कत्यूरी राजवंश का इतिहास | कार्तिकेयपुर का उदय और उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक राजनीतिक इतिहास

 


🌄 एक नई सत्ता की आहट

कल्पना कीजिए उस समय की, जब हिमालय की घाटियों में पुराने राज्य धीरे-धीरे अपनी पकड़ खो रहे थे। पहाड़ों की संकरी घाटियों, नदियों और जंगलों के बीच एक नई राजनीतिक शक्ति आकार ले रही थी।

इन्हीं पहाड़ियों में एक स्थान था—कार्तिकेयपुर।

यह केवल एक राजधानी नहीं थी; धीरे-धीरे यह मध्य हिमालय की बदलती राजनीति का केंद्र बनने लगी। राजाओं ने भूमि दान किए, मंदिरों का निर्माण कराया और अपने शासन के प्रमाण ताम्रपत्रों पर अंकित करवाए।

आज उन राजाओं की आवाज सुनाई नहीं देती, लेकिन पाण्डुकेश्वर के ताम्रपत्र और बैजनाथ के पत्थर आज भी उनकी कहानी कहते हैं।

तो आखिर कार्तिकेयपुर का उदय कैसे हुआ और किस तरह उसकी सत्ता ने आगे चलकर कत्यूरी परंपरा को जन्म दिया?

आइए, इन प्राचीन अभिलेखों और मंदिरों के बीच छिपी उस कहानी को पढ़ते हैं… पत्थरों और ताम्रपत्रों की जुबानी।

कार्तिकेयपुर का उदय 

ब्रह्मपुर के राजनीतिक क्षितिज के धुंधला पड़ने के बाद मध्य हिमालय में एक ऐसा दौर आया, जब पुरानी सत्ता-संरचनाएँ कमजोर हो रही थीं और नए राजनीतिक केंद्र आकार ले रहे थे। इसी संक्रमण के बीच कार्तिकेयपुर का नाम उभरता है।

यहीं से उत्तराखण्ड के मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास का वह अध्याय शुरू होता है, जिसे बाद के इतिहास-लेखन में कत्यूरी परंपरा के नाम से विशेष पहचान मिली।

लेकिन प्रश्न यह है—कार्तिकेयपुर की सत्ता कहाँ से आई? उसकी राजधानी कहाँ थी? उसके वास्तविक शासक कौन थे और किस प्रकार यह सत्ता इतनी प्रभावशाली बनी कि कुमाऊँ और गढ़वाल के बड़े भूभाग को एक राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में जोड़ने लगी?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें मुख्यतः ताम्रपत्रों, शिलालेखों, मंदिर स्थापत्य और बाद की ऐतिहासिक परंपराओं से मिलते हैं।

कार्तिकेयपुर : नाम में छिपी है एक राजधानी की कहानी

कार्तिकेयपुर का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उसकी पहचान से जुड़ा है। आज के बैजनाथ-कत्यूर घाटी क्षेत्र को प्रायः प्राचीन कार्तिकेयपुर से जोड़ा जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भी बैजनाथ को प्राचीन कार्तिकेयपुर के रूप में अक्सर पहचाने जाने वाला स्थल बताता है और इसे मध्य हिमालय की प्रारंभिक ऐतिहासिक राजसत्ता से जोड़ता है। ASI के अनुसार, इस क्षेत्र में राजधानी के जोशीमठ से यहाँ स्थानांतरित होने की परंपरा भी मिलती है।

इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि बैजनाथ-कत्यूर घाटी को कार्तिकेयपुर की पहचान से जोड़ने के पर्याप्त ऐतिहासिक आधार हैं, लेकिन इसकी पहचान को निर्विवाद तथ्य की तरह प्रस्तुत करने के बजाय अभिलेखीय संदर्भ में देखना चाहिए।

कार्तिकेयपुर का महत्व केवल राजधानी होने में नहीं था। यह उस राजनीतिक शक्ति का केंद्र बना जिसने हिमालयी भूभाग के अनेक हिस्सों को एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक व्यवस्था में जोड़ने की क्षमता दिखाई।

हाल के शोध में भी कत्यूरी सत्ता को मध्य हिमालय की ऐसी प्रारंभिक ऐतिहासिक शक्ति माना गया है जिसने कुमाऊँ और गढ़वाल को एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सत्ता की पहली मजबूत झलक : अभिलेख

कार्तिकेयपुर के इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ लोककथाओं के साथ-साथ ताम्रपत्र और शिलालेख भी उपलब्ध हैं।

बागेश्वर, पांडुकेश्वर, बालेश्वर और अन्य स्थानों से प्राप्त अभिलेख इस राजसत्ता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। पांडुकेश्वर से ललितशूरदेव, पद्मटदेव और सुभिक्षराजदेव के ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। अभिलेखीय सामग्री की सूची में ललितशूरदेव के 21वें और 22वें वर्ष के ताम्रपत्र, कंडारा का ताम्रपत्र तथा सुभिक्षराजदेव के चौथे वर्ष का ताम्रपत्र भी दर्ज हैं।

ललितशूरदेव के 21वें और 22वें राजकीय वर्षों के ताम्रपत्रों की तिथियों को लगभग 853–854 ईस्वी से जोड़ा गया है। इससे आठवीं-नौवीं शताब्दी में इस सत्ता के सुदृढ़ राजनीतिक अस्तित्व का महत्वपूर्ण प्रमाण मिलता है।

यही वे अभिलेख हैं जो कार्तिकेयपुर को केवल लोकस्मृति का विषय नहीं रहने देते, बल्कि उसे एक वास्तविक ऐतिहासिक राजनीतिक सत्ता के रूप में सामने लाते हैं।

कौन थे कार्तिकेयपुर के शासक?

यहाँ इतिहास थोड़ा रोचक और जटिल हो जाता है।

परंपरागत इतिहास-लेखन में कार्तिकेयपुर के शासकों को एक लंबे कत्यूरी राजवंश के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है, किंतु अभिलेखों का तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि इस राजनीतिक क्षेत्र में एक से अधिक शासकीय परिवार सक्रिय रहे।

अभिलेखीय परंपरा में एक क्रम वसंतन/वासंतदेव, खरपरदेव, कल्याणराजदेव और त्रिभुवनराजदेव आदि से जुड़ता दिखाई देता है। इसके बाद निंबर/निम्बरदेव, इष्टगणदेव, ललितशूरदेव और भूदेव की परंपरा सामने आती है। आगे चलकर सलोणादित्य, इच्छटदेव, पद्मटदेव और सुभिक्षराजदेव जैसे शासकों के अभिलेख मिलते हैं। डॉ. यशवंत सिंह कठौच ने भी इन राजपरिवारों और उनके क्रम को अलग-अलग अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर समझाया है।
एक पुरातात्विक सर्वेक्षण रिपोर्ट भी बागेश्वर, बालेश्वर और पांडुकेश्वर के अभिलेखों से इन अलग-अलग शासकीय क्रमों की वंशावलियों को जोड़ती है।

इसलिए “कत्यूरी राजवंश” को एक लंबे, एकरेखीय राजवंश के बजाय कार्तिकेयपुर-केंद्रित प्रारंभिक मध्यकालीन शासकीय परंपराओं के व्यापक नाम के रूप में समझना अधिक सुरक्षित है।

ललितशूरदेव : अभिलेखों में दिखाई देने वाला प्रभावशाली शासक

इन शासकों में ललितशूरदेव का स्थान विशेष महत्व रखता है।

उनके नाम से पांडुकेश्वर के ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। 21वें और 22वें राजकीय वर्षों के अभिलेख इस बात का संकेत देते हैं कि उनका शासन पर्याप्त रूप से संगठित था और प्रशासनिक तथा धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान दिए जाते थे।

ललितशूरदेव के अभिलेख केवल राजकीय शक्ति की कहानी नहीं कहते। वे उस समय के सामाजिक और धार्मिक जीवन की झलक भी देते हैं। उदाहरण के लिए, पांडुकेश्वर अभिलेख से संबंधित परंपरा में स्थानीय धार्मिक उत्सवों का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि राजसत्ता का संबंध केवल युद्ध और प्रशासन से नहीं था, बल्कि स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन से भी जुड़ा हुआ था।

