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पश्चिमी रामगंगा घाटी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी | गेवाड़, सल्ट और चौकोट के वीरों की पूरी सूची |

ईश्वरी दत्त फुलोरिया
(स्वतंत्रता संग्राम सेनानी-आदिग्राम फुलोरिया)
फोटो साभार - श्री राजेश फूलोरिया एवं श्री नवीन फूलोरिया 

पश्चिमी रामगंगा घाटी के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी

गेवाड़, सल्ट और चौकोट की धरती से उठी आजादी की आवाज

पश्चिमी रामगंगा घाटी केवल अपने प्राकृतिक सौंदर्य, प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक स्मृतियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ के ग्रामीण समाज की सक्रिय भागीदारी के कारण भी इसका इतिहास विशेष महत्व रखता है।

रामगंगा के किनारे बसे गाँवों से लेकर गेवाड़, सल्ट और चौकोट की पहाड़ी पट्टियों तक स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना पहुँची। इस चेतना को केवल बड़े राजनीतिक नेताओं ने नहीं, बल्कि गाँवों में रहने वाले सामान्य लोगों, किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और युवाओं ने भी आगे बढ़ाया।

किसी ने सत्याग्रह किया, किसी ने आंदोलन में भाग लिया, किसी ने जेल की यातनाएँ सहीं और अनेक लोगों ने आर्थिक दण्ड भी भुगता। इस प्रकार स्वतंत्रता का संघर्ष यहाँ केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं रहा, बल्कि गाँव-गाँव की भागीदारी का जनआंदोलन बन गया।


गेवाड़ पट्टी : मासी से उठी स्वतंत्रता की चेतना

गेवाड़ पट्टी में मासी स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा। उपलब्ध अभिलेखों में मासी क्षेत्र से श्री अम्बा दत्त शर्मा और श्री शीश राम मासीवाल के नाम मिलते हैं।

खनूली से डॉ. मुरलीधर पाण्डे का नाम दर्ज है।

श्री राम दत्त फुलोरिया

इसी क्षेत्र के आदिग्राम फुलोरिया ने स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान दिया। यहाँ से श्री ईश्वरी दत्त फुलोरिया, श्री राम दत्त, श्री देवी दत्त, श्री विष्णु दत्त सहित अनेक सेनानियों के नाम दर्ज हैं।

थापला से श्री जमन सिंह और श्री धन सिंह, कनौड़ी से श्री तेग सिंह, श्री बद्रीलाल वर्मा और श्री तेज सिंह भण्डारी, काला चौना से श्री दान सिंह तथा कनगाड़ से श्री बोरा सिंह का नाम मिलता है।

पटलगाँव से श्री भवानी दत्त और श्री हयात सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में दर्ज हैं।

इन नामों से स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना गेवाड़ क्षेत्र के विभिन्न गाँवों तक व्यापक रूप से पहुँची थी।


चौखुटिया क्षेत्र : गाँवों से निकली आंदोलन की आवाज

चौखुटिया क्षेत्र से भी अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का उल्लेख मिलता है।

चौखुटिया से श्री आनन्द सिंह और श्री उमेद सिंह, नागाड़ से श्री कमल राम आर्य और श्री मोहन सिंह, बसभीड़ा से श्री केसर सिंह तथा महतगाँव से श्री तारा दत्त, श्री त्रिलोचन हर्बोला, श्री धरम सिंह, श्री नन्द किशोर हर्बोला, श्री भवानी दत्त और श्री रूप सिंह के नाम दर्ज हैं।

उडलीखान से श्री जोग सिंह, बरलगाँव से श्री त्रिलोक सिंह, तथा महाकालेश्वर से अनेक सेनानियों के नाम मिलते हैं।

महाकालेश्वर की सूची में श्री खीम सिंह, श्री पद्म सिंह, श्री पूरन सिंह, श्री पान सिंह, श्री बुद्धि सिंह, श्री भवान सिंह, श्री भगत सिंह, श्री मदन सिंह, श्री मनदेव, श्री लाल सिंह, श्री हयात सिंह तथा श्री पान सिंह भण्डारी के नाम दर्ज हैं।

इसी क्रम में जमराड़ से श्री नारायण सिंह, पीपलधार से श्री नारायण सिंह, श्री नन्द राम और श्री शिव दत्त, रामपुर से श्री बची पहाड़ी, बेरती-चित्रेश्वर से श्री मोहन सिंह, बौनीगाड़ से श्री शिव दत्त और बाखली से श्री लक्ष्मण सिंह के नाम मिलते हैं।

हाट-धामदेवल से श्री हयात सिंह और श्री शेर सिंह, ग्वैलचैड़ा से श्री हयात सिंह और श्री हरि सिंह, तथा धुधलिया से श्री हीरा सिंह का नाम दर्ज है।


चौकोट पट्टी : स्वतंत्रता संघर्ष की एक विस्तृत स्मृति

चौकोट पट्टी भी स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए है।

तल्ला चौकोट

पैठना से श्री ज्योतिराम काण्डपाल और श्री भैरव दत्त जोशी के नाम दर्ज हैं।

तिमली से श्री रूद्र सिंह बिष्ट, श्री जंग बहादुर सिंह बिष्ट, श्री बचन सिंह रावत, श्री जसवन्त सिंह बिष्ट और श्री दुर्गा सिंह बिष्ट स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में मिलते हैं।

बिचला चौकोट

उदयपुर से श्री खुशाल सिंह मनराल का नाम दर्ज है।

मल्ला चौकोट

देघाट-स्याल्दे क्षेत्र की सूची विशेष रूप से विस्तृत है। इसमें श्री हरीकृष्ण, श्री हीरामणी, श्री कुशल सिंह, श्री खिमानन्द, श्री गंगा सिंह, श्री चिंतामणी, श्री देवी दत्त, श्री दिवान सिंह, श्री नन्दकिशोर, श्री प्रेम सिंह, श्री बचे सिंह, श्री बद्री दत्त, श्री भगत सिंह, श्री राम दत्त, श्रीमती राधा देवी, श्री लक्ष्मण सिंह, श्री हर्षदेव पुत्र श्री बचीराम तथा श्री हर्षदेव पुत्र श्री देवराम के नाम दर्ज हैं।

यह सूची इस बात की ओर संकेत करती है कि देघाट-स्याल्दे क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक सामाजिक भागीदारी रही।


सल्ट : स्वतंत्रता आंदोलन की सशक्त भूमि

पश्चिमी रामगंगा घाटी के स्वतंत्रता आंदोलन का उल्लेख सल्ट के बिना अधूरा है।

सल्ट क्षेत्र के खुमाड़ से बड़ी संख्या में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम उपलब्ध होते हैं।

इनमें श्री पुरुषोत्तम उपाध्याय, श्री रघुवर दत्त उपाध्याय, श्री गंगा राम उपाध्याय, श्री पान देव उपाध्याय, श्री भवानी दत्त उपाध्याय, श्री पूर्णानन्द उपाध्याय, श्री हरि दत्त वैद्य जी, श्री लालमणी उपाध्याय, श्री हयात सिंह भण्डारी, श्री खीम सिंह भण्डारी, श्री देवी दत्त काण्डपाल, श्री नीलाम्बर नदोलिया, श्री दीवान सिंह महरा, श्री नारायण दत्त उपाध्याय (कालदेव), श्री गोपाल सिंह बोरा, श्री केशव दत्त उपाध्याय, श्री हीरामणी उपाध्याय, श्री माधवानन्द उपाध्याय, श्री बद्री दत्त शर्मा, श्री नन्दराम नखुड़िया, श्री लीलाधर काण्डपाल, श्री नन्दराम उपाध्याय, श्री खीमदेव काण्डपाल, श्री मनशोधन कोटिया, श्री रूपदेव जोशी, श्री नैनमणी उपाध्याय तथा श्री उदे सिंह शामिल हैं।

इतने अधिक नामों का एक ही क्षेत्र से दर्ज होना इस बात का महत्वपूर्ण दस्तावेजी संकेत है कि खुमाड़ और आसपास के क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन का सामाजिक आधार व्यापक था।


सल्ट के अन्य गाँवों के सेनानी

कटरिया से श्री गंगा दत्त शास्त्री, श्री बचीराम शर्मा, श्री गणेश दत्त शर्मा, श्री हरी दत्त शर्मा, श्री लछीराम शर्मा, श्री भोला दत्त नखुड़िया, श्री गोपाल दत्त नखोड़िया और श्री आनदेव पालीवाल के नाम दर्ज हैं।

कफल्टा से श्री उदे सिंह बोरा, श्री माधवानन्द उपाध्याय और श्री दीवान सिंह बोरा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के रूप में सूचीबद्ध हैं।

पिपना से श्री प्रेम बल्लभ उपाध्याय, श्री हरीदत्त उपाध्याय, श्री किशनानन्द उपाध्याय, श्री बिणदेव, श्री बद्री दत्त, श्री मोतीराम, श्री गुरुदेव, श्री बचे सिंह कड़ाकोटी, श्री भोला दत्त सत्यवली, श्री टीकाराम, श्री गुसाईं देव, श्री उदेराम और श्री नारायण दत्त के नाम मिलते हैं।

सिलोर से श्री मथुरा दत्त और श्री अम्बा दत्त भट्ट, जंतरा से श्री बचे सिंह, चमकना से श्री लक्ष्मण सिंह अधिकारी, श्री प्रताप सिंह मालगुजार, श्री मोहर सिंह और श्री नारायण सिंह के नाम दर्ज हैं।

जामड़ी से श्री तारा दत्त, डभरा से श्री मंगल सिंह, श्री कुशल सिंह और श्री उत्तम सिंह, तथा डंगूला से श्री लक्ष्मण सिंह धुसाद, श्री बचे सिंह धुसाद और श्री हीरा सिंह धुसाद का उल्लेख मिलता है।

भ्याड़ी से श्री बहादुर सिंह, श्री ध्यान सिंह, श्री आनन्द सिंह और श्री झुसदेव, बैला से श्री प्रेम सिंह नयाल बिष्ट, श्री खुशाल सिंह रावत और श्री भीम सिंह नयाल बिष्ट, पोखरी से अनेक सेनानियों तथा छतेड़ से श्री हरिद्वार गिरी का नाम दर्ज है।

इसके अतिरिक्त उपलब्ध सूची में श्री गोविन्द ध्यानी, श्री मदन मोहन उपाध्याय, श्री लोकमणी नैलवाल, श्री बचीराम उपाध्याय, श्री दयाराम नैलवाल, श्री तुलाराम नैनवाल (प्रथम), श्री तुलाराम नैनवाल (द्वितीय), श्री अम्बा दत्त नैलवाल, श्री मथुरा दत्त नखुड़िया और श्री भानदेव उपाध्याय के नाम भी मिलते हैं।


आदिग्राम फुलोरिया : जेल, जुर्माना और संघर्ष की कहानी

मासी क्षेत्र का आदिग्राम फुलोरिया स्वतंत्रता आंदोलन की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है।

तालिका में यहाँ के सेनानियों के साथ उनके कारावास की अवधि और अर्थदण्ड का भी विवरण दिया जा रहा है  

