ध राजनीतिक घटनाओं के आधार पर किया गया है।

इसीलिए सोमचंद की तिथि को लेकर 700 ई. की परंपरागत मान्यता और लगभग 1025 ई. की ऐतिहासिक स्थापना में अंतर दिखाई देता है।

डॉ. अजय रावत स्वयं इस कालक्रम को अभिलेखों और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर समझने का प्रयास करते हैं। इसलिए इस ब्लॉग में उनकी पुस्तक को मुख्य आधार बनाया गया है।


निष्कर्ष : चम्पावत से अल्मोड़ा तक चंदों की विरासत

चंद राजवंश की कहानी केवल राजाओं की लंबी सूची नहीं है।

यह उस समय की कहानी है जब कुमाऊँ की अनेक स्थानीय शक्तियाँ धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक ढाँचे में संगठित हुईं।

सोमचंद से शुरू हुई राजनीतिक परंपरा, चम्पावत से आगे बढ़ी; ज्ञानचंद और भारतीचंद के समय में उसने विस्तार पाया; रत्नचंद और कीर्तिचंद के दौर से गुजरते हुए कल्याणचंद और रुद्रचंद के समय अधिक संगठित हुई; और बाजबहादुरचंद के समय चंद शक्ति अपने महत्वपूर्ण उत्कर्ष तक पहुँची।

इसके बाद उद्योतचंद और जगतचंद ने संघर्षों के बीच राज्य की शक्ति को बनाए रखने का प्रयास किया, लेकिन 18वीं शताब्दी में चंद राज्य धीरे-धीरे कमजोर होता गया।

फिर आया वह समय जब गोरखा शक्ति ने कुमाऊँ पर अधिकार कर लिया।

लेकिन किसी राजवंश की राजनीतिक सत्ता समाप्त हो जाने से उसकी विरासत समाप्त नहीं होती।

आज भी चम्पावत के मंदिरों, अल्मोड़ा की ऐतिहासिक पहचान, बागेश्वर के धार्मिक स्थलों, कुमाऊँ की लोकपरंपराओं, स्थापत्य, सामाजिक संस्थाओं और लोकस्मृतियों में चंद काल की अनेक परतें दिखाई देती हैं।

इसलिए चंद राजवंश को केवल—

“कुमाऊँ पर शासन करने वाला एक राजवंश”

कहना उसके महत्व को छोटा कर देना होगा।

वास्तव में चंदों का इतिहास कुमाऊँ के राजनीतिक एकीकरण, प्रशासनिक विकास और सांस्कृतिक पहचान के निर्माण की लंबी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

चम्पावत से उठी चंद सत्ता ने केवल कुमाऊँ पर शासन नहीं किया; उसने कुमाऊँ की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्मृति पर एक ऐसी छाप छोड़ी, जो आज भी दिखाई देती है।


📚 संदर्भ

मुख्य स्रोत

डॉ. अजय सिंह रावत — उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास, अध्याय: “कुमाऊँ का चन्द राजवंश”।
बद्रीदत्त पाण्डे → ओ.सी. हांडा → शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ → Atkinson → शिलालेख/पुरातात्विक स्रोत → अन्य आधुनिक शोध।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
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-भाग-2: उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-1) आद्य इतिहास से राज्य-व्यवस्था के उदय तक

-भाग-3 उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-3) कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड : कुषाण, यौधेय, शीलवर्मन और नाग सत्ता का बदलता राजनीतिक परिदृश्य

-भाग-4 उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-4) गुप्तों की छाया में उत्तराखण्ड : कर्तृपुर से कार्तिकेयपुर तक बदलती राजनीतिक सत्ता

-भाग-5 उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-5) ब्रह्मपुर के बाद कार्तिकेयपुर का उदय : हिमालय में एक नई राजनीतिक शक्ति और कत्यूरी परंपरा



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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)


पश्चिमी रामगंगा घाटी का पौराणिक महत्त्व | महाभारत, रामायण और लोकस्मृतियों में उत्तराखण्ड