यही कारण है कि ललितशूरदेव का काल कार्तिकेयपुर की राजनीतिक परिपक्वता का एक महत्वपूर्ण चरण माना जा सकता है।

पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र : कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव के शासनकाल का महत्वपूर्ण अभिलेख, जो प्रारम्भिक मध्यकालीन उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास का प्रमुख स्रोत है।


सुभिक्षराजदेव और बदलती राजधानी

कार्तिकेयपुर की कहानी का सबसे रोचक अध्याय सुभिक्षराजदेव से जुड़ता है।

उनके चौथे राजकीय वर्ष का पांडुकेश्वर ताम्रपत्र सुभिक्षपुर नामक नगर से जारी हुआ था। अभिलेख के संपादक हेरानंद शास्त्री ने इसे सुभिक्षराजदेव से संबंधित नगर और उनकी राजधानी माना है, हालांकि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि सुभिक्षपुर पुराने कार्तिकेयपुर के ठीक पास था।

इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि समय के साथ सत्ता का प्रशासनिक केंद्र बदल रहा था और नए राजनीतिक-नगरीय केंद्र विकसित हो रहे थे।

अभिलेख में सुभिक्षराजदेव द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में भूमि-अनुदान दिए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इससे उस समय के प्रशासन, भूमि-व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं के बीच संबंधों का पता चलता है।

राज्य की अर्थव्यवस्था : पहाड़ की जमीन से राजकोष तक

कार्तिकेयपुर की शक्ति केवल तलवार से नहीं बनी थी। उसकी वास्तविक नींव भूमि, कृषि, वन और पर्वतीय संसाधनों पर टिकी थी।

डॉ. अजय रावत ने अपने ऐतिहासिक विवरणों में राज्य की आय के प्रमुख साधनों के रूप में कृषि, खनिज और वनों का उल्लेख किया है। भूमि की माप और उसके अभिलेख रखने के लिए अलग-अलग अधिकारियों की व्यवस्था का भी वर्णन मिलता है।

उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री में भूमि-मापन से जुड़े प्रभातर, क्षेत्रपाल और उपचारिक/पट्टकोषचारिक जैसे पदों का उल्लेख मिलता है। पांडुकेश्वर के अभिलेखों में द्रोण और नाली जैसे भूमि-मापन संबंधी मानकों के संकेत भी मिलते हैं।

इससे पता चलता है कि पहाड़ों में शासन केवल स्थानीय मुखियाओं पर निर्भर नहीं था, बल्कि भूमि और राजस्व को व्यवस्थित करने की प्रशासनिक कोशिशें भी की जा रही थीं।

व्यापार और प्राकृतिक संसाधन

हिमालय का भूगोल कार्तिकेयपुर के लिए चुनौती भी था और अवसर भी।

वनों से मिलने वाली वस्तुएँ, पशुधन, ऊन, औषधीय वनस्पतियाँ और अन्य पर्वतीय उत्पाद स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे होंगे। कृषि के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण ने राज्य को आर्थिक आधार दिया।

यही आर्थिक आधार राजनीतिक शक्ति को बनाए रखने, मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं को दान देने तथा प्रशासनिक व्यवस्था चलाने में सहायक रहा।

धर्म : केवल एक परंपरा की कहानी नहीं

कार्तिकेयपुर के इतिहास का धार्मिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में शंकराचार्य के काल, बौद्ध धर्म के प्रभाव और बाद में ब्राह्मणवाद और धार्मिक परंपराओं के सुदृढ़ होने की चर्चा है।

लेकिन यहाँ इतिहास और परंपरा के बीच अंतर समझना जरूरी है।

आदि शंकराचार्य के उत्तराखण्ड आगमन की परंपरा अत्यंत प्रसिद्ध है, किंतु उनके प्रभाव को सीधे किसी एक राजनीतिक परिवर्तन या बौद्ध धर्म के तत्काल पतन का कारण मानना इतिहासकारों के लिए सरल निष्कर्ष नहीं है। आधुनिक शोध भी इस काल में धार्मिक परिवर्तन को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं से जोड़कर देखने की आवश्यकता बताता है।

कार्तिकेयपुर के अभिलेखों में शिव, विष्णु और देवी परंपराओं से जुड़े दान और धार्मिक संस्थाओं के प्रमाण मिलते हैं। उदाहरण के लिए सुभिक्षराजदेव के अभिलेख में दुर्गा और नारायण से संबंधित भूमि-अनुदानों का उल्लेख मिलता है।

अर्थात यह काल केवल “शैव” या केवल “वैष्णव” कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता। यहाँ अनेक धार्मिक धाराएँ साथ-साथ दिखाई देती हैं।

मंदिरों ने सत्ता की पहचान बदल दी

कार्तिकेयपुर की राजनीतिक शक्ति का सबसे स्थायी प्रमाण शायद उसके मंदिर हैं।

बैजनाथ का मंदिर-समूह आज भी मध्यकालीन हिमालयी स्थापत्य परंपरा की महत्वपूर्ण स्मृति को जीवित रखता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार, बैजनाथ या वैद्यनाथ में मुख्य शिव मंदिर के साथ 17 सहायक मंदिर हैं। इनमें केदारेश्वर, लक्ष्मी-नारायण और ब्राह्मणी देवी के मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

इस स्थापत्य परंपरा ने पहाड़ों में केवल धार्मिक जीवन को प्रभावित नहीं किया, बल्कि राजनीतिक सत्ता को भी सांस्कृतिक पहचान दी।

राजा बदल गए, राजधानियाँ बदलीं, लेकिन पत्थरों में गढ़ी यह स्मृति आज भी बची हुई है।


दक्षिणी गढ़वाल में दूसरी शक्तियाँ

कार्तिकेयपुर की शक्ति के समानांतर गढ़वाल के दक्षिणी हिस्सों में अन्य राजनीतिक केंद्र भी मौजूद थे। "उत्तराखंड का नवीन इतिहास" पुस्तक में  मयूर-राज्य का उल्लेख मिलता है, जिसकी राजधानी मयूरनगर/मोरध्वज से जोड़ी गई है और जिसे बाद में बाडुक द्वारा पराजित किए जाने की बात कही गई है।

इसी प्रकार बाद के काल में कनकवंश/परमार परंपरा का उदय दिखाई देता है। उक्त पुस्तक में चांदपुरगढ़ के कनकपाल से संबंधित परंपरा और उसके आधार पर कनकवंश की स्थापना का विवरण दिया गया है। साथ ही पुस्तक स्वयं यह सावधानी भी रखती है कि कुछ प्रशस्ति-संबंधी दावों को सीधे ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जा सकता।

इसलिए कनकपाल की कथा को कत्यूरी सत्ता की निरंतरता के रूप में नहीं, बल्कि बाद के गढ़वाली राजनीतिक इतिहास की अलग परंपरा के रूप में देखना अधिक उचित है।

कार्तिकेयपुर से “कत्यूरी” तक

यहीं इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है।

आज हम जिस नाम से कत्यूरी राजवंश को जानते हैं, उसका ऐतिहासिक अध्ययन मुख्यतः अभिलेखों, मंदिरों, स्थानीय परंपराओं और बाद के इतिहास-लेखन को जोड़कर किया गया है।

हाल के शोध में भी यह स्वीकार किया गया है कि सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच के इस इतिहास में स्रोत सीमित हैं और विशेषकर प्रारंभिक चरण के लिए अनेक प्रश्न अभी खुले हुए हैं। फिर भी उपलब्ध अभिलेख इस बात को मजबूत आधार देते हैं कि मध्य हिमालय में एक प्रभावशाली राजनीतिक सत्ता विकसित हुई जिसने कुमाऊँ और गढ़वाल के व्यापक भूभाग को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसलिए कार्तिकेयपुर केवल एक राजधानी का नाम नहीं था। यह उस राजनीतिक प्रक्रिया का प्रतीक था जिसमें मध्य हिमालय पहली बार एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक एकता की ओर बढ़ता दिखाई देता है।

और शायद यही कारण है कि सदियों बाद भी “कत्यूरी” नाम लोकगीतों, जागरों, मंदिरों और इतिहास की पुस्तकों में जीवित रहा।

