बुधवार, 5 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–5) पश्चिमी रामगंगा घाटी के महापाषाणीय शवाधान : पत्थरों में सुरक्षित एक विलुप्त सभ्यता की स्मृतियाँ

 

महापाषाणीय शवाधान


"जब लिखित इतिहास मौन हो जाता है, तब पत्थर बोलना शुरू करते हैं; और उन्हीं की भाषा को पुरातत्त्व कहा जाता है।"

पश्चिमी रामगंगा घाटी का इतिहास केवल कपमार्क्स तक सीमित नहीं है। इस घाटी की धरती के गर्भ में ऐसी अनेक पुरातात्विक धरोहरें छिपी हैं, जो हजारों वर्ष पूर्व यहाँ विकसित मानव सभ्यता की मौन गाथा सुनाती हैं। इन्हीं में सबसे महत्वपूर्ण हैं महापाषाणीय शवाधान—विशाल प्रस्तरखण्डों से निर्मित वे समाधि-स्थल, जिनमें उस युग के लोगों ने अपने प्रियजनों को अंतिम विश्राम दिया। ये केवल कब्रें नहीं हैं, बल्कि उस समाज की धार्मिक आस्था, सामाजिक संरचना, कलात्मक अभिरुचि और मृत्यु के प्रति उसके दार्शनिक दृष्टिकोण के सजीव दस्तावेज हैं।

मलारी : जहाँ उत्तराखण्ड में पहली बार खुला महापाषाणीय संस्कृति का द्वार

उत्तराखण्ड में महापाषाणीय शवाधानों की खोज का श्रेय प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' को जाता है। वर्ष 1956 ई. में उन्होंने चमोली जनपद के नीति घाटी स्थित मलारी गाँव में ऐसे शवाधानों की पहचान कर हिमालयी पुरातत्त्व के एक नए अध्याय का उद्घाटन किया।

मलारी में मिले शवाधानों का निर्माण अत्यन्त सुविचारित ढंग से किया गया था। चारों ओर विशाल प्रस्तरखण्ड खड़े किए गए थे और ऊपर एक बड़े शिलाखण्ड से उन्हें ढक दिया गया था। इन पत्थरों के भीतर सुरक्षित सामग्री यह संकेत देती है कि मृतकों के प्रति उस समाज का सम्मान अत्यन्त गहरा था तथा मृत्यु को वे जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि किसी नई यात्रा का आरम्भ मानते थे।


कब्रों से निकली एक विलुप्त संस्कृति की कहानी

जब इन शवाधानों का अध्ययन किया गया तो उनके भीतर से मानव तथा मेढ़ों की अस्थियाँ, मिट्टी के पात्र, तश्तरियाँ, अलंकृत कुतुप तथा अनेक अन्य उपयोगी वस्तुएँ प्राप्त हुईं। विशेष आकर्षण का केन्द्र वह पॉलिशयुक्त कुतुप था, जिसके हत्थे पर हिमालयी पक्षी मोनाल की सुंदर आकृति उकेरी गई थी। अन्य पात्रों पर देवदार की पत्तियों जैसी कलात्मक आकृतियाँ तथा ज्यामितीय रेखाएँ अंकित थीं, जो तत्कालीन शिल्पकला की परिपक्वता का परिचय देती हैं।

सबसे रोचक तथ्य यह था कि मृतकों को घुटने मोड़कर मुख के बल लिटाया गया था। यह विशिष्ट शवाधान परम्परा मध्य एशिया, ईरान तथा अफगानिस्तान की प्राचीन संस्कृतियों से साम्यता रखती है और हिमालय के बाहरी संसार से प्राचीन सांस्कृतिक सम्पर्कों की ओर संकेत करती है।

1983 का उत्खनन : जब इतिहास ने फिर खोले अपने रहस्य

वर्ष 1983 में हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग ने मलारी में वैज्ञानिक उत्खनन कराया। इस अभियान में लाल, काले और धूसर मृद्भाण्ड, लौह उपकरण, अलंकृत कुतुप तथा एक घोड़े का लगभग पूर्ण कंकाल प्राप्त हुआ।

इतना ही नहीं, कुत्ते, भेड़ तथा एक विशाल पशु (संभवतः हिमालयी वृषभ अथवा जेबू) के अवशेष भी मिले। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि मृतकों के साथ उनके प्रिय अथवा पवित्र माने जाने वाले पशुओं को भी दफनाया जाता था। यह परम्परा उस समय की धार्मिक मान्यताओं और परलोक संबंधी विश्वासों का महत्वपूर्ण संकेत है।

