शनिवार, 8 अगस्त 2026

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–7) प्रागैतिहासिक औजारों का विस्तृत अध्ययन : पत्थरों में छिपी मानव सभ्यता की विकासगाथा




"जब मनुष्य ने पहली बार किसी पत्थर को अपनी आवश्यकता के अनुसार तराशा, तभी से सभ्यता की यात्रा का वास्तविक आरम्भ हुआ। वही साधारण-सा पत्थर आगे चलकर मानव बुद्धि, विज्ञान और संस्कृति के विकास का प्रथम अध्याय बना।"


📚 इस लेख को पढ़ने से पहले-

यह लेख "उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल" शोध-श्रृंखला का भाग-7 है। यदि आपने इस श्रृंखला के पिछले लेख नहीं पढ़े हैं, तो उन्हें पहले अवश्य पढ़ें। इससे इस लेख में वर्णित पुरातात्त्विक स्थलों, सांस्कृतिक विकास तथा शोध निष्कर्षों को समझना अधिक सरल और रोचक होगा।

🔗 अधिक पढ़ें

- भाग–1 उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग-1): हिमालय की गोद में मानव सभ्यता की प्रथम आहट

- भाग–2: प्रागैतिहासिक काल का वर्गीकरण (भाग-2): समय की धारा में मानव विकास की क्रमिक यात्रा

- भाग–4: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–4)  पश्चिमी रामगंगा घाटी की पुरातात्त्विक अभिज्ञता : कपमार्क्स, शैलाश्रय और महापाषाणीय संस्कृति के साक्ष्य

- भाग-5: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–5) पश्चिमी रामगंगा घाटी के महापाषाणीय शवाधान : पत्थरों में सुरक्षित एक विलुप्त सभ्यता की स्मृतियाँ

-भाग-6: उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–6) प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल : हुडुली, फड़कानौली, देवीधुरा, पेटशाल, बनकोट एवं अन्य पुरातात्त्विक स्थल

«नोट: प्रत्येक शीर्षक पर क्लिक करके संबंधित लेख पढ़ें, फिर इस लेख का अध्ययन आगे बढ़ाएँ।»


भूमिका : क्या एक साधारण पत्थर इतिहास बदल सकता है?

कल्पना कीजिए—आज से लगभग 20 लाख वर्ष पहले हिमालय की तलहटी में रहने वाला एक प्रारम्भिक मानव भूख से व्याकुल है। उसके सामने एक मृत पशु पड़ा है, परन्तु उसके पास उसे काटने का कोई साधन नहीं। वह पास पड़ी एक कठोर चट्टान उठाता है और दूसरे पत्थर पर प्रहार करता है। एक नुकीला टुकड़ा अलग होकर गिरता है। वह उसे उठाकर मांस काटने का प्रयास करता है और सफल हो जाता है।

यहीं से आरम्भ होती है मानव की तकनीकी यात्रा।

प्रागैतिहासिक मानव के लिए औजार केवल जीवित रहने का साधन नहीं थे, बल्कि उसकी बुद्धिमत्ता, अनुभव, पर्यावरण के प्रति समझ और निरन्तर सीखने की क्षमता के प्रतीक थे। इसी कारण पुरातत्त्ववेत्ता किसी भी प्रागैतिहासिक स्थल पर प्राप्त पाषाण उपकरणों को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानते हैं। जहाँ लिखित अभिलेख उपलब्ध नहीं होते, वहाँ यही औजार उस युग के मौन इतिहासकार बन जाते हैं।

उत्तराखण्ड का हिमालयी क्षेत्र भी इस दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यहाँ विभिन्न स्थलों से प्राप्त पाषाण उपकरण यह संकेत देते हैं कि प्रागैतिहासिक मानव केवल मैदानी क्षेत्रों तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने पर्वतीय पर्यावरण के अनुरूप अपने जीवन और तकनीक का भी विकास किया।


प्रागैतिहासिक औजार क्यों हैं इतिहास की सबसे विश्वसनीय धरोहर?