निष्कर्ष

ब्रह्मपुर के बाद का राजनीतिक शून्य लंबे समय तक खाली नहीं रहा। कार्तिकेयपुर ने उस शून्य को भरा और धीरे-धीरे एक ऐसी शक्ति के रूप में उभरा जिसका प्रभाव मध्य हिमालय के बड़े भूभाग पर दिखाई देता है।

ताम्रपत्रों में दर्ज राजाज्ञाएँ, पहाड़ों में खड़े मंदिर, भूमि-अनुदानों की सूचियाँ और लोकस्मृति—इन सबको साथ पढ़ने पर कार्तिकेयपुर का इतिहास सामने आता है।

यह इतिहास हमें बताता है कि उत्तराखण्ड का मध्यकाल केवल छोटे-छोटे पहाड़ी राज्यों की कहानी नहीं था; यह राजनीतिक एकीकरण, प्रशासनिक विकास, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, धार्मिक परिवर्तन और स्थापत्य उत्कर्ष की भी कहानी थी।

और यहीं से आगे एक नया प्रश्न जन्म लेता है—

जब कार्तिकेयपुर की शक्ति कमजोर हुई, तो उसकी राजनीतिक विरासत किन-किन शाखाओं में बंटी? और इसी विखंडन से आगे चलकर कुमाऊँ में चंद तथा गढ़वाल में परमार-पंवार सत्ता के लिए जमीन कैसे तैयार हुई? क्या कत्यूरी राजवंश अन्य शाखाएं भी थी? यदि हाँ तो कहाँ?

यही हमारी अगली कड़ी का विषय होगा।                             

संदर्भ:
उत्तराखण्ड का मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास; Hirananda Shastri, Epigraphia Indica, Vol. XXXI; Archaeological Survey of India, Dehradun Circle; Dolly Purohit (2025); बागेश्वर, बालेश्वर एवं पाण्डुकेश्वर के अभिलेख।

                                                                                                                                 "जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"

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उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-4) गुप्तों की छाया में उत्तराखण्ड : कर्तृपुर से कार्तिकेयपुर तक बदलती राजनीतिक सत्ता

 

समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में उल्लिखित कर्तृपुर आखिर कहाँ था? क्या वह उत्तराखण्ड के किसी पर्वतीय राज्य का नाम था? गुप्त साम्राज्य की शक्ति हिमालय तक पहुँची तो क्या मध्य हिमालय भी गुप्त शासन के अधीन आ गया था? और गुप्तों के बाद उत्तराखण्ड में कौन-कौन सी राजनीतिक शक्तियाँ उभरीं?

इन प्रश्नों के उत्तर उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

उत्तराखण्ड का इतिहास केवल बड़े साम्राज्यों की सीमाओं का इतिहास नहीं है। हिमालय की घाटियों में समय-समय पर अनेक स्थानीय राजसत्ताएँ विकसित हुईं, जिन्होंने बदलती परिस्थितियों में अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखी। चौथी शताब्दी से लगभग ग्यारहवीं शताब्दी तक का काल इसी परिवर्तन की एक लंबी कहानी प्रस्तुत करता है—गुप्त प्रभाव से लेकर स्थानीय पर्वतीय राज्यों और फिर कार्तिकेयपुर की संगठित सत्ता तक।


1. गुप्त साम्राज्य और उत्तराखण्ड की सीमा

चौथी शताब्दी ईस्वी में समुद्रगुप्त के शासनकाल में गुप्त सत्ता उत्तर भारत की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्तियों में बदल गई। समुद्रगुप्त की उपलब्धियों का प्रमुख स्रोत प्रयाग प्रशस्ति है, जिसे उनके दरबारी कवि हरिषेण ने रचा था। यह अभिलेख उस समय की राजनीतिक शक्तियों और समुद्रगुप्त की उनसे संबंध-व्यवस्था की महत्वपूर्ण जानकारी देता है।

प्रयाग प्रशस्ति में नेपाल के साथ कर्तृपुर का भी उल्लेख मिलता है। इसी कारण उत्तराखण्ड के इतिहास में कर्तृपुर का विशेष महत्व हो जाता है।

लेकिन यहाँ एक सावधानी जरूरी है।

प्रशस्ति में किसी राज्य का उल्लेख मिल जाना और उसके आधुनिक भौगोलिक क्षेत्र की निश्चित पहचान हो जाना—दो अलग बातें हैं।


2. कर्तृपुर : उत्तराखण्ड के इतिहास की पहली बड़ी पहेली

कर्तृपुर की पहचान को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय से मतभेद रहा है। कुछ पुराने मत इसे उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों से जोड़ते थे, जबकि बाद के अध्ययनों में इसे पश्चिमी हिमालय और विशेष रूप से गढ़वाल-कुमाऊँ क्षेत्र से जोड़ने की संभावना व्यक्त की गई।

उत्तराखण्ड से संबंधित शोध में कर्तृपुर को हिमालयी राजनीतिक इकाई मानने का मत महत्वपूर्ण है। सरकारी पुरातात्विक सामग्री भी बताती है कि कर्तृपुर की पहचान को बाद के कार्तिकेयपुर से जोड़ने की एक परंपरा रही है, लेकिन प्रारंभिक कार्तिकेयपुर के वास्तविक विस्तार और कर्तृपुर के साथ उसके संबंध को पूरी तरह निश्चित नहीं माना जा सकता।

इसलिए कर्तृपुर के विषय में सबसे संतुलित निष्कर्ष यही होगा—

कर्तृपुर को मध्य हिमालय की एक संभावित राजनीतिक इकाई के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन उसकी सटीक स्थिति और बाद के कार्तिकेयपुर से उसका संबंध अभी भी शोध का विषय है।


3. क्या समुद्रगुप्त ने कर्तृपुर को जीत लिया था?

यह प्रश्न बहुत रोचक है, लेकिन इसका उत्तर केवल 'हाँ' या 'नहीं' में देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त के समकालीन राज्यों को अलग-अलग राजनीतिक श्रेणियों में रखा गया है। कुछ राज्यों को पराजित करके गुप्त साम्राज्य में मिला लिया गया, जबकि सीमावर्ती और दूरस्थ शक्तियों के साथ अधीनता, कर, सम्मान या राजनीतिक स्वीकृति जैसे संबंध स्थापित हुए।

इसलिए यदि कर्तृपुर को उत्तराखण्ड के किसी पर्वतीय क्षेत्र से संबंधित माना जाए, तो भी यह आवश्यक नहीं कि समुद्रगुप्त ने वहाँ प्रत्यक्ष गुप्त प्रशासन स्थापित कर दिया था।

बल्कि संभवतः स्थिति अधिक जटिल थी।

मैदानी साम्राज्य की राजनीतिक शक्ति एक ओर थी और दूसरी ओर हिमालय की अपनी स्थानीय सत्ता।

यही कारण है कि समुद्रगुप्त की 'विजय' को सीधे पूरे उत्तराखण्ड पर गुप्त शासन के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।


4. गुप्त प्रभाव के बाद स्थानीय सत्ताओं का उभार

गुप्त साम्राज्य की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगी तो उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों में स्थानीय राजवंशों ने पुनः अपनी राजनीतिक शक्ति स्थापित की।

मध्य हिमालय भी इससे अछूता नहीं रहा।

उत्तराखंड के ऐतिहासिक ग्रंथों में इस काल के लिए ब्रह्मपुर, गोविषाण तथा अन्य छोटे-बड़े पर्वतीय राज्यों का उल्लेख मिलता है। चीनी यात्रियों के विवरण और स्थानीय अभिलेख इन राजनीतिक इकाइयों के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं।

इस काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि मध्य हिमालय किसी एक विशाल साम्राज्य के अधीन नहीं था।

इसके बजाय यहाँ अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक केंद्र विकसित हो रहे थे।


5. ब्रह्मपुर : मध्य हिमालय की एक महत्वपूर्ण सत्ता

गुप्त साम्राज्य के कमजोर पड़ने के बाद उत्तराखण्ड में कई क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियाँ उभरने लगीं। इसी क्रम में ब्रह्मपुर मध्य हिमालय की एक महत्वपूर्ण सत्ता के रूप में सामने आता है। चीनी यात्री के विवरण तथा उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास जैसे स्रोतों में इसका उल्लेख मिलता है। यद्यपि इसके भौगोलिक विस्तार को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि उस समय हिमालय और तराई-मैदानी क्षेत्रों के बीच राजनीतिक एवं सांस्कृतिक संपर्क सक्रिय थे।

