उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल (भाग-1) आद्य इतिहास से राज्य-व्यवस्था के उदय तक

 

जब पहाड़ों ने इतिहास की नई आहट सुनी...

कल्पना कीजिए—हजारों वर्ष पुरानी किसी हिमालयी घाटी में सुबह का सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे से निकल रहा है। एक छोटी-सी बस्ती जाग रही है। खेतों में हलचल है, दूर पगडंडी पर यात्रियों के कदम सुनाई दे रहे हैं और किसी धातु की चमक पहली बार पत्थर से अलग पहचान बना रही है।

समय आगे बढ़ चुका है।

अब मनुष्य केवल प्रकृति के साथ जी नहीं रहा था, बल्कि समाज को संगठित कर रहा था, दूर-दराज के लोगों से जुड़ रहा था और राजनीतिक शक्ति के नए रूप आकार ले रहे थे।

हिमालय की इन्हीं घाटियों में इतिहास एक नए अध्याय की ओर बढ़ रहा था।


आद्य इतिहास की धुंध से निकलकर उत्तराखण्ड अब प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल की ओर कदम बढ़ा रहा था...उत्तराखण्ड का इतिहास केवल राजवंशों और युद्धों की कहानी नहीं है। यह उन पहाड़ों, घाटियों, नदियों और मानव समुदायों की दीर्घ यात्रा है, जिसने हिमालयी समाज को धीरे-धीरे एक संगठित राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान प्रदान की।

प्रागैतिहासिक काल में हमें मानव जीवन की सबसे आरम्भिक आहटें मिलती हैं। शैलचित्र, पत्थर के उपकरण, पुरातात्विक अवशेष और प्राचीन बस्तियों के संकेत उस समय के जीवन की झलक देते हैं। इसके बाद आद्य इतिहास के दौर में अभिलेखों, स्मारकों, परम्पराओं और अन्य स्रोतों के माध्यम से अतीत कुछ अधिक स्पष्ट होने लगता है।

लेकिन इसके बाद इतिहास एक ऐसे मोड़ पर पहुँचता है, जहाँ राजनीतिक संगठनों, जनपदों, शासकों, सिक्कों और अभिलेखीय प्रमाणों की भूमिका बढ़ने लगती है। यही वह संक्रमण है, जिसे उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल के रूप में समझना महत्वपूर्ण है।


आद्य इतिहास से इतिहास की ओर

‘आद्य इतिहास’ और ‘ऐतिहासिक काल’ के बीच कोई ऐसी कठोर सीमा नहीं है, जिसे एक निश्चित वर्ष में खींच दिया जाए। अलग-अलग क्षेत्रों में ऐतिहासिक परिवर्तन अलग-अलग समय पर हुए। उत्तराखण्ड जैसे पर्वतीय क्षेत्र में यह प्रक्रिया मैदानी भारत की तुलना में अलग गति से विकसित हुई।

इस काल में मौखिक परम्पराएँ, पुरातात्विक साक्ष्य, धार्मिक स्थल, व्यापारिक मार्ग और बाहरी साहित्यिक उल्लेख—सभी मिलकर अतीत की तस्वीर बनाने में सहायता करते हैं।

धीरे-धीरे हिमालय केवल एक दुर्गम भौगोलिक क्षेत्र न रहकर उत्तर भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ क्षेत्र बनने लगा।


हिमालय की भौगोलिक स्थिति और ऐतिहासिक महत्व

उत्तराखण्ड की भौगोलिक संरचना ने यहाँ के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।

हिमालय की ऊँची पर्वत-श्रृंखलाएँ, गहरी नदी-घाटियाँ और प्राकृतिक दर्रे एक ओर जहाँ आवागमन को कठिन बनाते थे, वहीं दूसरी ओर उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने वाले विशिष्ट मार्ग भी बनाए।

गंगा-यमुना की ऊपरी घाटियों से लेकर कुमाऊँ की पर्वतीय घाटियों और तिब्बत की ओर जाने वाले मार्गों तक, उत्तराखण्ड अनेक भौगोलिक क्षेत्रों के बीच संपर्क का क्षेत्र रहा।

यही कारण है कि प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल को समझने के लिए केवल राजाओं और राजवंशों को देखना पर्याप्त नहीं है। व्यापार, तीर्थ, पशुपालन, कृषि, धातु-उपयोग और पर्वतीय मार्गों को भी साथ में समझना आवश्यक है।


हिमालय की घाटियाँ : संपर्क और आवागमन के मार्ग

उत्तराखण्ड की प्रमुख नदी-घाटियाँ—यमुना, भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, रामगंगा और काली आदि—केवल जल-प्रणालियाँ नहीं थीं। ऐतिहासिक दृष्टि से ये मानव आवागमन और सांस्कृतिक संपर्क के महत्वपूर्ण क्षेत्र भी रही हैं।

पर्वतीय दर्रों और घाटियों से होकर मनुष्य, पशु, वस्तुएँ और विचार एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचते रहे होंगे।

यही कारण है कि प्रारम्भिक ऐतिहासिक उत्तराखण्ड को समझते समय भूगोल और इतिहास को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

हिमालय की भौगोलिक स्थिति ने यहाँ के राजनीतिक संगठनों, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक संपर्कों को प्रभावित किया।


पुरातत्व से सिक्कों तक : इतिहास के साक्ष्यों का विस्तार

प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल के अध्ययन में पुरातत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। लेकिन इस चरण में इतिहास के स्रोतों का स्वरूप पहले की अपेक्षा व्यापक हो जाता है।

अब हमें केवल पुरास्थलों और पुरावशेषों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, बल्कि—

  • सिक्के,
  • अभिलेख,
  • मुहरें,
  • स्थापत्य अवशेष,
  • मूर्तिकला,
  • साहित्यिक उल्लेख

जैसे स्रोत भी इतिहास की पुनर्रचना में सहायता करते हैं। उत्तराखण्ड से प्राप्त प्राचीन सिक्के, अभिलेख, स्थापत्य अवशेष, मूर्तियाँ, पुरास्थल और अन्य सामग्री हमें यह समझने में सहायता करती हैं कि यहाँ सामाजिक और राजनीतिक संगठन किस प्रकार विकसित हो रहे थे।

विशेष रूप से सिक्के प्रारम्भिक इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। सिक्कों पर अंकित नाम, प्रतीक, आकृतियाँ और लेख तत्कालीन राजनीतिक सत्ता, धार्मिक विश्वास तथा आर्थिक गतिविधियों के बारे में संकेत दे सकते हैं।

इसी संदर्भ में आगे चलकर कुणिंदों के सिक्के उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक इतिहास के अध्ययन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधार बनते हैं।


कुणिंदों के उदय की पृष्ठभूमि

प्रारम्भिक ऐतिहासिक उत्तराखण्ड की चर्चा कुणिंदों के बिना अधूरी है। हालांकि कुणिंदों का विस्तार केवल वर्तमान उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं माना जाता; उनका प्रभाव हिमालय की तराई और उससे जुड़े व्यापक क्षेत्र में रहा।

कुणिंदों का उल्लेख प्राचीन साहित्यिक स्रोतों तथा मुद्राओं के माध्यम से मिलता है। उनकी मुद्राएं विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उन पर शासकीय सत्ता, धार्मिक प्रतीकों और तत्कालीन सांस्कृतिक प्रभावों के संकेत मिलते हैं।

उनकी मुद्राएँ इस बात का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं कि हिमालयी क्षेत्र में ऐसी राजनीतिक सत्ता मौजूद थी जो अपनी मुद्रा जारी करने की क्षमता रखती थी।

अमोघभूति के नाम वाली कुणिंद मुद्राएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आधुनिक मुद्राशास्त्रीय सूचीकरण में इन्हें लगभग दूसरी–पहली शताब्दी ईसा पूर्व के संदर्भ में रखा गया है; हालांकि प्राचीन राजनीतिक शक्तियों की सटीक काल-सीमा निर्धारित करते समय विभिन्न विद्वानों के मतों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

कुणिंदों की चर्चा हमें यह समझने का अवसर देती है कि हिमालयी क्षेत्र में स्थानीय राजनीतिक शक्तियाँ किस प्रकार विकसित हुईं और वे व्यापक उत्तर भारतीय राजनीतिक संसार से कैसे जुड़ीं।

इसीलिए उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल का अगला महत्वपूर्ण अध्याय कुणिंदों से शुरू होना स्वाभाविक है।


