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शनिवार, 8 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–7) प्रागैतिहासिक औजारों का विस्तृत अध्ययन : पत्थरों में छिपी मानव सभ्यता की विकासगाथा




"जब मनुष्य ने पहली बार किसी पत्थर को अपनी आवश्यकता के अनुसार तराशा, तभी से सभ्यता की यात्रा का वास्तविक आरम्भ हुआ। वही साधारण-सा पत्थर आगे चलकर मानव बुद्धि, विज्ञान और संस्कृति के विकास का प्रथम अध्याय बना।"

गुरुवार, 6 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–6) प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल : हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट एवं अन्य पुरातात्त्विक स्थल

डॉ. भावना जुयाल 

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक इतिहास अनेक ऐसे पुरास्थलों से समृद्ध है, जो आदिम मानव के जीवन, कला और संस्कृति की अमूल्य झलक प्रस्तुत करते हैं। इस लेख में हम हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट तथा अन्य प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों का परिचय देंगे और जानेंगे कि ये साक्ष्य उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अतीत को समझने में क्यों महत्वपूर्ण हैं।

बुधवार, 5 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–5) पश्चिमी रामगंगा घाटी के महापाषाणीय शवाधान : पत्थरों में सुरक्षित एक विलुप्त सभ्यता की स्मृतियाँ

 

महापाषाणीय शवाधान


"जब लिखित इतिहास मौन हो जाता है, तब पत्थर बोलना शुरू करते हैं; और उन्हीं की भाषा को पुरातत्त्व कहा जाता है।"

पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास केवल कपमार्क्स तक सीमित नहीं है। इस घाटी की धरती के गर्भ में ऐसी अनेक पुरातात्विक धरोहरें छिपी हैं, जो हजारों वर्ष पूर्व यहाँ विकसित मानव सभ्यता की मौन गाथा सुनाती हैं। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण हैं महापाषाणीय शवाधान—विशाल प्रस्तरखण्डों से निर्मित वे समाधि-स्थल, जिनमें उस युग के लोगों ने अपने प्रियजनों को अंतिम विश्राम दिया। ये केवल कब्रें नहीं हैं, बल्कि उस समाज की धार्मिक आस्था, सामाजिक संरचना, कलात्मक अभिरुचि और मृत्यु के प्रति उसके दार्शनिक दृष्टिकोण के सजीव दस्तावेज हैं।

मलारी : जहाँ उत्तराखण्ड में पहली बार खुला महापाषाणीय संस्कृति का द्वार

उत्तराखण्ड में महापाषाणीय शवाधानों की खोज का श्रेय प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' को जाता है। वर्ष 1956 ई. में उन्होंने चमोली जनपद के नीति घाटी स्थित मलारी गाँव में ऐसे शवाधानों की पहचान कर हिमालयी पुरातत्त्व के एक नए अध्याय का उद्घाटन किया।

मलारी में मिले शवाधानों का निर्माण अत्यन्त सुविचारित ढंग से किया गया था। चारों ओर विशाल प्रस्तरखण्ड खड़े किए गए थे और ऊपर एक बड़े शिलाखण्ड से उन्हें ढक दिया गया था। इन पत्थरों के भीतर सुरक्षित सामग्री यह संकेत देती है कि मृतकों के प्रति उस समाज का सम्मान अत्यन्त गहरा था तथा मृत्यु को वे जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि किसी नई यात्रा का आरम्भ मानते थे।

सोमवार, 3 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–4) पश्चिमी रामगंगा घाटी की पुरातात्त्विक अभिज्ञता : कपमार्क्स, शैलाश्रय और महापाषाणीय संस्कृति के साक्ष्य

 

डॉ. भावना जुयाल 

पश्चिमी रामगंगा घाटी : उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अतीत की जीवंत प्रयोगशाला

"यदि लखु उडियार हमें प्रागैतिहासिक मानव की कलात्मक चेतना से परिचित कराता है, तो पश्चिमी रामगंगा घाटी उसके दैनिक जीवन, निवास और सांस्कृतिक विकास की कथा सुनाती है।"

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक इतिहास का अध्ययन करते समय पश्चिमी रामगंगा घाटी का विशेष महत्व सामने आता है। यह घाटी केवल एक नदी तंत्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से मानव गतिविधियों की साक्षी रही एक प्राकृतिक प्रयोगशाला है। यहाँ बिखरे हुए कपमार्क्स (Cup-marks), शैलाश्रय, पाषाण अवशेष तथा स्थानीय परंपराएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक समुदायों के लिए अत्यंत अनुकूल निवास स्थल रहा होगा।


उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक खोजों की शुरुआत

मध्य हिमालय में व्यवस्थित पुरातात्त्विक खोज का इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी से प्रारम्भ होता है। 1856 ई. में ब्रिटिश अधिकारी विलियम जे. हेनवुड (William J. Henwood) ने चम्पावत जनपद के देवीधुरा में चट्टानों पर बने कपमार्क्स खोजे। उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन में इसे एक महत्वपूर्ण प्रारम्भिक खोज माना जाता है।