ब्रह्मपुर के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी तालेश्वर ताम्रपत्र हैं। अल्मोड़ा जनपद की चौकोट पट्टी के अंतर्गत भिकियासैंण तहसील में विनो नदी के किनारे स्थित तालेश्वर गांव में लगभग 1915 ई. में खेत की नींव खोदते समय दो ताम्रपत्र मिले। ग्रामीणों ने उन्हें मंदिर में सुरक्षित रखा और लगभग 48 वर्ष बाद, 1963 ई. में श्री सदानन्द शर्मा ने उन्हें अध्ययन के लिए लखनऊ संग्रहालय को सौंपा।

अध्ययन से ज्ञात हुआ कि ये अभिलेख 5वीं–6वीं शताब्दी के सोमवंशी पौरव शासकों से संबंधित हैं। इनमें विष्णुवर्मन, वृषवर्मन, अग्निवर्मन, द्युतिवर्मन और विष्णुवर्मन द्वितीय सहित पाँच शासकों का उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों में ब्रह्मपुर का उल्लेख पौरव शासकों की राजनीतिक सत्ता और राजधानी के संदर्भ में मिलता है।

इस प्रकार तालेश्वर ताम्रपत्र केवल प्राचीन शासकों की जानकारी नहीं देते, बल्कि यह भी संकेत करते हैं कि गुप्तोत्तर काल में उत्तराखण्ड में स्वतंत्र क्षेत्रीय राजसत्ताएँ विकसित हो चुकी थीं। ब्रह्मपुर इसी राजनीतिक परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण कड़ी था, जिसने मध्य हिमालय के इतिहास में स्थानीय सत्ता के उभार को स्पष्ट रूप से सामने रखा।


6. गोविषाण : कुमाऊँ की ओर एक अलग राजनीतिक केंद्र

मध्य हिमालय की दूसरी महत्वपूर्ण राजनीतिक इकाई थी गोविषाण।

उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में गोविषाण का विशेष स्थान है। वर्तमान काशीपुर के आसपास स्थित इस प्राचीन स्थल की पहचान चीनी यात्री ह्वेनसांग के वर्णित किउ-पि-श्वांग-ना से की गई है। पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने इसे काशीपुर से जोड़ा था। ह्वेनसांग के समय गोविषाण एक विकसित बस्ती थी, जहाँ बौद्ध मठों के साथ ब्राह्मण मंदिर भी विद्यमान थे।

गोविषाण की ऐतिहासिकता को पुरातात्विक उत्खननों से भी बल मिलता है। यहाँ विभिन्न चरणों में हुई खुदाइयों से ईंट-निर्मित मंदिर, मृदभांड, टेराकोटा प्रतिमाएँ, सिक्के और अन्य स्थापत्य अवशेष मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यहाँ प्राप्त मंदिर परिसर के प्रारंभिक चरण को गुप्तकाल तथा बाद के विस्तार को लगभग छठी-सातवीं शताब्दी से जोड़ा जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि गोविषाण इस क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और नगरीय केंद्र था।

गोविषाण का महत्व ब्रह्मपुर के संदर्भ में भी बढ़ जाता है। गुप्तोत्तर काल में मध्य हिमालय में ब्रह्मपुर जैसी राजनीतिक सत्ता सक्रिय थी और काशीपुर का गोविषाण मैदान तथा हिमालय के बीच संपर्क का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा। कुछ इतिहासकार गोविषाण और ब्रह्मपुर को एक व्यापक राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में देखते हैं, लेकिन गोविषाण निश्चित रूप से ब्रह्मपुर के अधीन था, ऐसा प्रमाण अभी निर्णायक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए दोनों के संबंध को संभावित राजनीतिक, व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क के रूप में देखना अधिक उचित है।

गोविषाण का इतिहास आज भी खोज का विषय है। 2026 में यहाँ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा पुनः उत्खनन शुरू किया गया है। नई खुदाई से प्राप्त सामग्री इस प्राचीन नगरी के कालक्रम, स्वरूप और आसपास की राजनीतिक शक्तियों से उसके संबंधों पर नई रोशनी डाल सकती है।

इस प्रकार गोविषाण केवल काशीपुर का एक पुराना टीला नहीं, बल्कि तराई और मध्य हिमालय के बीच प्राचीन आवागमन, धर्म, संस्कृति और राजनीति को समझने वाली महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी है। इसके नीचे दबी परतें शायद ब्रह्मपुर और उत्तराखण्ड के प्रारंभिक मध्यकालीन इतिहास के कई अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।


7. छोटे-छोटे पर्वतीय राज्यों का संसार

इस समय मध्य हिमालय में केवल बड़े राज्य ही नहीं थे।

गढ़वाल के विभिन्न भागों में छोटे राजनीतिक केंद्रों का अस्तित्व भी रहा होगा। उत्तराखंड का नवीन इतिहास में स्थानीय इतिहासकार पातीराम परमार के आधार पर गढ़वाल के आसपास विभिन्न राजसत्ताओं का उल्लेख मिलता है।

इनमें—

  • कुमाऊँ क्षेत्र की प्रारंभिक स्थानीय सत्ता,

  • ब्रह्मपुर,

  • पाण्डुवाला,

  • मोरध्वज क्षेत्र,

  • चाँदपुर क्षेत्र तथा

  • पश्चिमी भागों की स्थानीय शक्तियाँ

जैसी राजनीतिक इकाइयों की चर्चा मिलती है।

इन सभी की राजनीतिक सीमा और काल-निर्धारण समान रूप से प्रमाणित नहीं हैं। इसलिए इन्हें एक सुव्यवस्थित साम्राज्य के हिस्से के रूप में देखने के बजाय मध्य हिमालय की बहुकेंद्रीय राजनीतिक संरचना के रूप में समझना अधिक उचित है।


8. पौरव सत्ता : ब्रह्मपुर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा

डॉ. अजय रावत की पुस्तक में  ब्रह्मपुर के शासकों को पौरव राजवंश से जोड़ने का मत भी सामने आता है।

तालेश्वर ताम्रपत्र इस संदर्भ में विशेष महत्व रखते हैं। इनमें पौरव शासकों की वंशावली तथा उनके शासन की जानकारी मिलती है।

इन अभिलेखों से यह संकेत मिलता है कि गुप्तोत्तर काल में मध्य हिमालय में राजनीतिक सत्ता स्थानीय राजवंशों के हाथों में थी।

इसलिए गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तराखण्ड में राजनीतिक शून्य नहीं बना।

इसके विपरीत—

गुप्त सत्ता के स्थान पर स्थानीय राजनीतिक परंपराएँ अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने लगीं।


9. कर्तृपुर से कार्तिकेयपुर की ओर

यहीं से उत्तराखण्ड के राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी सामने आती है।

कर्तृपुर का उल्लेख समुद्रगुप्त के समय मिलता है, जबकि बाद के अभिलेखों में कार्तिकेयपुर नाम सामने आता है।

क्या दोनों एक ही राजनीतिक परंपरा के अलग-अलग रूप हैं?