केवल राजवंश नहीं, बदलता हुआ समाज

इतिहास की इस अवधि को केवल ‘किस राजा ने शासन किया’ के प्रश्न तक सीमित करना उचित नहीं होगा।

इस समय हिमालयी समाज में कई स्तरों पर परिवर्तन हो रहे थे—

  • कृषि और पशुपालन की अर्थव्यवस्था का विस्तार

  • स्थानीय बस्तियों और सामाजिक संगठनों का विकास

  • धातु के उपयोग में वृद्धि

  • पर्वतीय एवं मैदानी क्षेत्रों के बीच संपर्क

  • व्यापारिक मार्गों का महत्व

  • धार्मिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं का विस्तार

  • राजनीतिक संगठनों का उभरना

इन परिवर्तनों ने आगे चलकर उत्तराखण्ड की विशिष्ट क्षेत्रीय संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


व्यापारिक मार्गों का बढ़ता महत्व

हिमालयी क्षेत्रों का इतिहास व्यापार से भी गहराई से जुड़ा रहा है।

नदियों की घाटियाँ और पर्वतीय दर्रे केवल प्राकृतिक संरचनाएँ नहीं थे; वे लोगों, वस्तुओं और विचारों के आवागमन के मार्ग भी थे।

हिमालय के पार जाने वाले मार्गों के माध्यम से नमक, ऊन, पशु-उत्पाद, धातु तथा अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान होता रहा होगा। इन संपर्कों ने पर्वतीय समाज को व्यापक आर्थिक संसार से जोड़ा।

व्यापार के साथ केवल वस्तुएँ ही नहीं चलतीं—भाषाएँ, धार्मिक धारणाएँ, कला-रूप, तकनीक और सांस्कृतिक प्रभाव भी यात्रा करते हैं।

उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक इतिहास को समझने में यह तथ्य विशेष महत्व रखता है।


धार्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल में उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक दुनिया भी परिवर्तनशील थी।

हिमालय प्राचीन भारतीय धार्मिक परम्पराओं में पहले से ही विशेष महत्व रखता था। नदियाँ, पर्वत, वन और प्राकृतिक स्थल धार्मिक कल्पना का हिस्सा थे।

समय के साथ विभिन्न धार्मिक परम्पराओं का प्रभाव यहाँ दिखाई देने लगा। आगे चलकर शैव, वैष्णव और बौद्ध परम्पराओं से जुड़े अनेक प्रमाण उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में मिलते हैं।

हालाँकि इन परम्पराओं के प्रसार को किसी एक घटना या एक राजवंश से जोड़ना उचित नहीं होगा। यह एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक प्रक्रिया थी, जिसमें स्थानीय विश्वासों और बाहरी धार्मिक प्रभावों का परस्पर संपर्क हुआ।


अभिलेख : इतिहास की दूसरी आवाज

सिक्कों के साथ अभिलेख भी प्रारम्भिक इतिहास के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जहाँ सिक्के आर्थिक और राजनीतिक इतिहास की जानकारी देते हैं, वहीं अभिलेख इतिहास के लिए लगभग प्रत्यक्ष प्रमाण का कार्य करते हैं।

अभिलेखों से किसी शासक, दानदाता, धार्मिक संस्था, प्रशासनिक व्यवस्था या सामाजिक परिस्थिति के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिल सकती है।

उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक इतिहास के अध्ययन में अभिलेखीय साक्ष्यों को सिक्कों और पुरातात्विक सामग्री के साथ पढ़ना आवश्यक है। इससे किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भर रहने से बचा जा सकता है।

उत्तराखण्ड में उपलब्ध प्राचीन एवं प्रारम्भिक मध्यकालीन अभिलेख इस क्षेत्र के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यही कारण है कि उत्तराखण्ड के इतिहास के अध्ययन में पुरातत्व, अभिलेखशास्त्र और मुद्राशास्त्र—तीनों को साथ लेकर चलना आवश्यक है।

इतिहास की विश्वसनीय तस्वीर तब बनती है, जब अलग-अलग स्रोत एक-दूसरे की पुष्टि, पूरकता या कभी-कभी चुनौती प्रस्तुत करते हैं।


उत्तराखण्ड के इतिहास में इस काल का महत्व

आद्य इतिहास तक पहुँचते-पहुँचते हमें मानव जीवन और संस्कृति के विकास की अनेक परतें दिखाई देती हैं। प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल में इन परतों के ऊपर एक नई संरचना जुड़ती है—संगठित राजनीतिक सत्ता।

प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल में इसी आधार पर एक नया चरण दिखाई देता है—स्थानीय राजनीतिक शक्तियों का उभार और उनका व्यापक भारतीय राजनीतिक-सांस्कृतिक संसार से संपर्क।

यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे सदियों की मानवीय गतिविधियाँ, स्थानीय समुदायों का विकास, व्यापारिक संपर्क, भौगोलिक परिस्थितियाँ और सांस्कृतिक आदान-प्रदान काम कर रहे थे।

इस दृष्टि से उत्तराखण्ड का प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल वास्तव में उस हिमालयी समाज के राजनीतिक रूप से संगठित होने की कहानी है, जिसकी जड़ें बहुत गहरे अतीत में थीं।


आगे की यात्रा : कुणिंदों की ओर

अब प्रश्न उठता है—इस बदलते हुए उत्तराखण्ड में पहली प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में कौन-सी शक्ति सामने आती है?

इस प्रश्न का उत्तर हमें कुणिंदों के इतिहास में मिलता है।

कुणिंदों का इतिहास केवल एक राजवंश का इतिहास नहीं है। उनके सिक्के, उनके भौगोलिक विस्तार और उनसे जुड़े स्रोत हमें यह समझने का अवसर देते हैं कि प्राचीन हिमालयी क्षेत्र किस प्रकार व्यापक उत्तर भारतीय इतिहास का सक्रिय हिस्सा बना।

इसलिए अगली कड़ी में हम विस्तार से जानेंगे—

“उत्तराखण्ड में कुणिंद : हिमालय की प्राचीन राजनीतिक शक्ति का इतिहास”

कुणिंद कौन थे?
उनका राज्य कहाँ तक फैला था?
राजा अमोघभूति की उत्तराखंड के इतिहास में वास्तविक भूमिका क्या है?
कुणिंदों के सिक्कों से हमें क्या जानकारी मिलती है?
और उत्तराखण्ड के इतिहास में उनका स्थान इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

इन प्रश्नों के उत्तर हमें उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक ऐतिहासिक अतीत की एक और रोचक परत से परिचित कराएँगे।


निष्कर्ष

प्रागैतिहासिक मानव की पहली आहट से लेकर संगठित राजनीतिक शक्ति के उदय तक—उत्तराखण्ड का इतिहास निरंतर परिवर्तन की कहानी है।

पत्थर के औजारों से शुरू हुई यात्रा शैलचित्रों, पुरास्थलों और प्राचीन सांस्कृतिक साक्ष्यों से गुजरते हुए अब सिक्कों, अभिलेखों और राजसत्ताओं के युग में प्रवेश करती है।

यही वह पड़ाव है जहाँ उत्तराखण्ड का अतीत केवल पुरातात्विक अवशेषों में दिखाई नहीं देता, बल्कि राजनीतिक इतिहास के रूप में भी अपना स्वरूप ग्रहण करने लगता है।

और इस नई ऐतिहासिक यात्रा का पहला महत्वपूर्ण नाम है—कुणिंद।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर

"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:

🔗 अधिक पढ़ें

- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट

- भाग–2: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण (भाग-2): समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा

- भाग–4: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–4)  पश्चिमी रामगंगा घाटी की पुरातात्त्विक अभिज्ञता : कपमार्क्स, शैलाश्रय और महापाषाणीय संस्कृति के साक्ष्य

- भाग-5: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–5) पश्चिमी रामगंगा घाटी के महापाषाणीय शवाधान : पत्थरों में सुरक्षित एक विलुप्त सभ्यता की स्मृतियाँ

-भाग-6: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–6) प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल : हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट एवं अन्य पुरातात्त्विक स्थल

-भाग-7: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–7) प्रागैतिहासिक औजारों का विस्तृत अध्ययन : पत्थरों में छिपी मानव सभ्यता की विकासगाथा

इसे भी पढ़े: उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास : पुरातात्विक साक्ष्यों से इतिहास की ओर बढ़ते कदम

«नोट: प्रत्येक शीर्षक पर क्लिक करके संबंधित लेख पढ़ें, फिर इस लेख का अध्ययन आगे बढ़ाएँ।»



लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास : पुरातात्विक साक्ष्यों से इतिहास की ओर बढ़ते कदम


मृद्भांडों, धातु-साक्ष्यों, समाधियों, प्राचीन समुदायों और अभिलेखीय परंपराओं के बीच उत्तराखण्ड के अतीत की खोज

हिमालय की ऊँची चोटियों, गहरी नदी-घाटियों और दुर्गम पर्वतीय अंचलों में बसा उत्तराखण्ड केवल प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक आस्था की भूमि नहीं है। इसकी मिट्टी, चट्टानों, गुफाओं और नदी-घाटियों में मानव सभ्यता की अत्यंत प्राचीन स्मृतियाँ भी सुरक्षित हैं।

लखु उडियार और हुडुली के शैलचित्रों से लेकर पाषाण औजारों, महापाषाणीय समाधियों, प्राचीन मृद्भांडों, धातु-अवशेषों और अभिलेखों तक—उत्तराखण्ड का पुरातात्त्विक परिदृश्य मानव जीवन के विकास की अनेक परतें खोलता है।

हमारी पिछली श्रृंखला में हमने उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक काल, पाषाण औजारों और शैलचित्रों को समझने का प्रयास किया। लेकिन इसके बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—

इन प्रारम्भिक मानव समुदायों के बाद उत्तराखण्ड में इतिहास की ओर बढ़ते कदमों को हम कैसे पहचानें?

यहीं से शुरू होती है उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास की कहानी।


आद्य इतिहास क्या है?

इतिहास के अध्ययन में आद्य ऐतिहासिक काल (Protohistoric Period) उस चरण को कहा जाता है जिसके बारे में पुरातात्त्विक अथवा अन्य प्रमाण तो उपलब्ध होते हैं, लेकिन लिखित स्रोत या तो सीमित होते हैं, अस्पष्ट होते हैं अथवा अभी पूरी तरह पढ़े और समझे नहीं जा सके हैं।

सरल शब्दों में इसे इस प्रकार समझ सकते हैं—

प्रागैतिहासिक काल → आद्य ऐतिहासिक काल → ऐतिहासिक काल

लेकिन यह क्रम हर क्षेत्र में एक जैसी तिथि पर लागू नहीं होता। कहीं कृषि पहले विकसित हुई, कहीं धातु तकनीक, कहीं लेखन और कहीं संगठित राजनीतिक व्यवस्था।

इसलिए उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास को समझने के लिए हमें उसके स्थानीय पुरातात्त्विक साक्ष्यों को केंद्र में रखना होगा।


पत्थर से धातु तक : बदलती दुनिया के संकेत

प्रागैतिहासिक मानव के लिए पत्थर जीवन का सबसे महत्वपूर्ण साधन था। शिकार, भोजन-संग्रह और प्रकृति पर निर्भर जीवन से आगे बढ़ते हुए मानव ने कृषि, पशुपालन, स्थायी अथवा अर्ध-स्थायी बस्तियों और नई तकनीकों को अपनाना शुरू किया।

इसी क्रम में धातु का प्रयोग मानव सभ्यता के विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

तांबे और बाद में लोहे के उपयोग ने औजारों, कृषि, निर्माण और युद्ध की तकनीकों को बदल दिया। उत्तराखण्ड में मिले विभिन्न पुरातात्त्विक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि हिमालयी समाज व्यापक भारतीय सांस्कृतिक परिवर्तनों से पूरी तरह अलग-थलग नहीं था।

हाँ, हिमालय की भौगोलिक परिस्थितियों ने इस परिवर्तन को अपना विशिष्ट रूप दिया। ऊँची पर्वत-श्रृंखलाएँ, संकरी घाटियाँ, नदियाँ और दर्रे बाधा होने के साथ-साथ संपर्क के मार्ग भी रहे होंगे।


मिट्टी के बर्तन : इतिहास की सबसे शांत लेकिन महत्वपूर्ण आवाज

पुरातत्त्व में मृद्भांड अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं।

किसी बर्तन का आकार, निर्माण तकनीक, मिट्टी, रंग, पकाने की विधि और उस पर बने चित्र उस समय के लोगों के जीवन और सांस्कृतिक संपर्कों के बारे में संकेत दे सकते हैं।

उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास में चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware—PGW) विशेष महत्त्व रखते हैं।

और यहीं से सामने आते हैं दो महत्वपूर्ण स्थल—थापली और पुरोला।




थापली : अलकनंदा घाटी में पहुँची चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति

श्रीनगर के निकट अलकनंदा नदी के तट पर स्थित थापली उत्तराखण्ड के आद्य ऐतिहासिक पुरातत्त्व का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है।

पुरातात्त्विक अनुसंधानों में थापली से Painted Grey Ware (PGW) की उपस्थिति स्थापित हुई है। शोधकर्ताओं के अनुसार थापली और पुरोला की खोज ने यह स्पष्ट किया कि चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति केवल गंगा-यमुना के मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं थी, बल्कि मध्य हिमालय के भीतर तक इसके प्रमाण मिलते हैं। (IGNCA)

थापली से प्राप्त PGW में मुख्यतः कटोरे और थालीनुमा पात्र मिले हैं तथा एक चित्रित लघु पात्र भी उल्लेखनीय है। (IGNCA)

यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उत्तराखण्ड को उत्तर भारत की व्यापक सांस्कृतिक गतिविधियों के संदर्भ में देखने का अवसर मिलता है।

अर्थात—

अलकनंदा केवल तीर्थों की नदी नहीं थी; उसकी घाटी प्राचीन मानव गतिविधियों और सांस्कृतिक संपर्कों की भी वाहक रही।


पुरोला : यमुना घाटी की एक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक कड़ी

उत्तरकाशी जिले का पुरोला उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास का एक और महत्वपूर्ण स्थल है।

यहाँ के उत्खनन से चित्रित धूसर मृद्भांड के अवशेषों के साथ टेराकोटा आकृतियाँ, मनके, मृद्भांडों पर कुम्हार के चिह्न तथा घोड़े के दाँत और जांघ की हड्डी के अवशेष मिलने की सूचना है। (Uttarakhand PSC Notes)

पुरोला की यह सामग्री हमें केवल एक प्राचीन बस्ती की जानकारी नहीं देती; यह उस समय के लोगों की तकनीक, जीवनशैली और संभावित सांस्कृतिक संपर्कों को समझने का अवसर देती है।

पुरोला से संबंधित एक अन्य रोचक पुरातात्त्विक विवरण में ईंटों से निर्मित वेदिका का उल्लेख मिलता है, जिसे उत्खननकर्ता ने श्येनचिति से संबद्ध किया है।

हालाँकि ऐसे पुरातात्त्विक साक्ष्यों की व्याख्या करते समय सावधानी जरूरी है। किसी मृद्भांड या घोड़े की अस्थि को सीधे किसी एक जाति, साहित्यिक परंपरा या धार्मिक समूह से जोड़ देना उचित नहीं होगा।

पुरातत्त्व साक्ष्य देता है; इतिहासकार उन साक्ष्यों के बीच संबंध खोजता है।


क्या अलकनंदा घाटी से उत्तर-हड़प्पाकालीन गेरुए मृद्भांड मिले थे?

यह प्रश्न उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास को लिखते समय विशेष सावधानी की माँग करता है।

उत्तर भारत में गेरुए रंग के मृद्भांड (Ochre Coloured Pottery—OCP) और उत्तर-हड़प्पाकालीन सांस्कृतिक चरणों का अध्ययन हुआ है, लेकिन अलकनंदा घाटी के संदर्भ में उपलब्ध स्पष्ट पुरातात्त्विक प्रकाशन थापली से PGW की उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं। (IGNCA)

“अलकनंदा घाटी के थापली से चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।”


कोल, किरात और खस : इतिहास के धुँधले पन्नों की कहानी

पुरातात्त्विक साक्ष्यों के साथ उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास में प्राचीन समुदायों की चर्चा भी महत्वपूर्ण है।

उत्तराखण्ड के पारंपरिक इतिहासलेखन में कोल, किरात और खस जैसे समुदायों का उल्लेख मिलता है। कुछ इतिहासकारों ने कोल अथवा मुण्ड समुदाय को हिमालय के प्राचीन निवासियों में माना और उनके बाद किरात तथा खस समुदायों के आगमन की परिकल्पना की।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

कोल → किरात → खस

को एक निर्विवाद और निश्चित पुरातात्त्विक क्रम मानना उचित नहीं है। इन समुदायों की पहचान, उनके आगमन का काल और उनके पारस्परिक संबंधों के विषय में इतिहासलेखन में मतभेद हैं।

इसी प्रकार “किरातों ने कोलों को दास बना लिया” जैसे कथन को भी निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके समर्थन में प्रत्यक्ष पुरातात्त्विक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं।

इसलिए इसे इतिहासलेखन की एक परंपरागत धारणा के रूप में देखना अधिक उचित होगा।

यही अंतर एक अच्छे इतिहास-लेख और लोककथा में होता है—

लोकस्मृति प्रश्न देती है, जबकि पुरातत्त्व और इतिहास उसके प्रमाण खोजते हैं।


क्या सिंधु घाटी सभ्यता का उत्तराखण्ड से संबंध था?