इसके लगभग दो दशक बाद 1877 ई. में कार्नेक (Carnegy) ने द्वाराहाट स्थित चंद्रेश्वर मंदिर के समीप लगभग 200 कपमार्क्स का उल्लेख किया। ये कपमार्क्स बारह समानांतर पंक्तियों में व्यवस्थित थे तथा इनके आसपास लहरदार रेखाएँ, पत्तीनुमा आकृतियाँ और अन्य ज्यामितीय चिह्न भी अंकित थे।

कार्नेक ने इन चिह्नों की तुलना यूरोप में मिले समान पुरातात्त्विक अवशेषों से करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि कपमार्क्स की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि विश्व के अन्य भागों में भी विद्यमान थी। इस तुलना ने उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया।


पश्चिमी रामगंगा घाटी : कपमार्क्स का समृद्ध क्षेत्र

समय के साथ अनेक भारतीय पुरातत्त्वविदों ने पश्चिमी रामगंगा घाटी का सर्वेक्षण किया। डॉ. एम. पी. जोशी ने अल्मोड़ा जनपद के घिटाई, दियाली डांडा, कालीमाटी, कैखान, मल्ला पैनुली, नौगाँव, फलसीमा और सिमल्टी जैसे स्थलों पर अनेक कपमार्क्स का प्रलेखन किया।

इसी क्रम में भारतीय शैलचित्र विशेषज्ञ डॉ. यशोधर मठपाल ने रामगंगा घाटी में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने नौला गाँव में 72 कपमार्क्स, जालली–मासी मार्ग पर जोंयो के समीप एक विशाल प्रस्तर पर 22 कपमार्क्स तथा दूसरी चट्टान पर 11 कपमार्क्स दर्ज किए। इसके अतिरिक्त नौगाँव और मुनिया की ढाई जैसे स्थलों पर भी कपमार्क्स की उपस्थिति दर्ज की गई।

इन खोजों से स्पष्ट होता है कि पश्चिमी रामगंगा घाटी उत्तराखण्ड की उन प्रमुख घाटियों में है जहाँ प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियों के व्यापक प्रमाण आज भी सुरक्षित हैं।

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'बाइस ओखला' : जहाँ इतिहास आज भी जीवित है

चौखुटिया–जौरासी मोटर मार्ग पर आगर मनराल गाँव के समीप स्थित एक विशाल वर्गाकार प्रस्तर पर 22 कपमार्क्स बने हुए हैं। इन्हीं के कारण यह स्थान स्थानीय लोगों के बीच "बाइस ओखला" के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्थल की विशेषता केवल इसके कपमार्क्स नहीं हैं, बल्कि यह भी है कि स्थानीय ग्रामीणों ने इन्हें सुरक्षित रखने के उद्देश्य से चारों ओर लौह सुरक्षा घेरा (Iron Railing) बनवाया है। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि स्थानीय समाज अपनी विरासत के प्रति सजग हो, तो संरक्षण का कार्य अधिक प्रभावी हो सकता है।

बाईस ओखला (आगर मनराल) 

थकुली उड्यार : जहाँ पत्थर भी बोलते हैं

गेवाड़ घाटी के ऊँचावाहन गाँव के समीप स्थित थकुली उड्यार पश्चिमी रामगंगा घाटी का सबसे रहस्यमय और रोचक पुरातात्त्विक स्थल माना जा सकता है। यहाँ विभिन्न चट्टानों पर 21 कपमार्क्स अंकित हैं, जिनमें कुछ उथले हैं तो कुछ अत्यंत गहरे।

इस स्थल की सबसे अनोखी विशेषता इसकी ध्वनि उत्पन्न करने वाली चट्टान है। जब इस पर हाथ से हल्की थाप दी जाती है तो थाली जैसी स्पष्ट ध्वनि सुनाई देती है, जबकि लकड़ी या पत्थर से प्रहार करने पर अलग प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। संभवतः इसी कारण स्थानीय लोगों ने इसे 'थकुली उड्यार' नाम दिया।

भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया के अनुसार ऐसी ध्वनियाँ चट्टानों की आंतरिक संरचना, प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाओं से बने रिक्त स्थान तथा उनके खनिजीय संघटन के कारण उत्पन्न हो सकती हैं। भारत के मध्य प्रदेश, गुजरात तथा बुंदेलखंड क्षेत्र में भी इस प्रकार की अनुनादी (Resonant) चट्टानों के उदाहरण मिलते हैं।


    
थकुली उड्यार 


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क्या थकुली उड्यार महापाषाणीय संस्कृति से जुड़ा है?