क्र. सं.सेनानीपिता का नामकारावास का विवरणअर्थदण्ड
1.श्री ईश्वरीदत्त फुलोरियाश्री जयकृष्ण फुलोरिया1930 – 4 माह; 1940 –9 माह;
1942 – 6-6 माह 
2.श्री त्रिलोचन फुलोरियाश्री गुजदेव फुलोरिया1930 – 1 वर्ष; 1941 – 10 माह₹200
3.श्री रामदत्त फुलोरियाश्री मनोरथ फुलोरिया1941 – 10 माह; 1942 – 2 वर्ष₹50
4.श्री देवीदत्त फुलोरियाश्री पुरुषोत्तम फुलोरिया1930 – 4 माह; 1942 – 2 वर्ष₹200
5.श्री विष्णुदत्त फुलोरियाश्री दयाराम फुलोरिया1942 – 1 वर्ष₹50
6.श्री ईश्वरीदत्त फुलोरियाश्री पुरुषोत्तम फुलोरिया1942 – 1 वर्ष₹50
7.श्री रामदत्त फुलोरियाश्री राधापति फुलोरिया1930 – 4 माह
8.श्री उमाकान्त फुलोरियाश्री मनोरथ फुलोरिया         -

यह तालिका स्वतंत्रता संग्राम के उस पक्ष को सामने लाती है जिसे केवल घटनाओं और नारों से नहीं समझा जा सकता। कारावास और आर्थिक दण्ड स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर दिए गए मूल्य की ओर संकेत करते हैं।                                           


आदिग्राम फुलोरिया के स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में यहाँ स्मृति-द्वार का निर्माण किया गया है। साथ ही, उनके नाम और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान की स्मृति में शिलालेख भी स्थापित किए गए हैं।


5 सितम्बर और खुमाड़ की शहीद स्मृति


देघाट में बने ये दोनों शहीद स्मारक, स्वतंत्रता संग्राम में क्षेत्र के वीर सेनानियों के अदम्य साहस और बलिदान की अमर गाथा कहते हैं। ये स्मारक आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता की कीमत और देशभक्ति की प्रेरणा सदैव देते रहेंगे।

पश्चिमी रामगंगा क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों में खुमाड़ का विशेष स्थान है।

5 सितम्बर 1947 को सर्वप्रथम खुमाड़ में शहीद दिवस मनाया गया। आज भी क्षेत्रीय स्तर पर 5 सितम्बर को खुमाड़ में शहीद दिवस और मेले के आयोजन की परंपरा का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी आंदोलन की स्मृति केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि स्थानीय स्मृति, जनभागीदारी और वार्षिक आयोजन के माध्यम से जीवित रही।


पश्चिमी रामगंगा घाटी का स्वतंत्रता संग्राम : एक सामूहिक इतिहास

गेवाड़, चौखुटिया, चौकोट और सल्ट की इन सूचियों को साथ रखकर देखने पर स्वतंत्रता आंदोलन की एक व्यापक तस्वीर सामने आती है।

यह इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध नामों का इतिहास नहीं है। इसमें मासी के गाँव हैं, खुमाड़ की धरती है, देघाट-स्याल्दे का जनसमुदाय है, चौखुटिया के गाँव हैं और रामगंगा घाटी के अनेक छोटे-छोटे गाँव हैं।

कहीं जेल की सजा मिली, कहीं अर्थदण्ड लगाया गया और कहीं आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण परिवारों को कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं। फिर भी स्वतंत्रता की आकांक्षा कमजोर नहीं हुई।

आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली, लेकिन उसकी नींव उन असंख्य लोगों के संघर्ष से बनी थी जिनके नाम इतिहास की बड़ी पुस्तकों में शायद कम दिखाई देते हैं, पर स्थानीय स्मृतियों और दस्तावेजों में आज भी सुरक्षित हैं।

पश्चिमी रामगंगा घाटी के ये स्वतंत्रता सेनानी उसी अनकहे इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं।


निष्कर्ष

पश्चिमी रामगंगा घाटी का स्वतंत्रता संग्राम हमें यह समझने का अवसर देता है कि भारत की स्वतंत्रता केवल बड़े नगरों और राजनीतिक केंद्रों की कहानी नहीं थी। इसकी जड़ें दूरस्थ पहाड़ी गाँवों तक फैली थीं।

गेवाड़ से सल्ट और चौकोट तक अनेक लोगों ने अपने स्तर पर स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया। जेल यात्राएँ, अर्थदण्ड और आंदोलन में सक्रिय भागीदारी इस संघर्ष की कठिनाइयों को सामने लाती हैं।

इन सेनानियों के नामों को संकलित करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि स्थानीय इतिहास को उसके वास्तविक सामाजिक आधार के साथ पहचानना भी है।

“स्वतंत्रता का इतिहास केवल उन लोगों का नहीं जिन्होंने इतिहास लिखा,
बल्कि उन लोगों का भी है जिन्होंने अपने संघर्ष से इतिहास रचा।”

स्रोत

  1. बिष्ट, न. (2015) 

  2. देघाट सूचना-पट — स्थानीय रूप से उपलब्ध अभिलेखीय सूचना।

  3. आदिग्राम फुलोरिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से संबंधित उपलब्ध विवरण।

नोट: उक्त स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अतिरिक्त यदि आपके संज्ञान में कोई और भी हैं तो कृपया कमेन्ट के माध्यम से अवश्य साझा करें। 

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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

उत्तराखण्ड का स्वतंत्रता संग्राम : औपनिवेशिक शोषण, कुली बेगार आन्दोलन और सल्ट–खुमाण जनप्रतिरोध का ऐतिहासिक अध्ययन


📚 इस लेख को पढ़ने से पहले-

यह लेख "उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक काल" शोध-श्रृंखला का भाग-13 है। यदि आपने इस श्रृंखला के पिछले लेख नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें पहले अवश्य पढ़ें। इससे इस लेख में वर्णित पुरातात्त्विक स्थलों, सांस्कृतिक विकास तथा शोध निष्कर्षों को समझना अधिक सरल और रोचक होगा।

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भूमिका : विकास के पीछे छिपा औपनिवेशिक शोषण

ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तराखण्ड में सड़क, डाकबंगले, प्रशासनिक केन्द्र और यातायात जैसी व्यवस्थाओं के विकास के प्रयास हुए, लेकिन इन कार्यों से अंग्रेजी शासन स्थानीय जनता के बीच लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका प्रमुख कारण था—विकास के साथ जुड़ा व्यापक शोषण और औपनिवेशिक दमन।

ब्रिटिश शासन की कठोर नीतियों ने पर्वतीय समाज में असंतोष की ऐसी जमीन तैयार की, जिस पर आगे चलकर स्वतंत्रता आन्दोलन की मजबूत नींव पड़ी। देश में उठ रही राष्ट्रीय चेतना की लहर से उत्तराखण्ड भी अछूता नहीं रहा। विभिन्न स्रोतों के अनुसार, 1857 के विद्रोह से ही कालूमहरा के नेतृत्व में उत्तराखण्ड में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रारम्भ माना गया है।

समय के साथ इस प्रतिरोध को आगे बढ़ाने वालों की लंबी श्रृंखला सामने आई। गोविन्द बल्लभ पंत, हरगोविन्द पंत, मोहन जोशी, चिरंजीलाल, हेमचन्द्र, बद्रीदत्त पाण्डे, श्रीदेव सुमन, ज्योतिराम काण्डपाल, इन्द्र सिंह नयाल, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली, अनुसूया प्रसाद बहुगुणा और भैरव दत्त जोशी जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित किया। इनमें से अनेक नेता गाँव-गाँव और क्षेत्र-क्षेत्र घूमकर युवाओं में देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना जागृत कर रहे थे।

सन् 1920 के असहयोग आन्दोलन से लेकर 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन तक उत्तराखण्ड की जनता ने राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी की। गांधीजी के आह्वान पर गोविन्द बल्लभ पंत के नेतृत्व में घाटी में बड़ी संख्या में लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की।


कुली बेगार : वह व्यवस्था जिसने पहाड़ के आत्मसम्मान को चुनौती दी

उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता आन्दोलन को समझने के लिए कुली बेगार व्यवस्था को समझना अत्यंत आवश्यक है।

कुमाऊँ में ब्रिटिश अधिकारियों के आने और बसने के बाद पहाड़ी भूगोल के कारण यातायात एक बड़ी समस्या थी। अधिकारियों को दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर डोली में ले जाया जाता था। उनके सामान को ढोने तथा विभिन्न सेवा कार्यों के लिए स्थानीय लोगों से बिना पारिश्रमिक श्रम लिया जाता था।

इसी व्यवस्था के तीन प्रमुख रूप थे—

कुली उतार, कुली बर्दाश और कुली बेगार।

  • कुली उतार: ग्रामीणों को रास्तों पर उतार कर अंग्रेज अधिकारियों का समान एक स्थान से दूसरे स्थान पर बिना पारिश्रमिक दिए पहुंचाने को बाध्य करना। 
  • कुली बर्दाश: अंग्रेज अधिकारियों या उनके मेहमानों के ठहरने पर उनके भोजन और ईंधन की निःशुल्क व्यवस्था करना। 
  • कुली बेगार: बिना पारिश्रमिक दिए जबरन श्रम करवाना अथवा समान ढुलवाना। 

अंग्रेज प्रशासन ने लोगों की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बेगार रजिस्टर तक बनाए थे। ग्रामीणों को अपना काम छोड़कर अंग्रेज अधिकारियों के भारी सामान को दूर-दूर तक ढोना पड़ता था और इसके बदले उन्हें कोई मेहनताना नहीं मिलता था।

धीरे-धीरे यह व्यवस्था केवल आर्थिक शोषण का प्रश्न नहीं रही। यह ग्रामीण समाज के आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना से जुड़ गई।

और फिर उत्तराखण्ड ने इसका संगठित प्रतिरोध किया।


14 जनवरी 1921 : सरयू में बहा बेगार का रजिस्टर

14 जनवरी 1921।

मकर संक्रान्ति का दिन।

बागेश्वर का प्रसिद्ध उतरायणी मेला

सरयू बगड़ में एक विशाल जनसभा आयोजित हुई। इसके पीछे नेतृत्व था—बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत और विक्टर मोहन जोशी का।

सभा में जनता ने अंग्रेजों के लिए किसी भी प्रकार का बेगार और डोली-पालकी व्यवस्था न करने का संकल्प लिया।

लेकिन इस संकल्प को इतिहास में अमर बनाने वाला दृश्य अभी बाकी था।

कुमाऊँ क्षेत्र के विभिन्न गाँवों के कुली बेगार रजिस्टरों को सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया गया।

सरयू की धारा में बहते वे रजिस्टर औपनिवेशिक व्यवस्था के विरुद्ध जनप्रतिरोध के प्रतीक बन गए। इस आन्दोलन की सफलता ने जनता में नई ऊर्जा पैदा की, जबकि अंग्रेज प्रशासन इससे अत्यधिक क्रुद्ध हुआ।


सल्ट में अंग्रेजों को मिली खाली वापसी

कुली बेगार आन्दोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश प्रशासन ने कार्रवाई तेज की। रानीखेत के एस.डी.एम. हबीबुर्रहमान को सल्ट की चार पट्टियों और पौड़ी की गुजुड़पट्टी में बेगार वसूलने भेजा गया।

लेकिन अंग्रेज अधिकारी सल्ट पहुँचते, उससे पहले ही हरगोविन्द पंत वहाँ पहुँच चुके थे।