यह संभावना इतिहासकारों को आकर्षित करती रही है।

कुछ अध्ययनों में कार्तिकेयपुर को कर्तृपुर का संस्कृतनिष्ठ या परिवर्तित रूप मानने की संभावना व्यक्त की गई है। भारतीय पुरातत्व संबंधी सामग्री में भी यह संभावना दर्ज है कि कार्तिकेयपुर और कर्तृपुर के बीच कोई संबंध हो सकता है। लेकिन उसी सामग्री में यह भी स्पष्ट है कि यह पहचान पूरी तरह निश्चित नहीं है।

इसलिए यहाँ इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण सबक देता है—

समान नाम महत्वपूर्ण संकेत दे सकते हैं, लेकिन वे अपने आप में पूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होते।


10. कार्तिकेयपुर : मध्य हिमालय की उभरती शक्ति

लगभग सातवीं–आठवीं शताब्दी के बाद मध्य हिमालय में कार्तिकेयपुर नाम अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने लगता है।

यहीं से वह राजनीतिक परंपरा विकसित होती है जिसे बाद के इतिहास-लेखन में प्रायः कत्यूरी सत्ता के नाम से जाना गया।

कार्तिकेयपुर की सत्ता का प्रभाव केवल एक छोटी घाटी तक सीमित नहीं था। उसके अभिलेख उत्तराखण्ड के विभिन्न भागों में प्राप्त हुए हैं और इससे एक व्यापक राजनीतिक प्रभाव का संकेत मिलता है।

बागेश्वर, पाण्डुकेश्वर और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त अभिलेख इस राजसत्ता की राजनीतिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर बाद के काल में कार्तिकेयपुर एक संगठित और प्रभावशाली पर्वतीय राज्य के रूप में उभरता दिखाई देता है।


11. कत्यूरी नाम : इतिहास और परंपरा के बीच

आज हम जिस सत्ता को सामान्यतः कत्यूरी राजवंश कहते हैं, उसके प्रारंभिक इतिहास में 'कत्यूरी' नाम की तुलना में कार्तिकेयपुर और संबंधित अभिलेखीय नाम अधिक महत्वपूर्ण हैं।

सरकारी पुरातात्विक दस्तावेज भी स्वीकार करते हैं कि इस राज्य को विभिन्न साहित्यिक और अभिलेखीय स्रोतों में अलग-अलग नामों से जाना गया है और आठवीं शताब्दी से पहले इसकी स्थिति एवं सीमा स्पष्ट नहीं है।

इसलिए कार्तिकेयपुर और बाद की कत्यूरी परंपरा के बीच संबंध को स्वीकार करते समय अभिलेखीय प्रमाण और लोकपरंपरा को अलग-अलग स्तरों पर देखना चाहिए।


12. कार्तिकेयपुर राजवंश का विस्तार

लगभग आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बीच कार्तिकेयपुर की सत्ता मध्य हिमालय में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गई।

इस काल के शासकों ने विभिन्न घाटियों और व्यापारिक मार्गों पर अपना प्रभाव स्थापित किया। पाण्डुकेश्वर और बागेश्वर जैसे स्थानों से प्राप्त अभिलेख इस सत्ता की गतिविधियों की जानकारी देते हैं।

यही वह काल है जब मध्य हिमालय पहली बार अपेक्षाकृत व्यापक राजनीतिक एकीकरण की ओर बढ़ता दिखाई देता है।

एक ओर अलग-अलग घाटियों की स्थानीय शक्तियाँ थीं, दूसरी ओर कार्तिकेयपुर जैसी सत्ता उन्हें एक बड़े राजनीतिक ढाँचे में जोड़ने का प्रयास करती दिखाई देती है।


13. क्या यही आगे चलकर कुमाऊँ की राजनीतिक पहचान बनी?

कार्तिकेयपुर की राजनीतिक परंपरा ने मध्य हिमालय के इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।

बाद की शताब्दियों में यह विशाल राजनीतिक संरचना छोटे-छोटे राज्यों और स्थानीय सत्ता-केंद्रों में विभाजित हुई। इसी विखंडन ने आगे चलकर कुमाऊँ और गढ़वाल की अनेक क्षेत्रीय राजसत्ताओं के विकास के लिए आधार तैयार किया।

इस दृष्टि से कार्तिकेयपुर का इतिहास केवल एक राजवंश की कहानी नहीं है।

यह मध्य हिमालय में राजनीतिक एकीकरण और फिर राजनीतिक विखंडन की लंबी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण था।


14. सत्ता परिवर्तन की पूरी कड़ी

यदि इस पूरे कालखंड को एक क्रम में देखें तो उत्तराखण्ड की राजनीतिक तस्वीर कुछ इस प्रकार बनती है—

कुणिंदों के बाद स्थानीय राजनीतिक शक्तियाँ
↓
गुप्तकाल में समुद्रगुप्त की व्यापक साम्राज्यवादी शक्ति
↓
प्रयाग प्रशस्ति में कर्तृपुर का उल्लेख
↓
गुप्तोत्तर काल में ब्रह्मपुर और गोविषाण जैसी क्षेत्रीय सत्ताएँ
↓
स्थानीय पौरव एवं अन्य राजवंशों का विकास
↓
कार्तिकेयपुर की संगठित राजनीतिक सत्ता का उभार
↓
बाद की परंपरा में कार्तिकेयपुर-कत्यूरी सत्ता की पहचान
↓
राजनीतिक विखंडन और अनेक क्षेत्रीय राज्यों का उदय

यह क्रम बिल्कुल सीधी रेखा नहीं था। कई शक्तियाँ एक ही समय में अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय रही होंगी। इसलिए इसे राजनीतिक विकास की व्यापक रूपरेखा के रूप में देखना चाहिए, न कि प्रत्येक सत्ता के बीच निश्चित वंशगत उत्तराधिकार के रूप में।


निष्कर्ष : हिमालय केवल साम्राज्यों की सीमा नहीं था

समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में कर्तृपुर का उल्लेख उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण खिड़की खोलता है। लेकिन इस खिड़की से दिखाई देने वाला संसार केवल गुप्त साम्राज्य का विस्तार नहीं है।

इसके पीछे एक दूसरा संसार भी था—

ब्रह्मपुर, गोविषाण और अनेक स्थानीय पर्वतीय राजनीतिक केंद्रों का संसार।

समय के साथ यही राजनीतिक बहुलता एक अपेक्षाकृत संगठित शक्ति—कार्तिकेयपुर—के उभार की ओर बढ़ती दिखाई देती है।

कर्तृपुर और कार्तिकेयपुर के बीच संबंध कितना सीधा था, यह प्रश्न अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इसी प्रकार प्रारंभिक कार्तिकेयपुर को बाद की कत्यूरी सत्ता के साथ पूर्णतः एक मानना भी सावधानी की माँग करता है।

लेकिन एक बात स्पष्ट है—

उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास किसी बाहरी साम्राज्य की छाया में दबा हुआ इतिहास नहीं था। यहाँ की घाटियों, व्यापारिक मार्गों और स्थानीय समाजों ने अपनी-अपनी राजनीतिक शक्तियाँ विकसित कीं और समय के साथ इन्हीं शक्तियों ने मध्य हिमालय की विशिष्ट राजनीतिक पहचान को आकार दिया।

और यही इतिहास हमें अगले चरण तक ले जाता है—कार्तिकेयपुर की सत्ता कैसे मजबूत हुई, उसके प्रमुख शासक कौन थे, उसकी राजधानी कहाँ थी और किस प्रकार यह सत्ता आगे चलकर 'कत्यूरी' परंपरा के रूप में प्रसिद्ध हुई?

यहीं से उत्तराखण्ड के मध्यकालीन राजनीतिक इतिहास का एक नया अध्याय आरंभ होता है।


📚 संदर्भ ग्रंथ

  • हरिषेण, प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख), समुद्रगुप्तकालीन अभिलेख।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, Indian Archaeology – A Review तथा उत्तराखण्ड से संबंधित पुरातात्विक अभिलेख।

  • डबराल, शिव प्रसाद, उत्तराखण्ड का इतिहास, खंड–प्रासंगिक।
  • कठोच, यशवंत सिंह, उत्तराखण्ड का इतिहास, देहरादून।
  • रावत, अजय, उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास, देहरादून।
  • पाण्डुकेश्वर एवं बैजनाथ-बागेश्वर के अभिलेख, कार्तिकेयपुर/कत्यूरी सत्ता के अध्ययन हेतु।



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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)


उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-3) कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड : कुषाण, यौधेय, शीलवर्मन और नाग सत्ता का बदलता राजनीतिक परिदृश्य

 

कुणिंदों की पर्वतीय सत्ता से कुषाणों की दस्तक तक

उत्तराखण्ड का प्राचीन इतिहास केवल राजाओं और राजवंशों की सूची नहीं है। यह उन पहाड़ी घाटियों, व्यापारिक मार्गों, सिक्कों और अभिलेखों की कहानी भी है, जिनके सहारे हम लगभग दो हजार वर्ष पुराने राजनीतिक परिवर्तनों को समझने का प्रयास करते हैं।

कुणिंदों ने मध्य हिमालय में एक सशक्त राजनीतिक पहचान बनाई थी। किंतु ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों में उत्तर भारत का राजनीतिक मानचित्र तेजी से बदल रहा था। उत्तर-पश्चिम से उभरी कुषाण शक्ति ने पंजाब, गांधार, मथुरा और उत्तर भारत के बड़े हिस्से में अपना प्रभाव स्थापित किया। इस परिवर्तन से हिमालय की तलहटी और उत्तराखण्ड का दक्षिणी भाग भी अछूता नहीं रहा।

लेकिन यहाँ एक रोचक तथ्य सामने आता है—

कुषाणों की शक्ति जितनी मैदानों में दिखाई देती है, मध्य हिमालय में उसका प्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण उतना स्पष्ट नहीं है।

यही अंतर उत्तराखण्ड के इतिहास को विशिष्ट बनाता है।


1. कुषाणों की पहुँच : पहाड़ों तक या केवल तराई-भाबर तक?