यद्यपि थकुली उड्यार में अभी तक शैलचित्र प्राप्त नहीं हुए हैं, फिर भी यह स्थल पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार उड्यार की सफाई के दौरान यहाँ से—

  • एक मिट्टी का दीपक,
  • एक प्रस्तर चक्र, तथा 
  • कुछ मृद्भाण्डों के अवशेष

प्राप्त हुए थे। दुर्भाग्यवश, जानकारी के अभाव में इन वस्तुओं का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं हो सका।

इन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, कपमार्क्स तथा शैलाश्रय की संरचना के आधार पर यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि इस स्थल का उपयोग महापाषाणीय अथवा उत्तर-प्रागैतिहासिक समुदायों द्वारा किया जाता रहा हो। हालांकि, इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक उत्खनन और दिनांकन (Dating) आवश्यक है।

शोध टिप्पणी: किसी भी पुरातात्त्विक स्थल को महापाषाणीय घोषित करने के लिए केवल कपमार्क्स पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए उत्खनन, सांस्कृतिक स्तर, दिनांकन और अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है।

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महरू उड्यार : शैलचित्र और कपमार्क्स का संगम

मासी–जालली मोटर मार्ग पर स्थित महरू उड्यार का उल्लेख डॉ. यशोधर मठपाल ने अपने शैलचित्र अध्ययनों में किया है। इसकी बनावट लखु उडियार से काफी मिलती-जुलती है। विशेष बात यह है कि इसके ठीक सामने एक कपमार्क भी स्थित है।

यह तथ्य इस संभावना को बल देता है कि शैलाश्रयों और कपमार्क्स का उपयोग एक ही सांस्कृतिक समुदाय द्वारा विभिन्न उद्देश्यों से किया जाता रहा होगा। यह विषय भविष्य के शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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पश्चिमी रामगंगा घाटी क्यों है विशेष?

पश्चिमी रामगंगा घाटी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यहाँ बड़ी संख्या में कपमार्क्स मिले हैं, बल्कि इसलिए भी है कि यहाँ प्राकृतिक शैलाश्रय, नदी तंत्र, पाषाण संसाधन और सांस्कृतिक अवशेष एक साथ मिलते हैं। ये सभी तत्व मिलकर संकेत देते हैं कि यह घाटी उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक मानव के जीवन, तकनीक और सांस्कृतिक विकास को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रही है।

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📚 संदर्भ

  1. Carnegy, P. (1877). Notes on Cup-Marks in Kumaon.
  2. Henwood, W. J. (1856). देवीधुरा क्षेत्र की प्रारम्भिक पुरातात्त्विक टिप्पणियाँ।
  3. Joshi, M. P. – कुमाऊँ क्षेत्र के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण।
  4. Mathpal, Y. (1996). Rock Art in Kumaon Himalaya.
  5. Mathpal, Y. (2008). कुमाऊँ के शैलचित्र एवं महरू उड्यार संबंधी अध्ययन।
  6. कुमार (2021). भारतीय अनुनादी (Resonant) चट्टानों पर अध्ययन।
  7. कोटलिया, बहादुर सिंह – हिमालयी भूगर्भीय संरचना पर अध्ययन।
  8. बिष्ट, शंकर सिंह (2022). ऊँचावाहन ग्राम से प्राप्त स्थानीय मौखिक जानकारी।
लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)


शनिवार, 1 अगस्त 2026

उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–3) "लखु उडियार: खोज, शैलचित्र और प्रागैतिहासिक मानव की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति"

 
स्रोत- wikimedia commons.

"चट्टानों पर उकेरे गए चित्र केवल कला नहीं, बल्कि उन लोगों की भाषा हैं जिनके पास लिखित लिपि नहीं थी।"

लखु उडियार की खोज और पुरातात्त्विक अध्ययन

उत्तराखंड के प्रागैतिहासिक इतिहास के व्यवस्थित अध्ययन की शुरुआत 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। इसी दौरान अल्मोड़ा जनपद स्थित लखु उडियार के शैलचित्रों ने पुरातत्वविदों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। बाद में भारतीय शैलकला विशेषज्ञों, विशेषकर डॉ. यशोधर मठपाल सहित अनेक विद्वानों ने इस स्थल का अध्ययन किया और इसे मध्य हिमालय की महत्वपूर्ण शैलचित्र परंपरा का प्रतिनिधि स्थल माना।

लखु उडियार का महत्व केवल चित्रों की संख्या में नहीं, बल्कि उनकी विषयवस्तु, शैली और सांस्कृतिक संकेतों में निहित है। यह स्थल इस बात का प्रमाण है कि हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले प्रागैतिहासिक समुदायों में भी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति और कलात्मक संवेदनशीलता विकसित हो चुकी थी।

शोध टिप्पणी: अब तक उपलब्ध अध्ययनों के आधार पर लखु उडियार के सभी चित्रों की एक निश्चित तिथि स्वीकार नहीं की गई है। अधिकांश विद्वान शैलीगत विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इन्हें प्रागैतिहासिक काल के विभिन्न चरणों से जोड़ते हैं। इसलिए किसी एक निश्चित वर्ष या काल का दावा करना उचित नहीं होगा।


शैलचित्र क्या हैं?