उन्होंने खुमाण के सरकारी विद्यालय के शिक्षक पुरुषोत्तम उपाध्याय, लक्ष्मण सिंह अधिकारी और पान सिंह पटवाल के साथ मिलकर व्यापक जनसम्पर्क किया और ग्रामीणों को समझाया कि सरकार को बेगार न दिया जाए।

जनता संगठित हो चुकी थी। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज अधिकारियों को खाली हाथ लौटना पड़ा।

यह घटना बताती है कि पर्वतीय क्षेत्रों में राष्ट्रीय आन्दोलन केवल शहरों तक सीमित नहीं था। यहाँ गाँव स्वयं राजनीतिक चेतना के केन्द्र बन रहे थे।


पुरुषोत्तम उपाध्याय : एक शिक्षक का घर बना आन्दोलन का केन्द्र

खुमाण निवासी पुरुषोत्तम उपाध्याय का घर स्वतंत्रता आन्दोलन की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र बन गया था।

वहाँ अक्सर बैठकें होती थीं और राष्ट्रीय आन्दोलन से संबंधित रणनीतियाँ तैयार की जाती थीं। देशसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी।

सन् 1929 में गांधीजी के कुमाऊँ आगमन के दौरान 16 जून को प्रेम विद्यालय, ताड़ीखेत में आयोजित वार्षिकोत्सव में उन्होंने अपने साथियों के साथ गांधीजी से भेंट की। इसके बाद वे गांधीजी के संपर्क में बने रहे और 31 दिसम्बर 1929 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में भी भाग लिया।

चौकोट पट्टी के रूद्र सिंह बिष्ट सहित क्षेत्र के अनेक लोगों ने कांग्रेस के विभिन्न अधिवेशनों में भाग लेकर राष्ट्रीय आन्दोलन से अपना संबंध मजबूत किया।


दांडी मार्च की गूँज रामगंगा घाटी तक

गांधीजी के दांडी मार्च का प्रभाव उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्रों में भी दिखाई दिया।

सन् 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान सल्ट क्षेत्र के उभरी, चमकना और हटुली गाँवों में नमक बनाकर नमक कानून का विरोध किया गया।

उत्तराखण्ड से तीन सत्याग्रहियों ने दांडी यात्रा में भाग लिया—

  • ज्योतिराम काण्डपाल

  • खड़क बहादुर

  • भैरव दत्त जोशी

इनमें ज्योतिराम काण्डपाल और भैरव दत्त जोशी दोनों रामगंगा घाटी की बिचला चौकोट पट्टी से संबंधित थे।

यह तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि रामगंगा घाटी का स्थानीय संघर्ष राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की व्यापक धारा से जुड़ा हुआ था।


ज्योतिराम काण्डपाल : खादी और जनसेवा के माध्यम से स्वराज की साधना

दांडी यात्रा से लौटने के बाद ज्योतिराम काण्डपाल ने देघाट में खादी के प्रचार-प्रसार के लिए उद्योग मंदिर की स्थापना की।

यह केवल खादी उत्पादन का केन्द्र नहीं था। जनकल्याण को ध्यान में रखते हुए वहाँ रोगियों के उपचार के लिए औषधालय भी स्थापित किया गया।

लेकिन ब्रिटिश सरकार ने सन् 1932 में देघाट उद्योग मंदिर को जब्त कर लिया।

फिर भी काण्डपाल जी का सेवा-भाव समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने मासी के समीप सुतनिया नामक स्थान पर निजी औषधालय खोलकर रोगियों की सेवा जारी रखी।

देशसेवा और समाजसेवा करते हुए सन् 1938 में उनका निधन हुआ, लेकिन वे अपने पीछे देशभक्तों की एक लंबी परम्परा छोड़ गए।


1942 : भारत छोड़ो आन्दोलन और उत्तराखण्ड

सन् 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया।

8 अगस्त 1942 को राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में भी विरोध प्रदर्शन तेज हुए।

इस आन्दोलन के दौरान देघाट और सल्ट क्षेत्र ने जो कीमत चुकाई, वह उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता इतिहास का अत्यंत मार्मिक अध्याय है।


देघाट गोलीकाण्ड : शांतिपूर्ण जुलूस पर चलीं गोलियाँ

मल्लाचौकोट पट्टी के देघाट में जनता शांतिपूर्ण जुलूस निकाल रही थी।

लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने इस जुलूस पर गोलियाँ चला दीं।

इस गोलीकाण्ड में हीरामणी और हरिकृष्ण उप्रेती शहीद हो गए।

देघाट की घटना के बाद अंग्रेज प्रशासन ने क्षेत्र में अपना दमन और अधिक बढ़ा दिया।

रानीखेत तहसील का एस.डी.एम. जॉनसन सैनिकों के साथ चौखुटिया डाकबंगले पहुँचा और वहाँ से नौगाँव, अखोड़िया, गनाई से लेकर मासी तक विभिन्न स्थानों पर छापे मारे तथा अनेक कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया।

लेकिन संघर्ष थमा नहीं।


रणसिंह की आवाज और खुमाण की ओर बढ़ती अंग्रेजी सेना

जब जॉनसन सल्ट की ओर बढ़ा तो पिपना गाँव के बिड़देव ने रणसिंह बजाकर लोगों को सतर्क किया।

इसी दौरान स्वतंत्रता सेनानी लालमणी ने अंग्रेजी सेना का विरोध किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

जॉनसन जब खुमाण पहुँचा तो उसका उद्देश्य आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार करना था। लेकिन गोविन्द ध्यानी के नेतृत्व में युवकों ने इसका कड़ा विरोध किया।

और फिर इतिहास का एक रक्तरंजित अध्याय सामने आया।


5 सितम्बर 1942 : खुमाण गोलीकाण्ड

5 सितम्बर 1942।

सल्ट क्षेत्र में कांग्रेस का प्रमुख केन्द्र—खुमाण

अंग्रेज प्रशासन और आन्दोलनकारियों के बीच तनाव बढ़ चुका था। जॉनसन ने निहत्थी जनता पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।

देघाट की तरह खुमाण की धरती भी गोलियों से गूँज उठी।

इस गोलीकाण्ड में गंगादत्त और खीमदेव, दो सगे भाई, घटनास्थल पर ही शहीद हो गए। चूड़ामणी और बहादुर सिंह मेहरा ने उपचार के दौरान, घटना के चौथे दिन, प्राण त्याग दिए।

इसके अतिरिक्त गंगादत्त शास्त्री, गोपाल सिंह, गोपाल दत्त, मधुसूदन, रूपदेव, नारायण सिंह और बचे सिंह सहित अनेक आन्दोलनकारी घायल हुए।

इस घटना को इतिहास में ‘खुमाण गोलीकाण्ड’ के नाम से जाना गया।

रानीखेत अदालत में इसी नाम से मुकदमा दर्ज हुआ और सल्ट के क्रांतिकारियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। लक्ष्मण सिंह अधिकारी, प्रेमबल्लभ उपाध्याय, रघुवर दत्त उपाध्याय, किशनानन्द उपाध्याय, मथुरा दत्त, अम्बा दत्त, खुशाल सिंह, नैनमणी उपाध्याय, तारा दत्त और हरि दत्त वैद्य जैसे प्रमुख सेनानियों को बिना अदालत में पेश किए डेढ़ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।

क्षेत्रवासियों के देशप्रेम और बलिदान की गांधीजी ने प्रशंसा की और इस संघर्ष को ‘कुमाऊँ की बारदोली’ की संज्ञा दी।


गेवाड़घाटी : क्रांतिकारी चेतना का एक और केन्द्र

उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता आन्दोलन में गेवाड़घाटी की भूमिका भी उल्लेखनीय रही।

गेवाड़घाटी में आन्दोलन की कमान दोरा पट्टी, द्वाराहाट के क्रांतिकारी नेता मदनमोहन उपाध्याय के हाथों में रही।

ब्रिटिश सरकार उनसे इतनी भयभीत थी कि उन्हें जीवित अथवा मृत पकड़ने पर 5000 रुपये का इनाम घोषित किया गया था। फिर भी अंग्रेज उन्हें पकड़ने में सफल नहीं हुए। एक अवसर पर मासी क्षेत्र के पटवारी ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन वे पटवारी को ही बन्धक बनाकर वहाँ से निकल गए।

इस क्षेत्र के अनेक लोगों ने जेल की यातनाएँ भी सहीं। बुद्धि सिंह बिष्ट को छह वर्ष तीन माह तक कारावास की यातनाएँ झेलनी पड़ीं। वे मंडल कांग्रेस के अध्यक्ष, कांग्रेस सेवा दल के सदस्य तथा जिला एवं प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सक्रिय सदस्य रहे। भारत कृषक समाज से भी उनका आजीवन संबंध रहा।

इसी प्रकार आदिग्राम के ईश्वरी दत्त फुलोरिया स्वतंत्रता आन्दोलन के सक्रिय कार्यकर्ता थे और उनका योगदान भी उल्लेखनीय रहा।


गाँवों की धरती पर फैला स्वतंत्रता आन्दोलन

स्वतंत्रता संग्राम को केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं के नामों से समझना पर्याप्त नहीं है। उत्तराखण्ड की वास्तविक कहानी उन असंख्य ग्रामीण सेनानियों में भी छिपी है जिन्होंने अपने-अपने गाँवों से इस आन्दोलन को शक्ति दी।

उपलब्ध स्रोतों में गेवाड़, सल्ट और चौकोट पट्टियों के अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का विवरण मिलता है। इनमें मासी, खनूली, आदिग्राम फुलोरिया, थापला, कनौड़ी, काला चौना, कनगाड़, पटलगाँव, चौखुटिया, नागाड़, बसभीड़ा, महतगाँव, उडलीखान, बरलगाँव, महाकालेश्वर, जमराड़, पीपलधार, रामपुर, बेरती-चित्रेश्वर, बौनीगाड़, बाखली, हाट-धामदेवल, ग्वैलचैड़ा और धुधलिया आदि क्षेत्रों के सेनानी शामिल हैं।

चौकोट क्षेत्र में ज्योतिराम काण्डपाल, भैरव दत्त जोशी, रूद्र सिंह बिष्ट, जंग बहादुर सिंह बिष्ट, बचन सिंह रावत, जसवन्त सिंह बिष्ट, दुर्गा सिंह बिष्ट और खुशाल सिंह मनराल जैसे नाम सामने आते हैं।

देघाट-स्याल्दे क्षेत्र में हरीकृष्ण, हीरामणी, कुशल सिंह, खिमानन्द, गंगा सिंह, चिंतामणी, देवी दत्त, दिवान सिंह, नन्दकिशोर, प्रेम सिंह, बचे सिंह, बद्री दत्त, भगत सिंह, राम दत्त, राधा देवी, लक्ष्मण सिंह तथा हर्षदेव आदि के नाम मिलते हैं।

सल्ट के खुमाड़ क्षेत्र से पुरुषोत्तम उपाध्याय, रघुवर दत्त उपाध्याय, गंगा राम उपाध्याय, पान देव उपाध्याय, भवानी दत्त उपाध्याय, पूर्णानन्द उपाध्याय, हरि दत्त वैद्य, लालमणी उपाध्याय, हयात सिंह भण्डारी, खीम सिंह भण्डारी, देवी दत्त काण्डपाल, नीलाम्बर नदोलिया, दीवान सिंह महरा, नारायण दत्त उपाध्याय (कालदेव), गोपाल सिंह बोरा, केशव दत्त उपाध्याय, हीरामणी उपाध्याय, माधवानन्द उपाध्याय, बद्री दत्त शर्मा, नन्दराम नखुड़िया, लीलाधर काण्डपाल, नन्दराम उपाध्याय, खीमदेव काण्डपाल, मनशोधन कोटिया, रूपदेव जोशी, नैनमणी उपाध्याय और उदे सिंह जैसे अनेक सेनानियों का उल्लेख मिलता है।