पश्चिमी रामगंगा घाटी और पौराणिक लोकपरंपराएँ

पश्चिमी रामगंगा घाटी केवल प्राकृतिक सौंदर्य, प्राचीन पुरातात्त्विक अवशेषों और ऐतिहासिक स्थलों के लिए ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसकी सांस्कृतिक स्मृति में महाभारत, रामायण, पाण्डवों और भगवान राम से जुड़ी अनेक परंपराएँ आज भी जीवित हैं।

चौखुटिया, गेवाड़ घाटी, मासी, जौरासी, तड़ागताल और आसपास के क्षेत्रों में अनेक ऐसे स्थल हैं, जिन्हें स्थानीय परंपरा पाण्डवों अथवा रामायणकालीन घटनाओं से जोड़ती है।

इन कथाओं को केवल आस्था के दृष्टिकोण से देखने के बजाय यदि पुराण, महाकाव्य, स्थानीय लोकस्मृति, स्थलनाम और पुरातात्त्विक साक्ष्यों के साथ देखा जाए, तो पश्चिमी रामगंगा घाटी की सांस्कृतिक पहचान की कई परतें सामने आती हैं।

इसलिए इस अध्ययन में पौराणिक परंपरा और ऐतिहासिक प्रमाण को अलग-अलग समझना आवश्यक है।


1. महाजनपदकालीन कुरु और उत्तरकुरु की परंपरा

महाभारत में कुरु परंपरा का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। कुरु क्षेत्र की राजनीतिक-सांस्कृतिक परंपरा के साथ उत्तर दिशा में स्थित उत्तरकुरु का भी उल्लेख मिलता है।

महाभारत के सभापर्व में अर्जुन की विजय-यात्रा के संदर्भ में कुलिंद, कालकूट आदि क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार शैलोदा नदी और उसके आसपास निवास करने वाली विभिन्न पर्वतीय जातियों का भी वर्णन प्राप्त होता है।

महाभारत के सभापर्व में अर्जुन की विजय-यात्रा के संदर्भ में कुलिंद और कालकूट आदि क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है—

“पूर्व कुलिन्दविषये वशे महीपतीन्
धनंजयो महाबाहुर्नातितीव्रण कर्मणा।
आनर्तान् कालकूटांश्च कुलिन्दांश्च विजित्य सः।”
(महाभारत, सभापर्व, 26/3-4)

अर्थात् अर्जुन ने अनेक क्षेत्रों के राजाओं को विजित किया, जिनमें कालकूट और कुलिंद जैसे क्षेत्र भी शामिल थे।

कालकूट को कुछ स्थानीय एवं ऐतिहासिक व्याख्याओं में वर्तमान कालसी क्षेत्र से जोड़ा गया है, जबकि कुलिंदों का संबंध हिमालयी भूभाग से माना जाता है।

यद्यपि इन प्राचीन नामों की आधुनिक भौगोलिक पहचान पर विद्वानों में मतभेद हैं, फिर भी इन उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि हिमालयी प्रदेश महाभारत की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक कल्पना का महत्त्वपूर्ण हिस्सा थे।


शैलोदा नदी और हिमालय की प्राचीन जातियाँ

महाभारत के सभापर्व में शैलोदा नदी का भी अत्यंत रोचक वर्णन मिलता है।

इस नदी को मेरु और मंदराचल पर्वतों के मध्य स्थित बताया गया है—

“मेरुमंदरयोर्मध्ये
शैलोदामभितो नदीम्,
ये ते कीचकवेणूनां
छायां रम्यामुपासते।”

इसके तट पर अनेक जातियों के निवास का उल्लेख मिलता है—

“खशाश्च नद्योतांश्च
प्रघसां दीर्घवेणिकान्,
पशुपांश्च कुलिंदांश्च
तंगणान् परतंगणान्।”

इनमें खश, नद्योत, प्रघस, दीर्घवेणिक, पशुप, कुलिंद, तंगण और परतंगण आदि समुदायों का उल्लेख मिलता है।

इन उल्लेखों ने उत्तर भारत के हिमालयी भूभाग के प्राचीन इतिहास को समझने में इतिहासकारों और भूगोलविदों का ध्यान आकर्षित किया है।

राजसूय यज्ञ में हिमालयी प्रदेशों की भेंट

महाभारत में युधिष्ठिर द्वारा आयोजित राजसूय यज्ञ के अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों के राजाओं द्वारा उपहार भेजे जाने का उल्लेख मिलता है।