प्रागैतिहासिक काल को समझने की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उस समय मनुष्य ने लेखन कला का विकास नहीं किया था। इसलिए उस युग के बारे में जानकारी लिखित स्रोतों से नहीं, बल्कि पुरातात्त्विक अवशेषों से प्राप्त होती है। इनमें पाषाण उपकरण सबसे अधिक टिकाऊ और सुरक्षित रहते हैं। लकड़ी, चमड़ा या हड्डी जैसे पदार्थ समय के साथ नष्ट हो जाते हैं, जबकि पत्थर के औजार हजारों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं।

इन उपकरणों के अध्ययन से इतिहासकार और पुरातत्त्ववेत्ता अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर खोजते हैं—

  • उस समय का मानव किस प्रकार का भोजन करता था?

  • क्या वह केवल आखेट करता था या भोजन संग्रह भी करता था?

  • वह किन पशुओं का शिकार करता था?

  • कौन-सी तकनीक से औजार बनाता था?

  • उसकी बौद्धिक क्षमता कितनी विकसित थी?

  • क्या वह समूह में रहता था?

  • क्या उसने पर्यावरण के अनुसार अपनी तकनीक बदली?

इस प्रकार, प्रत्येक पाषाण उपकरण केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि मानव जीवन, प्रकृति और तकनीकी विकास का साक्षी है।


उत्तराखण्ड में पाषाण उपकरणों का महत्व

उत्तराखण्ड की पर्वतीय भौगोलिक परिस्थितियाँ मैदानी क्षेत्रों से भिन्न रही हैं। ऊँचे पर्वत, गहरी घाटियाँ, तीव्र वेग वाली नदियाँ और विविध प्रकार की शिलाएँ यहाँ के प्राकृतिक परिवेश की विशेषताएँ हैं। ऐसी परिस्थितियों में रहने वाले प्रागैतिहासिक मानव को ऐसे औजारों की आवश्यकता थी जो हल्के, उपयोगी और स्थानीय संसाधनों से बनाए जा सकें।

पश्चिमी रामगंगा घाटी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी तथा अन्य क्षेत्रों से प्राप्त पाषाण उपकरण इस बात का संकेत देते हैं कि यहाँ के निवासी स्थानीय पत्थरों का चयन कर उन्हें अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप तराशते थे। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि हिमालयी क्षेत्र के मानव ने केवल प्रकृति पर निर्भर रहना नहीं सीखा, बल्कि उसे समझकर अपनी तकनीक भी विकसित की।


पत्थर से औजार बनाने की कला : मानव की पहली तकनीकी क्रांति

किसी भी पत्थर को उठाकर उसे औजार नहीं बनाया जा सकता था। इसके लिए उपयुक्त शिला, सही कोण और नियंत्रित प्रहार की आवश्यकता होती थी। इस प्रक्रिया को आधुनिक पुरातत्त्व में लिथिक प्रौद्योगिकी (Lithic Technology) कहा जाता है।

औजार बनाने की सामान्य प्रक्रिया इस प्रकार थी—

  1. उपयुक्त कठोर पत्थर का चयन।

  2. दूसरे कठोर पत्थर (Hammerstone) से नियंत्रित प्रहार।

  3. प्रहार के बाद निकले धारदार फ्लेक (Flake) का चयन।

  4. आवश्यकता अनुसार किनारों को पुनः तराशना (Retouch)।

  5. तैयार औजार का उपयोग।

यह प्रक्रिया देखने में सरल लग सकती है, परन्तु इसके लिए अभ्यास, अनुभव और सामग्री की समझ आवश्यक थी। यही कारण है कि पाषाण उपकरण मानव की बौद्धिक प्रगति के प्रत्यक्ष प्रमाण माने जाते हैं।


औजार बनाने में प्रयुक्त प्रमुख शिलाएँ

उत्तराखण्ड के भूगर्भीय स्वरूप के कारण यहाँ अनेक प्रकार की शिलाएँ उपलब्ध थीं। प्रागैतिहासिक मानव ने इनमें से उन्हीं का चयन किया जिनमें नियंत्रित प्रहार से धारदार किनारे बनाए जा सकते थे।