शैलचित्र (Rock Paintings) वे चित्र हैं जिन्हें प्राचीन मानव ने प्राकृतिक चट्टानों या शैलाश्रयों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों की सहायता से बनाया। लिखित भाषा के विकास से पहले यही चित्र मानव के विचारों, अनुभवों और सामुदायिक स्मृतियों के प्रमुख माध्यम थे।

लखु उडियार के शैलचित्र इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हिमालयी समाज की प्रारम्भिक सांस्कृतिक चेतना का परिचय देते हैं।


लखु उडियार के शैलचित्रों की प्रमुख विशेषताएँ

यहाँ प्राप्त चित्रों में निम्नलिखित विशेषताएँ प्रमुख हैं—

1. मानव आकृतियाँ

सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली आकृतियाँ मानव समूहों की हैं। कुछ चित्रों में कई व्यक्ति हाथों में हाथ डाले हुए दिखाई देते हैं। विद्वानों का मत है कि ये दृश्य सामूहिक नृत्य, किसी सामाजिक अनुष्ठान अथवा सामुदायिक आयोजन का प्रतीक हो सकते हैं।

2. ज्यामितीय आकृतियाँ

त्रिभुज, रेखाएँ, वृत्त, बिंदु तथा जालीनुमा संरचनाएँ भी चित्रित की गई हैं। इनका अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कुछ शोधकर्ता इन्हें धार्मिक प्रतीक मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें सामाजिक संकेत या प्रतीकात्मक भाषा का प्रारम्भिक रूप मानते हैं।

3. पशु चित्र

कुछ स्थानों पर पशुओं की आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। यद्यपि उनकी संख्या भीमबेटका जैसे स्थलों की तुलना में कम है, फिर भी वे उस समय के पर्यावरण और मानव-प्रकृति संबंध का संकेत देती हैं।



स्रोत- Wikimedia Commons

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चित्रों में प्रयुक्त रंग

लखु उडियार के अधिकांश चित्र लाल गेरू (Red Ochre) से बनाए गए हैं। कुछ चित्रों में सफेद रंग का भी प्रयोग दिखाई देता है।

रंगों के संभावित स्रोत—

रंग            संभावित प्राकृतिक स्रोत
लाल            हेमेटाइट (गेरू)
सफेद            चूना या अन्य श्वेत खनिज
काला            मैंगनीज़ या कोयला (कुछ स्थानों पर)

रंगों को पानी, पौधों के रस अथवा पशु वसा जैसे प्राकृतिक बाइंडर के साथ मिलाकर उपयोग किया गया होगा। हालाँकि लखु उडियार के सभी चित्रों के लिए यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है, लेकिन भारतीय शैलचित्रों पर हुए अध्ययनों से यह संभावना प्रबल मानी जाती है।


चित्रों से क्या पता चलता है?

इन शैलचित्रों का अध्ययन हमें बताता है कि—

  • मानव समूहों में रहता था।
  • सामूहिक गतिविधियाँ महत्वपूर्ण थीं।
  • प्रकृति के साथ गहरा संबंध था।
  • कला केवल सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक संचार का माध्यम थी।
  • प्रतीकों का प्रयोग प्रारम्भिक वैचारिक विकास का संकेत देता है।

क्या लखु उडियार केवल कला है?

नहीं।

आधुनिक पुरातत्व शैलचित्रों को केवल कला नहीं मानता। इन्हें मानव की सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक संगठन, धार्मिक विश्वास और सामूहिक पहचान के स्रोत के रूप में भी देखा जाता है। इसलिए लखु उडियार का अध्ययन केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानवशास्त्र (Anthropology), पुरातत्व (Archaeology) और कला इतिहास (Art History) — तीनों विषयों के लिए महत्वपूर्ण है।

शैलचित्रों का वैज्ञानिक अध्ययन

लखु उडियार के शैलचित्र वर्षों से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और मानवशास्त्रियों के अध्ययन का विषय रहे हैं। इन चित्रों का महत्व केवल उनकी कलात्मक सुंदरता में नहीं, बल्कि उन सूचनाओं में है जो वे प्रागैतिहासिक समाज के जीवन, पर्यावरण और सांस्कृतिक विकास के बारे में प्रदान करते हैं।

शोधकर्ताओं द्वारा इनका अध्ययन मुख्यतः निम्न आधारों पर किया जाता है—

  • चित्रों की शैली (Style)
  • प्रयुक्त रंगद्रव्य (Pigments)
  • अध्यारोपण (Superimposition)
  • शैलाश्रय का प्राकृतिक परिवेश
  • अन्य भारतीय शैलचित्र स्थलों से तुलना

इन सभी तथ्यों के संयुक्त अध्ययन से शैलचित्रों की अनुमानित आयु और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास किया जाता है।

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चित्रों में प्रयुक्त रंगों का वैज्ञानिक पक्ष

