शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–2) "प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण : समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा"



स्रोत- Wikimedia Commons 

प्रागैतिहासिक उत्तराखंड की विस्तृत यात्रा 

"हिमालय के पत्थर केवल भूगर्भीय संरचनाएँ नहीं हैं; वे समय के ऐसे पृष्ठ हैं जिन पर प्रकृति ने लाखों वर्षों का इतिहास अंकित किया है। उन पृष्ठों को पढ़ना सरल नहीं, क्योंकि उनमें शब्द नहीं हैं—केवल शिलाएँ, औज़ार, शैलचित्र और मौन साक्ष्य हैं। इन्हीं मौन साक्ष्यों को पढ़कर पुरातत्त्वविद् मानव सभ्यता की आरम्भिक यात्रा का पुनर्निर्माण करते हैं।"

मानव सभ्यता का विकास किसी एक घटना का परिणाम नहीं था। यह लाखों वर्षों तक चलने वाली क्रमिक प्रक्रिया थी, जिसमें जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता, तकनीकी नवाचार और सामूहिक अनुभवों ने समान रूप से योगदान दिया। इसी कारण पुरातत्वविदों ने प्रागैतिहासिक काल को केवल कालक्रम के आधार पर नहीं, बल्कि प्रौद्योगिकी (Technology), आजीविका (Subsistence) और सांस्कृतिक व्यवहार (Cultural Behaviour) के आधार पर वर्गीकृत किया है।

यही वैज्ञानिक वर्गीकरण आज विश्व के लगभग सभी पुरातात्त्विक अध्ययनों में स्वीकार किया जाता है।


प्रागैतिहासिक काल का वैज्ञानिक वर्गीकरण 

काल

अनुमानित अवधि

प्रमुख विशेषताएँ

पुरापाषाण (Palaeolithic)

लगभग 26 लाख वर्ष पूर्व – 10,000 ई0 पूर्व

हस्तकुठार, चॉपर, आखेट, खाद्य संग्रह

मध्यपाषाण (Mesolithic)

लगभग 10,000 – 6,000 0 पूर्व

सूक्ष्म पाषाण (Microliths), मछली पकड़ना, प्रारम्भिक सामाजिक संगठन

नवपाषाण (Neolithic)

लगभग 6,000 – 3,000 0 पूर्व

कृषि, पशुपालन, स्थायी निवास, मृद्भाण्ड



शोध टिप्पणी: यह काल-विभाजन भारतीय प्रागैतिहासिक अध्ययन में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। उत्तराखण्ड के विभिन्न स्थलों पर इन चरणों की तिथियाँ कुछ भिन्न हो सकती हैं, क्योंकि प्रत्येक स्थल का काल-निर्धारण उसके स्थानीय पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर निर्भर करता है। (ResearchGate)


उत्तराखंड के संदर्भ में इस वर्गीकरण का महत्व 

जब भारतीय उपमहाद्वीप के मैदानी भागों में मानव नदी घाटियों के किनारे अपना जीवन विकसित कर रहा था, उसी समय हिमालय का भूभाग एक अलग प्रकार की चुनौती प्रस्तुत कर रहा था।

लगभग सम्पूर्ण उत्तराखण्ड ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय भू-आकृति से निर्मित है। हिमनदों से निकलने वाली नदियाँ, गहरी घाटियाँ, घने वन और कठोर जलवायु यहाँ के मानव जीवन को सीधे प्रभावित करते थे। इसलिए यहाँ रहने वाले आदिमानव का जीवन गंगा-यमुना के मैदानों में रहने वाले मानव से भिन्न रहा होगा।

यही कारण है कि उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक अध्ययन केवल भारतीय इतिहास का क्षेत्रीय अध्याय नहीं, बल्कि दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में मानव अनुकूलन (Human Adaptation in the Himalaya) का भी अध्ययन है।


पुरातात्विक साक्ष्य क्या कहते हैं? 

