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| डॉ. भावना जुयाल |
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यह लेख "उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल" शोध-श्रृंखला का भाग-6 है। यदि आपने इस श्रृंखला के पिछले लेख नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें पहले अवश्य पढ़ें। इससे इस लेख में वर्णित पुरातात्त्विक स्थलों, सांस्कृतिक विकास तथा शोध निष्कर्षों को समझना अधिक सरल और रोचक होगा।
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- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट
- भाग–2: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण (भाग-2): समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा
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1. हुडुली के शैलचित्र : गढ़वाल की चट्टानों पर उकेरी गई प्राचीन स्मृतियाँ
यदि कुमाऊँ का लखु उडियार उत्तराखण्ड की शैलचित्र परम्परा का प्रतिनिधि है, तो गढ़वाल क्षेत्र में उत्तरकाशी जनपद का हुडुली भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थल है। भागीरथी घाटी के निकट स्थित यह शैलाश्रय इस बात का सशक्त प्रमाण है कि प्रागैतिहासिक मानव ने कुमाऊँ साथ गढ़वाल की पर्वतीय घाटियों में भी अपनी उपस्थिति के चिह्न छोड़े।
हुडुली के शैलचित्रों में नीले रंग से बनी मानव आकृतियाँ, रेखीय चित्र, प्रतीकात्मक चिन्ह तथा कुछ पशु-आकृतियाँ दिखाई देती हैं। यद्यपि इन चित्रों का अधिकांश भाग समय, वर्षा, धूप और प्राकृतिक अपरदन के कारण धूमिल हो चुका है, फिर भी जो अवशेष आज उपलब्ध हैं, वे उस युग की सांस्कृतिक चेतना का परिचय देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन चित्रों का उद्देश्य केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं था। संभवतः ये आखेट की सफलता, सामुदायिक अनुष्ठानों, धार्मिक विश्वासों अथवा समूह की पहचान से जुड़े प्रतीक रहे होंगे। विश्व के अनेक प्रागैतिहासिक शैलचित्र स्थलों की भाँति यहाँ भी चित्र मानव और प्रकृति के गहरे संबंध को व्यक्त करते है।
हुडुली : गढ़वाल की रंगीन शैलकला
उत्तरकाशी जनपद के हुडुली शैलचित्र उत्तराखण्ड की शैलकला परम्परा में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। इन चित्रों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता नीले (नील) रंग का प्रयोग है, जो उत्तराखण्ड के अन्य अधिकांश शैलचित्र स्थलों की तुलना में इन्हें अलग पहचान देता है।
चित्रों में मानव आकृतियाँ, सरल रेखांकन और प्रतीकात्मक रूपांकन मिलते हैं। रंगों का यह विविध प्रयोग तत्कालीन मानव की कलात्मक समझ और उपलब्ध प्राकृतिक खनिज रंगों के ज्ञान का परिचायक है। हुडुली यह भी सिद्ध करता है कि गढ़वाल क्षेत्र में प्रागैतिहासिक कला स्वतंत्र रूप से विकसित हुई थी।
मुख्य विशेषताएँ
- नील (नीले) रंग के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध।
- मानव आकृतियाँ एवं प्रतीकात्मक चित्र।
- गढ़वाल क्षेत्र की महत्वपूर्ण शैलचित्र धरोहर।
हुडुली का ऐतिहासिक महत्व
- गढ़वाल क्षेत्र में प्रागैतिहासिक शैलकला का प्रमुख साक्ष्य।
- हिमालयी मानव के सांस्कृतिक जीवन का परिचायक।
- उत्तराखण्ड में शैलचित्र परम्परा के व्यापक प्रसार का प्रमाण।
- संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील पुरास्थल।
📌 शोध टिप्पणी
हुडुली के रंगों के संबंध में विभिन्न अध्ययनों में भिन्न-भिन्न विवरण मिलते हैं।