इसी प्रकार कटरिया, कफल्टा, पिपना, सिलोर, जंतरा, चमकना, जामड़ी, डभरा, डंगूला, भ्याड़ी, बैला, पोखरी और छतेड़ आदि स्थानों के भी अनेक स्वतंत्रता सेनानियों के नाम स्रोत में दर्ज हैं।

इन नामों की लंबी सूची हमें यह समझने में सहायता करती है कि स्वतंत्रता आन्दोलन किसी एक नगर, एक नेता या एक संगठन की गतिविधि नहीं था। यह गाँवों की सामूहिक राजनीतिक चेतना में गहराई तक उतर चुका था।


आदिग्राम फुलोरिया : एक गाँव, अनेक सेनानी और कारावास की पीड़ा

रामगंगा नदी के दाहिने तट पर स्थित आदिग्राम फुलोरिया स्वतंत्रता आन्दोलन की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

यहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों का विवरण-

ईश्वरीदत्त फुलोरिया

पिता—जयकृष्ण फुलोरिया
कारावास—1930 में 4 माह, 1940 में अवधि स्रोत में अपूर्ण, 1942 में 6 माह
अर्थदण्ड—नहीं।

त्रिलोचन फुलोरिया

पिता—गुजदेव फुलोरिया
कारावास—1930 में 1 वर्ष, 1941 में 10 माह
अर्थदण्ड—200 रुपये।

रामदत्त फुलोरिया

पिता—मनोरथ फुलोरिया
कारावास—1941 में 10 माह, 1942 में 2 वर्ष
अर्थदण्ड—50 रुपये।

देवीदत्त फुलोरिया

पिता—पुरुषोत्तम फुलोरिया
कारावास—1930 में 4 माह, 1942 में 2 वर्ष
अर्थदण्ड—200 रुपये।

विष्णुदत्त फुलोरिया

पिता—दत्राराम फुलोरिया
कारावास—1942 में 1 वर्ष
अर्थदण्ड—50 रुपये।

ईश्वरीदत्त फुलोरिया

पिता—पुरुषोत्तम फुलोरिया
कारावास—1942 में 1 वर्ष
अर्थदण्ड—50 रुपये।

रामदत्त फुलोरिया

पिता—राधापति फुलोरिया
कारावास—1930 में 4 माह
अर्थदण्ड—नहीं।

इन विवरणों से स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने की कीमत केवल जेल नहीं थी। अनेक परिवारों को आर्थिक दण्ड, सामाजिक कठिनाइयों और वर्षों के कारावास का सामना करना पड़ा।


उपसंहार : स्वतंत्रता की कीमत पहाड़ ने भी चुकाई थी

उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास केवल राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रतिध्वनि नहीं था। यह अपनी विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों से निर्मित जनप्रतिरोध की स्वतंत्र ऐतिहासिक धारा भी था।

कुली बेगार के विरुद्ध उठी आवाज ने जनता को संगठित किया।
सरयू में बहाए गए बेगार रजिस्टरों ने औपनिवेशिक व्यवस्था को खुली चुनौती दी।
नमक सत्याग्रह ने राष्ट्रीय आन्दोलन को रामगंगा घाटी और सल्ट तक पहुँचाया।
देघाट और खुमाण में चली गोलियों ने इस संघर्ष की कीमत रक्त से लिखी।
गेवाड़, चौकोट, सल्ट, स्याल्दे और रामगंगा घाटी के गाँवों ने जेल, अर्थदण्ड और दमन सहकर स्वतंत्रता की लड़ाई को आगे बढ़ाया।

अंततः 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। इस स्वतंत्रता के पीछे उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों का योगदान था, जिन्होंने न जेल से डरकर पीछे हटे और न ही यातनाओं से। इस इतिहास की स्मृति आज भी जीवित है।

5 सितम्बर 1947 को पहली बार खुमाण में शहीद दिवस मनाया गया और वर्तमान में भी प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को वहाँ शहीद दिवस तथा मेले का आयोजन किया जाता है।

इतिहास हमें यही बताता है—

आजादी केवल 15 अगस्त 1947 को मिली हुई कोई तारीख नहीं थी।
यह उन अनगिनत दिनों, रातों, जेलों, यातनाओं और बलिदानों का परिणाम थी,
जिन्होंने हिमालय की घाटियों में स्वतंत्रता की चेतना को जीवित रखा।

उत्तराखण्ड की पहाड़ियों ने केवल आजादी की हवा महसूस नहीं की थी—
उन्होंने उसकी कीमत भी चुकाई थी।

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स्रोत

बिष्ट, न. (2015) एवं देघाट सूचनापट; तथा स्रोत सामग्री में उल्लिखित मनराल एवं मित्तल (2010)

संदर्भ

  1. बदरीदत्त पांडे — कुमाऊँ का इतिहास, 1937।

  2. शेखर पाठक — उत्तराखण्ड में कुली बेगार प्रथा, राधाकृष्ण प्रकाशन, 1987।

  3. शेखर पाठक — A Study of Social Movements in Uttarakhand, 1982।

  4. उत्तराखण्ड के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित स्थानीय ऐतिहासिक अभिलेख एवं प्रकाशित सामग्री।

  5. श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय की पाठ्य-सामग्री।

  6. उत्तरायणी मेला, बागेश्वर से संबंधित सरकारी/ऐतिहासिक अभिलेख। 


लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)



उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन और पश्चिमी रामगंगा घाटी | मासी–पाली का आधुनिक इतिहास


 

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यह लेख "उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक काल" शोध-श्रृंखला का भाग-13 है। यदि आपने इस श्रृंखला के पिछले लेख नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें पहले अवश्य पढ़ें। इससे इस लेख में वर्णित पुरातात्त्विक स्थलों, सांस्कृतिक विकास तथा शोध निष्कर्षों को समझना अधिक सरल और रोचक होगा।

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उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन और पश्चिमी रामगंगा घाटी: मासी–पाली क्षेत्र के प्रशासनिक एवं ऐतिहासिक अवशेष

उत्तराखण्ड के इतिहास में सन् 1815–16 ई. का कालखंड एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन का साक्षी रहा। गोरखा शासन के अंत के बाद अंग्रेजी सत्ता का विस्तार कुमाऊँ और गढ़वाल के बड़े भूभाग तक हुआ। 4 मार्च 1816 ई. को नेपाल नरेश द्वारा संधि की पुष्टि के साथ कुमाऊँ-गढ़वाल सहित पश्चिमी रामगंगा घाटी में भी ब्रिटिश शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके बाद इस पर्वतीय क्षेत्र में केवल राजनीतिक सत्ता ही नहीं बदली, बल्कि प्रशासन, राजस्व व्यवस्था, न्याय, परिवहन, शिक्षा और स्थानीय संस्थाओं की संरचना में भी व्यापक परिवर्तन होने लगे।

इसी परिवर्तन की कहानी को समझने के लिए मासी और पाली जैसे क्षेत्र विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। आज इन स्थानों पर दिखाई देने वाले पुराने भवन, पुल, तहसील परिसर, कारागार के अवशेष और स्थानीय परंपराएँ उस दौर की ऐतिहासिक स्मृतियों को अपने भीतर संजोए हुए हैं।


ब्रिटिश शासन के अधीन उत्तराखण्ड का प्रशासनिक पुनर्गठन

ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद सम्पूर्ण उत्तराखण्ड का प्रशासनिक स्वरूप धीरे-धीरे पुनर्गठित किया गया। टिहरी रियासत को छोड़कर कुमाऊँ और गढ़वाल का बड़ा भाग ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आ गया। प्रारम्भ में कुमाऊँ कमिश्नरी के अंतर्गत विस्तृत पर्वतीय क्षेत्र का प्रशासन संचालित किया गया।

सन् 1839 ई. में कुमाऊँ कमिश्नरी को अल्मोड़ा और ब्रिटिश गढ़वाल में विभाजित किया गया। इसके बाद प्रशासनिक सुविधा के लिए समय-समय पर नए जिलों और तहसीलों का गठन हुआ। सन् 1842 में तराई तथा सन् 1891 में नैनीताल जिले की स्थापना इस प्रशासनिक पुनर्गठन की महत्वपूर्ण कड़ियाँ थीं।

इस व्यवस्था का शीर्ष अधिकारी कुमाऊँ कमिश्नर होता था। प्रारम्भिक कमिश्नरों को प्रशासन में काफी व्यापक अधिकार प्राप्त थे। उनके अधीन डिप्टी कमिश्नर, डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, नायब तहसीलदार, कानूनगो, पटवारी आदि अधिकारी कार्य करते थे। पर्वतीय समाज की स्थानीय संरचना को देखते हुए थोकदार, सयाणा और प्रधान जैसे पारंपरिक प्रभावशाली व्यक्तियों को भी प्रशासनिक व्यवस्था से जोड़ा गया।

कुमाऊँ के प्रमुख कमिश्नर

ब्रिटिश काल में कुमाऊँ प्रशासन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख कमिश्नरों में एडवर्ड गार्डनर, जॉर्ज विलियम ट्रेल, जॉन हैलिट बैटन और सर हेनरी रैमजे विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे। इनके बाद भी स्वतंत्रता तक विभिन्न ब्रिटिश अधिकारियों ने कमिश्नर के रूप में प्रशासन संभाला।

आपके स्रोतों के अनुसार सन् 1815 से स्वतंत्रता के आसपास तक कमिश्नरों का क्रम इस प्रकार रहा—

क्रमकमिश्नर                                                    कार्यकाल
1एडवर्ड गार्डनर1815–1816
2जॉर्ज विलियम ट्रेल (कार्यवाहक)1816–1817
3जॉर्ज विलियम ट्रेल1817–1835
4मौसले स्मिथ (कार्यवाहक)1835–1836
5कर्नल जॉर्ज गोबान1836–1838
6जी. टी. लुशिंगटन1838–1848
7जे. एच. बैटन1848–1856
8सर हेनरी रैमजे1856–1884
25डब्ल्यू. डब्ल्यू. फिनले1943–1947
26के. एल. मेहता1947–1948

स्रोत : डॉ. अजय सिंह रावत (2021); घनश्याम जोशी (2017)


विकास कार्यों के साथ राजस्व और नियंत्रण की व्यवस्था

ब्रिटिश प्रशासन ने उत्तराखण्ड में अनेक प्रशासनिक एवं आधारभूत कार्य करवाए। इनमें राजस्व ग्रामों की सीमाओं का अभिलेखन, सड़कों का निर्माण, डाक व्यवस्था, डाकबंगलों की स्थापना, नदियों पर पुलों का निर्माण, शिक्षा का प्रसार तथा न्याय और पुलिस व्यवस्था में परिवर्तन प्रमुख थे।

बद्रीनाथ-केदारनाथ जैसे तीर्थ मार्गों पर यात्रियों की सुविधा के लिए स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाएँ की गईं और स्थानीय चिकित्सकों की नियुक्ति की गई। पाठशालाओं की स्थापना तथा आधुनिक शिक्षा के प्रसार की दिशा में भी कार्य हुआ।