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स्वर्ण मुखौटे ने चौंका दिया इतिहास जगत

वर्ष 2001–02 में पुनः किए गए सर्वेक्षण ने मलारी को एक बार फिर राष्ट्रीय महत्व के पुरातात्विक स्थल के रूप में स्थापित कर दिया। इस बार मिट्टी के पात्र, कांसे की कटोरियाँ और तश्तरियों के साथ एक मानव कंकाल के ऊपर रखा लगभग 5.02 किलोग्राम वजनी स्वर्ण मुखौटा प्राप्त हुआ, जिसने इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का विशेष ध्यान आकर्षित किया।

इसी सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आया कि मलारी के निवासी केवल प्रस्तर-पेटिका शवाधान ही नहीं बनाते थे, बल्कि पर्वत को काटकर गुफानुमा शवगृह भी निर्मित करते थे। यह हिमालयी स्थापत्य-कौशल का अद्भुत उदाहरण है।

मलारी से प्राप्त स्वर्ण मुखौटा (AI निर्मित) 

किसकी थी यह संस्कृति?

महापाषाणीय संस्कृति की उत्पत्ति और उसके निर्माताओं को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं। प्रसिद्ध यात्री एवं इतिहासकार राहुल सांकृत्यायन का मत था कि उस समय मध्य हिमालय में खश जाति का प्रभुत्व था। इसलिए सम्भव है कि इन शवाधानों का सम्बन्ध प्रारम्भिक खश संस्कृति से रहा हो। यद्यपि इस विषय में अंतिम निष्कर्ष अभी शेष है, किन्तु इतना निश्चित है कि मलारी की खोज ने उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास को समझने की दिशा ही बदल दी।

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पश्चिमी रामगंगा घाटी : महापाषाणीय संस्कृति का विस्तृत विस्तार

मलारी की खोज के बाद पश्चिमी रामगंगा घाटी में भी अनेक ऐसे स्थल प्रकाश में आए, जिन्होंने सिद्ध किया कि महापाषाणीय संस्कृति केवल उच्च हिमालय तक सीमित नहीं थी।

मासी–भिक्यासैंन मार्ग पर स्थित नौला–जैनल गाँव में खेतों की जुताई के दौरान ग्रामीणों को विशाल प्रस्तरखण्ड दिखाई दिए। प्रसिद्ध पुरातत्वविद् पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने इनके अध्ययन के बाद इन्हें महापाषाणीय शवाधान बताया तथा इनका काल लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व निर्धारित किया।

इसी क्रम में जैनल से लगभग 29 किलोमीटर दूर पत्थरखोला में विनो नदी के तट पर सड़क निर्माण के समय दो प्रस्तर-पेटिका शवाधान मिले। इनके समीप मृद्भाण्ड भी प्राप्त हुए, जिनसे स्पष्ट होता है कि यहाँ भी मृतकों के साथ दैनिक उपयोग की वस्तुएँ रखी जाती थीं।

भिक्यासैंन के समीप सीरीकोट तथा मासी–रानीखेत मार्ग पर स्थित जालली भी महापाषाणीय संस्कृति के महत्वपूर्ण केन्द्र हैं। इन स्थलों की खोज से यह सिद्ध होता है कि पश्चिमी रामगंगा घाटी का विशाल भूभाग कभी इस सांस्कृतिक परम्परा से प्रभावित रहा होगा।

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पत्थरों से आगे : जीवित परम्पराओं के साक्ष्य

पश्चिमी रामगंगा घाटी की विरासत केवल महापाषाणीय शवाधानों तक सीमित नहीं है। यहाँ फैली प्राचीन समाधियाँ, मंदिर, नौले, धारे और धर्मशालाएँ इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरन्तरता को आज भी जीवित रखे हुए हैं। वृद्ध केदार से लेकर नर्मदेश्वर, श्रीनाथेश्वर और वैराठेश्वर तक अनेक मंदिरों के आसपास स्थित समाधियाँ इस भूमि की दीर्घकालीन साधना-परम्परा का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

इसी प्रकार नौधरू, डोबरी नौला, सुधारी धारा, पन्याली और भैरवगढ़ी के प्राचीन जलस्रोत इस बात के साक्षी हैं कि हिमालयी समाज केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि जल संरक्षण और लोककल्याण की दृष्टि से भी अत्यन्त विकसित था।