2. फड़कानौली : चट्टानों पर अंकित मौन इतिहास
अल्मोड़ा जनपद का फड़कानौली अपेक्षाकृत कम चर्चित होने के बावजूद उत्तराखण्ड के महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थलों में गिना जाता है। यह स्थान उन शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है जहाँ लाल गेरुए रंग से निर्मित चित्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
इन चित्रों में ज्यामितीय आकृतियाँ, रेखीय विन्यास, मानव आकृतियाँ तथा कुछ ऐसे प्रतीक मिलते हैं जिनका अर्थ आज भी शोध का विषय है। यही रहस्य इन चित्रों को और अधिक रोचक बनाता है। प्रत्येक रेखा और प्रत्येक आकृति मानो हजारों वर्ष पुराने किसी अनकहे संदेश को अपने भीतर समेटे हुए है।
फड़कानौली यह सिद्ध करता है कि उत्तराखण्ड की शैलचित्र परम्परा किसी एक स्थल तक सीमित नहीं थी, बल्कि विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले मानव समूहों ने अपने-अपने अनुभवों और विश्वासों को चट्टानों पर अंकित किया।
फड़कानौली का महत्व
- उत्तराखण्ड की कम चर्चित किंतु महत्वपूर्ण शैलकला धरोहर।
- प्रतीकात्मक एवं ज्यामितीय चित्रों की उपस्थिति।
- स्थानीय सांस्कृतिक परम्पराओं के अध्ययन का आधार।
- भविष्य में विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की व्यापक संभावनाएँ।
3. देवीधुरा के कपमार्क्स : रहस्यमयी ओखलनुमा चिन्हों का संसार
चम्पावत जनपद का देवीधुरा केवल अपनी प्रसिद्ध बग्वाल परम्परा के लिए ही नहीं, बल्कि विशाल चट्टानों पर बने कपमार्क्स (Cup Marks) और बुर्जहोम (कश्मीर) के समान बनी समाधियों के कारण भी पुरातत्त्वविदों का ध्यान आकर्षित करता है। उक्त स्थल की खोज सन् 1856 में हेनवुड द्वारा की गई।
कपमार्क्स चट्टानों की सतह पर बने छोटे-छोटे गोलाकार गड्ढे होते हैं। देखने में ये साधारण लगते हैं, परन्तु इनके निर्माण का उद्देश्य आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सका है। यही रहस्य इन्हें विशेष बनाता है।
कुछ विद्वानों का मत है कि इनका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञीय क्रियाओं या जल अर्पण जैसी परम्पराओं में होता होगा। अन्य शोधकर्ताओं के अनुसार ये खगोलीय अवलोकन, गणना, खेल अथवा सामाजिक आयोजनों से जुड़े संकेत भी हो सकते हैं। विश्व के अनेक देशों में भी ऐसे कपमार्क्स मिले हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह परम्परा व्यापक सांस्कृतिक महत्व रखती थी।
देवीधुरा के कपमार्क्स उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक पुरातात्त्विक अध्ययनों में विशेष महत्व रखते हैं। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय शोधकर्ताओं का ध्यान भी सबसे पहले इन्हीं रहस्यमयी चिह्नों ने आकर्षित किया था, जिसके बाद उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन को नई दिशा मिली।
| कपमार्क्स |
देवीधुरा का महत्व
- उत्तराखण्ड के प्रारम्भिक पुरातात्त्विक अनुसंधान का प्रमुख केन्द्र।
- कपमार्क्स की रहस्यमयी परम्परा का उत्कृष्ट उदाहरण।
- धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के संभावित संकेत।
- भारतीय एवं वैश्विक प्रागैतिहासिक अध्ययन में महत्वपूर्ण स्थान।
4. गोरख्या उडियार : चट्टानों पर अंकित प्रागैतिहासिक जीवन
चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के निकट स्थित गोरख्या उडियार उत्तराखण्ड का एक महत्वपूर्ण शैलाश्रय है। यह गुफा नदी तल से लगभग 300 मीटर ऊँची खड़ी चट्टान पर स्थित है। प्राकृतिक सौन्दर्य से घिरा यह स्थल आज भी प्रागैतिहासिक मानव की कला और जीवन का साक्षी बना हुआ है।
गुफा की चट्टानों पर लाल गेरुए रंग से बने हिरण, बकरी, आखेटक तथा अन्य वन्य जीवों के चित्र अंकित हैं। डॉ. यशोधर मठपाल ने प्रस्तुत शैलाश्रय का अन्वेषण कर बताया कि यहाँ निर्मित 41 शैलचित्रों में से 30 मानव आकृतियाँ हैं, 8 पशुओं के तथा 3 पुरुषों के चित्र हैं। ये शैलचित्र उस समय के मानव के आखेट-प्रधान जीवन, प्रकृति के साथ उसके घनिष्ठ संबंध तथा उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाते हैं। यद्यपि इन चित्रों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन अभी भी जारी है, फिर भी गोरख्या उडियार उत्तराखण्ड की प्रागैतिहासिक शैलचित्र परम्परा का एक महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
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चमोली जनपद में अलकनंदा घाटी के निकट स्थित शैलाश्रय।
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लगभग 300 मीटर ऊँची चट्टान पर अवस्थित।
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लाल गेरुए रंग से बने हिरण, आखेटक, बकरी एवं अन्य वन्य जीवों के चित्र।
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प्रागैतिहासिक आखेट जीवन और शैलकला का महत्वपूर्ण साक्ष्य।
📌 शोध टिप्पणी
गोरख्या उडियार यह प्रमाणित करता है कि उत्तराखण्ड की शैलचित्र परम्परा केवल कुमाऊँ तक सीमित नहीं थी, बल्कि गढ़वाल हिमालय में भी प्रागैतिहासिक मानव ने अपनी कलात्मक और सांस्कृतिक पहचान चट्टानों पर अंकित की थी।
📌 शोध टिप्पणी
गोरख्या उडियार यह प्रमाणित करता है कि उत्तराखण्ड की शैलचित्र परम्परा केवल कुमाऊँ तक सीमित नहीं थी, बल्कि गढ़वाल हिमालय में भी प्रागैतिहासिक मानव ने अपनी कलात्मक और सांस्कृतिक पहचान चट्टानों पर अंकित की थी।
5. ल्वेथाप : चट्टानों पर अंकित आखेट, जीवन और प्रकृति की अनुगूँज
अल्मोड़ा जनपद के बिनसर क्षेत्र में स्थित ल्वेथाप उत्तराखण्ड के अपेक्षाकृत कम चर्चित, किन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक शैलचित्र स्थलों में से एक है। प्राकृतिक वनाच्छादित वातावरण और निर्जन पहाड़ियों के मध्य स्थित यह शैलाश्रय आज भी हजारों वर्ष पुराने मानव जीवन की मौन गाथा सुनाता प्रतीत होता है।
यहाँ की सबसे प्रमुख विशेषता चट्टान की प्राकृतिक उल्टी छत (Overhanging Rock Shelter) पर गहरे रक्तवर्ण (गेरुए-लाल) रंग से निर्मित शैलचित्र हैं। इनमें लंबी मानव श्रृंखलाएँ तथा आखेट संबंधी दृश्य अंकित दिखाई देते हैं। इन मानव आकृतियों के ठीक नीचे एक लंबी लाल पट्टी के धूमिल अवशेष भी दृष्टिगोचर होते हैं। वर्तमान में यह स्पष्ट रूप से पहचान में नहीं आती, जिससे अनुमान लगाया जाता है कि हजारों वर्षों तक वर्षा, हवा, तापमान में परिवर्तन तथा अन्य जैविक प्रभावों के कारण मूल रंग फैल गया या क्षीण हो गया होगा।
ल्वेथाप के इस शैलाश्रय की एक और रोचक विशेषता इसकी प्राकृतिक संरचना है। चट्टान की छत के नीचे एक प्राकृतिक बरामदे जैसा समतल भाग निर्मित है। पुरातत्त्वविदों का मानना है कि यह स्थान प्रागैतिहासिक मानव के अस्थायी निवास, विश्राम अथवा सामुदायिक गतिविधियों के लिए उपयुक्त रहा होगा। यह प्राकृतिक संरचना शैलाश्रय को केवल चित्रांकन का स्थल ही नहीं, बल्कि मानव जीवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा आश्रयस्थल भी सिद्ध करती है।