मुख्य शिलाएँ थीं—

  • क्वार्ट्जाइट (Quartzite) – कठोर एवं टिकाऊ, बड़े औजारों के लिए उपयुक्त।

  • क्वार्ट्ज (Quartz) – छोटे एवं तीक्ष्ण उपकरणों के निर्माण में उपयोगी।

  • चर्ट (Chert) – महीन बनावट, धारदार किनारे बनाने के लिए उत्कृष्ट।

  • जैस्पर (Jasper) – कुछ क्षेत्रों में छोटे औजारों के लिए प्रयुक्त।

  • नदी से प्राप्त गोल पत्थर (Pebbles/Cobbles) – प्रारम्भिक चॉपर एवं चॉपिंग टूल बनाने में उपयोग।

इन शिलाओं का चयन यह दर्शाता है कि प्रागैतिहासिक मानव केवल उपलब्ध संसाधनों का उपयोग नहीं करता था, बल्कि उनकी गुणवत्ता को पहचानने की क्षमता भी रखता था।


📌 क्या आप जानते हैं?

कई पाषाण औजारों पर आज भी सूक्ष्म घिसाव (Microwear) के निशान सुरक्षित हैं। आधुनिक वैज्ञानिक माइक्रोस्कोप की सहायता से इन निशानों का अध्ययन कर यह अनुमान लगा लेते हैं कि किसी औजार का उपयोग मांस काटने, लकड़ी छीलने, चमड़ा साफ करने या पौधों को काटने में किया गया था।


पाषाण युग के औजार : मानव बुद्धिमत्ता के विकास की कहानी

प्रागैतिहासिक मानव का जीवन उसके औजारों से पहचाना जाता है। समय के साथ जैसे-जैसे उसकी आवश्यकताएँ बढ़ीं, वैसे-वैसे उसके औजारों में भी परिवर्तन आया। बड़े और भारी उपकरण धीरे-धीरे छोटे, धारदार और अधिक उपयोगी बनने लगे। पुरातत्त्ववेत्ता इन्हीं परिवर्तनों के आधार पर पाषाण युग को पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण कालों में विभाजित करते हैं।

1. पुरापाषाण काल के औजार (Palaeolithic Tools)

पुरापाषाण काल मानव इतिहास का सबसे प्राचीन चरण माना जाता है। इस समय के औजार आकार में बड़े, भारी और अपेक्षाकृत खुरदरे होते थे। इनका निर्माण मुख्यतः कठोर पत्थरों—विशेषकर क्वार्ट्जाइट और नदी से प्राप्त गोल पत्थरों—को प्रत्यक्ष प्रहार (Direct Percussion) तकनीक से तराशकर किया जाता था।

इस काल के प्रमुख औजार थे—

  • हैण्डऐक्स (Handaxe) – बहुउद्देशीय उपकरण; आखेट, मांस काटने और लकड़ी काटने में उपयोग।

  • क्लीवर (Cleaver) – चौड़ी धार वाला उपकरण, बड़े पशुओं को काटने के लिए।

  • चॉपर (Chopper) – एक ओर धार वाला प्रारम्भिक औजार।

  • स्क्रेपर (Scraper) – पशुओं की खाल साफ करने तथा लकड़ी घिसने के लिए।

इन औजारों से स्पष्ट होता है कि प्रारम्भिक मानव शिकारी-संग्रहकर्ता था और उसका जीवन मुख्यतः प्रकृति पर निर्भर था।


2. मध्यपाषाण काल के औजार (Mesolithic Tools)

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलाव के साथ मानव ने अधिक सूक्ष्म और प्रभावी औजार विकसित किए। इस काल की सबसे बड़ी विशेषता माइक्रोलिथ (Microliths) हैं, जिनकी लंबाई सामान्यतः 1 से 5 सेंटीमीटर होती थी।