उत्तराखण्ड की प्राचीन परंपराओं से जोड़े जाने वाले तत्कालीन प्रदेशों के राजा—खश, झस, नद्योत, प्रघस, वेणु, कीचक, ज्योहा अथवा जौहरी, एकासन, दीर्घवेणिक, पशुप, कुणिन्द, तंगण और परतंगण—द्वारा अर्जुन एवं युधिष्ठिर को उपहार भेजे जाने की चर्चा मिलती है।

इन उपहारों में विशेष रूप से पिपीलिका स्वर्ण का उल्लेख मिलता है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न रंगों के चँवर, हिमालयी शहद, लंबे समय तक टिकने वाले विभिन्न प्रकार के रत्न, गंगाजल तथा अनेक औषधीय जड़ी-बूटियाँ भी उपहारों में सम्मिलित बताई गई हैं।

इन विवरणों से हिमालयी प्रदेशों की प्राकृतिक संपदा और तत्कालीन सांस्कृतिक संपर्कों की एक रोचक तस्वीर सामने आती है।


2. कुणिन्द और हिमालयी क्षेत्र की प्राचीन राजनीतिक पहचान

महाभारत में कुलिंद/कुणिन्द समुदाय का उल्लेख विशेष महत्त्व रखता है।

उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास के अध्ययन में कुणिन्दों को एक महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक राजनीतिक शक्ति माना जाता है। महाभारत में कुलिंदों के साथ खश, तंगण, परतंगण आदि पर्वतीय समुदायों का उल्लेख मिलता है।

इससे यह संकेत मिलता है कि महाकाव्य परंपरा के समय हिमालयी क्षेत्र केवल निर्जन पर्वतीय भूभाग नहीं था, बल्कि विभिन्न समुदायों और राजनीतिक इकाइयों से युक्त एक सक्रिय सांस्कृतिक क्षेत्र था।

यही कारण है कि पश्चिमी रामगंगा घाटी को समझने के लिए केवल स्थानीय इतिहास ही नहीं, बल्कि व्यापक हिमालयी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।


3. चौखुटिया और कीचक की लोकस्मृति

पश्चिमी रामगंगा घाटी में महाभारत से जुड़ी सबसे रोचक लोकपरंपराओं में कीचक की कथा प्रमुख है।

चौखुटिया से लगभग 3.5 किलोमीटर की दूरी पर रामगंगा नदी के किनारे, रामनगर सड़क मार्ग पर स्थित नतलिया रौ नामक स्थान से एक शिलालेख प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।

इस शिलालेख पर—

“कीचक को किसने मारा, मैंने मारा।”

अंकित होने की बात कही जाती है।

स्थानीय निवासियों का विश्वास था कि यह लेख स्वयं भीम द्वारा लिखा गया था।

बाद में पुरातत्व विभाग के संज्ञान में आने पर शिलालेख का निरीक्षण किया गया और उसे लखनऊ संग्रहालय भेज दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

इतिहासकार बद्रीदत्त पाण्डे ने भी इस क्षेत्र को कीचकघाट के रूप में वर्णित किया है।

क्या यह वास्तव में महाभारतकालीन कीचक से जुड़ा कोई प्रमाण है? इसका उत्तर अभी निश्चित रूप से नहीं दिया जा सकता। शिलालेख की वास्तविक तिथि, लिपि और संदर्भ का वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।

लेकिन इतना निश्चित है कि कीचक की कथा पश्चिमी रामगंगा घाटी की लोकस्मृति में गहराई से जड़ें जमाए  हुए है।


4. क्या गेवाड़ घाटी ही महाभारत की विराटनगरी थी?