इस शैलाश्रय के मध्य भाग में निर्मित ओखलीनुमा कपमार्क्स (Cup Marks) इसकी पुरातात्त्विक महत्ता को और अधिक बढ़ा देते हैं। इन गोलाकार गड्ढों के निर्माण का वास्तविक उद्देश्य अभी भी शोध का विषय है। कुछ विद्वान इन्हें धार्मिक अनुष्ठानों, जबकि अन्य इन्हें दैनिक उपयोग अथवा सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़कर देखते हैं।
मुख्य शैलाश्रय के सामने स्थित एक विशाल चट्टान पर भी शैलचित्रों के अवशेष मिलते हैं। यद्यपि प्राकृतिक अपरदन, वर्षा और समय के प्रभाव से ये चित्र अत्यधिक धूमिल हो चुके हैं, फिर भी वे इस पूरे क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव की सक्रिय उपस्थिति का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
पानी, वन्यजीव और आखेट : निवास के पीछे का भूगोल
ल्वेथाप के शैलचित्रों में कुछ मानव आकृतियाँ स्पष्ट रूप से आखेट (शिकार) करते हुए दिखाई देती हैं। यह केवल एक कलात्मक दृश्य नहीं, बल्कि तत्कालीन जीवन-पद्धति का यथार्थ चित्रण भी है।
बिनसर घाटी की भौगोलिक संरचना का अध्ययन बताता है कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र जल स्रोतों, घने वनों और वन्यजीवों से समृद्ध रहा होगा। भोजन, जल और प्राकृतिक सुरक्षा की उपलब्धता ने इसे प्रारम्भिक मानव के लिए एक आदर्श निवास क्षेत्र बनाया। यही कारण है कि यहाँ आखेट, सामूहिक गतिविधियों और संभवतः सामाजिक जीवन से जुड़े अनेक चित्र अंकित किए गए।
इस प्रकार ल्वेथाप केवल एक शैलचित्र स्थल नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक मानव के निवास, आजीविका, कला और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध का सजीव साक्ष्य है।
📌 शोध टिप्पणी
ल्वेथाप के शैलचित्रों में अंकित मानव श्रृंखलाएँ, आखेट दृश्य और कपमार्क्स इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यह स्थल केवल चित्रांकन का स्थान नहीं था, बल्कि सम्भवतः प्रागैतिहासिक मानव का अस्थायी निवास, सामुदायिक मिलन-स्थल और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी रहा होगा।
6. पेटशाल (कफ्फरकोट) : नृत्य करती मानव आकृतियों का शैलाश्रय
अल्मोड़ा जनपद में पेटशाला और पुनाकोट गाँवों के मध्य स्थित कफ्फरकोट शैलचित्रों के लिए जाना जाता है। यहाँ प्राप्त कत्थई रंग के चित्रों में नृत्य करती हुई मानव आकृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इन चित्रों से प्रतीत होता है कि प्रागैतिहासिक समाज में सामूहिक नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि वह सामाजिक एकता, धार्मिक अनुष्ठानों अथवा सामुदायिक उत्सवों का भी अभिन्न अंग रहा होगा। चित्रों की सरल रेखाएँ और समूहबद्ध आकृतियाँ उस समय की कलात्मक शैली को स्पष्ट करती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
- सामूहिक नृत्य करती मानव आकृतियाँ।
- सांस्कृतिक एवं धार्मिक गतिविधियों के संकेत।
- उत्तराखण्ड की शैलचित्र परम्परा का महत्वपूर्ण स्थल।
7. फलसीमा : योग और नृत्य की प्राचीन अभिव्यक्ति
अल्मोड़ा जनपद का फलसीमा शैलचित्र स्थल अपनी विशिष्ट मानव आकृतियों के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ कुछ चित्रों में मानव को ऐसी मुद्राओं में दर्शाया गया है जिन्हें अनेक विद्वान योगासन-सदृश या नृत्य मुद्रा के रूप में व्याख्यायित करते हैं।