लखु उडियार के अधिकांश चित्र लाल गेरू (Red Ochre) से बनाए गए हैं। यह रंग प्राकृतिक रूप से मिलने वाले हेमेटाइट (Iron Oxide) खनिज से प्राप्त होता है। कुछ चित्रों में सफेद रंग भी दिखाई देता है, जो संभवतः चूना या अन्य श्वेत खनिजों से तैयार किया गया होगा।

रंगों की यह विशेषता महत्वपूर्ण है क्योंकि—

  • प्राकृतिक खनिजों से बने रंग अत्यधिक टिकाऊ होते हैं।
  • यही कारण है कि अनेक चित्र हजारों वर्षों बाद भी दिखाई देते हैं।
  • रंगों का चयन स्थानीय भूगर्भीय संसाधनों की जानकारी को भी दर्शाता है।

हालाँकि लखु उडियार के प्रत्येक चित्र पर विस्तृत रासायनिक परीक्षण प्रकाशित नहीं हैं, इसलिए रंगों की संरचना के बारे में निष्कर्ष सावधानीपूर्वक ही प्रस्तुत किए जाते हैं।


चित्र बनाने की संभावित तकनीक

प्रागैतिहासिक कलाकारों के पास आधुनिक उपकरण नहीं थे, फिर भी उन्होंने अत्यंत प्रभावशाली चित्र बनाए।

संभावना है कि वे—

  • उँगलियों,
  • लकड़ी की पतली टहनियों,
  • पौधों के रेशों,
  • अथवा पशुओं के बालों से बने सरल ब्रश

का उपयोग करते रहे होंगे।

रंगों को पानी, वनस्पति रस या पशु वसा जैसे प्राकृतिक बाइंडर के साथ मिलाया गया होगा। यह व्याख्या भारत के अन्य शैलचित्र स्थलों पर हुए अध्ययनों से समर्थित है।


मानव आकृतियों का सांस्कृतिक अर्थ

लखु उडियार के अनेक चित्रों में मानव आकृतियाँ समूहों में दिखाई देती हैं। कुछ आकृतियाँ हाथों में हाथ डाले या कतारबद्ध प्रतीत होती हैं।

इनकी विभिन्न व्याख्याएँ की गई हैं—

सामूहिक नृत्य

कुछ विद्वान इन चित्रों को सामूहिक नृत्य या उत्सव का दृश्य मानते हैं। यह संभवतः किसी सफल शिकार, ऋतु परिवर्तन या सामुदायिक अनुष्ठान से जुड़ा रहा होगा।

सामाजिक संगठन

समूह चित्र यह भी संकेत देते हैं कि उस समय तक मानव छोटे-छोटे संगठित समुदायों में रहने लगा था। सामूहिक जीवन ने सहयोग, श्रम-विभाजन और सांस्कृतिक परंपराओं को जन्म दिया।

धार्मिक या अनुष्ठानिक गतिविधियाँ

कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार कुछ चित्र धार्मिक अनुष्ठानों या प्रकृति-पूजा से जुड़े हो सकते हैं। हालाँकि इस संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसे एक संभावित व्याख्या के रूप में ही स्वीकार किया जाता है।

शोध टिप्पणी: प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की व्याख्या में सावधानी आवश्यक है। जहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध न हों, वहाँ किसी निष्कर्ष को अंतिम सत्य नहीं माना जाता।


ज्यामितीय आकृतियाँ क्या दर्शाती हैं?

लखु उडियार में केवल मानव चित्र ही नहीं, बल्कि रेखाएँ, त्रिभुज, बिंदु और अन्य ज्यामितीय आकृतियाँ भी मिलती हैं।

इनकी संभावित व्याख्याएँ हैं—

  • प्रारम्भिक प्रतीकात्मक भाषा
  • समूह या कुल-चिह्न
  • धार्मिक प्रतीक
  • शिकार या मार्ग संकेत
  • कलात्मक अभिव्यक्ति

अब तक इनका निश्चित अर्थ ज्ञात नहीं हो पाया है, और यही इन शैलचित्रों को रहस्यमय बनाता है।

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पर्यावरण और जीवन शैली

शैलचित्रों से यह स्पष्ट होता है कि प्रागैतिहासिक मानव प्रकृति के साथ गहरे संबंध में रहता था।

सुयाल नदी की घाटी में—

  • जल उपलब्ध था,
  • वनस्पति प्रचुर थी,
  • वन्य जीवों की पर्याप्त संख्या थी,
  • प्राकृतिक शैलाश्रय सुरक्षा प्रदान करते थे।

यही कारण है कि यह क्षेत्र लंबे समय तक मानव गतिविधियों का केंद्र रहा होगा।


लखु उडियार हमें क्या सिखाता है?