लेकिन इन विकासात्मक गतिविधियों के साथ ब्रिटिश शासन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य राजस्व व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाना भी था। इसलिए भूमि-बन्दोबस्त को प्रशासन की प्राथमिकताओं में प्रमुख स्थान मिला।


भूमि-बन्दोबस्त : गाँव से राजस्व तक

ब्रिटिश प्रशासन के प्रारम्भिक वर्षों में कुमाऊँ में भूमि-बन्दोबस्त की प्रक्रिया शुरू हुई। इसका उद्देश्य भूमि, गाँवों की सीमाओं और कृषि उत्पादन का व्यवस्थित अभिलेखन तथा उसके आधार पर राजस्व निर्धारित करना था।

सन् 1816–17 में कुमाऊँ में लगभग 125 पट्टियाँ और 14 परगने बताए जाते हैं। प्रारम्भिक बन्दोबस्त में मुख्यतः परगनों को सम्मिलित किया गया, जबकि बाद के बन्दोबस्तों में पट्टियों और फिर गाँवों को भी व्यवस्थित रूप से राजस्व व्यवस्था में शामिल किया गया।

समय के साथ भूमि की माप, वर्गीकरण और राजस्व निर्धारण की प्रक्रिया अधिक विस्तृत होती गई। भूमि को उसकी प्रकृति और उत्पादकता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया।

कुमाऊँ के भूमि-बन्दोबस्त

क्रम        बन्दोबस्त    वर्ष                            अधिकारी            निर्धारित राजस्व/आय (रु.)
1प्रथम1815–16गार्डनर85,191
2द्वितीय1817ट्रेल89,537
3तृतीय1818ट्रेल98,991
4चतुर्थ1820ट्रेल1,08,327
5पंचम1823ट्रेल1,19,430
6षष्ठ1829ट्रेल1,22,494
7सप्तम1832ट्रेल1,24,729
8अष्टम1834कर्नल गाउनस्थगित
9नवम1842–46बैटन1,29,765
10दशम1863–73विकेट2,50,264 आय
11ग्यारहवाँ1899–1902गूज2,67,559 आय

स्रोत : प्रफुल्ल पंत, 2001

इन बन्दोबस्तों से स्पष्ट होता है कि समय के साथ ब्रिटिश प्रशासन ने भूमि और राजस्व संबंधी अभिलेखों को अधिक व्यवस्थित किया। गाँवों के नक्शे, खसरे और पर्चे तैयार किए गए तथा कृषि भूमि का वर्गीकरण किया गया।


पाली परगना : पश्चिमी रामगंगा घाटी का प्रशासनिक केन्द्र

पश्चिमी रामगंगा घाटी के इतिहास में पाली का विशेष महत्व रहा। मासी से लगभग 12 किलोमीटर पूर्व की ओर स्थित पाली में ब्रिटिश काल में तहसील स्थापित की गई। यह क्षेत्रीय प्रशासन और न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण केन्द्र बना।

गेवाड़ घाटी से किसी अपराधी को पकड़े जाने पर उसे पहले मासी स्थित कारागार में रखा जाता था। स्थानीय विवरण के अनुसार अपराधी को लगभग 24 घंटे तक थोकदार की निगरानी में रखने के बाद अगले दिन पाली तहसील ले जाया जाता था।

छोटे मामलों का निपटारा स्थानीय स्तर पर किया जाता था, जबकि गंभीर अथवा जटिल मामलों को आगे अल्मोड़ा स्थित जिला न्यायालय भेजा जाता था।

इस व्यवस्था से मासी और पाली के बीच उस समय विद्यमान प्रशासनिक संबंधों का अनुमान लगाया जा सकता है।


पाली की पुरानी तहसील और ‘फांसी का कमरा’

पाली का इतिहास केवल प्रशासनिक अभिलेखों तक सीमित नहीं है। यहाँ आज भी ब्रिटिशकालीन प्रशासनिक भवनों के अवशेष मौजूद हैं।

उपलब्ध स्थानीय जानकारी के अनुसार सन् 1869 ई. में रानीखेत नगर की स्थापना के बाद पाली की तहसील को रानीखेत स्थानांतरित कर दिया गया। बाद में सन् 1902 ई. में पुरानी तहसील की इमारत को विद्यालय में परिवर्तित कर दिया गया।

विद्यालय के विकास का क्रम इस प्रकार बताया जाता है—

  • 1902 — जूनियर हाईस्कूल

  • 1966 — हाईस्कूल

  • 1971 — इंटरमीडिएट

  • 1975 — राजकीयकरण

पुराने परिसर में तहसीलदार का कार्यालय आज भी सुरक्षित बताया जाता है।

इसी परिसर में एक कमरा स्थानीय स्तर पर ‘फांसी का कमरा’ नाम से जाना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार ब्रिटिश काल में यहाँ फांसी दी जाती थी। कमरे में मौजूद गहरे गड्ढे को भी इसी परंपरा से जोड़ा जाता है।

हालाँकि, इस दावे को स्थानीय मौखिक परंपरा के रूप में ही प्रस्तुत करना अधिक उचित होगा, जब तक ब्रिटिशकालीन न्यायिक या जेल अभिलेखों से इसकी स्वतंत्र पुष्टि न हो जाए। यही सावधानी इतिहास लेखन को अधिक प्रमाणिक बनाती है।


पटवारी व्यवस्था : गाँव तक पहुँचा ब्रिटिश प्रशासन

ब्रिटिश प्रशासन ने राजस्व व्यवस्था को गाँव के स्तर तक पहुँचाने के लिए पटवारी व्यवस्था विकसित की। द्वितीय बन्दोबस्त के दौरान जॉर्ज विलियम ट्रेल ने पटवारी पद का प्रस्ताव रखा, जिसे सन् 1819 ई. में स्वीकार किया गया

प्रारम्भ में प्रमुख परगनों में पटवारियों की नियुक्ति की गई। बाद में इनकी संख्या बढ़ी और बड़ी संख्या में गाँवों के लिए पटवारी नियुक्त किए गए।

पटवारी के प्रमुख कार्य थे—

  • भूमि एवं ग्राम की माप

  • राजस्व वसूली

  • भूमि संबंधी अभिलेख रखना

  • स्थानीय विवादों में सहायता

  • अपराधों की सूचना देना

  • अपराधियों को पकड़ने में प्रशासन की सहायता करना

कुमाऊँ के पर्वतीय क्षेत्रों में पुलिस व्यवस्था सीमित होने के कारण पटवारी की भूमिका सामान्य राजस्व अधिकारी से कहीं अधिक व्यापक हो गई थी।


थोकदार, सयाणा और प्रधान : परंपरा और औपनिवेशिक प्रशासन का मेल

ब्रिटिश प्रशासन ने स्थानीय समाज की पारंपरिक संरचना को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसका उपयोग अपने प्रशासनिक हितों के लिए किया।

थोकदार, सयाणा और प्रधान जैसे स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों को प्रशासनिक व्यवस्था में सहयोगी बनाया गया। इससे ब्रिटिश शासन को दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में कम संसाधनों के साथ प्रशासन चलाने में सहायता मिली।

इसी कारण ब्रिटिश प्रशासन की ग्रामीण व्यवस्था में एक ओर अंग्रेज अधिकारी थे, तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर थोकदार–पटवारी–प्रधान जैसे पद और संस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।


मासी के थोकदार मनोरथ जी से जुड़ी स्थानीय परंपरा

मासी के थोकदार परिवार से प्राप्त स्थानीय मौखिक इतिहास इस व्यवस्था का एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत करता है।

मासी के थोकदारवंशी श्री शिवदत्त मासीवाल जी के साक्षात्कार के अनुसार उनके पूर्वज श्री मनोरथ थोकदार जी को क्षेत्र में अत्यंत सम्मान प्राप्त था। स्थानीय परंपरा के अनुसार जटिल मामलों को सुलझाने के लिए उन्हें अल्मोड़ा तक बुलाया जाता था और वहाँ उन्हें जिला मजिस्ट्रेट के समकक्ष सम्मान दिया जाता था।

इसी परंपरा के अनुसार अंग्रेजों द्वारा उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें नौ गाँवों की थोकदारी प्रदान की गई—

मासी, कबडोली, ऊँचावाहन, खनूली, झुड़ंगा-दीपाकोट, कनरै, नौगाँव, टिमटा एवं भगोती।

यह विवरण मासीवाल (2022) के साक्षात्कार पर आधारित है। अतः इसे स्थानीय मौखिक इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में देखा जा सकता है और भविष्य में ब्रिटिशकालीन राजस्व अभिलेखों से इसका मिलान किया जाना उपयोगी होगा।


मासी का ब्रिटिशकालीन सस्पेंशन पुल

पश्चिमी रामगंगा घाटी में ब्रिटिशकालीन आधारभूत संरचनाओं का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मासी में रामगंगा नदी पर निर्मित लोहे का सस्पेंशन पुल है।

इसका निर्माण सन् 1887 ई. में हुआ था। पर्वतीय भूगोल में नदियों को पार करने के लिए ऐसे पुलों का निर्माण प्रशासनिक, व्यापारिक और आवागमन की दृष्टि से महत्वपूर्ण था।

इसके अतिरिक्त चौखुटिया–गनाई क्षेत्र में सन् 1913 ई. के आसपास एक अन्य सस्पेंशन पुल का निर्माण हुआ।

इस पुल से संबंधित सूचना-पट्ट के अनुसार चौकोट और गेवाड़ पट्टी के गाँवों से 134 लोग प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1919) के दौरान सेना में गए, जिनमें 2 लोग शहीद हुए।

यह तथ्य पश्चिमी रामगंगा घाटी के ग्रामीण समाज और ब्रिटिश भारतीय सेना के बीच बने संबंधों की ओर संकेत करता है। पुल का निर्माण सैन्य आवागमन में सहायक रहा हो—यह एक संभावित व्याख्या है; इसे निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त अभिलेखीय प्रमाण आवश्यक होंगे।


कृषि और वन आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तन

ब्रिटिश शासन के दौरान उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था में भी परिवर्तन हुए। कुछ क्षेत्रों में आलू और चाय जैसी फसलों को प्रोत्साहन मिला। दूसरी ओर भांग की खेती और चीड़ के जंगलों से लीसा निकालने जैसी गतिविधियाँ भी बढ़ीं।

चीड़ से प्राप्त लीसे से बिरोजा, पिथ और तारपीन जैसे उत्पाद तैयार किए जाने लगे। इससे वन संसाधनों का औपनिवेशिक आर्थिक उपयोग बढ़ा और पर्वतीय समाज तथा जंगलों के संबंधों में भी परिवर्तन आया।

इस प्रकार ब्रिटिशकालीन ‘विकास’ को केवल सड़क, पुल और विद्यालयों के निर्माण तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे राजस्व, प्रशासनिक नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों के आर्थिक उपयोग की नीति भी जुड़ी हुई थी।


पश्चिमी रामगंगा घाटी में ब्रिटिशकाल की विरासत

आज मासी और पाली जैसे क्षेत्र केवल भौगोलिक स्थान नहीं हैं, बल्कि वे उत्तराखण्ड के औपनिवेशिक इतिहास के जीवित पुरातात्विक और सांस्कृतिक दस्तावेज हैं।