लम्बे समय तक यह माना जाता रहा कि उत्तराखण्ड का दुर्गम भूभाग प्रागैतिहासिक मानव के लिए उपयुक्त नहीं रहा होगा। किन्तु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुए सर्वेक्षणों ने इस धारणा को बदल दिया।

अल्मोड़ा जनपद के लखु उडियार शैलाश्रय की पहचान और उसके बाद हुए अध्ययनों ने यह सिद्ध किया कि कुमाऊँ क्षेत्र में प्रागैतिहासिक मानव की उपस्थिति के स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं। लखु उडियार की शैलचित्र परम्परा का वैज्ञानिक अध्ययन डॉ. एम. पी. जोशी तथा बाद में यशोधर मठपाल सहित अनेक विद्वानों ने किया। आज यह स्थल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित स्मारक है। चित्रों में लाल गेरू, श्वेत और काले रंगों से मानव समूह, पशु तथा ज्यामितीय आकृतियाँ अंकित हैं, जिन्हें अधिकांश विद्वान मध्यपाषाण से ताम्रपाषाण संक्रमणकाल से जोड़ते हैं। (ARF Journals)

इसके बाद कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्र में फड़कानौली, पेटशाल, फलसीमा, ग्वारख्या उडियार, किमनी, थकुली उडियार, महरू उडियार तथा हुडली जैसे अनेक शैलाश्रयों की पहचान हुई, जिससे स्पष्ट हुआ कि उत्तराखण्ड में प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियाँ किसी एक स्थल तक सीमित नहीं थीं। (ResearchGate)


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इतिहास का सबसे बड़ा प्रश्न

इन शैलचित्रों को देखकर एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है—

क्या यह केवल कला थी?

या फिर...

यह आदिमानव की भाषा थी?

जब लिपि का जन्म नहीं हुआ था, तब क्या मनुष्य अपने अनुभव, भय, उत्सव और विश्वास को शिलाओं पर उकेरकर अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहता था?

इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर आज भी उपलब्ध नहीं है, किन्तु अधिकांश पुरातत्त्वविद् मानते हैं कि शैलचित्र केवल सजावट नहीं थे; वे तत्कालीन समाज के सांस्कृतिक जीवन, आखेट, सामूहिक नृत्य और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। (ARF Journals)


नवीन पुरातात्विक शोध

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक काल पर आधुनिक अनुसंधानों की नई दृष्टि

"इतिहास कभी समाप्त नहीं होता। प्रत्येक नई खोज अतीत की किसी अनसुलझी पहेली का एक नया उत्तर लेकर आती है। उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक इतिहास भी आज निरन्तर नए पुरातात्त्विक अनुसंधानों के कारण और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है।"

इसे भी पढ़े: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल : हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट


लम्बे समय तक यह धारणा प्रचलित रही कि उत्तराखण्ड का पर्वतीय भूभाग प्रागैतिहासिक मानव के लिए अत्यन्त कठिन था और यहाँ मानव बसावट अपेक्षाकृत देर से हुई। किन्तु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा इक्कीसवीं शताब्दी में हुए पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों ने इस धारणा को चुनौती दी। आज उपलब्ध शैलचित्रों, पाषाण उपकरणों, शैलाश्रयों तथा भू-पुरातात्त्विक अध्ययनों के आधार पर यह स्पष्ट हो रहा है कि हिमालयी क्षेत्र मानव की प्रारम्भिक सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है।


शैलचित्रों का वैज्ञानिक पुनरावलोकन 

प्रारम्भिक अध्ययनों में लखु उडियार के चित्रों को केवल कलात्मक अभिव्यक्ति माना गया था, किन्तु आधुनिक शोधों ने यह संकेत दिया है कि इन चित्रों में तत्कालीन समाज की सामाजिक संरचना, सामूहिक आखेट, धार्मिक अनुष्ठान तथा पर्यावरणीय परिस्थितियों के संकेत भी निहित हो सकते हैं।

पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने कुमाऊँ हिमालय के शैलचित्रों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताया कि अनेक चित्र केवल सजावटी नहीं हैं, बल्कि वे मानव समुदायों की सांस्कृतिक स्मृति और प्रतीकात्मक संचार (Symbolic Communication) के माध्यम भी रहे होंगे।

बहु-स्तरीय (Superimposition) चित्रों का महत्व

लखु उडियार में एक ही चट्टान पर विभिन्न रंगों और शैलियों के चित्र एक-दूसरे के ऊपर बने हुए हैं। आधुनिक पुरातत्त्व में इसे Superimposition कहा जाता है।

यह तथ्य इस बात का संकेत देता है कि—

  • यह स्थल केवल एक पीढ़ी द्वारा नहीं, बल्कि लम्बे समय तक विभिन्न समुदायों द्वारा उपयोग किया गया।
  • विभिन्न कालों में यहाँ पुनः चित्रांकन हुआ।
  • सांस्कृतिक परंपराओं की निरन्तरता विद्यमान रही।

इस प्रकार लखु उडियार केवल एक चित्रशाला नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की सांस्कृतिक विरासत का अभिलेख है।