कुषाणकालीन साक्ष्यों का अध्ययन करते समय उत्तराखण्ड को दो भौगोलिक क्षेत्रों में देखना उपयोगी है—

तराई–भाबर और शिवालिक क्षेत्र
और
मध्य हिमालय का पर्वतीय क्षेत्र।

डॉ. अजय रावत जैसे आधुनिक इतिहासकारों के ग्रंथों में यह महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है कि कुषाणकालीन मुद्राएँ तराई और शिवालिक के निकटवर्ती क्षेत्रों से तो प्राप्त हुई हैं, लेकिन मध्य हिमालय के पर्वतीय भाग में उसी प्रकार के प्रत्यक्ष कुषाण नियंत्रण के प्रमाण नहीं मिलते। इसके विपरीत, वहाँ कुणिंदों की स्वतंत्र सत्ता के बने रहने की बात कही गई है।

यह निष्कर्ष आधुनिक शोध में भी सावधानी के साथ स्वीकार किया जाता है। Central Himalayas के पुरातात्विक अध्ययन में भी तीसरी–चौथी शताब्दी के मध्य हिमालय की राजनीतिक स्थिति को अस्पष्ट माना गया है और पाँचवीं शताब्दी से पहले कुमाऊँ के लिए प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रमाण बहुत कम बताए गए हैं।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि—

कुषाण प्रभाव उत्तराखण्ड में पहुँचा, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सम्पूर्ण मध्य हिमालय कुषाण साम्राज्य के प्रत्यक्ष प्रशासन के अधीन था।


2. सिक्के बोलते हैं : कुषाणों की उत्तराखण्ड में उपस्थिति



जब किसी प्राचीन सत्ता के अभिलेख कम मिलते हैं, तब सिक्के इतिहासकारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

उत्तराखण्ड में कुषाणकालीन सिक्कों और पुरावशेषों की प्राप्ति मुख्यतः—

कुषाणकालीन स्वर्ण मुद्राएं 
  • वीरभद्र (ऋषिकेश)

  • मोरध्वज (कोटद्वार क्षेत्र)

  • गोविषाण (काशीपुर) तथा

  • तराई-भाबर के अन्य क्षेत्रों

से हुई है। इन स्थानों से मिले साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र कुषाणकालीन आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ था।

विशेष रूप से गोविषाण का महत्व उल्लेखनीय है। प्राचीन गोविषाण की पहचान वर्तमान काशीपुर क्षेत्र से की जाती है और यहाँ से कुषाणकालीन तथा उत्तर-कुषाणकालीन मुद्राओं की प्राप्ति ने इस क्षेत्र की ऐतिहासिक महत्ता को और स्पष्ट किया है।


3. मुनि की रेती का स्वर्ण-मुद्रा भंडार : एक अनोखी कहानी

ऋषिकेश के निकट मुनि की रेती से हुविष्क की 44 स्वर्ण मुद्राओं के प्राप्त होने का उल्लेख डॉ. यशवंत कठौच की पुस्तक उत्तराखंड का नवीन इतिहास में मिलता है।

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वर्ण मुद्राएँ केवल आर्थिक समृद्धि का संकेत नहीं देतीं; वे यह भी बताती हैं कि कोई क्षेत्र व्यापक आर्थिक गतिविधि से जुड़ा हुआ था।


4. गोविषाण से वासुदेव की मुद्राएँ : कुषाण प्रभाव का एक और संकेत

गोविषाण के प्राचीन टीले से वासुदेव से संबंधित स्वर्ण मुद्राओं की प्राप्ति का उल्लेख भी उत्तराखंड का नवीन इतिहास में वर्णित है।

इन मुद्राओं में शिव और नंदी से संबंधित प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। ऑनलाइन उपलब्ध क्षेत्रीय पुरातात्विक विवरण भी गोविषाण से उत्तर-कुषाणकालीन स्वर्ण मुद्राओं की प्राप्ति का उल्लेख करते हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—

कुषाणकालीन उत्तराखण्ड केवल राजनीतिक संपर्क का क्षेत्र नहीं था, बल्कि धार्मिक प्रतीकों और आर्थिक गतिविधियों के आदान-प्रदान का क्षेत्र भी था।

कुषाण मुद्राओं पर विभिन्न धार्मिक प्रतीकों का अंकन उस बहुधार्मिक वातावरण की ओर संकेत करता है जिसमें बौद्ध, ब्राह्मणीय और स्थानीय धार्मिक परंपराएँ साथ-साथ विकसित हो रही थीं।


5. पहाड़ों में कुणिंद अभी जीवित थे

यहीं से उत्तराखण्ड का इतिहास एक रोचक मोड़ लेता है।

यदि तराई और भाबर में कुषाण प्रभाव बढ़ रहा था, तो क्या कुणिंद पूरी तरह समाप्त हो गए थे?

उपलब्ध साक्ष्य ऐसा नहीं बताते।

एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक अध्ययन के अनुसार कुणिंदों ने लगभग पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास कुषाण प्रभुत्व स्वीकार किया था, लेकिन तीसरी शताब्दी के प्रारम्भ में उनकी राजनीतिक सक्रियता फिर दिखाई देती है। छत्रेश्वर से संबंधित कुणिंद सिक्के लगभग तीसरी शताब्दी के माने जाते हैं और उनका स्वरूप समकालीन यौधेय सिक्कों से काफी मिलता है। लगभग 250 ई. के बाद कुणिंद सिक्कों का क्रम समाप्त होता दिखाई देता है।

इससे इतिहासकारों ने यह संभावना व्यक्त की है कि कुणिंद और यौधेय कुषाण शक्ति के विरुद्ध किसी स्तर पर सहयोगी रहे होंगे।

यहाँ “संयुक्त महासंघ” की बात निश्चित तथ्य के रूप में नहीं कही जा सकती; उपलब्ध साक्ष्य सहयोग की संभावना को तो मजबूत करते हैं, लेकिन किसी विशाल औपचारिक महासंघ को सिद्ध नहीं करते।


6. कुषाणों के विरुद्ध यौधेयों का उभार

कुषाण साम्राज्य के कमजोर पड़ने के साथ उत्तर भारत में कई स्थानीय शक्तियाँ पुनः सक्रिय हुईं।

इनमें यौधेय गण विशेष रूप से महत्वपूर्ण थे।

यौधेयों की मुद्राओं पर प्रसिद्ध वाक्य मिलता है—

“यौधेय गणस्य जयः”

अर्थात्—

“यौधेय गण की विजय।”

उनकी मुद्राओं पर उनके अधिष्ठाता देवता के रूप में कार्तिकेय की छवि भी मिलती है। उत्तराखण्ड के पश्चिमी भागों और शिवालिक क्षेत्र से यौधेय सिक्कों की प्राप्ति उनके हिमालयी संपर्क की ओर संकेत करती है। ऐतिहासिक स्रोतों में काँगड़ा, शिमला, जौनसार-भाबर, कालाडांडा और सहारनपुर जैसे क्षेत्रों में इनकी मुद्राओं का उल्लेख मिलता है।

इसलिए कुषाणोत्तर उत्तराखण्ड को समझने के लिए यौधेय शक्ति की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।


7. कुषाणों की वापसी के बाद भी पहाड़ों की राजनीति अलग रही

यहाँ एक बार फिर उत्तराखण्ड की भौगोलिक स्थिति निर्णायक बनती है।

मैदानों में किसी विशाल साम्राज्य का नियंत्रण अपेक्षाकृत सरल था, लेकिन हिमालयी घाटियों में राजनीतिक सत्ता का स्वरूप अधिक स्थानीय रहा होगा।