यह प्रश्न स्वाभाविक है।

सिंधु-सरस्वती सभ्यता का मुख्य विकास उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ। उत्तराखण्ड में अभी तक हड़प्पा के प्रमुख नगरों जैसी नगरीय संरचनाएँ नहीं मिली हैं। इसलिए यह कहना कि “उत्तराखण्ड सिंधु सभ्यता का हिस्सा था”, वर्तमान प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं होगा।

हाँ, उत्तर भारत और हिमालय के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संपर्कों की संभावना को व्यापक पुरातात्त्विक संदर्भ में देखा जा सकता है।

थापली और पुरोला में PGW की उपस्थिति ने विशेष रूप से यह दिखाया कि उत्तर भारत की कुछ सांस्कृतिक परंपराएँ हिमालय के भीतर तक पहुँची थीं। शोधकर्ताओं ने इसे PGW संस्कृति की हिमालयी सीमा के विस्तार के रूप में महत्वपूर्ण माना है। (IGNCA)

इसलिए लेख में “सांस्कृतिक संपर्क” कहना अधिक उचित है, बजाय इसके कि किसी बड़े सभ्यतागत विस्तार का दावा कर दिया जाए।


बिनसर महादेव : अभिलेख, रहस्य और लोकविश्वास

पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण क्षेत्र में स्थित बिनसर महादेव मंदिर भी प्राचीन अभिलेखीय परंपरा की दृष्टि से उल्लेखनीय है। मंदिर की एक दीवार पर एक प्राचीन अभिलेख उत्कीर्ण है, जिसे स्थानीय परंपरा में ‘विश्वकर्मा द्वारा लिखा हुआ’ माना जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि अभिलेख की लिपि सामान्य जन के लिए सहज पठनीय नहीं है। स्थानीय लोगों में प्रचलित इस विश्वास ने इस अभिलेख को रहस्य और लोक-आस्था से जोड़ दिया है।

यदि इसे शंख लिपि का अभिलेख माना जाता है, तो यह उत्तराखण्ड की प्राचीन लिपि-परंपराओं और अभिलेखीय इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है। हालांकि किसी अभिलेख की वास्तविक तिथि, लिपि और आशय निर्धारित करने के लिए पैलियोग्राफिक अध्ययन तथा विशेषज्ञों द्वारा प्रत्यक्ष परीक्षण आवश्यक है। इसलिए इसे बिना प्रमाण के निश्चित काल या किसी ऐतिहासिक व्यक्ति से जोड़ना उचित नहीं होगा।


यही इस अभिलेख की सबसे रोचक विशेषता है—एक ओर पत्थर पर अंकित अज्ञात अक्षर हैं और दूसरी ओर उनसे जुड़ी लोकस्मृति। इतिहासकार जहाँ उन अक्षरों को पढ़कर उनका वास्तविक अर्थ और काल निर्धारित करने का प्रयास करते हैं, वहीं स्थानीय समाज ने अपनी कल्पना और आस्था के माध्यम से उन्हें विश्वकर्मा से जोड़ दिया। इस प्रकार बिनसर महादेव का यह अभिलेख पुरातत्त्व, अभिलेख-विज्ञान और लोकविश्वास—तीनों के संगम का उदाहरण बन जाता है।

पुरातत्त्वविद के लिए वह एक अनपढ़ा चिह्न है; स्थानीय समाज के लिए वही विश्वकर्मा की स्मृति।

यानी एक ही पत्थर—दो अलग-अलग अर्थ।


जब इतिहास ने स्वयं को लिखना शुरू किया : कालसी

आद्य इतिहास से लिखित इतिहास की ओर बढ़ते हुए सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है—

अभिलेख

जब किसी समाज के अपने समय के लिखित प्रमाण सामने आने लगते हैं, तो इतिहासकार के पास पुरातात्त्विक सामग्री के साथ एक नया स्रोत जुड़ जाता है।

उत्तराखण्ड में इसका सबसे प्रसिद्ध और प्रमाणिक उदाहरण है—

कालसी का अशोक शिलालेख

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अनुसार कालसी वह महत्वपूर्ण स्थल है जहाँ सम्राट अशोक के चौदह प्रमुख शिलालेखों का समूह एक शिला पर उत्कीर्ण है। ये अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं। (Dehradun Circle)


यहाँ उत्तराखण्ड के इतिहास में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है।

अब हमारे पास केवल—

मिट्टी नहीं, शब्द भी हैं।

अब पुरातत्त्व के साथ अभिलेख इतिहास की आवाज बनने लगता है।


कुणिंद : जब हिमालयी समाज राजनीतिक पहचान की ओर बढ़ा

आगे चलकर उत्तराखण्ड और उसके आसपास के हिमालयी क्षेत्र में कुणिंदों का उल्लेख मिलता है।

कुणिंदों के अध्ययन में उनकी मुद्राएँ विशेष महत्व रखती हैं। इनसे राजनीतिक सत्ता, अर्थव्यवस्था, धार्मिक प्रतीकों और सांस्कृतिक संपर्कों के बारे में महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं।

यहाँ इतिहास की यात्रा एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई देती है—

पुरास्थल → संस्कृति → समुदाय → राजनीतिक संगठन → मुद्रा → अभिलेख

अब अतीत केवल मिट्टी की परतों में नहीं है; वह अपनी राजनीतिक पहचान भी व्यक्त करने लगा है।


हिमालय : क्या पर्वत वास्तव में बाधा थे?

उत्तराखण्ड के इतिहास को देखते हुए एक पुरानी धारणा पर पुनर्विचार आवश्यक है—

क्या हिमालय ने यहाँ के लोगों को बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग रखा था?

शायद नहीं।

नदियों की घाटियाँ, पर्वतीय दर्रे और प्राकृतिक मार्ग प्राचीन समुदायों के लिए आवागमन और संपर्क के रास्ते भी रहे होंगे।

अलकनंदा, यमुना और अन्य नदी घाटियों के पुरातात्त्विक साक्ष्य हमें यह सोचने का आधार देते हैं कि हिमालय केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं था।

वह संपर्क का क्षेत्र भी था।

इसीलिए उत्तराखण्ड के पुरातात्त्विक साक्ष्यों को केवल स्थानीय इतिहास के रूप में नहीं, बल्कि हिमालय और उत्तर भारतीय मैदानों के व्यापक सांस्कृतिक नेटवर्क के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।


प्रागैतिहासिक से ऐतिहासिक तक : एक लंबी यात्रा

उत्तराखण्ड का इतिहास किसी एक दिन अचानक शुरू नहीं हुआ।

यह हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुई प्रक्रिया थी—

पाषाण औजार
↓
शिकार और संग्रह
↓
कृषि और पशुपालन
↓
स्थायी/अर्ध-स्थायी बसावट
↓
मृद्भांड
↓
धातु तकनीक
↓
सामाजिक जटिलता
↓
धार्मिक एवं अंतिम संस्कार परंपराएँ
↓
अभिलेखीय परंपरा
↓
संगठित राजनीतिक सत्ता

यह यात्रा सीधी रेखा में नहीं चली होगी। अलग-अलग घाटियों और समुदायों में परिवर्तन की गति अलग रही होगी।

लेकिन प्रत्येक पुरातात्त्विक परत हमें उस विशाल परिवर्तन की एक झलक देती है।


एक मिट्टी का टुकड़ा और हजारों वर्षों की कहानी

उत्तराखण्ड के आद्य इतिहास की सबसे सुंदर बात यही है कि यहाँ इतिहास हमें हमेशा राजाओं की वंशावली से नहीं मिलता।