गेवाड़ घाटी का प्राचीन नाम बैराट बताया जाता है।

महाभारत में पाण्डवों के अज्ञातवास का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रसंग राजा विराट की नगरी से जुड़ा है। राजा विराट के साले का नाम कीचक था, जिसकी मृत्यु भीम के हाथों हुई थी।

इसी कारण गेवाड़ घाटी के बैराट को स्थानीय परंपरा में महाभारत की विराटनगरी से जोड़कर देखा जाता है।

लेकिन यहाँ इतिहास और लोकविश्वास के बीच अंतर करना आवश्यक है।

पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक परंपरा में महाभारतकालीन विराटनगर की पहचान सामान्यतः वर्तमान राजस्थान के बैराट से की जाती है।

इसलिए गेवाड़ के बैराट को महाभारत की विराट नगरी मानना अभी प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। फिर भी यह स्थानीय मान्यता पश्चिमी रामगंगा घाटी की सांस्कृतिक स्मृति को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।


5. देवगौड़ा और अधूरी शिव प्रतिमा

चौखुटिया-जौरासी मार्ग पर स्थित देवगौड़ा अथवा कलुआगाड़ में भी पाण्डवों से जुड़ी एक लोककथा प्रचलित है।

यहाँ एक विशाल शिलाखण्ड में अधूरी शिव प्रतिमा दिखाई देती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के अंतिम दिनों में पाण्डव यहाँ शिव प्रतिमा का निर्माण कर रहे थे। इसी बीच दुर्योधन द्वारा उनकी खोज के लिए सेना भेजे जाने की सूचना मिली और पाण्डव प्रतिमा को अधूरा छोड़कर वहाँ से चले गए।

आज यह अधूरी प्रतिमा स्थानीय लोकविश्वास में पाण्डवों की स्मृति से जुड़ी हुई है।

यहाँ भी प्रतिमा की वास्तविक निर्माण-तिथि और उसके पाण्डवकालीन होने की पुष्टि के लिए पुरातात्त्विक अध्ययन आवश्यक है।


6. छुपकेश्वर महादेव और रहस्यमय पशु-खुर

क्षेत्र में स्थित छुपकेश्वर महादेव मंदिर के निकट एक विशाल शिलाखंड में असंख्य पशु-खुर जैसे चिह्न दिखाई देते हैं।

स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इनका संबंध उन गायों से हो सकता है, जिनका हरण विराट युद्ध के समय दुर्योधन ने राजा विराट की गौशाला से किया था।

प्राकृतिक शिलाचिह्नों को महाभारत की घटनाओं से जोड़ने की यह परंपरा बताती है कि स्थानीय समाज ने अपने आसपास के प्राकृतिक भू-दृश्य को किस प्रकार महाकाव्यीय स्मृतियों से अर्थ प्रदान किया।



7. तड़ागताल : भीम की गदा और जलाशय की लोककथा


चौखुटिया से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तड़ागताल एक सुंदर प्राकृतिक झीलनुमा क्षेत्र है।

वर्षा ऋतु में यह पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और शीत ऋतु तक धीरे-धीरे सूखने लगता है। जल घटने के बाद स्थानीय लोग यहाँ गेहूँ की फसल भी उगाते हैं।

इस सुंदर ताल से पाण्डवों की कई किवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं।

एक मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पाण्डव विराट क्षेत्र में रहते थे। स्नान और वस्त्र धोने के लिए उचित स्थान न मिलने पर भीम ने एक पहाड़ी पर अपनी गदा से प्रहार किया।

पहाड़ी में बने धँसाव में वर्षा का पानी भर गया और वह ताल का रूप ले बैठा।

लेकिन समस्या तब उत्पन्न हुई जब जलस्तर बढ़ने से आसपास के गाँवों में बाढ़ का खतरा पैदा होने लगा।

तब भीम ने ताल की तलहटी में अपनी पाँचों उँगलियों से पाँच छिद्र बना दिए, जिनसे अतिरिक्त पानी पहाड़ी की दूसरी ओर निकलने लगा।

यह स्थान आज जाबर टीला के नाम से जाना जाता है।


जाबर टीले से सम्बद्ध दूसरी लोककथा

तड़ागताल से जुड़ी दूसरी मान्यता थोड़ी अलग है।

इसके अनुसार ताल पहले से ही अस्तित्व में था। वर्षा ऋतु में उसमें अथाह जल एकत्र हो जाता था और आसपास के गाँवों में जलभराव का संकट पैदा हो जाता था।