लखु उडियार केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि यह बताता है कि—

  • कला मानव की मूल प्रवृत्ति है।
  • सामाजिक जीवन का विकास प्रागैतिहासिक काल में ही प्रारम्भ हो चुका था।
  • हिमालयी क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है।
  • उत्तराखंड का इतिहास केवल लिखित अभिलेखों से नहीं, बल्कि चट्टानों पर अंकित चित्रों से भी पढ़ा जा सकता है।

शोध टिप्पणी: शैलचित्रों की तिथि का निर्धारण प्रायः प्रत्यक्ष कार्बन डेटिंग से नहीं, बल्कि शैली, रंग, अध्यारोपण (Superimposition) और तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर किया जाता है। इसलिए विभिन्न विद्वानों द्वारा इनके काल-निर्धारण में कुछ मतभेद मिलते हैं। इस तथ्य का उल्लेख करना किसी भी शोधपरक लेख की विश्वसनीयता बढ़ाता है।

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📚 संदर्भ (विश्वसनीय स्रोत)

  1. मठपाल, यशोधर (1984). Prehistoric Rock Paintings of Bhimbetka. Abhinav Publications, New Delhi.

  2. मठपाल, यशोधर (1998). Rock Art in India. Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA), New Delhi.

  3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India). Indian Archaeology – A Review (विभिन्न वर्ष).

  4. नौटियाल, के.पी. (K. P. Nautiyal). Prehistory and Protohistory of the Central Himalaya. Garhwal University Research Publications.

  5. उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय. उत्तराखण्ड का इतिहास एवं संस्कृति (अध्ययन सामग्री).

  6. डी.पी. अग्रवाल (D. P. Agrawal). The Archaeology of India. Curzon Press.

  7. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA). Rock Art Archive.

  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), देहरादून सर्किल द्वारा प्रकाशित उपलब्ध संरक्षण एवं सर्वेक्षण रिपोर्टें।

ऑनलाइन संदर्भ 

  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)
  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA)
  • उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग
  • उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय

 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–2) "प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण : समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा"



स्रोत- Wikimedia Commons 

प्रागैतिहासिक उत्तराखंड की विस्तृत यात्रा 

"हिमालय के पत्थर केवल भूगर्भीय संरचनाएँ नहीं हैं; वे समय के ऐसे पृष्ठ हैं जिन पर प्रकृति ने लाखों वर्षों का इतिहास अंकित किया है। उन पृष्ठों को पढ़ना सरल नहीं, क्योंकि उनमें शब्द नहीं हैं—केवल शिलाएँ, औज़ार, शैलचित्र और मौन साक्ष्य हैं। इन्हीं मौन साक्ष्यों को पढ़कर पुरातत्त्वविद् मानव सभ्यता की आरम्भिक यात्रा का पुनर्निर्माण करते हैं।"

मानव सभ्यता का विकास किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह लाखों वर्षों तक चलने वाली क्रमिक प्रक्रिया थी, जिसमें जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, तकनीकी नवाचार और सामूहिक अनुभवों ने समान रूप से योगदान दिया। इसी कारण पुरातत्वविदों ने प्रागैतिहासिक काल को केवल कालक्रम के आधार पर नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी (Technology), आजीविका (Subsistence) और सांस्कृतिक व्यवहार (Cultural Behaviour) के आधार पर वर्गीकृत किया है।

यही वैज्ञानिक वर्गीकरण आज विश्व के लगभग सभी पुरातात्त्विक अध्ययनों में स्वीकार किया जाता है।


प्रागैतिहासिक काल का वैज्ञानिक वर्गीकरण 

काल

अनुमानित अवधि

प्रमुख विशेषताएँ

पुरापाषाण (Palaeolithic)

लगभग 26 लाख वर्ष पूर्व – 10,000 ई0 पूर्व

हस्तकुठार, चॉपर, आखेट, खाद्य संग्रह

मध्यपाषाण (Mesolithic)

लगभग 10,000 – 6,000 0 पूर्व

सूक्ष्म पाषाण (Microliths), मछली पकड़ना, प्रारम्भिक सामाजिक संगठन

नवपाषाण (Neolithic)

लगभग 6,000 – 3,000 0 पूर्व

कृषि, पशुपालन, स्थायी निवास, मृद्भाण्ड



शोध टिप्पणी: यह काल-विभाजन भारतीय प्रागैतिहासिक अध्ययन में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। उत्तराखण्ड के विभिन्न स्थलों पर इन चरणों की तिथियाँ कुछ भिन्न हो सकती हैं, क्योंकि प्रत्येक स्थल का काल-निर्धारण उसके स्थानीय पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर निर्भर करता है। (ResearchGate)


उत्तराखंड के संदर्भ में इस वर्गीकरण का महत्व 

जब भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी भागों में मानव नदी घाटियों के किनारे अपना जीवन विकसित कर रहा था, उसी समय हिमालय का भूभाग एक अलग प्रकार की चुनौती प्रस्तुत कर रहा था।

लगभग सम्पूर्ण उत्तराखण्ड ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय भू-आकृति से निर्मित है। हिमनदों से निकलने वाली नदियाँ, गहरी घाटियाँ, घने वन और कठोर जलवायु यहाँ के मानव जीवन को सीधे प्रभावित करते थे। इसलिए यहाँ रहने वाले आदिमानव का जीवन गंगा-यमुना के मैदानों में रहने वाले मानव से भिन्न रहा होगा।

यही कारण है कि उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक अध्ययन केवल भारतीय इतिहास का क्षेत्रीय अध्याय नहीं, बल्कि दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में मानव अनुकूलन (Human Adaptation in the Himalaya) का भी अध्ययन है।


पुरातात्विक साक्ष्य क्या कहते हैं? 