प्रमुख औजार—

  • माइक्रोलिथ

  • ब्लेड

  • पॉइंट

  • बुरिन

  • बैक्ड ब्लेड

इन छोटे औजारों को लकड़ी या हड्डी के डंडों में जड़कर तीर, भाले और अन्य संयुक्त उपकरण बनाए जाते थे। इससे आखेट अधिक प्रभावी हुआ और मानव की तकनीकी दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।


3. नवपाषाण काल के औजार (Neolithic Tools)

नवपाषाण काल में मानव ने कृषि, पशुपालन और स्थायी निवास की ओर कदम बढ़ाया। इसी कारण औजारों की प्रकृति भी बदल गई। इस काल के उपकरण केवल शिकार तक सीमित न रहकर खेती, निर्माण और दैनिक जीवन के कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होने लगे।

मुख्य औजार—

  • पालिशदार कुल्हाड़ी (Polished Axe)

  • छेनी (Chisel)

  • हथौड़ा

  • दरांती

  • पीसने वाले पत्थर (Grinding Stones)

  • ओखली और मूसल

इन उपकरणों पर की गई पालिश इस बात का प्रमाण है कि मानव केवल उपयोगिता ही नहीं, बल्कि औजारों की मजबूती और दक्षता पर भी ध्यान देने लगा था।


प्रमुख पुराविदों का योगदान

प्रागैतिहासिक औजारों के अध्ययन और वर्गीकरण में अनेक भारतीय तथा विदेशी पुरातत्त्वविदों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

  • सी. जे. थॉमसन ने त्रि-युग प्रणाली (Stone, Bronze, Iron Age) प्रस्तुत कर प्रागैतिहासिक अध्ययन की आधारशिला रखी।

  • जॉन ल्यूबॉक ने पाषाण युग को पुरापाषाण और नवपाषाण में विभाजित करने का विचार लोकप्रिय बनाया।

  • रॉबर्ट ब्रूस फुट को भारतीय प्रागैतिहासिक पुरातत्त्व का जनक कहा जाता है। उन्होंने 1863 में दक्षिण भारत के पल्लवरम से प्रथम पाषाण उपकरण खोजे।

  • एच. डी. सांकलिया ने भारतीय पाषाण संस्कृति और औजारों के विकास पर व्यापक शोध किया।

  • वी. एन. मिश्रा ने भारतीय प्रागैतिहासिक मानव, पर्यावरण और पाषाण तकनीक पर महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किए।

  • उत्तराखण्ड के संदर्भ में डॉ. यशोधर मठपाल ने शैलचित्रों एवं हिमालयी प्रागैतिहासिक संस्कृति पर उल्लेखनीय कार्य किया, जबकि डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' ने उत्तराखण्ड के पुरातात्त्विक स्थलों के दस्तावेजीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।


उत्तराखण्ड में प्राप्त प्रागैतिहासिक औजार: हिमालयी मानव की तकनीकी दक्षता के प्रमाण

उत्तराखण्ड के पर्वतीय भूभाग में प्राप्त पाषाण उपकरण यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ का प्रागैतिहासिक मानव केवल प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित नहीं था, बल्कि उसने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अपनी तकनीक भी विकसित की। यद्यपि उत्तराखण्ड में अभी तक भीमबेटका या सोहन घाटी जैसी विशाल पाषाण उपकरण कार्यशालाएँ (Tool Workshops) नहीं मिली हैं, फिर भी विभिन्न पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों से प्राप्त उपकरण हिमालय में मानव की प्राचीन उपस्थिति के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।

कुमाऊँ और गढ़वाल के अनेक क्षेत्रों से क्वार्ट्जाइट, क्वार्ट्ज तथा अन्य स्थानीय शिलाओं से निर्मित पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। इनसे यह स्पष्ट होता है कि यहाँ का मानव नदी घाटियों, पर्वतीय ढालों तथा प्राकृतिक आश्रयों के समीप निवास करता था और वहीं उपलब्ध पत्थरों से अपने उपकरण तैयार करता था।

1. पश्चिमी रामगंगा घाटी (अल्मोड़ा)