इसीलिए संभव है कि—

तराई और भाबर में कुषाण → फिर यौधेय प्रभाव के साथ-साथ, मध्य हिमालय में कुणिंद या अन्य स्थानीय राजनीतिक इकाइयाँ अपनी सत्ता बनाए रखती रही हों।

यह राजनीतिक बहुलता उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास की एक प्रमुख विशेषता थी।


8. कालसी–जगतग्राम और राजा शीलवर्मन : एक अलग शक्ति का उदय

इसी संक्रमणकाल में कालसी के निकट जगतग्राम इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र बनकर सामने आता है।

यहाँ से प्राप्त ईंटों और अभिलेखों से राजा शीलवर्मन द्वारा अश्वमेध यज्ञों के आयोजन का प्रमाण मिलता है।

शिलालेखीय साक्ष्य शीलवर्मन को वार्षगण्य गोत्र से जोड़ते हैं और जगतग्राम में उसके अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख करते हैं। उपलब्ध शोध इन्हें लगभग तीसरी शताब्दी ईस्वी के संदर्भ में रखता है।

जगतग्राम की सबसे बड़ी विशेषता वहाँ मिली गरुड़ाकार/श्येनाकार वेदिकाएँ हैं।

जगतग्राम से प्राप्त गरुड़ाकार/श्येनाकार वेदिका

सोचिए—

यमुना की घाटी के निकट एक ऐसा शासक, जो अपनी राजनीतिक शक्ति और सार्वभौम महत्वाकांक्षा को प्रदर्शित करने के लिए अश्वमेध जैसे वैदिक राजसूचक अनुष्ठान करता है।

यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था।

अश्वमेध राजनीतिक शक्ति की सार्वजनिक घोषणा भी था।

जगतग्राम इसीलिए उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में एक असाधारण स्थल है।


9. फिर इतिहास में आता है एक नया अध्याय—नाग

अब हम उस प्रश्न तक पहुँचते हैं जिसने उत्तराखण्ड के इतिहासकारों को लंबे समय से आकर्षित किया है—

नागों का उत्तराखण्ड से क्या संबंध था?

यहाँ सबसे पहले एक सावधानी जरूरी है।

उत्तराखण्ड के नागों को सीधे कुषाणों के तत्काल उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से बहुत सरल निष्कर्ष होगा।

उपलब्ध अभिलेखीय साक्ष्य नाग सत्ता को विशेष रूप से उत्तर-गुप्त काल और लगभग छठी–सातवीं शताब्दी के संदर्भ में अधिक स्पष्ट करते हैं। गढ़वाल-हिमालय में गुप्तोत्तर काल के प्रमुख स्रोतों में गोपेश्वर त्रिशूल लेख, बाड़ाहाट त्रिशूल लेख और लाखामंडल लेख का विशेष महत्व माना जाता है।

अर्थात् इतिहास की समयरेखा को इस प्रकार समझना अधिक उचित होगा—

कुणिंद → कुषाण प्रभाव → यौधेय/स्थानीय शक्तियाँ → गुप्तकालीन प्रभाव → गुप्तोत्तर स्थानीय राज्य → नाग सत्ता

यह क्रम उत्तराखण्ड की राजनीतिक कहानी को अधिक स्पष्ट बनाता है।


10. गोपेश्वर का त्रिशूल : धातु पर अंकित एक राजवंश

चमोली का गोपेश्वर इस इतिहास का शायद सबसे रोचक अध्याय है।

गोपेश्वर के रुद्रनाथ/गोपीनाथ मंदिर परिसर में स्थित विशाल धातु-त्रिशूल पर प्राचीन लेख अंकित है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार इस त्रिशूल पर छठी–सातवीं शताब्दी ईस्वी की उत्तर-ब्राह्मी लिपि में एक लेख है, जिसमें इसे गणपतिनाग द्वारा रुद्र के मंदिर के सामने स्थापित किए जाने का उल्लेख मिलता है। बाद में इसी त्रिशूल पर 1191 ई. में पश्चिमी नेपाल के शासक अशोक चल्ल से संबंधित एक अन्य लेख भी अंकित हुआ।

यानी एक ही त्रिशूल—

प्राचीन नाग सत्ता → मध्यकालीन राजनीतिक हस्तक्षेप → आधुनिक पुरातात्विक विरासत

तीनों को जोड़ता हुआ दिखाई देता है।

“गोपेश्वर के रुद्रनाथ/गोपीनाथ मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन लौह त्रिशूल। त्रिशूल पर एक प्राचीन तथा तीन आधुनिक अभिलेख अंकित हैं; प्राचीन अभिलेख उत्तराखण्ड के गुप्तोत्तर इतिहास और नाग शासक गणपतिनाग के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है।”


11. गणपतिनाग कौन था?

गणपतिनाग (Ganapatinaga) लगभग चौथी शताब्दी ईस्वी के आरंभिक काल का एक प्रमुख नाग शासक था। उसका संबंध उत्तर भारत में प्रभावशाली रहे नाग राजवंश से था। उपलब्ध सिक्कों और अभिलेखीय साक्ष्यों से उसका संबंध विशेष रूप से मथुरा क्षेत्र से जोड़ा जाता है।

गणपतिनाग का महत्व

  • वह नाग राजवंश का शक्तिशाली शासक था।
  • उसके नाम से जुड़े सिक्के मथुरा, पद्मावती और विदिशा से मिले हैं।
  • उसके सिक्कों की बड़ी संख्या मथुरा से मिलने के कारण कुछ इतिहासकार उसे मथुरा की नाग शाखा का शासक मानते हैं।
  • उसका राजनीतिक प्रभाव इतना महत्वपूर्ण था कि वह समुद्रगुप्त के आर्यावर्त अभियान में पराजित होने वाले प्रमुख राजाओं में शामिल हुआ। 

अतः गोपेश्वर त्रिशूल लेख में गणपतिनाग का नाम विशेष महत्व रखता है। गोपेश्वर त्रिशूल लेख में नाग शासकों के क्रमशः —

  1. स्कन्दनाग

  2. विभुनाग

  3. अंशुनाग

  4. गणपतिनाग

नाम दिए गए हैं।

हालाँकि इन शासकों के विस्तृत राजनीतिक इतिहास और उनके राज्य की निश्चित सीमाओं को लेकर अभी भी विद्वानों में मतभेद हैं।

इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि—

गोपेश्वर का अभिलेख नाग शासक परिवार/स्थानीय नाग सत्ता के अस्तित्व का महत्वपूर्ण प्रमाण है, लेकिन इससे पूरे उत्तराखण्ड पर एक विशाल केंद्रीकृत “नाग साम्राज्य” की सीमा निश्चित नहीं की जा सकती।


12 . नाग सत्ता और शिव उपासना

गोपेश्वर के त्रिशूल को केवल राजनीतिक अभिलेख मानना भी पर्याप्त नहीं होगा।

त्रिशूल स्वयं रुद्र/शैव परंपरा से जुड़ा प्रतीक है।

गोपेश्वर के मंदिर परिसर में आज भी विशाल त्रिशूल और शिव परंपरा की निरंतरता दिखाई देती है। वर्तमान गोपीनाथ मंदिर का स्थापत्य बाद का है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसे मुख्यतः आठवीं शताब्दी की स्थापत्य शैली से जोड़ता है, लेकिन परिसर में मौजूद पुराना त्रिशूल इससे कहीं प्राचीन अभिलेखीय परंपरा की ओर संकेत करता है।

इससे एक दिलचस्प सांस्कृतिक निरंतरता दिखाई देती है—

राजा बदलते रहे, राजनीतिक सीमाएँ बदलती रहीं, लेकिन पर्वतीय धार्मिक परंपराओं की स्मृति बनी रही।


13 . बाड़ाहाट : उत्तरकाशी की प्राचीन स्मृति

गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी भागीरथी के किनारे स्थित वर्तमान उत्तरकाशी का प्राचीन नाम बाड़ाहाट/बाराहाट माना जाता है।

यहाँ भी एक विशाल त्रिशूल से संबंधित अभिलेखीय परंपरा मिलती है।

कुछ विद्वानों ने बाड़ाहाट को नाग शासकों की राजनीतिक गतिविधियों से जोड़ा है। उपलब्ध विवरणों में गणेश्वर और गुह जैसे नामों का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन अभिलेखों की व्याख्या और उनसे निर्मित राजनीतिक सीमा के बारे में मतभेद हैं।

इससे इतना स्पष्ट अवश्य होता है कि—

उत्तराखण्ड के ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में गुप्तोत्तर काल तक स्थानीय राजसत्ताएँ सक्रिय थीं।


14. क्या नागों ने कुणिंदों का स्थान लिया?