पश्चिमी रामगंगा नदी के बाएं तट पर निर्मित आधुनिक समाधियां (सनणा)   


इतिहास की निःशब्द धरोहर

आज ये महापाषाणीय शवाधान, समाधियाँ और प्राचीन जलस्रोत मौन अवश्य हैं, किन्तु इनके भीतर हजारों वर्षों का इतिहास सुरक्षित है। आवश्यकता केवल इन्हें पढ़ने, समझने और संरक्षित करने की है। पश्चिमी रामगंगा घाटी की यह विरासत न केवल उत्तराखण्ड के इतिहास को समृद्ध बनाती है, बल्कि सम्पूर्ण हिमालयी सभ्यता के विकासक्रम को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी प्रस्तुत करती है।

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निष्कर्ष

पश्चिमी रामगंगा घाटी में प्राप्त महापाषाणीय शवाधान, प्रस्तर-पेटिकाएँ, समाधियाँ, प्राचीन नौले-धारे, गढ़ियाँ और पुरावशेष इस तथ्य के सशक्त प्रमाण हैं कि यह क्षेत्र केवल प्राकृतिक सौन्दर्य का धनी नहीं, बल्कि एक अत्यन्त समृद्ध सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक विरासत का भी संरक्षक है। इन अवशेषों के माध्यम से हमें उस समाज की जीवन-पद्धति, धार्मिक आस्थाओं, मृत्यु-संस्कारों, जल प्रबंधन, स्थापत्य-कौशल तथा सांस्कृतिक विकास की ऐसी झलक मिलती है, जिसे लिखित इतिहास अकेले प्रस्तुत नहीं कर सकता।

दुर्भाग्यवश समय, प्राकृतिक क्षरण, सड़क निर्माण तथा मानवीय उपेक्षा के कारण इन धरोहरों का एक बड़ा भाग नष्ट हो चुका है और जो शेष हैं, वे भी संरक्षण की प्रतीक्षा में हैं। यदि समय रहते इनके वैज्ञानिक सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और संरक्षण के प्रभावी प्रयास नहीं किए गए, तो हिमालय के अतीत की अनेक अमूल्य स्मृतियाँ सदा के लिए विलुप्त हो सकती हैं।

आज आवश्यकता केवल इन पुरातात्त्विक स्थलों को देखने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने, उनके महत्व को जन-जन तक पहुँचाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की है। क्योंकि किसी भी सभ्यता का भविष्य तभी सुदृढ़ होता है, जब वह अपने अतीत को सम्मानपूर्वक संरक्षित रखती है।

"पश्चिमी रामगंगा घाटी के ये मौन पत्थर आज भी बोल रहे हैं—आवश्यकता केवल उन्हें सुनने वाली संवेदनशील दृष्टि और समझने वाले शोधपूर्ण मन की है।"

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📚 संदर्भ

  • डबराल, शिवप्रसाद 'चारण'. उत्तराखण्ड का इतिहास (भाग–2). डोगड्डा: वीरगाथा प्रकाशन।
  • जोशी, घनानन्द. (2017). उत्तराखण्ड का राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास.
  • भीष्म. (2013). उत्तराखण्ड के प्राचीन समुदाय एवं पुरातात्त्विक विरासत.
  • राव, नागराज. (1986). Indian Archaeology – A Review (1982–83). Archaeological Survey of India, New Delhi.
  • रावत, अजय सिंह. (2021). उत्तराखण्ड का समग्र राजनैतिक इतिहास.
  • भट्ट, आर. सी. एवं नौटियाल, के. पी. (1987–88). Trans Himalayan Burials vis-à-vis Malari: An Assessment. JOHSARD.
  • भट्ट, आर. सी. एवं खंडूड़ी, बी. एम. (2002). मलारी के गुफा शवागार. उत्तराखण्ड संस्कृति.
  • Agarwal, D. P. & Kharakwal, J. S. (1995). Cist Burials of the Kumaun Himalayas.
  • Nautiyal, K. P. & Khanduri, B. M. (1991). Emergence of Early Culture in Garhwal, Central Himalaya.
  • Indian Archaeology – A Review. Archaeological Survey of India (विभिन्न अंक). 


  • लेखक: डॉ. भावना जुयाल
    © डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
    (इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

    10 टिप्‍पणियां:

    1. Such a great knowledge, it's a very informative topic to us so that we can know very well our historical things
      Thankyou for sharing with us
      Dr. Bhawana Juyal

      जवाब देंहटाएं

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