यहाँ—

पुराना तहसील भवन,
मासी का सस्पेंशन पुल,
पाली की प्रशासनिक इमारत,
पुराने कारागार से जुड़ी स्मृतियाँ,
‘फांसी के कमरे’ की स्थानीय परंपरा,
थोकदारी की वंश परंपरा,
राजस्व और भूमि-बन्दोबस्त की स्मृतियाँ

आज भी उस दौर की कहानी कहते हैं।

इन अवशेषों को केवल पुराने भवन या स्थानीय किंवदंतियों के रूप में देखने के बजाय उत्तराखण्ड के प्रशासनिक और सामाजिक इतिहास के स्रोत के रूप में संरक्षित और दस्तावेजीकृत किया जाना चाहिए।


निष्कर्ष

सन् 1816 के बाद पश्चिमी रामगंगा घाटी में स्थापित ब्रिटिश शासन ने इस क्षेत्र के प्रशासनिक ढाँचे को गहराई से प्रभावित किया। भूमि-बन्दोबस्त ने राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित किया, पटवारी व्यवस्था ने प्रशासन को गाँव तक पहुँचाया और थोकदारों तथा अन्य स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों को औपनिवेशिक प्रशासन का सहयोगी बनाया।

सड़कें, पुल, डाकबंगले, विद्यालय और न्यायिक संस्थाएँ इस परिवर्तन के दिखाई देने वाले पक्ष थे, जबकि भूमि-मापन, राजस्व निर्धारण और वन संसाधनों का आर्थिक उपयोग इसके दूसरे पक्ष को सामने रखते हैं।

मासी और पाली इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षेत्र प्रस्तुत करते हैं। यहाँ सुरक्षित ब्रिटिशकालीन भवन, पुल और स्थानीय मौखिक परंपराएँ हमें यह समझने का अवसर देती हैं कि औपनिवेशिक शासन किस प्रकार हिमालय के दूरस्थ गाँवों तक पहुँचा और उसने स्थानीय प्रशासन तथा सामाजिक संरचनाओं को किस प्रकार प्रभावित किया।

इसलिए पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास केवल ब्रिटिश शासन की कहानी नहीं है; यह स्थानीय समाज, औपनिवेशिक प्रशासन और हिमालयी भूगोल के परस्पर संबंधों की कहानी भी है।

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संदर्भ

  1. जोशी, घनश्याम — उत्तराखण्ड का राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास, 2017।

  2. रावत, डॉ. अजय सिंह — उत्तराखण्ड के इतिहास संबंधी कृतियाँ, 2021।

  3. पंत, प्रफुल्ल — उत्तराखण्ड का फौजदारी प्रबन्ध, 2001।

  4. मासीवाल, शिवदत्त — स्थानीय मौखिक इतिहास/साक्षात्कार, 2022।


लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)


उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन | कचहरी, कर, वन, बेगार और जनप्रतिरोध|


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यह लेख "उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक काल" शोध-श्रृंखला का भाग-13 है। यदि आपने इस श्रृंखला के पिछले लेख नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें पहले अवश्य पढ़ें। इससे इस लेख में वर्णित पुरातात्त्विक स्थलों, सांस्कृतिक विकास तथा शोध निष्कर्षों को समझना अधिक सरल और रोचक होगा।

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भाग-5 उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-5) ब्रह्मपुर के बाद कार्तिकेयपुर का उदय : हिमालय में एक नई राजनीतिक शक्ति और कत्यूरी परंपरा






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गोरखा शासन के बाद बदली सत्ता, बदला प्रशासन और बदला पहाड़ का जीवन

“1815 में पहाड़ से गोरखा सत्ता के जाने के साथ केवल शासक नहीं बदला; शासन को देखने और समझने की पूरी व्यवस्था बदलने लगी। तलवार और चौकियों की जगह कचहरी, बंदोबस्त, अभिलेख और कानून आए—और जंगल, जमीन तथा श्रम धीरे-धीरे शासन की नई भाषा का हिस्सा बन गए।”

उत्तराखण्ड का आधुनिक इतिहास अनेक परतों से मिलकर बना है। गोरखा शासन की समाप्ति के बाद 1815 में ब्रिटिश सत्ता का प्रवेश इस इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। ब्रिटिश शासन ने पहाड़ में प्रशासनिक संस्थाओं को अधिक व्यवस्थित किया, राजस्व और न्याय व्यवस्था का विस्तार किया, शिक्षा तथा सार्वजनिक निर्माण को बढ़ावा दिया और नैनीताल जैसे नए प्रशासनिक केंद्र विकसित किए।

लेकिन इस परिवर्तन की दूसरी तस्वीर भी थी।

जमीन का सर्वेक्षण हुआ, राजस्व व्यवस्था बदली, जंगलों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा और स्थानीय समाज के परंपरागत अधिकारों पर नए नियम लागू होने लगे। बेगार जैसी प्रथाओं और वन-नियमों के विरुद्ध असंतोष धीरे-धीरे संगठित राजनीतिक चेतना में बदलने लगा।

इसलिए उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन को केवल “आधुनिक प्रशासन के आगमन” या केवल “औपनिवेशिक शोषण” के रूप में देखना इतिहास को अधूरा कर देगा।

यह वास्तव में आधुनिकीकरण और नियंत्रण, विकास और संसाधन-अधिग्रहण, प्रशासन और प्रतिरोध—इन सबकी एक साथ चलती कहानी थी।


1. 1815 : गोरखा सत्ता के बाद ब्रिटिश शासन का आरंभ

1804 में गोरखाओं ने गढ़वाल के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित किया था। लगभग बारह वर्षों के गोरखा शासन के बाद 1815 में एंग्लो-गोरखा युद्ध के परिणामस्वरूप उनकी सत्ता समाप्त हुई। ब्रिटिशों ने कुमाऊँ और गढ़वाल के क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित किया।

8 मई 1815 को ई. गार्डिनर को कुमाऊँ डिवीजन का पहला कमिश्नर नियुक्त किया गया। इसके बाद जॉर्ज विलियम ट्रेल ने लंबे समय तक कुमाऊँ के प्रशासन को दिशा दी। 1817 में ट्रेल ने कुमाऊँ का दूसरा राजस्व बंदोबस्त कराया।

लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि आज का पूरा उत्तराखण्ड उस समय एक ही प्रशासनिक इकाई नहीं था।

ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आने वाला कुमाऊँ और बाद में ब्रिटिश गढ़वाल एक ओर था, जबकि पश्चिमी गढ़वाल में सुदर्शन शाह के नेतृत्व में टिहरी रियासत अस्तित्व में आई। ब्रिटिश गढ़वाल का प्रशासन प्रारंभ में कुमाऊँ के साथ जुड़ा रहा और बाद में इसे अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में विकसित किया गया।

यहीं से उत्तराखण्ड के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में दो समानांतर धाराएँ दिखाई देने लगती हैं—

ब्रिटिश शासित पहाड़ और टिहरी रियासत का पहाड़।

आगे चलकर दोनों क्षेत्रों में जन-असंतोष और आंदोलनों के स्वरूप अलग-अलग दिखाई देंगे।


2. कचहरी का आगमन : जब पहाड़ प्रशासनिक अभिलेखों में दर्ज होने लगा

ब्रिटिश शासन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक था—व्यवस्थित प्रशासन और दस्तावेजीकरण।

अरुण के. मित्तल की British Administration in Kumaon Himalayas: A Historical Study, 1815–1947 में ब्रिटिश प्रशासन को राजस्व, न्याय एवं पुलिस, स्वास्थ्य एवं शिक्षा, लोक निर्माण, कृषि तथा वन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में विभाजित करके देखा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश शासन केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं था; उसने पहाड़ी समाज की प्रशासनिक संरचना को व्यापक रूप से प्रभावित किया।

पहले जहाँ भूमि, जंगल और स्थानीय संसाधनों के संबंध अनेक बार परंपराओं और सामुदायिक व्यवस्थाओं से संचालित होते थे, वहीं औपनिवेशिक प्रशासन ने उन्हें—

सर्वेक्षण → बंदोबस्त → अभिलेख → राजस्व → कानून

की श्रृंखला में व्यवस्थित करना शुरू किया।

यानी पहाड़ की जमीन अब केवल खेती और जीवन का आधार नहीं थी।

वह सरकारी रिकॉर्ड की एक इकाई भी बनने लगी।


3. भूमि-बंदोबस्त और राजस्व व्यवस्था : खेत से कागज तक

ब्रिटिश शासन के शुरुआती वर्षों में राजस्व प्रशासन पर विशेष ध्यान दिया गया।

1817 में जी. डब्ल्यू. ट्रेल द्वारा कुमाऊँ में दूसरा राजस्व बंदोबस्त कराया जाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा था। बाद के दशकों में विभिन्न अधिकारियों के नेतृत्व में राजस्व व्यवस्था का विस्तार और पुनर्गठन हुआ।

इस प्रक्रिया के कुछ सकारात्मक परिणाम भी थे।

भूमि का रिकॉर्ड तैयार हुआ, प्रशासनिक सीमाएँ स्पष्ट हुईं और राजस्व व न्यायिक व्यवस्था में निश्चितता आई। लेकिन दूसरी ओर, स्थानीय समाज की पारंपरिक भूमि और संसाधन व्यवस्थाएँ धीरे-धीरे सरकारी कानूनों के अधीन आने लगीं।

यही वह बिंदु था जहाँ औपनिवेशिक शासन और पहाड़ी समाज के बीच संबंध जटिल होने लगे।

क्योंकि पहाड़ में जमीन का अर्थ केवल खेत नहीं था।

खेत के साथ जुड़े थे—

जंगल, घास, पानी, चरागाह और सामुदायिक उपयोग के अनेक अधिकार।

इसलिए जब इनमें से किसी एक पर सरकारी नियंत्रण बढ़ता था, उसका प्रभाव पूरे ग्रामीण जीवन पर पड़ता था।


4. जंगल : पहाड़ की अर्थव्यवस्था और औपनिवेशिक शासन की नई दृष्टि

यदि उत्तराखण्ड के औपनिवेशिक इतिहास में किसी एक विषय को सबसे महत्वपूर्ण कहा जाए, तो वह है—

वन।

पहाड़ के ग्रामीण जीवन में जंगल का महत्व केवल लकड़ी तक सीमित नहीं था।

जंगल से मिलता था—

  • ईंधन,

  • पशुओं के लिए चारा,

  • घास,

  • पत्तियाँ,

  • घरेलू उपयोग की लकड़ी,

  • कृषि के लिए आवश्यक सामग्री,

  • पशु चराने की जगह,

  • और अनेक स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का आधार।

अर्थात् पहाड़ का जंगल जीवन-व्यवस्था का विस्तार था।

लेकिन औपनिवेशिक शासन की दृष्टि में जंगल धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण आर्थिक और प्रशासनिक संसाधन भी बन गया।

अमर फारूकी की Colonial Forest Policy in Uttarakhand, 1890–1928 विशेष रूप से इस बात का अध्ययन करती है कि औपनिवेशिक वन नीति ने कुमाऊँ में पारंपरिक अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित किया और उसके विरुद्ध किस प्रकार प्रतिरोध विकसित हुआ।

सुरेन्द्र बिष्ट के अध्ययन में भी ब्रिटिश औपनिवेशिक वन व्यवस्था और गढ़वाल-कुमाऊँ के हिमालयी समाज के बीच बने तनाव तथा उसके सामाजिक परिणामों पर प्रकाश डाला गया है।