यह प्रश्न सरल है, लेकिन इसका उत्तर सरल नहीं।

कई क्षेत्रीय इतिहास-ग्रंथ नागों को कुणिंदों के बाद की शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं। लेकिन उपलब्ध प्रमाणों को कालक्रम में रखने पर स्थिति अधिक जटिल दिखाई देती है।

कुणिंदों के सिक्के तीसरी शताब्दी के बाद लगभग गायब हो जाते हैं। यौधेय शक्ति भी आगे चलकर गुप्त साम्राज्य के विस्तार में समाहित हो गई। चौथी-पाँचवीं शताब्दी के बीच मध्य हिमालय की राजनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत अस्पष्ट है। फिर पाँचवीं–छठी शताब्दी के बाद हमें स्थानीय राजवंशों और नाग शासकों के अधिक स्पष्ट अभिलेख मिलते हैं।

इसलिए अधिक सुरक्षित निष्कर्ष यह है—

नाग सत्ता कुणिंदों की सीधी और तत्काल उत्तराधिकारी सत्ता के बजाय उत्तराखण्ड में विकसित हुई एक बाद की स्थानीय राजनीतिक शक्ति थी, जिसका स्पष्ट अभिलेखीय स्वरूप गुप्तोत्तर काल में दिखाई देता है।


15. इतिहास का सबसे रोचक पक्ष : सत्ता बदलती रही, क्षेत्र नहीं

कुणिंदों से कुषाणों तक और फिर यौधेयों से नागों तक की यात्रा हमें एक महत्वपूर्ण तथ्य बताती है।

उत्तराखण्ड किसी एक साम्राज्य की स्थायी परिधि नहीं था।

यह था—

मैदान और पहाड़ के बीच एक संपर्क क्षेत्र।

यहाँ से होकर—

  • व्यापारिक मार्ग गुजरते थे,

  • सिक्के पहाड़ों तक पहुँचते थे,

  • धार्मिक विचारों का आदान-प्रदान होता था,

  • राजनीतिक शक्तियाँ अपने प्रभाव का विस्तार करती थीं,

  • और स्थानीय समाज बाहरी शक्तियों के साथ सामंजस्य या प्रतिरोध दोनों करता था।

इसीलिए उत्तराखण्ड के इतिहास को केवल “किसने शासन किया?” से समझना पर्याप्त नहीं।

सवाल यह भी होना चाहिए—

“किस क्षेत्र पर किसका वास्तविक नियंत्रण था?”

और—

“स्थानीय समाज ने बदलती राजनीतिक शक्तियों के बीच अपनी पहचान कैसे बनाए रखी?”


16. कुषाणों की छाया से नागों की उपस्थिति तक

यदि इस पूरे दौर को एक ऐतिहासिक यात्रा के रूप में देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—

कुणिंदों की शक्ति
↓
कुषाणों का तराई-भाबर और व्यापारिक मार्गों पर प्रभाव
↓
मध्य हिमालय में स्थानीय सत्ता की निरंतरता
↓
यौधेयों का उभार और कुषाण शक्ति का क्षय
↓
शीलवर्मन और जगतग्राम की क्षेत्रीय शक्ति
↓
गुप्तकालीन राजनीतिक प्रभाव
↓
गुप्तोत्तर स्थानीय राज्यों का उदय
↓
नाग शासकों के अभिलेखीय प्रमाण
↓
आगे चलकर नई हिमालयी राजसत्ताओं का उदय

यह क्रम उत्तराखण्ड के प्राचीन राजनीतिक इतिहास को किसी सीधी रेखा के बजाय लगातार बदलते शक्ति-संतुलन के रूप में सामने लाता है।


निष्कर्ष : कुणिंदों के बाद इतिहास ने कौन-सी राह पकड़ी?

कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड का इतिहास किसी एक साम्राज्य के अधीन जाने की कहानी नहीं है।

कुषाणों ने तराई और शिवालिक से जुड़े क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वीरभद्र, मोरध्वज और गोविषाण जैसे स्थलों से मिले अवशेष और सिक्के इस संपर्क के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। दूसरी ओर मध्य हिमालय में कुणिंदों की राजनीतिक परंपरा कुछ समय तक बनी रही और कुषाण शक्ति के क्षय के साथ यौधेयों जैसी गणराज्यीय शक्तियाँ भी उभरीं।

कालसी–जगतग्राम में शीलवर्मन के अश्वमेध यज्ञ इस बात का प्रमाण हैं कि तीसरी शताब्दी के आसपास इस क्षेत्र में ऐसी स्थानीय शक्ति भी मौजूद थी जो स्वयं को स्वतंत्र और सार्वभौम शासक के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही थी।

और कुछ शताब्दियों बाद—

गोपेश्वर का त्रिशूल गणपतिनाग का नाम लेकर इतिहास के अंधेरे में एक दीपक जला देता है।

वह हमें बताता है कि गुप्तोत्तर उत्तराखण्ड में स्थानीय नाग सत्ता केवल लोककथा नहीं थी; उसके पीछे अभिलेखीय साक्ष्य भी मौजूद हैं। हालांकि उनके राज्य की वास्तविक सीमा और राजनीतिक संरचना पर अभी भी शोध की आवश्यकता है।

इस प्रकार कुणिंदों के बाद उत्तराखण्ड में इतिहास की धारा समाप्त नहीं हुई—

उसने अपना रूप बदला।

सिक्कों से अभिलेखों तक, गणराज्यों से स्थानीय राजसत्ताओं तक और कुषाणों से नागों तक—

मध्य हिमालय अपनी राजनीतिक पहचान को बार-बार नए रूप में गढ़ता रहा।

और इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य से आगे निकलकर उत्तराखण्ड इतिहास के उस दौर में प्रवेश करता है, जहाँ गुप्त साम्राज्य, कर्तृपुर, नाग, मौखरी और बाद में हर्षवर्धन जैसी शक्तियाँ हिमालय की राजनीति को प्रभावित करती दिखाई देती हैं।

अगली कड़ी में…

गुप्तों की छाया में उत्तराखण्ड : कर्तृपुर, पर्वतीय गणराज्य और समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति

क्या समुद्रगुप्त ने वास्तव में उत्तराखण्ड के किसी राज्य को पराजित किया था?
कर्तृपुर कहाँ था?
क्या कर्तृपुर की पहचान आधुनिक कत्यूर घाटी से की जा सकती है?
और गुप्त साम्राज्य के विस्तार के बावजूद मध्य हिमालय अपनी स्वतंत्रता किस प्रकार बनाए रख पाया?

इन प्रश्नों के उत्तर उत्तराखण्ड के इतिहास के अगले महत्वपूर्ण अध्याय का द्वार खोलेंगे।


📚 संदर्भ ग्रंथ

  • रावत, डॉ. अजय सिंह, उत्तराखण्ड का समग्र राजनीतिक इतिहास।
  • कठोच, डॉ. यशवंत सिंह, उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास।
  • Archaeological Survey of India, Dehradun Circle — गोपेश्वर त्रिशूल एवं गोपीनाथ मंदिर संबंधी विवरण।

  • Central Himalayas: Archaeological, Linguistic and Cultural Synthesis — कुषाण, कुणिंद और मध्य हिमालय की राजनीतिक स्थिति।

  • Altekar आदि के अध्ययन पर आधारित IGNCA में उपलब्ध New History of the Indian People के अंश — कुणिंद, यौधेय और कुषाणोत्तर राजनीतिक परिवर्तन।

  • जगतग्राम–शीलवर्मन और अश्वमेध संबंधी पुरातात्विक/शोध स्रोत। 



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लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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