स्थानीय लोगों के अनुरोध पर भीम ने जाबर टीले पर पंजा मारकर बाँध बनाया।

आज भी जाबर टीले पर प्राकृतिक बाँध जैसी संरचना दिखाई देती है, जिससे अतिरिक्त जल पहाड़ी की दूसरी ओर निकलकर रामगंगा नदी में चला जाता है।

इस कथा में पौराणिक विश्वास के साथ स्थानीय जल-प्रबंधन की स्मृति भी दिखाई देती है।


8. माँ नन्दादेवी का मेला

जाबर टीले के एक छोर पर माँ नन्दादेवी का मंदिर स्थित है।

यहाँ प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह की पंचमी से भव्य मेले का शुभारंभ होता है।

अष्टमी को रात्रि मेला लगता है और नवमी को नन्दादेवी के प्रतीक स्वरूप कदली वृक्ष के विसर्जन के साथ मेले का समापन होता है।

इस प्रकार जाबर टीला केवल पाण्डव परंपरा से ही नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की नन्दादेवी उपासना और लोकपर्व की परंपरा से भी जुड़ा हुआ है।

वर्तमान समय में इस क्षेत्र को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और इसके सौंदर्यीकरण के प्रयास भी किए जा रहे हैं।


9. पाण्डुखोली : पाण्डवों का शरणस्थल?


जाबर टीले से पूर्व दिशा की ओर कुछ दूरी पर स्थित पहाड़ी पर पाण्डुखोली नामक एक अन्य स्थल है, जिसे पाण्डवकालीन स्थल माना जाता है।

‘पाण्डुखोली’ शब्द को स्थानीय व्याख्या में दो शब्दों से बना माना जाता है—

पाण्डु + खोली

जहाँ ‘पाण्डु’ का अर्थ पाण्डवों से और ‘खोली’ का अर्थ शरणस्थल माना जाता है।

अर्थात्—पाण्डवों का शरणस्थल।

स्थानीय मान्यता के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पाण्डवों ने कुछ समय यहाँ बिताया था और यहाँ एक शिवालय की स्थापना की थी।

आज भी पाण्डुखोली में शिवालय विद्यमान है। इसके निकट एक टीले पर पाण्डवों के पाषाणिक प्रतीक भी स्थापित बताए जाते हैं।

पाण्डुखोली में स्थित एक बुग्यालनुमा स्थल को ‘भीम की खातड़ी’ अथवा ‘भीम का गद्दा’ कहा जाता है।

ऐसे स्थलनाम इस क्षेत्र की लोकस्मृति में पाण्डव आख्यानों की गहरी उपस्थिति को दर्शाते हैं।


10. वाल्मीकि रामायण में शैलोदा और उत्तरकुरु

महाभारत की तरह वाल्मीकि रामायण में भी उत्तर दिशा के प्रदेशों का उल्लेख मिलता है।

किष्किन्धाकाण्ड के 43वें सर्ग में सुग्रीव द्वारा शतबली को उत्तर दिशा के प्रदेशों का परिचय दिया गया है।

श्लोक 37 में शैलोदा नदी का वर्णन मिलता है—

“तं तु देशमतिक्रम्य
शैलोदा नाम निम्नगा।
उभयोस्तीरयोस्तस्याः
कीचकाः नाम वेणवः॥ 37॥”

अर्थात उस प्रदेश को पार करने के बाद शैलोदा नामक नदी आती है और उसके दोनों तटों पर कीचक नामक बाँस पाए जाते हैं।

अगले श्लोक में कहा गया है—

“ते नयन्ति परं तीरं
सिद्धान् प्रत्यानीयन्ति च।
उत्तराः कुरवस्तत्र
कृतपुण्यप्रतिश्रयाः॥ 38॥”

यहाँ शैलोदा के आगे उत्तरकुरुओं का वर्णन किया गया है।

महाभारत और रामायण दोनों में शैलोदा तथा उत्तरकुरु का उल्लेख मिलना इस प्राचीन भौगोलिक परंपरा को और रोचक बनाता है।


11. रामपादुका : पश्चिमी रामगंगा घाटी में रामायण की लोकस्मृतियाँ

पश्चिमी रामगंगा घाटी में केवल महाभारत ही नहीं, बल्कि रामायण से जुड़ी अनेक लोककथाएँ भी प्रचलित हैं।