कहीं—

मिट्टी का एक छोटा-सा टुकड़ा है।

कहीं—

चट्टान पर बना एक रहस्यमय चिह्न।

कहीं—

मृतक की समाधि।

कहीं—

धातु का छोटा-सा उपकरण।

कहीं—

घोड़े की अस्थि।

और अंततः—

कालसी की चट्टान पर खुदे हुए अक्षर।

इन छोटे-छोटे साक्ष्यों को जोड़कर इतिहासकार उस विशाल अतीत की तस्वीर बनाते हैं जिसे समय ने लगभग मिटा दिया था।

यही पुरातत्त्व का आकर्षण है।

एक छोटा साक्ष्य—एक बड़ा प्रश्न।


निष्कर्ष : पत्थरों से शब्दों तक

उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास वास्तव में मौन साक्ष्यों को पढ़ने की कला है।

जहाँ कोई राजा अपना नाम नहीं लिख गया, वहाँ एक मृद्भांड बोलता है।

जहाँ कोई इतिहासकार उपस्थित नहीं था, वहाँ एक धातु का औजार कहानी कहता है।

जहाँ कोई लिखित ग्रंथ नहीं मिला, वहाँ एक समाधि हमें मृत्यु और विश्वास के बारे में सोचने को विवश करती है।

जहाँ किसी चट्टान पर अनजाने चिह्न हैं, वहाँ लोकस्मृति उन्हें विश्वकर्मा की लेखनी मानकर अपने ढंग से अर्थ देती है।

और जहाँ पुरातत्त्व के साथ अभिलेख जुड़ जाता है, वहाँ इतिहास की आवाज और स्पष्ट हो जाती है।

इस दृष्टि से उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास केवल अतीत की खोज नहीं है। यह उस प्रक्रिया को समझने का प्रयास है जिसमें मानव समुदायों ने अपने परिवेश को समझते हुए तकनीक, समाज, संस्कृति, विश्वास और राजनीतिक पहचान की जटिल दुनिया का निर्माण किया।

प्रागैतिहासिक औजारों से लेकर थापली और पुरोला के मृद्भांडों तक, मलारी की समाधियों से लेकर बिनसर की रहस्यमय अभिलेखीय परंपरा तक और अंततः कालसी के अशोक शिलालेख तक—उत्तराखण्ड की धरती एक लंबी कहानी सुनाती है।

एक ऐसी कहानी जिसमें—

पत्थर धीरे-धीरे औजार से स्मृति बना,
मिट्टी मृद्भांड बनी,
धातु तकनीक बनी,
समाधि विश्वास की गवाही बनी,
और अंततः पत्थर पर खुदे अक्षर इतिहास की आवाज बन गए।

और शायद यही इतिहास की सबसे सुंदर यात्रा है—

“जब मनुष्य ने पत्थर को आकार दिया, तब संस्कृति ने जन्म लिया;
और जब उसने अपने अनुभवों को शब्दों में दर्ज किया, तब इतिहास ने स्वयं को पहचान लिया।”

अंतिम विचार

उत्तराखण्ड का आद्य इतिहास अभी पूर्णतः लिखा नहीं जा चुका है। इसकी अनेक घाटियाँ, पुरास्थल, अभिलेख और पुरावशेष आज भी नए शोध की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

इसलिए यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

हर नई खुदाई, हर नया अभिलेख और हर नया पुरातात्त्विक अध्ययन उत्तराखण्ड के अतीत की किसी अनदेखी परत को सामने ला सकता है।

शायद भविष्य में कोई ऐसा पुरावशेष मिले, जो आज के किसी प्रश्न का उत्तर दे।

और तब—

उत्तराखण्ड की धरती एक बार फिर इतिहास बोलेगी।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर

"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:

🔗 अधिक पढ़ें

- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट

- भाग–2: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण (भाग-2): समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा

- भाग–4: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–4)  पश्चिमी रामगंगा घाटी की पुरातात्त्विक अभिज्ञता : कपमार्क्स, शैलाश्रय और महापाषाणीय संस्कृति के साक्ष्य

- भाग-5: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–5) पश्चिमी रामगंगा घाटी के महापाषाणीय शवाधान : पत्थरों में सुरक्षित एक विलुप्त सभ्यता की स्मृतियाँ

-भाग-6: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–6) प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल : हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट एवं अन्य पुरातात्त्विक स्थल

-भाग-7: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–7) प्रागैतिहासिक औजारों का विस्तृत अध्ययन : पत्थरों में छिपी मानव सभ्यता की विकासगाथा

«नोट: प्रत्येक शीर्षक पर क्लिक करके संबंधित लेख पढ़ें, फिर इस लेख का अध्ययन आगे बढ़ाएँ।»



लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–7) प्रागैतिहासिक औजारों का विस्तृत अध्ययन : पत्थरों में छिपी मानव सभ्यता की विकासगाथा




"जब मनुष्य ने पहली बार किसी पत्थर को अपनी आवश्यकता के अनुसार तराशा, तभी से सभ्यता की यात्रा का वास्तविक आरम्भ हुआ। वही साधारण-सा पत्थर आगे चलकर मानव बुद्धि, विज्ञान और संस्कृति के विकास का प्रथम अध्याय बना।"

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–6) प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल : हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट एवं अन्य पुरातात्त्विक स्थल

डॉ. भावना जुयाल 

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक कालीन इतिहास अनेक ऐसे पुरास्थलों से समृद्ध है, जो आदिम मानव के जीवन, कला और संस्कृति की अमूल्य झलक प्रस्तुत करते हैं। इस लेख में हम हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट तथा अन्य प्रमुख पुरातात्त्विक स्थलों का परिचय देंगे और जानेंगे कि ये साक्ष्य उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अतीत को समझने में क्यों महत्वपूर्ण हैं।

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–5) पश्चिमी रामगंगा घाटी के महापाषाणीय शवाधान : पत्थरों में सुरक्षित एक विलुप्त सभ्यता की स्मृतियाँ

 

महापाषाणीय शवाधान


"जब लिखित इतिहास मौन हो जाता है, तब पत्थर बोलना शुरू करते हैं; और उन्हीं की भाषा को पुरातत्त्व कहा जाता है।"

'उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल' के संदर्भ में पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास केवल कपमार्क्स तक सीमित नहीं है। इस घाटी की धरती के गर्भ में ऐसी अनेक पुरातात्विक धरोहरें छिपी हैं, जो हजारों वर्ष पूर्व यहाँ विकसित मानव सभ्यता की मौन गाथा सुनाती हैं। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण हैं महापाषाणीय शवाधान—विशाल प्रस्तरखण्डों से निर्मित वे समाधि-स्थल, जिनमें उस युग के लोगों ने अपने प्रियजनों को अंतिम विश्राम दिया। ये केवल कब्रें नहीं हैं, बल्कि उस समाज की धार्मिक आस्था, सामाजिक संरचना, कलात्मक अभिरुचि और मृत्यु के प्रति उसके दार्शनिक दृष्टिकोण के सजीव दस्तावेज हैं।

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक स्थल 

मलारी : जहाँ उत्तराखण्ड में पहली बार खुला महापाषाणीय संस्कृति का द्वार

उत्तराखण्ड में महापाषाणीय शवाधानों की खोज का श्रेय प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' को जाता है। वर्ष 1956 ई. में उन्होंने चमोली जनपद के नीति घाटी स्थित मलारी गाँव में ऐसे शवाधानों की पहचान कर हिमालयी पुरातत्त्व के एक नए अध्याय का उद्घाटन किया।

मलारी में मिले शवाधानों का निर्माण अत्यन्त सुविचारित ढंग से किया गया था। चारों ओर विशाल प्रस्तरखण्ड खड़े किए गए थे और ऊपर एक बड़े शिलाखण्ड से उन्हें ढक दिया गया था। इन पत्थरों के भीतर सुरक्षित सामग्री यह संकेत देती है कि मृतकों के प्रति उस समाज का सम्मान अत्यन्त गहरा था तथा मृत्यु को वे जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि किसी नई यात्रा का आरम्भ मानते थे।

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–4) पश्चिमी रामगंगा घाटी की पुरातात्त्विक अभिज्ञता : कपमार्क्स, शैलाश्रय और महापाषाणीय संस्कृति के साक्ष्य

 

डॉ. भावना जुयाल 

पश्चिमी रामगंगा घाटी : उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अतीत की जीवंत प्रयोगशाला