लम्बे समय तक यह माना जाता रहा कि उत्तराखण्ड का दुर्गम भूभाग प्रागैतिहासिक मानव के लिए उपयुक्त नहीं रहा होगा। किन्तु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुए सर्वेक्षणों ने इस धारणा को बदल दिया।

अल्मोड़ा जनपद के लखु उडियार शैलाश्रय की पहचान और उसके बाद हुए अध्ययनों ने यह सिद्ध किया कि कुमाऊँ क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव की उपस्थिति के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं। लखु उडियार की शैलचित्र परम्परा का वैज्ञानिक अध्ययन डॉ. एम. पी. जोशी तथा बाद में यशोधर मठपाल सहित अनेक विद्वानों ने किया। आज यह स्थल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक है। चित्रों में लाल गेरू, श्वेत और काले रंगों से मानव समूह, पशु तथा ज्यामितीय आकृतियाँ अंकित हैं, जिन्हें अधिकांश विद्वान मध्यपाषाण से ताम्रपाषाण संक्रमणकाल से जोड़ते हैं। (ARF Journals)

इसके बाद कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में फड़कानौली, पेटशाल, फलसीमा, ग्वारख्या उडियार, किमनी, थकुली उडियार, महरू उडियार तथा हुडली जैसे अनेक शैलाश्रयों की पहचान हुई, जिससे स्पष्ट हुआ कि उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियाँ किसी एक स्थल तक सीमित नहीं थीं। (ResearchGate)


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इतिहास का सबसे बड़ा प्रश्न

इन शैलचित्रों को देखकर एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है—

क्या यह केवल कला थी?

या फिर...

यह आदिमानव की भाषा थी?

जब लिपि का जन्म नहीं हुआ था, तब क्या मनुष्य अपने अनुभव, भय, उत्सव और विश्वास को शिलाओं पर उकेरकर अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहता था?

इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर आज भी उपलब्ध नहीं है, किन्तु अधिकांश पुरातत्त्वविद् मानते हैं कि शैलचित्र केवल सजावट नहीं थे; वे तत्कालीन समाज के सांस्कृतिक जीवन, आखेट, सामूहिक नृत्य और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। (ARF Journals)


नवीन पुरातात्विक शोध

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक काल पर आधुनिक अनुसंधानों की नई दृष्टि

"इतिहास कभी समाप्त नहीं होता। प्रत्येक नई खोज अतीत की किसी अनसुलझी पहेली का एक नया उत्तर लेकर आती है। उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक इतिहास भी आज निरन्तर नए पुरातात्त्विक अनुसंधानों के कारण और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है।"

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लम्बे समय तक यह धारणा प्रचलित रही कि उत्तराखण्ड का पर्वतीय भूभाग प्रागैतिहासिक मानव के लिए अत्यन्त कठिन था और यहाँ मानव बसावट अपेक्षाकृत देर से हुई। किन्तु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा इक्कीसवीं शताब्दी में हुए पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों ने इस धारणा को चुनौती दी। आज उपलब्ध शैलचित्रों, पाषाण उपकरणों, शैलाश्रयों तथा भू-पुरातात्त्विक अध्ययनों के आधार पर यह स्पष्ट हो रहा है कि हिमालयी क्षेत्र मानव की प्रारम्भिक सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।


शैलचित्रों का वैज्ञानिक पुनरावलोकन 

प्रारम्भिक अध्ययनों में लखु उडियार के चित्रों को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति माना गया था, किन्तु आधुनिक शोधों ने यह संकेत दिया है कि इन चित्रों में तत्कालीन समाज की सामाजिक संरचना, सामूहिक आखेट, धार्मिक अनुष्ठान तथा पर्यावरणीय परिस्थितियों के संकेत भी निहित हो सकते हैं।

पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने कुमाऊँ हिमालय के शैलचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताया कि अनेक चित्र केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि वे मानव समुदायों की सांस्कृतिक स्मृति और प्रतीकात्मक संचार (Symbolic Communication) के माध्यम भी रहे होंगे।

बहु-स्तरीय (Superimposition) चित्रों का महत्व

लखु उडियार में एक ही चट्टान पर विभिन्न रंगों और शैलियों के चित्र एक-दूसरे के ऊपर बने हुए हैं। आधुनिक पुरातत्त्व में इसे Superimposition कहा जाता है।