यदि यह व्याख्या सही मानी जाए, तो यह स्थल हिमालयी क्षेत्र में मानव की शारीरिक अभिव्यक्ति, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रारम्भिक संकेतों का परिचायक हो सकता है। हालांकि इन मुद्राओं की निश्चित व्याख्या पर अभी भी शोध जारी है।
मुख्य विशेषताएँ
- योगासन या नृत्य जैसी मुद्राओं में मानव आकृतियाँ।
- प्रतीकात्मक एवं सांस्कृतिक महत्व।
- वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता।
8. बनकोट : रहस्यमयी ताम्र मानव आकृतियाँ
ताम्रयुगीन संस्कृति का महत्वपूर्ण पुरास्थल
पिथौरागढ़ जनपद के गंगोलीहाट क्षेत्र स्थित बनकोट उत्तराखण्ड के प्रमुख प्रागैतिहासिक एवं ताम्रयुगीन पुरास्थलों में से एक है। वर्ष 1989 में राजकीय इंटर कॉलेज बनकोट के भवन निर्माण के दौरान हुई खुदाई में आठ ताम्र उपकरण प्राप्त हुए, जिन्होंने इस क्षेत्र को पुरातात्त्विक दृष्टि से विशेष महत्व प्रदान किया। इन उपकरणों को सामान्यतः ताम्रनिधि (Copper Hoard) संस्कृति से संबंधित माना जाता है तथा इनका काल लगभग ईसा पूर्व द्वितीय सहस्राब्दी का अनुमानित है।
बनकोट से प्राप्त ताम्र उपकरणों के स्वरूप एवं उपयोग को लेकर विद्वानों में विभिन्न मत हैं। कुछ इन्हें मानवाकृतियाँ (Anthropomorphic Figures) मानते हैं, जबकि अन्य इन्हें अनुष्ठानिक या प्रतीकात्मक उपकरणों के रूप में देखते हैं। यद्यपि इनके वास्तविक उपयोग पर अभी भी शोध जारी है, फिर भी यह खोज मध्य हिमालय में ताम्र धातुकर्म, तकनीकी दक्षता तथा सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है।
प्रमुख विशेषताएँ
- वर्ष 1989 में आठ ताम्र उपकरणों की खोज।
- उत्तराखण्ड का महत्वपूर्ण ताम्रयुगीन पुरास्थल।
- ताम्रनिधि (Copper Hoard) संस्कृति से संभावित संबंध।
- मध्य हिमालय में प्राचीन धातुकर्म का महत्वपूर्ण साक्ष्य।
- उपकरणों के स्वरूप एवं उपयोग पर विद्वानों में मतभेद।
📌 शोध टिप्पणी
बनकोट की खोजें केवल ताम्र उपकरणों की प्राप्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक जीवन से ताम्रयुगीन एवं आद्य-ऐतिहासिक संस्कृति की ओर बढ़ते मानव विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी प्रस्तुत करती हैं। इसलिए बनकोट को केवल एक पुरास्थल के रूप में नहीं, बल्कि मध्य हिमालय में सांस्कृतिक एवं तकनीकी संक्रमण के सशक्त पुरातात्त्विक साक्ष्य के रूप में भी देखा जाता है।
✍️ क्या आप जानते हैं?
उत्तराखण्ड के शैलचित्रों में प्रयुक्त लाल, गेरुआ, श्वेत और कुछ स्थानों पर नील रंग प्राकृतिक खनिजों और वनस्पति स्रोतों से तैयार किए जाते थे। यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी इन चित्रों के अवशेष आज तक सुरक्षित हैं।
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📚 संदर्भ
📚 पुस्तकें
- डी. पी. अग्रवाल
- यशोधर मठपाल
- डी. के. चक्रवर्ती
- शिव प्रसाद डबराल
📄 शोध-पत्र एवं सरकारी प्रकाशन
- ASI – Indian Archaeology – A Review
- उत्तराखण्ड राज्य पुरातत्त्व विभाग
- Man and Environment (ISPQS)
- ICHR के शोध प्रकाशन
ऑनलाइन संदर्भ
- भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI)
- उत्तराखण्ड संस्कृति विभाग
- उत्तराखण्ड राज्य पुरातत्त्व विभाग
- भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR)
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

Very nice article
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जवाब देंहटाएंरोचक और ज्ञानवर्धक लेख
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