"यदि लखु उडियार हमें प्रागैतिहासिक मानव की कलात्मक चेतना से परिचित कराता है, तो पश्चिमी रामगंगा घाटी उसके दैनिक जीवन, निवास और सांस्कृतिक विकास की कथा सुनाती है।"

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक इतिहास का अध्ययन करते समय पश्चिमी रामगंगा घाटी का विशेष महत्व सामने आता है। यह घाटी केवल एक नदी तंत्र नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से मानव गतिविधियों की साक्षी रही एक प्राकृतिक प्रयोगशाला है। यहाँ बिखरे हुए कपमार्क्स (Cup-marks), शैलाश्रय, पाषाण अवशेष तथा स्थानीय परंपराएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक समुदायों के लिए अत्यंत अनुकूल निवास स्थल रहा होगा।


उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक खोजों की शुरुआत (कपमार्क्स)

मध्य हिमालय में व्यवस्थित पुरातात्त्विक खोज का इतिहास उन्नीसवीं शताब्दी से प्रारम्भ होता है। 1856 ई. में ब्रिटिश अधिकारी विलियम जे. हेनवुड (William J. Henwood) ने चम्पावत जनपद के देवीधुरा में चट्टानों पर बने कपमार्क्स खोजे। उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन में इसे एक महत्वपूर्ण प्रारम्भिक खोज माना जाता है।

इसके लगभग दो दशक बाद 1877 ई. में कार्नेक (Carnegy) ने द्वाराहाट स्थित चंद्रेश्वर मंदिर के समीप लगभग 200 कपमार्क्स का उल्लेख किया। ये कपमार्क्स बारह समानांतर पंक्तियों में व्यवस्थित थे तथा इनके आसपास लहरदार रेखाएँ, पत्तीनुमा आकृतियाँ और अन्य ज्यामितीय चिह्न भी अंकित थे।

कार्नेक ने इन चिह्नों की तुलना यूरोप में मिले समान पुरातात्त्विक अवशेषों से करते हुए यह विचार व्यक्त किया कि कपमार्क्स की परंपरा केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि विश्व के अन्य भागों में भी विद्यमान थी। इस तुलना ने उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान किया।


पश्चिमी रामगंगा घाटी : कपमार्क्स का समृद्ध क्षेत्र

समय के साथ अनेक भारतीय पुरातत्त्वविदों ने पश्चिमी रामगंगा घाटी का सर्वेक्षण किया। डॉ. एम. पी. जोशी ने अल्मोड़ा जनपद के घिटाई, दियाली डांडा, कालीमाटी, कैखान, मल्ला पैनुली, नौगाँव, फलसीमा और सिमल्टी जैसे स्थलों पर अनेक कपमार्क्स का प्रलेखन किया।

🎥 वीडियो में देखिए—कपमार्क्स का रहस्य

चट्टानों पर बने ये छोटे-छोटे गड्ढे देखने में भले ही साधारण लगें, लेकिन इनके पीछे छिपी कहानी बेहद रोचक है। कपमार्क्स के ये निशान हमें प्राचीन मानव और उसकी गतिविधियों से जुड़े कई सवालों तक ले जाते हैं।

आखिर इन पत्थरों पर ये निशान क्यों बनाए गए? इनका उपयोग किस उद्देश्य से होता था? और क्या इन मौन चिह्नों में हमारे अतीत की कोई अनकही कहानी छिपी है?

आइए, वीडियो के माध्यम से कपमार्क्स को करीब से देखें और इन रहस्यमयी निशानों के पीछे छिपे इतिहास को समझने का प्रयास करें।

इसी क्रम में भारतीय शैलचित्र विशेषज्ञ डॉ. यशोधर मठपाल ने रामगंगा घाटी में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने नौला गाँव में 72 कपमार्क्स, जालली–मासी मार्ग पर जोंयो के समीप एक विशाल प्रस्तर पर 22 कपमार्क्स तथा दूसरी चट्टान पर 11 कपमार्क्स दर्ज किए। इसके अतिरिक्त नौगाँव और मुनिया की ढाई जैसे स्थलों पर भी कपमार्क्स की उपस्थिति दर्ज की गई।

इन खोजों से स्पष्ट होता है कि पश्चिमी रामगंगा घाटी उत्तराखण्ड की उन प्रमुख घाटियों में है जहाँ प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियों के व्यापक प्रमाण आज भी सुरक्षित हैं।

इसे भी पढ़े: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल : हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट


'बाइस ओखला' : जहाँ इतिहास आज भी जीवित है

चौखुटिया–जौरासी मोटर मार्ग पर आगर मनराल गाँव के समीप स्थित एक विशाल वर्गाकार प्रस्तर पर 22 कपमार्क्स बने हुए हैं। इन्हीं के कारण यह स्थान स्थानीय लोगों के बीच "बाइस ओखला" के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्थल की विशेषता केवल इसके कपमार्क्स नहीं हैं, बल्कि यह भी है कि स्थानीय ग्रामीणों ने इन्हें सुरक्षित रखने के उद्देश्य से चारों ओर लौह सुरक्षा घेरा (Iron Railing) बनवाया है। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि स्थानीय समाज अपनी विरासत के प्रति सजग हो, तो संरक्षण का कार्य अधिक प्रभावी हो सकता है।

बाईस ओखला (आगर मनराल) 

थकुली उड्यार : जहाँ पत्थर भी बोलते हैं

गेवाड़ घाटी के ऊँचावाहन गाँव के समीप स्थित थकुली उड्यार पश्चिमी रामगंगा घाटी का सबसे रहस्यमय और रोचक पुरातात्त्विक स्थल माना जा सकता है। यहाँ विभिन्न चट्टानों पर 21 कपमार्क्स अंकित हैं, जिनमें कुछ उथले हैं तो कुछ अत्यंत गहरे।

इस स्थल की सबसे अनोखी विशेषता इसकी ध्वनि उत्पन्न करने वाली चट्टान है। जब इस पर हाथ से हल्की थाप दी जाती है तो थाली जैसी स्पष्ट ध्वनि सुनाई देती है, जबकि लकड़ी या पत्थर से प्रहार करने पर अलग प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। संभवतः इसी कारण स्थानीय लोगों ने इसे 'थकुली उड्यार' नाम दिया।

🎥 आइए, वीडियो में थकुली उडियार को करीब से देखें और सुनें—जहाँ पत्थर सचमुच बोलते हुए प्रतीत होते हैं।

भूगर्भ वैज्ञानिक प्रो. बहादुर सिंह कोटलिया के अनुसार ऐसी ध्वनियाँ चट्टानों की आंतरिक संरचना, प्राकृतिक रासायनिक प्रक्रियाओं से बने रिक्त स्थान तथा उनके खनिजीय संघटन के कारण उत्पन्न हो सकती हैं। भारत के मध्य प्रदेश, गुजरात तथा बुंदेलखंड क्षेत्र में भी इस प्रकार की अनुनादी (Resonant) चट्टानों के उदाहरण मिलते हैं।


    
थकुली उड्यार 


इसे भी पढ़े: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण : समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा

क्या थकुली उड्यार महापाषाणीय संस्कृति से जुड़ा है?

यद्यपि थकुली उड्यार में अभी तक शैलचित्र प्राप्त नहीं हुए हैं, फिर भी यह स्थल पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार उड्यार की सफाई के दौरान यहाँ से—

  • एक मिट्टी का दीपक,
  • एक प्रस्तर चक्र, तथा 
  • कुछ मृद्भाण्डों के अवशेष

प्राप्त हुए थे। दुर्भाग्यवश, जानकारी के अभाव में इन वस्तुओं का वैज्ञानिक संरक्षण नहीं हो सका।

इन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों, कपमार्क्स तथा शैलाश्रय की संरचना के आधार पर यह संभावना व्यक्त की जा सकती है कि इस स्थल का उपयोग महापाषाणीय अथवा उत्तर-प्रागैतिहासिक समुदायों द्वारा किया जाता रहा हो। हालांकि, इस निष्कर्ष की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक उत्खनन और दिनांकन (Dating) आवश्यक है।

शोध टिप्पणी: किसी भी पुरातात्त्विक स्थल को महापाषाणीय घोषित करने के लिए केवल कपमार्क्स पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए उत्खनन, सांस्कृतिक स्तर, दिनांकन और अन्य पुरातात्त्विक साक्ष्यों का अध्ययन आवश्यक है।

इसे भी पढ़े: उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–3) "लखु उडियार: खोज, शैलचित्र और प्रागैतिहासिक मानव की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति" 


महरू उड्यार : शैलचित्र और कपमार्क्स का संगम

मासी–जालली मोटर मार्ग पर स्थित महरू उड्यार का उल्लेख डॉ. यशोधर मठपाल ने अपने शैलचित्र अध्ययनों में किया है। इसकी बनावट लखु उडियार से काफी मिलती-जुलती है। विशेष बात यह है कि इसके ठीक सामने एक कपमार्क भी स्थित है।

यह तथ्य इस संभावना को बल देता है कि शैलाश्रयों और कपमार्क्स का उपयोग एक ही सांस्कृतिक समुदाय द्वारा विभिन्न उद्देश्यों से किया जाता रहा होगा। यह विषय भविष्य के शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसे भी पढ़े: उत्तराखंड का इतिहास और संस्कृति: देवभूमि की गौरवशाली विरासत 


पश्चिमी रामगंगा घाटी क्यों है विशेष?