पश्चिमी रामगंगा घाटी उत्तराखण्ड के महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक क्षेत्रों में गिनी जाती है। यहाँ हुए सर्वेक्षणों में विभिन्न प्रकार के फ्लेक (Flakes), ब्लेड, स्क्रेपर तथा अन्य पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। इनसे संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा होगा। नदी तंत्र के कारण यहाँ उपयुक्त कच्चा पत्थर आसानी से उपलब्ध था, जिससे उपकरण निर्माण संभव हुआ।

2. कालसी (देहरादून)

उत्तराखण्ड में निम्न पुरापाषाण (Lower Palaeolithic) संस्कृति के प्रमाण सर्वप्रथम कालसी के निकट यमुना नदी के तटवर्ती जलोढ़ स्तरों (Terraces) से प्राप्त हुए। सन् 1961–62 में आर. पी. दास (R. P. Das) ने यहाँ से हैण्डऐक्स (Handaxe), चॉपर (Chopper) तथा अन्य प्रारम्भिक पाषाण उपकरण खोजे। बाद में अन्य शोधकर्ताओं ने भी इस क्षेत्र से पेबल (Pebble) औजारों की सूचना दी। ये उपकरण मुख्यतः क्वार्ट्जाइट से निर्मित हैं और प्रमाणित करते हैं कि यमुना घाटी प्रारम्भिक मानव की गतिविधियों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र थी।


3. अलकनंदा घाटी (श्रीनगर–डांग क्षेत्र)

गढ़वाल विश्वविद्यालय के डॉ. के. पी. नौटियाल तथा उनके सहयोगियों ने अलकनंदा घाटी, विशेषकर श्रीनगर और डांग क्षेत्र में व्यापक पुरातात्त्विक सर्वेक्षण किए। इन सर्वेक्षणों में नदी की पुरानी सतहों (River Terraces) से चॉपर, चॉपिंग टूल, फ्लेक, स्क्रेपर, पॉइंट, बोरर तथा द्विपार्श्वीय (Bifacial) उपकरण प्राप्त हुए। अधिकांश उपकरण क्वार्ट्जाइट के बने हैं और इनका संबंध पुरापाषाण परम्परा से माना जाता है। यह खोज इस धारणा को चुनौती देती है कि हिमालयी क्षेत्र में प्रारम्भिक मानव का निवास नहीं था।


4. अन्य क्षेत्र

अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, उत्तरकाशी तथा गढ़वाल के अनेक क्षेत्रों में समय-समय पर सतही सर्वेक्षणों से पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। अधिकांश उपकरण क्वार्ट्जाइट और क्वार्ट्ज से निर्मित हैं तथा इनमें स्क्रेपर, फ्लेक और ब्लेड प्रमुख हैं। इन खोजों से स्पष्ट होता है कि उत्तराखण्ड के विभिन्न भागों में प्रागैतिहासिक मानव का विस्तार व्यापक था।


उत्तराखण्ड के औजारों की प्रमुख विशेषताएँ

उत्तराखण्ड से प्राप्त पाषाण उपकरणों का अध्ययन निम्न विशेषताओं को उजागर करता है—

  • स्थानीय शिलाओं (विशेषकर क्वार्ट्जाइट और क्वार्ट्ज) का व्यापक उपयोग।

  • नदी घाटियों से प्राप्त पत्थरों को कच्चे पदार्थ (Raw Material) के रूप में अपनाना।

  • बड़े और भारी उपकरणों की अपेक्षा फ्लेक-आधारित तथा अपेक्षाकृत छोटे उपकरणों की अधिकता।

  • शिकार, पशु प्रसंस्करण, लकड़ी काटने तथा दैनिक उपयोग के लिए बहुउद्देशीय औजार।

  • पर्वतीय पर्यावरण के अनुरूप तकनीकी अनुकूलन (Adaptation)।


उत्तराखण्ड के प्रमुख शोधकर्ताओं का योगदान

उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अध्ययन को आगे बढ़ाने में कई विद्वानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है—

  • विलियम जे. हेनवुड (1856) — कुमाऊँ में प्रारम्भिक पुरातात्त्विक खोजों का श्रेय।

  • एलेक्ज़ेंडर कनिंघम और कार्नैक — उत्तर भारत के पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों के दौरान हिमालयी क्षेत्रों की प्राचीनता पर ध्यान आकर्षित किया।