5. जब जंगल की सीमा खिंची और अधिकारों की परीक्षा शुरू हुई

औपनिवेशिक वन प्रशासन के विस्तार के साथ जंगलों का सीमांकन और वर्गीकरण बढ़ा।

जो जंगल ग्रामीणों की दैनिक जरूरतों का हिस्सा थे, उनमें प्रवेश और उपयोग पर नए नियम लागू होने लगे।

चराई, लकड़ी, टहनियाँ, पत्तियाँ और अन्य वन उत्पादों के उपयोग पर नियंत्रण बढ़ा।

यहाँ समस्या केवल कानून की कठोरता नहीं थी।

समस्या यह थी कि सरकार जिस चीज को “वन संसाधन” मान रही थी, ग्रामीण उसे अपनी जीवन-व्यवस्था का हिस्सा मानते थे।

इस अंतर ने संघर्ष की नींव रखी।

एक ग्रामीण के लिए जंगल का अर्थ था—

“हमारे पशुओं का चारा और हमारे घर का ईंधन।”

जबकि औपनिवेशिक प्रशासन के लिए वही जंगल—

“राज्य द्वारा नियंत्रित संसाधन” बनता जा रहा था।

यही दृष्टिकोणों का अंतर आगे चलकर उत्तराखण्ड के वन आंदोलनों की सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बना।


6. 1911–17 : वन बंदोबस्त और बढ़ता असंतोष

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक वन प्रशासन और स्थानीय समाज के बीच तनाव बढ़ चुका था।

1911–17 के बीच हुए वन बंदोबस्तों ने इस तनाव को और गहरा किया। कई क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के परंपरागत उपयोग पर प्रतिबंध और वन विभाग के अधिकारों का विस्तार ग्रामीणों को स्वीकार्य नहीं था।

धीरे-धीरे विरोध केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं रहा।

वह सामूहिक रूप लेने लगा।

कहीं याचिकाएँ दी गईं, कहीं सभाएँ हुईं और कहीं सरकारी वन-नियमों की अवहेलना की गई।

शोध में यह भी मिलता है कि कुछ क्षेत्रों में जंगलों में आग लगाने जैसी घटनाएँ इस असंतोष की चरम अभिव्यक्तियों में शामिल थीं। 2026 के नवीन अध्ययन में वन-विरोधी गतिविधियों, याचिकाओं और प्रेस अभियानों को उस व्यापक राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा माना गया है, जिसने सरकार को अंततः कुमाऊँ वन शिकायत समिति गठित करने के लिए मजबूर किया।


7. 1921 : कुमाऊँ वन शिकायत समिति

वन संबंधी असंतोष इतना व्यापक हो गया कि 1921 में सरकार ने Kumaon Forest Grievances Committee का गठन किया।

यह घटना उत्तराखण्ड के औपनिवेशिक इतिहास में मील का पत्थर है।

समिति ने कुमाऊँ के विभिन्न क्षेत्रों से 5,000 से अधिक लोगों की गवाही सुनी और 30 से अधिक सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

इसका महत्व केवल इतना नहीं था कि सरकार ने शिकायतें सुनीं।

महत्व यह था कि—

पहाड़ के ग्रामीण समाज ने अपने स्थानीय अनुभवों को सामूहिक राजनीतिक प्रश्न में बदल दिया था।

समिति की सिफारिशों के बाद कुछ गैर-वाणिज्यिक वन क्षेत्रों के प्रशासन में परिवर्तन किए गए और स्थानीय समुदायों के लिए वन उपयोग की कुछ व्यवस्थाओं को पुनर्गठित किया गया। 1921 में कुछ ऐसे वन क्षेत्र, जिन पर स्थानीय समाज की निर्भरता अधिक थी, वन विभाग से राजस्व विभाग को हस्तांतरित किए गए।

यही प्रक्रिया आगे चलकर वन पंचायत व्यवस्था के विकास की पृष्ठभूमि बनी।


8. वन पंचायत : संघर्ष से निकली सामुदायिक व्यवस्था

1931 के कुमाऊँ वन पंचायत नियम उत्तराखण्ड के इतिहास की विशिष्ट उपलब्धियों में गिने जाते हैं।

इनके माध्यम से गाँवों को कुछ वन क्षेत्रों के प्रबंधन में सीमित अधिकार प्राप्त हुए।

आज उत्तराखण्ड की वन पंचायत व्यवस्था को सामुदायिक वन प्रबंधन की ऐतिहासिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि—

वन पंचायत किसी शून्य से पैदा हुई व्यवस्था नहीं थी; उसके पीछे वर्षों का स्थानीय असंतोष, राजनीतिक संगठन और अधिकारों के लिए संघर्ष था।

1921 की वन शिकायत समिति से 1931 के वन पंचायत नियमों तक की यह यात्रा बताती है कि ग्रामीण प्रतिरोध ने औपनिवेशिक वन नीति को पूरी तरह समाप्त तो नहीं किया, लेकिन उसे बातचीत और सीमित सामुदायिक अधिकारों की दिशा में मोड़ने में भूमिका निभाई।


9. बेगार : जब पहाड़ के श्रम ने सवाल पूछना शुरू किया

वन अधिकारों के साथ-साथ दूसरा बड़ा प्रश्न था—

कुली बेगार।

ब्रिटिश अधिकारियों, यात्रियों और प्रशासनिक गतिविधियों के लिए स्थानीय लोगों से सामान ढुलवाने तथा विभिन्न प्रकार की सेवाएँ लेने की प्रथा पहाड़ के लोगों में असंतोष का कारण बनी।

यह केवल मजदूरी का प्रश्न नहीं था।

यह प्रश्न था—

किसी व्यक्ति के श्रम पर उसका अधिकार कितना है?

और इससे भी बड़ा प्रश्न—

क्या शासन की सेवा के नाम पर किसी ग्रामीण को अपनी इच्छा के विरुद्ध श्रम करने के लिए बाध्य किया जा सकता है?

धीरे-धीरे बेगार स्थानीय शिकायत से राजनीतिक प्रश्न बन गया।


10. कुमाऊँ परिषद : शिकायत से संगठन तक

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में शिक्षा प्राप्त स्थानीय वर्ग और राजनीतिक चेतना के विकास ने इन प्रश्नों को नया मंच दिया।

कुमाऊँ परिषद इसी प्रक्रिया की महत्वपूर्ण कड़ी थी।

2026 में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार गोविंद बल्लभ पंत की प्रारंभिक राजनीतिक सक्रियता, 1918 के कुमाऊँ परिषद के प्रस्ताव और 1921 के बागेश्वर आंदोलन को अलग-अलग घटनाओं की बजाय एक निरंतर राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है। इस प्रक्रिया में बेगार और वन संबंधी प्रश्न धीरे-धीरे व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ते गए।

यानी पहाड़ की राजनीति का केंद्र बदल रहा था।

पहले प्रश्न थे—

“कर कितना है?”

“जंगल में क्यों नहीं जाने दिया जा रहा?”

“बेगार क्यों करनी पड़े?”

अब प्रश्न बनने लगा—

“शासन में हमारी आवाज कहाँ है?”


11. बागेश्वर, 1921 : बेगार के विरुद्ध निर्णायक जनप्रतिरोध

जनवरी 1921 में बागेश्वर के उत्तरायणी मेले के अवसर पर बेगार-विरोधी आंदोलन ने महत्वपूर्ण रूप ग्रहण किया।

यह आंदोलन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें स्थानीय असंतोष एक व्यापक सामूहिक प्रतिरोध के रूप में सामने आया।

बागेश्वर केवल धार्मिक और व्यापारिक मेला-स्थल नहीं रहा।

वह उस समय राजनीतिक चेतना का मंच बन गया।

लोगों ने बेगार के विरुद्ध सामूहिक असहमति व्यक्त की और इस आंदोलन ने ब्रिटिश प्रशासन को यह संकेत दिया कि पहाड़ का समाज अब पहले की तरह चुपचाप प्रशासनिक आदेश स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

2026 के शोध के अनुसार 1914 के काशीपुर विरोध से लेकर 1918 के कुमाऊँ परिषद के प्रस्तावों और जनवरी 1921 के बागेश्वर प्रतिरोध तक घटनाओं ने मिलकर बेगार विरोध को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने में योगदान दिया।


12. गोविंद बल्लभ पंत और बदलती राजनीतिक भाषा

कुमाऊँ के राजनीतिक इतिहास में गोविंद बल्लभ पंत का उदय इसी वातावरण में हुआ।

लेकिन पंत की भूमिका को केवल किसी एक आंदोलन के नेता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।

नए शोध के अनुसार उनकी भूमिका में कानूनी रणनीति, राजनीतिक संगठन और नीतिगत बातचीत तीनों महत्वपूर्ण थे, जबकि जमीनी स्तर पर हर्गोविंद पंत, बद्री दत्त पांडे और अन्य स्थानीय नेताओं ने जनसंगठन में भूमिका निभाई।

इससे उत्तराखण्ड की राजनीति में एक नई शैली विकसित हुई—

जन-आक्रोश + संगठन + राजनीतिक नेतृत्व + प्रशासन से संवाद।

आगे चलकर यही शैली राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ती गई।


13. शिक्षा : औपनिवेशिक व्यवस्था की अनपेक्षित विरासत

ब्रिटिश काल में शिक्षा का भी विस्तार हुआ।

1840 में श्रीनगर में कंपनी सरकार द्वारा विद्यालय स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है। 1850 की थॉर्नटन रिपोर्ट में क्षेत्र की पाठशालाओं का उल्लेख मिलता है और 1857 में कुमाऊँ में शिक्षा विभाग की स्थापना हुई।

शिक्षा का उद्देश्य औपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं से जुड़ा था, लेकिन उसका परिणाम उससे कहीं व्यापक हुआ।

शिक्षा ने पहाड़ में एक नया शिक्षित वर्ग तैयार किया।

यही वर्ग आगे चलकर—

  • समाचार-पत्र पढ़ता है,

  • राजनीतिक विचारों से परिचित होता है,

  • संगठन बनाता है,

  • प्रशासनिक नीतियों पर सवाल उठाता है,

  • और राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ता है।

इस प्रकार ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित शिक्षा व्यवस्था की एक अनपेक्षित ऐतिहासिक परिणति यह भी रही कि उसने आलोचनात्मक और राजनीतिक चेतना के विकास को गति दी।


14. सड़कें, नगर और नई अर्थव्यवस्था

ब्रिटिश काल में उत्तराखण्ड में सड़क, संचार और प्रशासनिक ढाँचे का भी विस्तार हुआ।

नैनीताल इसका प्रमुख उदाहरण है।

1815 के बाद ब्रिटिश प्रशासन ने कुमाऊँ को संगठित किया और 1862 में नैनीताल को उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया। इसके बाद वहाँ प्रशासनिक भवनों, बंगलों, बाजारों, क्लबों और अन्य संस्थानों का विस्तार हुआ।

अल्मोड़ा भी ब्रिटिश शासन में प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित होता रहा। 1815 में बने कुमाऊँ जिले का मुख्यालय अल्मोड़ा था और बाद में प्रशासनिक पुनर्गठन के साथ क्षेत्र की सीमाएँ बदलती गईं।