पश्चिमी रामगंगा घाटी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यहाँ बड़ी संख्या में कपमार्क्स मिले हैं, बल्कि इसलिए भी है कि यहाँ प्राकृतिक शैलाश्रय, नदी तंत्र, पाषाण संसाधन और सांस्कृतिक अवशेष एक साथ मिलते हैं। ये सभी तत्व मिलकर संकेत देते हैं कि यह घाटी उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक मानव के जीवन, तकनीक और सांस्कृतिक विकास को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र रही है।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर

"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:


📚 संदर्भ

  1. Carnegy, P. (1877). Notes on Cup-Marks in Kumaon.
  2. Henwood, W. J. (1856). देवीधुरा क्षेत्र की प्रारम्भिक पुरातात्त्विक टिप्पणियाँ।
  3. Joshi, M. P. – कुमाऊँ क्षेत्र के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण।
  4. Mathpal, Y. (1996). Rock Art in Kumaon Himalaya.
  5. Mathpal, Y. (2008). कुमाऊँ के शैलचित्र एवं महरू उड्यार संबंधी अध्ययन।
  6. कुमार (2021). भारतीय अनुनादी (Resonant) चट्टानों पर अध्ययन।
  7. कोटलिया, बहादुर सिंह – हिमालयी भूगर्भीय संरचना पर अध्ययन।
  8. बिष्ट, शंकर सिंह (2022). ऊँचावाहन ग्राम से प्राप्त स्थानीय मौखिक जानकारी।
लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)


उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–3) लखु उडियार: उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों का रहस्य | इतिहास| Lakhu Udyar|

 
Lakhu Udyar rock paintings

"चट्टानों पर उकेरे गए चित्र केवल कला नहीं, बल्कि उन लोगों की भाषा हैं जिनके पास लिखित लिपि नहीं थी।"

🎥 लखु उडियार के रहस्यमयी शैलचित्रों को वीडियो में देखिए

चट्टानों पर अंकित इन प्रागैतिहासिक चित्रों की कहानी, उनकी विशेषताओं और उत्तराखण्ड की प्रागैतिहासिक विरासत को करीब से जानने के लिए हमारा वीडियो देखें।

वीडियो: लखु उडियार के रहस्यमयी शैलचित्र – YouTube

लखु उडियार के शैलचित्र: खोज और पुरातात्त्विक अध्ययन

उत्तराखंड के प्रागैतिहासिक इतिहास के व्यवस्थित अध्ययन की शुरुआत 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई। इसी दौरान अल्मोड़ा जनपद स्थित लखु उडियार के शैलचित्रों ने पुरातत्वविदों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। बाद में भारतीय शैलकला विशेषज्ञों, विशेषकर डॉ. यशोधर मठपाल सहित अनेक विद्वानों ने इस स्थल का अध्ययन किया और इसे मध्य हिमालय की महत्वपूर्ण शैलचित्र परंपरा का प्रतिनिधि स्थल माना।

लखु उडियार का महत्व केवल चित्रों की संख्या में नहीं, बल्कि उनकी विषयवस्तु, शैली और सांस्कृतिक संकेतों में निहित है। यह स्थल इस बात का प्रमाण है कि हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले प्रागैतिहासिक समुदायों में भी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति और कलात्मक संवेदनशीलता विकसित हो चुकी थी।

शोध टिप्पणी: अब तक उपलब्ध अध्ययनों के आधार पर लखु उडियार के सभी चित्रों की एक निश्चित तिथि स्वीकार नहीं की गई है। अधिकांश विद्वान शैलीगत विश्लेषण और तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर इन्हें प्रागैतिहासिक काल के विभिन्न चरणों से जोड़ते हैं। इसलिए किसी एक निश्चित वर्ष या काल का दावा करना उचित नहीं होगा।


शैलचित्र क्या हैं?

शैलचित्र (Rock Paintings) वे चित्र हैं जिन्हें प्राचीन मानव ने प्राकृतिक चट्टानों या शैलाश्रयों की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों की सहायता से बनाया। लिखित भाषा के विकास से पहले यही चित्र मानव के विचारों, अनुभवों और सामुदायिक स्मृतियों के प्रमुख माध्यम थे।

लखु उडियार के शैलचित्र इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हिमालयी समाज की प्रारम्भिक सांस्कृतिक चेतना का परिचय देते हैं।


लखु उडियार के शैलचित्रों की प्रमुख विशेषताएँ

यहाँ प्राप्त चित्रों में निम्नलिखित विशेषताएँ प्रमुख हैं—

1. मानव आकृतियाँ

सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली आकृतियाँ मानव समूहों की हैं। कुछ चित्रों में कई व्यक्ति हाथों में हाथ डाले हुए दिखाई देते हैं। विद्वानों का मत है कि ये दृश्य सामूहिक नृत्य, किसी सामाजिक अनुष्ठान अथवा सामुदायिक आयोजन का प्रतीक हो सकते हैं।

2. ज्यामितीय आकृतियाँ

त्रिभुज, रेखाएँ, वृत्त, बिंदु तथा जालीनुमा संरचनाएँ भी चित्रित की गई हैं। इनका अर्थ पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। कुछ शोधकर्ता इन्हें धार्मिक प्रतीक मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें सामाजिक संकेत या प्रतीकात्मक भाषा का प्रारम्भिक रूप मानते हैं।

3. पशु चित्र

कुछ स्थानों पर पशुओं की आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। यद्यपि उनकी संख्या भीमबेटका जैसे स्थलों की तुलना में कम है, फिर भी वे उस समय के पर्यावरण और मानव-प्रकृति संबंध का संकेत देती हैं।



लखु उडियार के प्रागैतिहासिक शैलचित्र उत्तराखण्ड

इसे भी पढ़े: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल : हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट


चित्रों में प्रयुक्त रंग

लखु उडियार के अधिकांश चित्र लाल गेरू (Red Ochre) से बनाए गए हैं। कुछ चित्रों में सफेद रंग का भी प्रयोग दिखाई देता है।

रंगों के संभावित स्रोत—

रंग            संभावित प्राकृतिक स्रोत
लाल            हेमेटाइट (गेरू)
सफेद            चूना या अन्य श्वेत खनिज
काला            मैंगनीज़ या कोयला (कुछ स्थानों पर)

रंगों को पानी, पौधों के रस अथवा पशु वसा जैसे प्राकृतिक बाइंडर के साथ मिलाकर उपयोग किया गया होगा। हालाँकि लखु उडियार के सभी चित्रों के लिए यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है, लेकिन भारतीय शैलचित्रों पर हुए अध्ययनों से यह संभावना प्रबल मानी जाती है।


चित्रों से क्या पता चलता है?

इन शैलचित्रों का अध्ययन हमें बताता है कि—

  • मानव समूहों में रहता था।
  • सामूहिक गतिविधियाँ महत्वपूर्ण थीं।
  • प्रकृति के साथ गहरा संबंध था।
  • कला केवल सजावट नहीं, बल्कि सामाजिक संचार का माध्यम थी।
  • प्रतीकों का प्रयोग प्रारम्भिक वैचारिक विकास का संकेत देता है।

क्या लखु उडियार केवल कला है?