इनमें सबसे प्रमुख कथा रामपादुका तीर्थ से जुड़ी हुई है।

अल्मोड़ा जनपद की गेवाड़ घाटी में मासी से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर कोट्यूड़ा ग्रामसभा के क्षेत्र में भगवान रामचन्द्र का रामपादुका तीर्थ नामक प्राचीन मंदिर स्थित है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार रावण वध के पश्चात भगवान राम को ब्रह्महत्या का दोष लगा था।

गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से उन्होंने चारधाम यात्रा कर अपना शुद्धिकरण किया।

बद्रीनाथ धाम की यात्रा के दौरान भगवान राम पश्चिमी रामगंगा नदी के किनारे से होते हुए बद्रिकाश्रम पहुँचे।

किवदंती है कि रामजी ने वर्तमान रामपादुका नामक स्थान पर एक रात्रि विश्राम किया था।


12. असुरगढ़ी और भगवान राम

उन दिनों इस क्षेत्र में असुर नामक राक्षस का आतंक फैला हुआ था।

भगवान राम ने असुर का वध कर क्षेत्र को उसके आतंक से मुक्त किया।

आज भी असुर के निवास स्थान को असुर फाट अथवा असुरगढ़ी के नाम से जाना जाता है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार असुर का वध करने से पूर्व भगवान राम ने जिस स्थान पर छिपकर भगवान शिव की आराधना की थी, वह स्थान आगे चलकर छुपकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


छुपकेश्वर महादेव : एक अलग पहचान

सामान्यतः शिवालय पूर्वमुखी होते हैं, लेकिन छुपकेश्वर महादेव मंदिर पश्चिममुखी बताया जाता है।

स्थानीय मान्यता इसके पीछे भी एक रोचक कारण बताती है।

चूँकि असुरगढ़ी पश्चिम दिशा में स्थित है, इसलिए भगवान राम ने असुर पर दृष्टि रखते हुए वहाँ से शिव की आराधना की थी और इसी कारण मंदिर की दिशा पश्चिममुखी हुई।

यह धार्मिक स्थापत्य और लोककथा का एक रोचक मेल है।


60,000 गायों का दान और रामगंगा का पवित्रीकरण

मान्यता है कि असुर के वध के बाद उसके रक्त से पूरी घाटी रक्तिम हो गई थी।

क्षेत्र के शुद्धिकरण के लिए भगवान राम ने 60,000 गायों का दान किया और रामगंगा नदी के तट पर यज्ञ का आयोजन किया।

यज्ञ के लिए आवश्यक लगभग सभी सामग्री स्थानीय स्तर पर मिल गई, लेकिन सात नदियों का जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा था।

तब भगवान राम ने रामगंगा घाटी में अलग-अलग स्थानों से छह जलधाराएँ प्रकट कीं।

स्थानीय परंपरा में इन सात धाराओं के नाम इस प्रकार बताए जाते हैं—

बौगाड़, धरगाड़, गनोली गाड़/गंगारौली, खतगाड़, रीठागाड़, कालीगाड़ और रोहप अर्थात रामगंगा।

इन सातों धाराओं के जल से यज्ञ की आवश्यकता पूरी की गई।


13. रोहप से रामगंगा : नामकरण की लोककथा


लोकमान्यता के अनुसार इन जलधाराओं का संगम घाटी में बह रही नदी रोहप के साथ हुआ और यहीं से यह नदी रामगंगा कहलाने लगी।

यज्ञ के दौरान जलस्तर बढ़ने से रामगंगा की कलकल ध्वनि इतनी तीव्र हो गई कि यज्ञ के मंत्रोच्चार में विघ्न पड़ने लगा।

तब भगवान राम ने अपने चरणों से नदी को दबाकर उसकी धारा को शांत किया और यज्ञ पूर्ण किया।

यज्ञ समाप्त होते ही घाटी पुनः निर्मल हो गई।

भगवान राम के चरणचिह्न आज भी इस स्थान पर विद्यमान माने जाते हैं।

इन्हीं चरणचिह्नों के कारण यह स्थान रामपादुका कहलाया और कालांतर में यहाँ मंदिर की स्थापना हुई।