रानीखेत, मसूरी, नैनीताल और अन्य पहाड़ी केंद्रों का विकास भी औपनिवेशिक सैन्य, प्रशासनिक और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों से जुड़ा था।

लेकिन इन परिवर्तनों ने पहाड़ की अर्थव्यवस्था को भी बदल दिया।


15. सेना, नौकरी और पहाड़ से बाहर जाती अर्थव्यवस्था

ब्रिटिश काल में सैन्य भर्ती और सरकारी नौकरियों ने पहाड़ी समाज की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला।

नकद आय की आवश्यकता बढ़ी और अनेक परिवारों की आर्थिक संरचना स्थानीय कृषि से आगे बढ़कर—

सेना + सरकारी नौकरी + मजदूरी + व्यापार + बाहरी रोजगार

से जुड़ने लगी।

यही वह प्रक्रिया थी जिसने आगे चलकर पहाड़ में बाहरी रोजगार और प्रवासन को एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक प्रवृत्ति बनाया।

इसका एक सकारात्मक पक्ष था—परिवारों को नकद आय और नए अवसर मिले।

लेकिन दूसरा पक्ष यह था कि स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा और युवाओं का बाहर जाना धीरे-धीरे सामान्य आर्थिक रणनीति बनने लगा।

इसलिए आधुनिक उत्तराखण्ड की प्रवासन समस्या की जड़ें केवल स्वतंत्रता के बाद के विकास मॉडल में खोजने के बजाय उसके औपनिवेशिक पूर्वइतिहास को भी समझना आवश्यक है।


16. ब्रिटिश शासन की दूसरी तस्वीर : विकास और नियंत्रण साथ-साथ

अब प्रश्न उठता है—

क्या ब्रिटिश शासन ने उत्तराखण्ड का विकास किया?

उत्तर है—कुछ क्षेत्रों में निश्चित रूप से संस्थागत परिवर्तन और आधारभूत विकास हुआ।

लेकिन क्या यह विकास केवल स्थानीय हितों के लिए था?

उत्तर है—नहीं।

औपनिवेशिक शासन का मूल उद्देश्य स्थानीय कल्याण नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी प्रशासन और आर्थिक हितों की पूर्ति था।

इसीलिए सड़कें प्रशासन और सैन्य आवाजाही के लिए भी थीं।

वन व्यवस्था राजस्व और संसाधन प्रबंधन से भी जुड़ी थी।

शिक्षा प्रशासनिक जरूरतों से भी जुड़ी थी।

नगरों का विकास औपनिवेशिक अधिकारियों, सैनिकों और यूरोपीय समुदाय की जरूरतों से भी प्रभावित था।

इसलिए ब्रिटिश काल का मूल्यांकन करते समय सबसे उचित दृष्टिकोण यही है—

“औपनिवेशिक शासन ने आधुनिक संस्थाएँ विकसित कीं, लेकिन उनका निर्माण औपनिवेशिक हितों से अलग नहीं था।”


17. टिहरी गढ़वाल : ब्रिटिश भारत के बाहर का पहाड़

ब्रिटिश शासन की चर्चा करते समय टिहरी गढ़वाल को अलग रखना आवश्यक है।

1815 के बाद पश्चिमी गढ़वाल में सुदर्शन शाह की टिहरी रियासत बनी रही। इसलिए वहाँ ब्रिटिश भारत जैसी प्रशासनिक संरचना नहीं थी।

लेकिन वन, कर और स्थानीय अधिकारों से जुड़े प्रश्न वहाँ भी धीरे-धीरे गंभीर होते गए।

बीसवीं शताब्दी में टिहरी राज्य में वन अधिकारों और प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध असंतोष ने आंदोलनों का रूप लिया।

इसी क्रम में रवाईं आंदोलन और तिलाड़ी कांड (1930) उत्तराखण्ड के इतिहास में महत्वपूर्ण बनते हैं।

यहाँ एक तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है—

तिलाड़ी कांड ब्रिटिश प्रशासन द्वारा किया गया नरसंहार नहीं था; यह टिहरी रियासत की सत्ता और ग्रामीण आंदोलन के बीच संघर्ष से संबंधित घटना थी।

इसलिए इसे ब्रिटिश शासन की प्रत्यक्ष घटना के रूप में लिखना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा।

लेकिन व्यापक संदर्भ में यह घटना बताती है कि राज्य द्वारा जंगल और स्थानीय संसाधनों पर नियंत्रण का प्रश्न ब्रिटिश भारत की सीमाओं से बाहर टिहरी रियासत में भी जनप्रतिरोध का कारण बन रहा था।


18. जंगल से राजनीति तक : प्रतिरोध की बदलती भाषा

उत्तराखण्ड के औपनिवेशिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहाँ आंदोलन अचानक नहीं हुए।

उनकी एक लंबी प्रक्रिया थी।

पहले ग्रामीण ने कहा—

“हमारे जंगल में जाने दो।”

फिर सवाल उठा—

“हमसे बेगार क्यों ली जाती है?”

फिर आवाज बनी—

“हमारी बात सुनी जाए।”

और अंततः यही चेतना राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गई।

2026 के नवीन शोध में 1914 से 1931 के बीच बेगार-विरोध, कुमाऊँ परिषद, वन शिकायत समिति और वन पंचायतों के विकास को इसी निरंतर प्रक्रिया में देखा गया है।

इसलिए उत्तराखण्ड का स्वतंत्रता आंदोलन केवल राष्ट्रीय नेतृत्व का स्थानीय विस्तार नहीं था।

उसकी अपनी स्थानीय जमीन थी—

जंगल, जमीन, श्रम, सम्मान और अधिकार।


19. ब्रिटिश शासन ने उत्तराखण्ड को क्या दिया और क्या बदला?

इतिहास का संतुलित मूल्यांकन करते हुए ब्रिटिश काल के प्रमुख परिवर्तनों को इस प्रकार समझा जा सकता है।

प्रशासनिक क्षेत्र में

  • कुमाऊँ डिवीजन की प्रशासनिक संरचना मजबूत हुई।

  • राजस्व और न्याय व्यवस्था अधिक दस्तावेजी हुई।

  • पुलिस तथा प्रशासनिक संस्थाओं का विस्तार हुआ।

शिक्षा के क्षेत्र में

  • आधुनिक विद्यालयों और शिक्षा विभाग का विस्तार हुआ।

  • नया शिक्षित वर्ग सामने आया।

  • राजनीतिक और सामाजिक चेतना के लिए नई जमीन तैयार हुई।

आधारभूत संरचना में

  • सड़क और संचार व्यवस्था का विस्तार हुआ।

  • नैनीताल, रानीखेत, मसूरी आदि केंद्र विकसित हुए।

  • प्रशासनिक और सैन्य आवाजाही आसान हुई।

आर्थिक क्षेत्र में

  • नकद अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ।

  • सेना और सरकारी नौकरियाँ बढ़ीं।

  • बाहरी रोजगार की प्रवृत्ति मजबूत हुई।

पर्यावरण और समाज में

  • वन प्रशासन मजबूत हुआ।

  • स्थानीय वन अधिकार सीमित हुए।

  • जंगल और ग्रामीण समाज के बीच तनाव बढ़ा।

  • अंततः वन आंदोलन और वन पंचायत जैसी संस्थाएँ विकसित हुईं।

राजनीतिक क्षेत्र में

  • स्थानीय संगठन उभरे।

  • कुमाऊँ परिषद जैसी संस्थाओं ने क्षेत्रीय प्रश्नों को राजनीतिक रूप दिया।

  • बेगार और वन अधिकार के प्रश्न राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े।


निष्कर्ष : सत्ता बदली, लेकिन पहाड़ ने भी जवाब देना सीखा

1815 के बाद उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन का आगमन एक नए युग की शुरुआत था।

कचहरियाँ बनीं।
राजस्व बंदोबस्त हुए।
भूमि अभिलेख तैयार हुए।
शिक्षा का विस्तार हुआ।
सड़कें बनीं।
नए नगर विकसित हुए।
सेना और सरकारी रोजगार के अवसर बढ़े।

लेकिन इसी के साथ जंगलों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा, परंपरागत अधिकारों पर प्रतिबंध लगे और बेगार जैसी व्यवस्थाओं ने ग्रामीण समाज में असंतोष पैदा किया।

फिर वही असंतोष धीरे-धीरे आंदोलन बना।

वन का प्रश्न → अधिकार का प्रश्न बना।

बेगार का प्रश्न → सम्मान का प्रश्न बना।

स्थानीय शिकायत → राजनीतिक चेतना बनी।

और यही राजनीतिक चेतना आगे चलकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गई।

इसलिए उत्तराखण्ड में ब्रिटिश शासन की सबसे महत्वपूर्ण कहानी शायद अंग्रेज अधिकारियों की नहीं, बल्कि पहाड़ के उस समाज की है जिसने बदलती सत्ता के सामने धीरे-धीरे अपनी आवाज पहचानना सीखा।

गोरखा शासन के बाद अंग्रेज आए थे।

लेकिन इतिहास का अगला अध्याय यह बताता है कि—

शासक बदलने के बाद अब पहाड़ स्वयं बदलने लगा था।
और इस बदलाव की अगली मंजिल थी—स्वाधीनता की चेतना।


📌 इस लेख से जुड़े प्रमुख वर्ष

वर्षप्रमुख घटना
1815ब्रिटिशों का कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र पर अधिकार
1815ई. गार्डिनर प्रथम कमिश्नर, कुमाऊँ
1817ट्रेल का राजस्व बंदोबस्त
19वीं शताब्दीप्रशासन, शिक्षा, सड़क और वन व्यवस्था का विस्तार
1911–17महत्वपूर्ण वन बंदोबस्त और बढ़ता असंतोष
1916कुमाऊँ परिषद का गठन
1918कुमाऊँ परिषद की राजनीतिक सक्रियता का विस्तार
1921बागेश्वर का बेगार-विरोधी आंदोलन
1921–22कुमाऊँ वन शिकायत समिति
1930टिहरी राज्य का रवाईं आंदोलन और तिलाड़ी कांड
1931वन पंचायत नियम
1947ब्रिटिश शासन का अंत

संदर्भ 

  1. Arun K. Mittal, British Administration in Kumaon Himalayas: A Historical Study, 1815–1947 — राजस्व, न्याय-पुलिस, शिक्षा, लोक निर्माण तथा कृषि-वन प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ।

  2. Amar Farooqui, Colonial Forest Policy in Uttarakhand, 1890–1928 — औपनिवेशिक वन नीति और उसके विरुद्ध प्रतिरोध पर केंद्रित अध्ययन।

  3. Surendra Bisht, British Colonial System and the Forests of Garhwal and Kumaon Himalayas — औपनिवेशिक वन हस्तक्षेप और हिमालयी समाज के संबंधों का अध्ययन।

  4. Vishal Singh Bhadauriya (2026), From “Coolie Begar” to Van Panchayats — बेगार, कुमाऊँ परिषद, वन शिकायत समिति और वन पंचायतों के बीच संबंधों पर नवीन शोध।

  5. Uttarakhand: Need for a Comprehensive Eco-Strategy — उत्तराखण्ड के इतिहास, समाज, वन और जन आंदोलनों की पृष्ठभूमि के लिए उपयोगी संकलन।

  6. जिला पौड़ी, नैनीताल एवं अल्मोड़ा की आधिकारिक ऐतिहासिक सामग्री।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओ

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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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