नहीं।

आधुनिक पुरातत्व शैलचित्रों को केवल कला नहीं मानता। इन्हें मानव की सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक संगठन, धार्मिक विश्वास और सामूहिक पहचान के स्रोत के रूप में भी देखा जाता है। इसलिए लखु उडियार का अध्ययन केवल इतिहास नहीं, बल्कि मानवशास्त्र (Anthropology), पुरातत्व (Archaeology) और कला इतिहास (Art History) — तीनों विषयों के लिए महत्वपूर्ण है।

शैलचित्रों का वैज्ञानिक अध्ययन

लखु उडियार के शैलचित्र वर्षों से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और मानवशास्त्रियों के अध्ययन का विषय रहे हैं। इन चित्रों का महत्व केवल उनकी कलात्मक सुंदरता में नहीं, बल्कि उन सूचनाओं में है जो वे प्रागैतिहासिक समाज के जीवन, पर्यावरण और सांस्कृतिक विकास के बारे में प्रदान करते हैं।

शोधकर्ताओं द्वारा इनका अध्ययन मुख्यतः निम्न आधारों पर किया जाता है—

  • चित्रों की शैली (Style)
  • प्रयुक्त रंगद्रव्य (Pigments)
  • अध्यारोपण (Superimposition)
  • शैलाश्रय का प्राकृतिक परिवेश
  • अन्य भारतीय शैलचित्र स्थलों से तुलना

इन सभी तथ्यों के संयुक्त अध्ययन से शैलचित्रों की अनुमानित आयु और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास किया जाता है।

इसे भी पढ़े: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण : समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा


चित्रों में प्रयुक्त रंगों का वैज्ञानिक पक्ष

लखु उडियार के अधिकांश चित्र लाल गेरू (Red Ochre) से बनाए गए हैं। यह रंग प्राकृतिक रूप से मिलने वाले हेमेटाइट (Iron Oxide) खनिज से प्राप्त होता है। कुछ चित्रों में सफेद रंग भी दिखाई देता है, जो संभवतः चूना या अन्य श्वेत खनिजों से तैयार किया गया होगा।

रंगों की यह विशेषता महत्वपूर्ण है क्योंकि—

  • प्राकृतिक खनिजों से बने रंग अत्यधिक टिकाऊ होते हैं।
  • यही कारण है कि अनेक चित्र हजारों वर्षों बाद भी दिखाई देते हैं।
  • रंगों का चयन स्थानीय भूगर्भीय संसाधनों की जानकारी को भी दर्शाता है।

हालाँकि लखु उडियार के प्रत्येक चित्र पर विस्तृत रासायनिक परीक्षण प्रकाशित नहीं हैं, इसलिए रंगों की संरचना के बारे में निष्कर्ष सावधानीपूर्वक ही प्रस्तुत किए जाते हैं।


चित्र बनाने की संभावित तकनीक

प्रागैतिहासिक कलाकारों के पास आधुनिक उपकरण नहीं थे, फिर भी उन्होंने अत्यंत प्रभावशाली चित्र बनाए।

संभावना है कि वे—

  • उँगलियों,
  • लकड़ी की पतली टहनियों,
  • पौधों के रेशों,
  • अथवा पशुओं के बालों से बने सरल ब्रश

का उपयोग करते रहे होंगे।

रंगों को पानी, वनस्पति रस या पशु वसा जैसे प्राकृतिक बाइंडर के साथ मिलाया गया होगा। यह व्याख्या भारत के अन्य शैलचित्र स्थलों पर हुए अध्ययनों से समर्थित है।


मानव आकृतियों का सांस्कृतिक अर्थ

लखु उडियार के अनेक चित्रों में मानव आकृतियाँ समूहों में दिखाई देती हैं। कुछ आकृतियाँ हाथों में हाथ डाले या कतारबद्ध प्रतीत होती हैं।

इनकी विभिन्न व्याख्याएँ की गई हैं—

सामूहिक नृत्य

कुछ विद्वान इन चित्रों को सामूहिक नृत्य या उत्सव का दृश्य मानते हैं। यह संभवतः किसी सफल शिकार, ऋतु परिवर्तन या सामुदायिक अनुष्ठान से जुड़ा रहा होगा।

सामाजिक संगठन

समूह चित्र यह भी संकेत देते हैं कि उस समय तक मानव छोटे-छोटे संगठित समुदायों में रहने लगा था। सामूहिक जीवन ने सहयोग, श्रम-विभाजन और सांस्कृतिक परंपराओं को जन्म दिया।

धार्मिक या अनुष्ठानिक गतिविधियाँ

कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार कुछ चित्र धार्मिक अनुष्ठानों या प्रकृति-पूजा से जुड़े हो सकते हैं। हालाँकि इस संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसे एक संभावित व्याख्या के रूप में ही स्वीकार किया जाता है।

शोध टिप्पणी: प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की व्याख्या में सावधानी आवश्यक है। जहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध न हों, वहाँ किसी निष्कर्ष को अंतिम सत्य नहीं माना जाता।


ज्यामितीय आकृतियाँ क्या दर्शाती हैं?

लखु उडियार में केवल मानव चित्र ही नहीं, बल्कि रेखाएँ, त्रिभुज, बिंदु और अन्य ज्यामितीय आकृतियाँ भी मिलती हैं।

इनकी संभावित व्याख्याएँ हैं—

  • प्रारम्भिक प्रतीकात्मक भाषा
  • समूह या कुल-चिह्न
  • धार्मिक प्रतीक
  • शिकार या मार्ग संकेत
  • कलात्मक अभिव्यक्ति

अब तक इनका निश्चित अर्थ ज्ञात नहीं हो पाया है, और यही इन शैलचित्रों को रहस्यमय बनाता है।

इसे भी पढ़े: उत्तराखंड का इतिहास और संस्कृति: देवभूमि की गौरवशाली विरासत 


पर्यावरण और जीवन शैली

शैलचित्रों से यह स्पष्ट होता है कि प्रागैतिहासिक मानव प्रकृति के साथ गहरे संबंध में रहता था।

सुयाल नदी की घाटी में—

  • जल उपलब्ध था,
  • वनस्पति प्रचुर थी,
  • वन्य जीवों की पर्याप्त संख्या थी,
  • प्राकृतिक शैलाश्रय सुरक्षा प्रदान करते थे।

यही कारण है कि यह क्षेत्र लंबे समय तक मानव गतिविधियों का केंद्र रहा होगा।


लखु उडियार हमें क्या सिखाता है?

लखु उडियार केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि यह बताता है कि—

  • कला मानव की मूल प्रवृत्ति है।
  • सामाजिक जीवन का विकास प्रागैतिहासिक काल में ही प्रारम्भ हो चुका था।
  • हिमालयी क्षेत्र सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है।
  • उत्तराखंड का इतिहास केवल लिखित अभिलेखों से नहीं, बल्कि चट्टानों पर अंकित चित्रों से भी पढ़ा जा सकता है।

शोध टिप्पणी: शैलचित्रों की तिथि का निर्धारण प्रायः प्रत्यक्ष कार्बन डेटिंग से नहीं, बल्कि शैली, रंग, अध्यारोपण (Superimposition) और तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर किया जाता है। इसलिए विभिन्न विद्वानों द्वारा इनके काल-निर्धारण में कुछ मतभेद मिलते हैं। इस तथ्य का उल्लेख करना किसी भी शोधपरक लेख की विश्वसनीयता बढ़ाता है।

"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर

"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:


📚 संदर्भ (विश्वसनीय स्रोत)

  1. मठपाल, यशोधर (1984). Prehistoric Rock Paintings of Bhimbetka. Abhinav Publications, New Delhi.

  2. मठपाल, यशोधर (1998). Rock Art in India. Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA), New Delhi.

  3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India). Indian Archaeology – A Review (विभिन्न वर्ष).

  4. नौटियाल, के.पी. (K. P. Nautiyal). Prehistory and Protohistory of the Central Himalaya. Garhwal University Research Publications.

  5. उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय. उत्तराखण्ड का इतिहास एवं संस्कृति (अध्ययन सामग्री).

  6. डी.पी. अग्रवाल (D. P. Agrawal). The Archaeology of India. Curzon Press.

  7. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA). Rock Art Archive.

  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), देहरादून सर्किल द्वारा प्रकाशित उपलब्ध संरक्षण एवं सर्वेक्षण रिपोर्टें।

ऑनलाइन संदर्भ 

  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)
  • इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA)
  • उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग
  • उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय

 

1962 भारत-चीन युद्ध का एक भूला- बिसरा लोकगीत: सैनिक की पीड़ा और पहाड़ की लोकस्मृति |

जब इतिहास की एक घटना, बचपन की स्मृति बनकर लौट आई कुछ लोकगीत केवल गीत नहीं होते—वे समय की धड़कनों को अपने भीतर सँजोए हुए जीवित दस्तावेज होते ...