आज भी रामपादुका में भगवान राम के चरणचिह्न श्रद्धा का केंद्र हैं।


14. इन्द्रेश्वर महादेव और कपिला गाय

रामपादुका तीर्थ के ठीक सामने रामगंगा नदी के दूसरे तट पर इन्द्रेश्वर महादेव मंदिर स्थित है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार एक समय देवराज इन्द्र को ब्रह्महत्या का दोष लगा था।

दोषमुक्ति के लिए उन्होंने यहाँ शिवालय स्थापित किया और कई वर्षों तक तपस्या की।

इस लंबे समय में इन्द्रदेव ने कपिला गाय का पालन-पोषण भी किया।

आज भी रामगंगा नदी के तट पर एक विशाल शिलाखंड में कपिला गाय के खुर अथवा पदचिह्न होने की स्थानीय मान्यता है।

देवराज इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया और आशीर्वाद दिया कि यह स्थान भविष्य में इन्द्रेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध होगा।

इस प्रकार रामपादुका और इन्द्रेश्वर महादेव—रामगंगा के दो किनारों पर स्थित ये दोनों धार्मिक स्थल—एक ही सांस्कृतिक परिदृश्य के दो महत्त्वपूर्ण केंद्र बन जाते हैं।


15. पौराणिक कथा और इतिहास : अंतर समझना क्यों आवश्यक है?

पश्चिमी रामगंगा घाटी की पौराणिक परंपराएँ अत्यंत समृद्ध हैं, लेकिन इतिहास लेखन में इनके मूल्यांकन के लिए सावधानी आवश्यक है।

किसी स्थल का पाण्डवों, राम या किसी  रामायण अथवा महाभारतकालीन पात्र से जुड़ा होना अपने आप में उस घटना का पुरातात्त्विक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

इन परंपराओं को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—

पहला — शास्त्रीय स्रोत
महाभारत, रामायण और पुराणों में प्राप्त उल्लेख।

दूसरा — स्थानीय लोकस्मृति
पाण्डुखोली, तड़ागताल, कीचकघाट, रामपादुका आदि से जुड़ी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही कथाएँ।

तीसरा — पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक प्रमाण
मंदिर, शिलालेख, स्थापत्य, स्थलनाम, मूर्तियाँ तथा अन्य भौतिक साक्ष्य।

जब इन तीनों को साथ रखकर अध्ययन किया जाता है, तभी किसी क्षेत्र के अतीत की अधिक संतुलित तस्वीर सामने आती है।


निष्कर्ष

पश्चिमी रामगंगा घाटी का पौराणिक महत्त्व केवल कुछ मंदिरों या लोककथाओं तक सीमित नहीं है।

यहाँ महाभारत की पाण्डव परंपरा, रामायण की रामकथा, शिव उपासना, नन्दादेवी परंपरा और नदी-केंद्रित धार्मिक संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती हैं।

चौखुटिया का कीचक प्रसंग, तड़ागताल की भीम-कथा, पाण्डुखोली की स्मृति, मासी का रामपादुका तीर्थ और इन्द्रेश्वर महादेव जैसे स्थल इस घाटी को एक जीवंत सांस्कृतिक भू-दृश्य प्रदान करते हैं।

लेकिन इन परंपराओं का सबसे बड़ा महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि वे ऐतिहासिक रूप से कितनी प्रमाणित हैं। उनका महत्त्व इस बात में भी है कि
स्थानीय समाज ने अपने भूगोल, नदियों, पहाड़ों, मंदिरों और प्राकृतिक स्थलों को महाकाव्यीय स्मृतियों से जोड़कर एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान निर्मित की है।

यही कारण है कि पश्चिमी रामगंगा घाटी का अध्ययन केवल इतिहास या पुरातत्त्व का विषय नहीं, बल्कि लोकस्मृति, धर्म, भूगोल, साहित्य और सांस्कृतिक इतिहास के अंतर्संबंधों का अध्ययन भी है।

और शायद यही इस घाटी की सबसे बड़ी विशेषता है—

यहाँ नदी केवल बहती नहीं,
वह स्मृतियाँ भी बहाती है।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
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