नई तकनीकों का प्रयोग

इक्कीसवीं शताब्दी में पुरातत्त्व केवल खुदाई तक सीमित नहीं रहा।

अब शोधकर्ता अनेक आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर रहे हैं, जैसे—

  • GIS (Geographical Information System) द्वारा स्थलों का मानचित्रण।
  • 3D Digital Documentation द्वारा शैलचित्रों का डिजिटल संरक्षण।
  • DStretch (Digital Image Enhancement) जैसी तकनीकों से धुंधले चित्रों को स्पष्ट करना।
  • Portable X-Ray Fluorescence (pXRF) द्वारा रंगों में प्रयुक्त खनिजों का विश्लेषण।
  • सूक्ष्म भू-आकृतिक (Micro-geomorphological) अध्ययन द्वारा शैलाश्रयों के पर्यावरण का पुनर्निर्माण।

इन तकनीकों ने कई ऐसे चित्रों और रेखांकन को पहचानने में सहायता की है जो सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देते।


उत्तराखण्ड के अन्य पुरातात्विक स्थल

हाल के दशकों में कुमाऊँ एवं गढ़वाल क्षेत्र के कई अन्य शैलाश्रयों का पुनः सर्वेक्षण किया गया है। इनमें—

  • ग्वारख्या उडियार
  • हुडली
  • किमनी
  • फड़कानौली
  • पेटशाल
  • फलसीमा
  • लखु उडियार
  • महरू उडियार

जैसे स्थलों से प्राप्त चित्रों ने यह स्पष्ट किया है कि शैलचित्र परम्परा केवल लखु उडियार तक सीमित नहीं थी।

इससे यह संभावना और मजबूत होती है कि सम्पूर्ण मध्य हिमालय में प्रागैतिहासिक मानव समुदायों का व्यापक सांस्कृतिक नेटवर्क विद्यमान था।


संरक्षण की चुनौती

नवीन शोधों ने एक गंभीर समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है।

प्राकृतिक अपरदन, वर्षा, नमी, जैविक वृद्धि (Lichen), मानवीय हस्तक्षेप तथा अनियंत्रित पर्यटन के कारण अनेक शैलचित्र धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहे हैं।

यदि समय रहते वैज्ञानिक संरक्षण नहीं किया गया, तो मानव सभ्यता की यह अमूल्य धरोहर भविष्य की पीढ़ियों के लिए लुप्त हो सकती है।


इसे भी पढ़े: उत्तराखंड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–3) "लखु उडियार: खोज, शैलचित्र और प्रागैतिहासिक मानव की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति"


निष्कर्ष 

उपलब्ध नवीन पुरातात्त्विक शोधों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष सामने आते हैं—

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक इतिहास पूर्व में अनुमानित अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध है।

लखु उडियार सहित अनेक शैलचित्र स्थल हिमालय में मानव की सांस्कृतिक गतिविधियों के सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों ने अनेक नए तथ्यों को उजागर किया है तथा भविष्य में और महत्वपूर्ण खोजों की संभावना बनी हुई है।

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक स्थलों का संरक्षण केवल राज्य की सांस्कृतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव सभ्यता की साझा विरासत की रक्षा का प्रश्न है।

अगले भाग में...

भाग–3 में हम विस्तार से जानेंगे—

  • लखु उडियार: उत्तराखंड की प्रागैतिहासिक शैलचित्र परंपरा की विश्वविख्यात धरोहर
  • भारतीय शैलचित्र परंपरा में लखु उडियार का स्थान
  • लखु उडियार की खोज और पुरातात्त्विक महत्व
  • उत्तराखंड के प्रागैतिहासिक अध्ययन में महत्व

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📚 संदर्भ (विश्वसनीय स्रोत)

  1. Yashodhar Mathpal – Rock Art in Kumaon Himalaya (IGNCA, 1995)
  2. M. P. Joshi – Kumaon Himalaya में शैलचित्रों पर प्रारम्भिक अध्ययन।
  3. Archaeological Survey of India (ASI) – संरक्षित स्मारकों का अभिलेख।
  4. Indian Archaeology – A Review (ASI) के विभिन्न वार्षिक अंक।
  5. K. P. Nautiyal एवं अन्य विद्वानों के मध्य हिमालय पर प्रकाशित शोधपत्र।
  6. Indian Journal of Archaeology, Man and Environment (Indian Society for Prehistoric and Quaternary Studies) तथा IGNCA के शैलकला संबंधी प्रकाशन।

 

 

 


 

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