यह तथ्य इस बात का संकेत देता है कि—

  • यह स्थल केवल एक पीढ़ी द्वारा नहीं, बल्कि लम्बे समय तक विभिन्न समुदायों द्वारा उपयोग किया गया।
  • विभिन्न कालों में यहाँ पुनः चित्रांकन हुआ।
  • सांस्कृतिक परंपराओं की निरन्तरता विद्यमान रही।

इस प्रकार लखु उडियार केवल एक चित्रशाला नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की सांस्कृतिक विरासत का अभिलेख है।


नई तकनीकों का प्रयोग

इक्कीसवीं शताब्दी में पुरातत्त्व केवल खुदाई तक सीमित नहीं रहा।

अब शोधकर्ता अनेक आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, जैसे—

  • GIS (Geographical Information System) द्वारा स्थलों का मानचित्रण।
  • 3D Digital Documentation द्वारा शैलचित्रों का डिजिटल संरक्षण।
  • DStretch (Digital Image Enhancement) जैसी तकनीकों से धुंधले चित्रों को स्पष्ट करना।
  • Portable X-Ray Fluorescence (pXRF) द्वारा रंगों में प्रयुक्त खनिजों का विश्लेषण।
  • सूक्ष्म भू-आकृतिक (Micro-geomorphological) अध्ययन द्वारा शैलाश्रयों के पर्यावरण का पुनर्निर्माण।

इन तकनीकों ने कई ऐसे चित्रों और रेखांकन को पहचानने में सहायता की है जो सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देते।


उत्तराखण्ड के अन्य पुरातात्विक स्थल

हाल के दशकों में कुमाऊँ एवं गढ़वाल क्षेत्र के कई अन्य शैलाश्रयों का पुनः सर्वेक्षण किया गया है। इनमें—

  • ग्वारख्या उडियार
  • हुडली
  • किमनी
  • फड़कानौली
  • पेटशाल
  • फलसीमा
  • लखु उडियार
  • महरू उडियार

जैसे स्थलों से प्राप्त चित्रों ने यह स्पष्ट किया है कि शैलचित्र परम्परा केवल लखु उडियार तक सीमित नहीं थी।

इससे यह संभावना और मजबूत होती है कि सम्पूर्ण मध्य हिमालय में प्रागैतिहासिक मानव समुदायों का व्यापक सांस्कृतिक नेटवर्क विद्यमान था।


संरक्षण की चुनौती

नवीन शोधों ने एक गंभीर समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है।

प्राकृतिक अपरदन, वर्षा, नमी, जैविक वृद्धि (Lichen), मानवीय हस्तक्षेप तथा अनियंत्रित पर्यटन के कारण अनेक शैलचित्र धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।

यदि समय रहते वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो मानव सभ्यता की यह अमूल्य धरोहर भविष्य की पीढ़ियों के लिए लुप्त हो सकती है।


इसे भी पढ़े: उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–3) "लखु उडियार: खोज, शैलचित्र और प्रागैतिहासिक मानव की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति"


निष्कर्ष 

उपलब्ध नवीन पुरातात्त्विक शोधों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष सामने आते हैं—

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक इतिहास पूर्व में अनुमानित अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध है।

लखु उडियार सहित अनेक शैलचित्र स्थल हिमालय में मानव की सांस्कृतिक गतिविधियों के सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों ने अनेक नए तथ्यों को उजागर किया है तथा भविष्य में और महत्वपूर्ण खोजों की संभावना बनी हुई है।

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक स्थलों का संरक्षण केवल राज्य की सांस्कृतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता की साझा विरासत की रक्षा का प्रश्न है।

अगले भाग में...

भाग–3 में हम विस्तार से जानेंगे—

  • लखु उडियार: उत्तराखंड की प्रागैतिहासिक शैलचित्र परंपरा की विश्वविख्यात धरोहर
  • भारतीय शैलचित्र परंपरा में लखु उडियार का स्थान
  • लखु उडियार की खोज और पुरातात्त्विक महत्व
  • उत्तराखंड के प्रागैतिहासिक अध्ययन में महत्व

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📚 संदर्भ (विश्वसनीय स्रोत)

  1. Yashodhar Mathpal – Rock Art in Kumaon Himalaya (IGNCA, 1995)
  2. M. P. Joshi – Kumaon Himalaya में शैलचित्रों पर प्रारम्भिक अध्ययन।
  3. Archaeological Survey of India (ASI) – संरक्षित स्मारकों का अभिलेख।
  4. Indian Archaeology – A Review (ASI) के विभिन्न वार्षिक अंक।
  5. K. P. Nautiyal एवं अन्य विद्वानों के मध्य हिमालय पर प्रकाशित शोधपत्र।
  6. Indian Journal of Archaeology, Man and Environment (Indian Society for Prehistoric and Quaternary Studies) तथा IGNCA के शैलकला संबंधी प्रकाशन।

 

 

 


 

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