  • डॉ. यशोधर मठपाल — लखु उडियार एवं उत्तराखण्ड के शैलचित्रों पर विश्वस्तरीय शोध।

  • डॉ. शिवप्रसाद डबराल 'चारण' — उत्तराखण्ड के इतिहास और पुरातत्त्व के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण में महत्वपूर्ण योगदान।

  • डॉ. डी. पी. अग्रवाल — हिमालयी पुरातत्त्व, पर्यावरण और मानव बसावट पर महत्वपूर्ण शोध।


इन खोजों का महत्व

कालसी, अलकनंदा घाटी और पश्चिमी रामगंगा घाटी से प्राप्त पाषाण उपकरण यह सिद्ध करते हैं कि उत्तराखण्ड का हिमालय केवल शैलचित्रों और महापाषाणीय स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ निम्न पुरापाषाण से मध्य पुरापाषाण काल तक मानव की सक्रिय उपस्थिति रही। इन खोजों ने यह स्थापित किया कि हिमालयी नदी घाटियाँ प्रारम्भिक मानव के लिए जल, कच्चे पत्थर और प्राकृतिक आश्रय उपलब्ध कराती थीं, इसलिए वे उसके निवास और गतिविधियों के अनुकूल क्षेत्र थीं। 

निष्कर्ष

उत्तराखण्ड से प्राप्त प्रागैतिहासिक औजार संख्या में भले ही भारत के कुछ अन्य क्षेत्रों की तुलना में कम हों, परन्तु उनका वैज्ञानिक महत्व अत्यंत अधिक है। ये उपकरण सिद्ध करते हैं कि हिमालय केवल धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं का केंद्र नहीं रहा, बल्कि मानव की प्रारम्भिक तकनीकी, आर्थिक और सांस्कृतिक यात्रा का भी एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। भविष्य में व्यवस्थित उत्खनन, वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण और आधुनिक विश्लेषण तकनीकों के माध्यम से उत्तराखण्ड के प्रागैतिहासिक अतीत के अनेक नए तथ्य सामने आने की पूरी संभावना है।


"जड़ों को जानना ही भविष्य को दिशा देना है।"
— जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओ

"थात- जड़ों से जुड़कर भविष्य की ओर" फेसबुक पेज से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें:


📚 संदर्भ

  • यशवंत सिंह कठौच — उत्तराखण्ड का नवीन इतिहास
  • एम. पी. जोशी — उत्तराखण्ड का राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास
  • यशोधर मठपाल — उत्तराखण्ड की प्रागैतिहासिक शैलकला संबंधी शोधकार्य।
  • D. P. Agrawal et al. — Cist Burials of the Kumaun Himalayas, Antiquity.
  • Archaeological Survey of India (ASI) — पुरातात्विक अभिलेख एवं संरक्षण संबंधी सामग्री।
  • IGNCA — प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों एवं सूक्ष्मपाषाणीय औजारों संबंधी अध्ययन।
  • Geoheritage Sites in Kumaun Himalaya of Uttarakhand, India — कुमाऊँ हिमालय के शैलाश्रयों एवं शैलकला पर अध्ययन। 


लेखक: डॉ. भावना जुयाल
© डॉ. भावना जुयाल, 2026. सर्वाधिकार सुरक्षित।
(इस लेख का कोई भी भाग लेखक की पूर्व अनुमति के बिना पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता।)

 

4 टिप्‍पणियां:

उत्तराखण्ड का प्रागैतिहासिक काल (भाग–7) प्रागैतिहासिक औजारों का विस्तृत अध्ययन : पत्थरों में छिपी मानव सभ्यता की विकासगाथा

"जब मनुष्य ने पहली बार किसी पत्थर को अपनी आवश्यकता के अनुसार तराशा, तभी से सभ्यता की यात्रा का वास्तविक आरम्भ हुआ। वही साधारण-सा पत्थर ...